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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)

DevanagariHindipublished100 pages

प्रारंभिक मंगलाचरण, प्रस्तावना एवं कापालिक सत्यसोम प्रवेश

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महेन्द्रविक्रमवर्मा-कृत
मत्तविलास-प्रहसन
(विस्तृत-भूमिका, हिन्दी-अनुवाद एवं टिप्पणियों सहित)
रानी मजूमदार
विवेक पब्लिकेशंस
अलीगढ़

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पपेक्षा 'मत्त
...गी...

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Rs. 100/=
AB 28/3/14
Library
Sahitya

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महेन्द्रविक्रमवर्मा-कृत
मत्तविलास-प्रहसन
(विस्तृत-भूमिका, हिन्दी-अनुवाद एवं टिप्पणियों सहित)
सम्पादिका एवं अनुवादिका
रानो मजूमदार
एम०ए०(अलीगढ़), पी-एच०डी० (वल्लभ-विद्यानगर )
संस्कृत-विभाग,
महिला महाविद्यालय,
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय,
अलीगढ़
विवेक
विवेक पब्लिकेशंस
अलीगढ़
RGCSLIB
16366

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प्रकाशक :
विवेक पब्लिकेशन्स,
३/३६४, समद रोड,
अलीगढ़-२०२००१ (उ०प्र०)
प्रथम संस्करण : १९८८
मूल्य : पुस्तकालय संस्करण : रु० १००/-
विद्यार्थी संस्करण : रु० ३०
MATTAVILĀSA-PRAHASANA
OF
MAHENDRAVIKRAMAVARMAN
Edited by :
Rani Majumdar
First Published : 1988
Price : Library Edition : Rs. 100/-
Student Edition : Rs. 30
Viveka Publications,
3/364, Samad Road,
Aligarh-202001 (India)
मुद्रक :
चित्रा प्रिंटिंग प्रेस
गंगागंज, पड़ाव दुबे,
अलीगढ़-२०२००१ (उ०प्र०)

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समर्पण
परम-पूज्य-पिता
स्व० रमेन्द्रसुन्दर मजूमदार
की
पुण्य स्मृति में

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विषय-सूची
शुभाशीर्वाद
प्राक्कथन
सङ्केताक्षर-सूची
भूमिका ... १-२१
मत्तविलास-प्रहसन ... २१-६३
(मूल-संस्कृत एवं हिन्दी-अनुवाद)
प्रहसन के पात्र ... ६४
टिप्पणियाँ ... ६५-८१
श्लोक-सूची ... ८२
सन्दर्भ-ग्रंथ-सूची ... ८३
शुद्धि-पत्र ... ८४

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शुभाशीर्वाद
डा० रानी मजूमदार एम० ए० कक्षा में मेरी छात्रा रही हैं।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च प्रथम श्रेणी में एम०ए० उपाधि प्राप्त
करने के बाद उन्होंने सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ-विद्यानगर, गुजरात,
से पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। तदनन्तर वे प्रो० रामसुरेश त्रिपाठी
के साथ 'बृहदारण्यक-उपनिषद्' पर उच्चतर शोधकार्य करती रहीं। साथ ही
वे महिला महाविद्यालय (अ० मु० वि० वि०), अलीगढ़, में अध्यापन-कार्य भी
करती रही हैं। विशेष रूप से संस्कृत-नाट्य का अध्यापन करते हुए छात्रों
में रुचि उत्पन्न करने के लिए पाठ्यक्रम में कुछ हास्यरस-प्रधान प्रहसन भी होने
चाहिएँ, ऐसा उन्हें अनुभव हुआ। इसी प्रेरणा से उन्होंने प्रस्तुत 'मत्तविलास-
प्रहसन' का संस्करण सम्पादित किया है। पूर्व प्रकाशित संस्करणों से इस
संस्करण में बहुत अधिक उपयोगी सामग्री दी गई है। पाठ-शुद्धि का भी विशेष
ध्यान रखा गया है। अनुवाद में प्रत्येक शब्द का उचित अर्थ—एक या अनेक—देने
का प्रयास किया गया है। कापालिक, जैन, बौद्ध सम्प्रदायों के दार्शनिक
सन्दर्भ स्पष्ट करते हुए प्रहसन-काल में इन सम्प्रदायों में जो विकृतियाँ आगईं
थीं उन्हीं को लेकर हास्य रस कैसे पैदा किया गया है, यह भी लेखिका ने
स्पष्टीकरण किया है। विद्वत्तापूर्ण 'भूमिका' तथा टिप्पणियों से इस संस्करण
की उपयोगिता बढ़ गई है। लेखिका इसी प्रकार कार्य करके संस्कृत-विद्या के
क्षेत्र में मान्यता प्राप्त करें, यही मेरा शुभाशीर्वाद है।
—चिन्तामणि त्र्यम्बक केंधे
प्रोफेसर, संस्कृत विभाग,
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय,
अलीगढ़ (उ०प्र०)
२५ सितम्बर, १९८८ ई०

