मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context१२४ मीमांसादर्शनम् [ सू०
पूर्वसूत्रानुषङ्गेण सर्वत्वमिति सूत्रावयवो व्याख्यातः। तत्सिद्धयर्थं पूर्वोक्तमप्यर्थवाद-
विषयत्वं स्मारयति—संस्कारेति। पूर्णाहुतिविद्ययोः संस्कारत्वात्पशुबन्धस्य चारादुप-
कारककर्मत्वादित्यर्थः। सर्वकामफलस्येति भाष्येण सर्वत्वमित्यवयवावृत्त्या सर्वकामा-
वाप्तिवचनालम्बनाभिधानार्थत्वेनैतत्सूत्रं व्याख्यातम्। तद्व्याचष्टे—स्तुतिस्त्विति। उक्तेऽर्थे
सूत्रं योजयति—सूत्रं चेति।
असर्वेष्वितिभाष्येण सर्वत्वानुपपत्तिपरिहारार्थत्वेन पुनरेतत्सूत्रं व्याख्यातम्। तदा-
शङ्कापूर्वं विवृणोति—ननु चेति। एकस्मै वा अन्ये यज्ञक्रतवः कामायाद्रियन्ते, सर्वेभ्यो
ज्योतिष्टोम इत्यधिकृतस्य ज्योतिष्टोमस्य सर्वकामसाधनत्वात्तदङ्गभूतस्य पशुबन्धस्य तद्-
द्वारा सर्वलोकसाधनत्वं स्तुत्यर्थमुपचारादुक्तमित्येवं सूत्रं योज्यम्। विद्योदाहरणे तु पूर्व-
सूत्रागतविद्याशब्दानुषङ्गेण विद्याप्याधिकारिकीति विपरिणामेनाधिकृताश्वमेधफलं मृत्यु-
तरणादि तदुपकारिण्यां विद्यायामश्वमेधस्तुत्यर्थमुपचारेणोक्तमिति योज्यम् ॥ १६ ॥
भा० प्र०—'अन्यानर्थक्यात्' इस सूत्र के व्याख्यान में "पूर्णाहुत्या सर्वान् कामाना-
प्नोति" इस अर्थवाद वाक्य का उल्लेख कर विध्यन्तर का आनर्थक्य समर्थित किया गया
गया है, किन्तु वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि, 'सभी ब्राह्मणों को भोजन कराया जाय'
यह कहने पर निमन्त्रित या घर पर आये हुए सभी ब्राह्मणों की अवगति होती है।
वैसे ही पूर्णाहुत्या सर्वान् कामाप्नोति' यह "पूर्णाहुतिं जुहुयात्" इस विधि का शेष है।
अतः; इस प्रकरण में उल्लिखित सभी कामनाओं का सर्वत्व विवक्षित है। पूर्णाहुति के
अभाव में आधानरूप कर्म अङ्ग-विकल होगा; उस अङ्गविकलता का पूर्णाहुति समाधान
होता है; यह एक काम है। उसका समाधान होने पर आहवनीय आदि अग्नियां अग्नि-
होत्र आदि कर्मों में योग्य होती हैं—यह दूसरा काम है। उन कर्मों से वे कर्म फल प्राप्त
होते हैं—यह अन्य काम है। इस तरह सभी कामनाओं की प्राप्ति अन्य आहुतियों से भी
कही गई है ? इसके उत्तर में कहा गया है कि इसमें हानि क्या है ? इससे पूर्णाहुति की
स्तुति से कोई हानि नहीं है। इस स्थल में अन्य अधिकार में भी कामना का प्रसङ्ग हो
सकता है। और इस प्रकार विद्यान्तर का भी आनर्थक्य नहीं हो सकता है। अन्य स्थल
में जहाँ "सभी कामनाएं सिद्ध होती है" इस प्रकार के वचन कहे गये है, वहाँ भी इसी
प्रकार समझना चाहिए ॥१६॥
फलस्य कर्मनिष्पत्तेस्तेषां लोकवत्परिमाणतः फलविशेषः
स्यात् ॥ १.२.१७ ॥
शा० भा०—अन्वारुह्य वचनमिदम्। यद्यपि विधिः, तथाऽप्यर्थवत्ता परि-
माणतः सारतो वा फलविशेषात् ॥ १७ ॥