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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

Page 178 of 804

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Page 178

१२६ मीमांसादर्शनम् [ सू०
गादिभिरेकदर्शपूर्णमासादिप्रयोगावासिवचनं कर्माल्पत्वमहत्त्वकृतं फलभेदं
दर्शयति ॥ १७ ॥
न्या० सु०—अन्वारुह्य वचनस्य प्रयोजनमाह—तच्चैतदिति । दक्षिणापरिमाण-
साम्येऽपि फलाधिक्यमन्तरेणासारद्रव्यदानेनापि क्रतुसिद्धौ सारद्रव्यदाने प्रवृत्त्ययोगात्सूत्रा-
तिरेकेण भाष्ये सारग्रहणम् । विशेषमुपपादयति—साधनेति । अत्राशङ्कते—इति स्थित
इति । परिहरति—तदभिधीयते इति । स्थानादपीयं व्यवस्था सिद्धयतीत्याह—किं चेति ।
श्लोकं व्याचष्टे—यथैवेति । कर्मगोचर इत्यादिना समुदायाभिप्रायः स्वगोचरशब्दः ।
निर्धारणे च सप्तमी व्यवस्थावचनश्च विभागशब्द इति व्याख्यातः ।
ब्रह्महत्याश्वमेधाभ्यां न परं पुण्यपापयोः ।
आभूतसंप्लवान्तं च फलमिष्टं तयोर्द्विज ॥
इत्यादिसमरणादपि व्यवस्थाऽवसीयेत इत्याह—स्मरणादपीति । यदग्निहोत्रं जुहोति
अथ दशगृहमेधिन आप्नोत्येकया रात्र्या यदा दश संवत्सरानग्निहोत्रं जुहोत्यथ दर्शपूर्ण-
मासयाजिनामाप्नोति यदा दश, संवत्सरान् दर्शपूर्णमासाभ्यां यजतेऽथाग्निष्टोमयाजिनामा-
प्नोतीत्याद्यन्यार्थदर्शनादपि व्यवस्थासिद्धिरित्याह—चातुर्मास्यसोमेषु चेति । चातुर्मास्य-
वत्सोमेऽपीत्यर्थः ॥ १७ ॥
भा० प्र०-कर्म के परिमाण के अनुसार फल की अल्पता और आधिक्य होता है ।
निरूढ पशुबन्ध नामक यज्ञ से स्वर्ग की प्राप्ति होती है एवं ज्योतिष्टोम दर्शपूर्णमास आदि
कर्मों से भी स्वर्ग की प्राप्ति होती है इसी प्रकार अश्वमेध विषयक ज्ञान ब्रह्महत्या आदि
पापों से छुटकारा मिलता है एवं अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान से भी ब्रह्महत्या आदि पापों
की निवृत्ति होती है, किन्तु ये सभी एक प्रकार के नहीं हैं। अल्प परिश्रम साध्य कर्म से
किस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, वह भिन्न प्रकार एवं उसका स्थायित्व भिन्न जातीय
होता है, एवं अधिक परिश्रम से साध्य कर्म से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है वह उससे
भिन्न एवं उसका स्थायित्व भी भिन्न है । इसलिए तैत्तिरीयसंहिता "उच्चावचकर्म्मणा-
मेकविधफलासम्भवात् स्वर्गो बहुविधः", स्वल्प और महत् कर्म से एक प्रकार का
स्वर्गरूपी फल नहीं हो सकता है; अतः, स्वर्ग अनेक प्रकार का है, जो व्यक्ति जिस
प्रकार का कर्म करता है, उस कर्म के परिणाम के अनुसार स्वर्ग का भोग भिन्न प्रकार
का होता है । जैसे एक कपड़ा पाँच रुपये का खरीदा जा सकता है और एक रुपया का
भी कपड़ा खरीदा जा सकता है, किन्तु कपड़ा होने पर भी उनमें बहुत भेद है । इसी
तरह कर्म की स्वल्पता और महत्त्व के अनुसार स्वर्ग भोग अल्पकाल स्थायी एवं अधिक
काल स्थायी होता है । नरक के भोग का भी यही नियम है । इसी प्रकार कायिक
वाचिक एवं मानसिक भेद से ब्रह्महत्या अनेक प्रकार की है । मन में ब्रह्महत्या की