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प्राक्कथन

'मत्तविलास-प्रहसन' सातवीं शताब्दी के पल्लववंशीय राजा
महेन्द्रविक्रमवर्मा द्वारा रचित शुद्ध कोटि का प्रहसन है। ऐतिहासिक व्यक्ति
की रचना होने के कारण इस प्रहसन की ओर मेरा ध्यान आकर्षित हुआ।
इस प्रहसन का सरल हिन्दी अनुवाद तथा इसमें आए हुए बौद्ध, जैन व
शैव धर्म से सम्बन्धित शब्दों की टिप्पणियाँ प्रस्तुत करने का यह मेरा एक
प्रयासमात्र है। वस्तुतः, बोधायन के नाम पर प्रचलित किन्तु महेन्द्रविक्रमवर्मा
द्वारा लिखित माने गए 'भगवदज्जुक्रीय-प्रहसन' और 'मत्तविलास-प्रहसन'
के तुलनात्मक अध्ययन' पर, मैं आगे कार्य करने की इच्छुक हूँ।
स्व० प्रो० रामसुरेश त्रिपाठी, भूतपूर्व अध्यक्ष, संस्कृत-विभाग, अलीगढ़
मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के प्रति मैं कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ जो मेरे
छात्र-जीवन की आधारशिला रहे। उन्हीं की प्रेरणा और प्रोत्साहन के कारण
मैं आज भी अध्ययन-कार्य में प्रवृत्त हूँ। प्रो० चिन्तामणि त्र्यम्बक कँधे के प्रति
भी मैं अत्यधिक कृतज्ञ हूँ जिन्होंने मुझे उचित निर्देशन दिया। प्रस्तुत पुस्तक
की प्रस्तावना लिखकर उन्होंने मेरा जो उत्साह बढाया है उसके लिए मैं
उनकी चिर-ऋणी रहूँगी। डा० श्रीरामुल राजेश्वर शर्मा, रीडर, संस्कृत-
विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, के प्रति भी मैं अत्यधिक आभारी हूँ
जिन्होंने इस पुस्तक के रचयिता महेन्द्रविक्रमवर्मा के विषय में समय निर्धारण
सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण जानकारी दी, यत्र तत्र उपस्थित हुई अनेक कठिनाइयों
एवं त्रुटियों को दूर किया और कई रचनात्मक सुझाव भी दिए।
श्रीमती लीलावती त्रिपाठी एवं श्रीमती सुलभा कँधे के प्रति कृतज्ञता
प्रकट करना भी मैं अपना परम-कर्तव्य समझती हूँ जो पुस्तक-लेखन के कार्य
में मेरे लिए सतत् प्रेरणा का स्रोत बनी रहीं। डा० उमेशचन्द्र शर्मा के
प्रति भी मैं आभारी हूँ जिन्होंने पुस्तक की पाण्डुलिपि को पढ़ने का कष्ट
किया तथा कुछ सुझाव दिए। प्रियसखि डा० (श्रीमती) हितेष सिंह ने लेखन
कार्य में जो सहयोग मुझे दिया उसके लिए भी अपनी कृतज्ञता व्यक्त
करती हूँ। अपने पति सैयद ज़ाहिद हसन के प्रति भी मैं आभारी हूँ
जिन्होंने आर्थिक सहायता देकर इस पुस्तक के प्रकाशन में सहयोग दिया।
अन्त में, सहृदय पाठकों से अनुरोध है कि इस पुस्तक की मुद्रण व
अन्य त्रुटियों को लेखिका की प्रथम कृति समझकर क्षमा कर देंगे।
—रानी मजूमदार
संस्कृत विभाग,
महिला महाविद्यालय,
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय,
अलीगढ़ (उ० प्र०)
२० सितम्बर, १६८८

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संकेताक्षर-सूची
अभि० दर्पण — अभिनयदर्पण
अभि० भा० — अभिनवभारती
अष्टा० — अष्टाध्यायी
दश० — दशरूपक
ना० द० — नाट्यदर्पण
सा० द० — साहित्यदर्पण

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भूमिका
संस्कृत काव्य
संस्कृत साहित्य के प्रायः सभी आलंकारिकों ने काव्य के स्वरूप के
विषय में अपने-अपने विचार व्यक्त किए हैं। भामह, रुद्रट, वामन, विद्यानाथ
आदि आचार्य शब्दार्थयुगल को काव्य मानते हुए शब्द और अर्थ दोनों पर
समान बल देते हैं। इन आचार्यों की काव्य-परिभाषाएँ इस प्रकार हैं—
'शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्।' —भामह
'शब्दार्थौ काव्यम्।' —रुद्रट
'काव्यशब्दोऽयं गुणालंकारसंस्कृतयोः शब्दार्थयोर्वर्तते।' —वामन
गुणालंकारसहितौ शब्दार्थौ दोषवर्जितौ (काव्यम्) —विद्यानाथ
जयदेव ने 'चन्द्रालोक' में काव्य-परिभाषा में दोष, लक्षण, रीति, गुण,
अलंकार, रस, वृत्ति—इन सभी का समावेश किया है—
निर्दोषा लक्षणवती सरीतिर्गुणभूषणा ।
सालंकाररसानेकवृत्तिर्वाक् काव्यनामभाक् ॥ (१.७)
आनन्दवर्धनाचार्य शब्द और अर्थ दोनों पर बल देते हैं परन्तु
'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' कहकर ध्वनि (व्यंग्य) को काव्य की आत्मा
मानते हैं।
पण्डितराज जगन्नाथ के अनुसार रमणीय अर्थ का प्रतिपादन कराने
वाला शब्द ही काव्य है—
'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्।'
दण्डी ने अपने काव्य अथवा काव्य-शरीर की परिभाषा में स्पष्टतः
अर्थ की अपेक्षा शब्द पर अधिक बल दिया है क्योंकि उनके अनुसार शब्द-
समूह काव्य या काव्य-शरीर है। अर्थ की इष्टता उस शब्द-समूह के
काव्यत्व की शर्त मात्र है—
'शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली।'
विश्वनाथ कविराज रसात्मक वाक्य को ही काव्य मानते हैं—
'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।'

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२ मत्तविलास-प्रहसन
परन्तु आज जो मत सर्वमान्य है वह है आचार्य मम्मट का काव्य
लक्षण सम्बन्धी मत। उन्होंने अपनी काव्य परिभाषा में अन्य सभी मतों को
यथोचित सम्मान दिया है। मम्मट के विचार में काव्य वे शब्द एवं अर्थ हैं जो
दोषरहित परन्तु सगुण और कभी-कभी अलंकारों से भी रहित हो सकते हैं—
‘तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि।’
मम्मट ने यद्यपि काव्य में ध्वनि को प्राधान्य दिया है तथापि रस, अलंकार
और रीति को भी काव्य में महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना है।
अन्त में मम्मट के ही विचार से ‘यह कृति जो नियति के रचित
नियमों से आबद्ध नहीं है, जो आह्लाद से युक्त है, जो अन्य किसी कारण
आदि के वशीभूत नहीं है, नव रसों से युक्त होने के कारण जिसकी रचना
मनोहारिणी है, ऐसी कवियों की वाणी सदैव विजयी होती है’—
नियतिकृतनियमरहितां ह्लादैकमयीमनन्यपरतन्त्राम् ।
नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती भारती कवेर्जयति ॥
काव्य के भेद
काव्य के मुख्य रूप से दो भेद हैं—
(१) श्रव्य काव्य (२) दृश्य काव्य
श्रव्य काव्य का आनन्द पढ़कर या सुनकर लिया जाता है। इसके
पुनः तीन भेद होते हैं—गद्य-काव्य, पद्य-काव्य और चम्पू-काव्य। गद्य-काव्य के
अन्तर्गत कथा और आख्यायिका, पद्य-काव्य के तन्तर्गत महा-काव्य, खण्ड-काव्य
मुक्तक-काव्य और गीति-काव्य आदि तथा गद्य-पद्य-मयी रचनायें चम्पू-काव्य
के अन्तर्गत आती हैं।
दृश्य-काव्य वे काव्य हैं जो नेत्रों के माध्यम से हृदय में प्रवेश करते
हैं, अर्थात् जो रङ्गमंच पर अभिनीत किए जाते हैं। इसी कारण श्रव्य काव्य
की अपेक्षा दृश्य काव्य अधिक रमणीय होता है। कहा भी जाता है—
‘काव्येषु नाटकं रम्यम्।’
दशरूपकार धनञ्जय नाट्य, रूप और रूपक—इन तीनों को दृश्य
काव्य का पर्याय मानते हैं।
नाट्य—उनके अनुसार चार प्रकार के अभिनय (आङ्गिक, वाचिक, आहार्य

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भूमिका ३
और सात्त्विक) के द्वारा अनुकार्य (राम आदि) के साथ नायक की अवस्थाओं
का अनुकरण नाट्य कहलाता है—
'अवस्थानुकृतिर्नाट्यम्।' १.७
रूप—दृश्य होने के कारण वह नाट्य रूप भी कहलाता है।
'रूपं दृश्यतयोच्यते।' १.८
जिस प्रकार दृश्य अर्थात् चाक्षुष ज्ञान का विषय होने के कारण नील,
पीत, कृष्णादि रूप कहलाते हैं उसी प्रकार दृश्य होने के कारण नाट्य भी
रूप कहलाता है।
रूपक—आरोप किया जाने के कारण वह नाट्य रूपक कहलाता है।
'रूपकं तत्समारोपात्।' १.८
जिस प्रकार मुख में चन्द्रमा का आरोप किया जाने के कारण 'मुखचन्द्र'
में रूपक अलंकार होता है उसी प्रकार नट में राम आदि की अवस्था
(रूप) का आरोप होने के कारण नाट्य को भी रूपक कहते हैं।
भरत मुनि के मतानुसार 'सुख-दुःख' समन्वित संसार का स्वभाव जब
चार प्रकार के अभिनयों से अभिनीत होता है तो वही नाट्य कहलाता है।
अभिनवगुप्त के मत में नाट्य लौकिक पदार्थों से भिन्न है; अनु-

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४ मत्तविलास-प्रहसन
'नटैर्यत् प्रदर्श्यते तन्नाट्यम् । तत्र नृत्यगीतादीनां प्रवेशो नास्ति ।'¹
अर्थात् नटों के द्वारा जो प्रदर्शित किया जाता है तथा जिसमें नृत्त
गीतादि का समावेश नहीं होता है वह नाट्य कहलाता है। परन्तु महिमभट्ट
ने नाट्य में गीत का प्रयोग स्वीकार किया है। उनके मत में नाट्य 'वाक्या-
र्थाभिनयात्मक' तथा रसाश्रय होता है।² नन्दिकेश्वर के मतानुसार आदर्श
पूर्वकथा के अभिनय को नाट्य कहते हैं।³ वे नाट्य की प्रतिष्ठा सत्त्व में
मानते हैं—
'सत्त्वे नाट्यम् प्रतिष्ठितम् ।' (अभि० दर्पण, १५)
नाट्य का मुख्य धर्म है—कथनोपकथन; आचार्यों की मान्यता है कि
कथनोपकथन के बिना अनुकृति अधूरी होगी; इसलिए नाट्य में वाचिकाभिनय
का विशेष महत्त्व है।⁴
नाटक का उद्भव
नाटक की उत्पत्ति कब और कैसे हुई यह संस्कृत साहित्य का एक
विवादास्पद विषय है। आदि काल से ही मानव हृदय में अनुकरण की प्रवृत्ति
रही और उसका काल-क्रम से विकास होकर नाटक के रूप में उसकी परिणति
हुई यह पौराणिक मान्यता है। 'ऋग्वेद' में यम-यमी संवाद (१०.१०) पुरूरवा-
उर्वशी संवाद (१०.९५), अगस्त्य-लोपामुद्रा संवाद (१.१७९) और विश्वा-
मित्र-नदी संवाद (३.३३) आदि नाटक के बीज माने जाते हैं। 'रामायण'
में भी नट, नर्तक, नाटक, रङ्ग एवं कुशीलव आदि का प्रयोग और 'महाभारत'
में रङ्गशाला, नट आदि का उल्लेख इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि नाटकों
का विकास अवश्य होने लगा था। भारतीय परम्परा नाटक को पंचम वेद
ही मानती है और इसका साक्षात् प्रमाण है—भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र'।
१. उद्धृत—वाचस्पति गैरोला, 'भारतीय नाट्यपरम्परा और अभिनय-
दर्पण,' पृ० ७६
२. वही, पृ० ७७
३. अभि० दर्पण, १५
४. वाचस्पति गैरोला, 'भारतीय नाट्यपरम्परा और अभिनयदर्पण', पृ० ८०

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भूमिका ५
इसके प्रथम अध्याय में ही नाटक की उत्पत्ति के विषय में लिखा है कि त्रेता
युग में ब्रह्मा द्वारा नाटक की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा ने 'ऋग्वेद' से पाठ्य 'सामवेद'
से गान, 'यजुर्वेद' से अभिनय और 'अथर्ववेद' से रस इन चार तत्त्वों को ग्रहण
किया-
जग्राह पाठ्यमृग्वेदात्सामभ्यो गीतमेव च ।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥
ब्रह्मा की प्रेरणा से विश्वकर्मा ने नाट्यगृह की रचना की और
भरतमुनि ने अभिनय की व्यवस्था की। भरत ने अपने सौ शिष्यों और
अप्सराओं को नाट्य कला की शिक्षा दी। इस नाट्य कला को पूर्ण करने
के लिए शिव ने नाट्य के साथ ताण्डव, पार्वती ने लास्य नृत्य और विष्णु ने
नाट्य रीति प्रदान की। इस प्रकार भरत ने नाट्यशास्त्र का प्रणयन कर
नर लोक में नाट्य का प्रचार किया।
शुभङ्करकृत 'सङ्गीतदामोदर' में नाटक की उत्पत्ति के विषय में लिखा
है कि—प्राचीन काल में इन्द्र के द्वारा प्रार्थना किए जाने पर ब्रह्मा ने वेदों
से आकर्षण कर पञ्चम नाट्य वेद को बनाया ऐसा सुना जाता है। स्मृति
में चार वेद और एक उपवेद कहे गये हैं। उनमें शिव ने ब्रह्मा को गन्धर्व-
वेद (नाट्यवेद) उपवेद बताया। ब्रह्मा ने भरत को बताया और भरत के
द्वारा उसका मर्त्यलोक में प्रचार किया गया। अतः शिव, ब्रह्मा और भरत
इस नाट्यवेद के प्रयोजक माने गये हैं—
इहानुश्रूयते ब्रह्मा शक्रेणाभ्यर्थितः पुरा।
चकाराऽकृष्य वेदेभ्यो नाट्यवेदं तु पञ्चमम् ॥
उपवेदोऽथ वेदाश्च चत्वारः कथिताः स्मृतौ ।
तत्रोपवेदो गान्धर्वः शिवेनोक्तः स्वयम्भुवे ॥
तेनाऽपि भरतायोक्तस्तेन मर्त्ये प्रचारितः।
शिवाऽब्जयोनिभरतास्तस्मादस्य प्रयोजकाः ॥
इस प्रकार अत्यन्त प्राचीन समय से लेकर वेद-शास्त्र और 'रामायण'
'महाभारत' आदि से नाटक की स्वतन्त्र रूप से उत्पत्ति प्रमाणित होती है।
रूपक के भेद
धनंजय के अनुसार रसों पर आश्रित रूपक दस प्रकार के होते हैं—
'दशधैव रसाश्रयम्' ।

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६ मत्तविलास-प्रहसन
धनञ्जय रूपकों के भेद को एक और स्वरूप देते हैं—(१) शुद्ध रूपक
और (२) संकीर्ण रूपक ।
वस्तु, नेता और रस के आधार पर एक दूसरे से भिन्न स्वरूप वाले
दस रूपक ही शुद्ध रूपक हैं। इनमें से दो या तीन रूपकों के कतिपय लक्षणों
का मिश्रण जिस रूपक में पाया जाता है वह रूपक का संकीर्ण भेद है जैसे
नाटक और प्रकरण के लक्षणों का संकर होने के कारण नाटिका संकीर्ण
रूपक है। कुछ व्याख्याकारों ने नाटिका और प्रकरणिका दोनों को पृथक्
पृथक् संकीर्ण रूपक माना है (ना०द० १.३) । लेकिन धनिक ने इस मत
का खण्डन करके नाटिका और प्रकरणिका को रूपकों में जोड़कर बारह रूप
मान लिये हैं।
'दशरूपक' में शुद्ध रूपकों का वर्णन इस प्रकार है—
नाटकं सप्रकरणं भाणः प्रहसनं डिमः ।
व्यायोगसमवकारौ वीथ्यङ्केहामृगा इति ॥ (१.८)
अर्थात् नाटक, प्रकरण, भाण, प्रहसन, डिम, व्यायोग, समवकार, वीथी,
अङ्क और ईहामृग ।
संस्कृत साहित्य में प्रहसन
जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, प्रहसन का विषय मुख्य रूप से
हास्य ही होता है—'प्रकृष्टं हसत्यनेनेति प्रहसनम् ।' संस्कृत साहित्य के इतिहास
में प्रहसन का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । संस्कृत के विभिन्न आचार्यों ने समय-
समय पर प्रहसन की भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। धनञ्जय के
मतानुसार प्रहसन नामक रूपक भेद वस्तु, सन्धि, सन्ध्यङ्ग, अङ्क तथा
लास्यादि में भाण की तरह होता है—
'भाणवद्वस्तुसन्धिसन्ध्यङ्गलास्यादीनामतिदेशः ।' (दश० ३)
प्रहसन की कथावस्तु कल्पित होती है, एक या दो अङ्क होते हैं, धूर्त, पाखण्डी
विप्र तथा कामुक आदि पात्र होते हैं; इसमें विष्कम्भक और प्रवेशक नहीं
होते हैं; इसमें अधिकतर भारती वृत्ति होती है; इसका अङ्गी रस हास्य होता
है और लास्य के दस अङ्गों का प्रयोग होता है ।
यह प्रहसन तीन प्रकार का होता है—(१) शुद्ध, (२) विकृत और
(३) सङ्कर

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भूमिका ७
'तद्द्वत्प्रहसनम् त्रेधा शुद्धवैकृतसङ्करैः' ।
शुद्ध प्रहसन पाखण्डी, विप्र, चेट, चेटी और विट आदि पात्रों से युक्त होता है
उनके आचरण, वेष तथा भाषा से युक्त होता है तथा इनमें कथनोपकथन
हास्य-युक्त होता है—
पाखण्डिविप्रप्रभृति चेटचेटीविटाकुलम् ।
चेष्टितं वेषभाषाभिः शुद्धं हास्यवचोन्वितम् ॥ (दश० ३.५४)
विश्वनाथ के अनुसार जहाँ नायक धृष्ट होता है वह हास्य-विषयक
प्रहसन शुद्ध कहलाता है—
'एको यत्र भवेद् धृष्टो हास्यं तच्छुद्धमुच्यते ।' (सा०द० ६.२६६)
जैसे—'कन्दर्पकेलि' ।
शुद्ध प्रहसन में तपस्वी, संन्यासी और ब्राह्मण श्रेणी के व्यक्तियों में से
किसी एक श्रेणी के व्यक्ति को धृष्ट नायक के रूप में चित्रित किया जाता है
और जिसमें हास्य रस प्रमुख होता है ।
विकृत प्रहसन कामुक आदि की भाषा और वेष को धारण करने
वाले नपुंसक, कञ्चुकी तथा तपस्त्री आदि पात्रों से युक्त होता है—
'कामुकादिवचोवेषैः षण्डकञ्चुकितापसैः विकृतम् ।' (दश०३.५५)
संकीर्ण प्रहसन वीथी के अङ्गों से मिश्रित तथा धूर्तों से भरा हुआ
होता है—
'सङ्कराद् वीथ्या सङ्कीर्णं धूर्तसङ्कुलम् ।' (दश० ३.५६)
परन्तु जहाँ एक ओर कुछ आचार्य प्रहसन के तीन भेद मानते हैं,
दूसरी ओर भरतमुनि, नाट्यदर्पणकार अभिनवगुप्त आदि प्रहसन के शुद्ध और
सङ्कीर्ण ये दो.ही भेद मानते हैं । भरतमुनि के अनुसार विकृत नामक प्रहसन
का सङ्कीर्ण में ही अन्तर्भाव हो जाता है —
'इदं (विकृतं) तु सङ्कीर्णेनैव गतार्थमिति मुनिना पृथङ् नोक्तम् ।'
(सा० द० ६०)
हास्य के भेद
प्रहसन हास्य-रस प्रधान होता है । अतः प्रहसन के भेदों का निरूपण
करने के पश्चात् हास्य के भेदों को भी स्पष्ट करना युक्तिसङ्गत होगा ।

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८ मत्तविलास-प्रहसन
पण्डितराज जगन्नाथ और धनञ्जय के अनुसार हास्य रस दो प्रकार
का होता है-
(१) आत्मस्थ, (२) परस्थ ।
आत्मस्थ 'अपने' विकृत वेष-भाषा आदि विभावों का आलम्बन करके
उत्पन्न होने वाला हास है, और 'परस्थ' (दूसरे) के विकृत वेष तथा भाषा
आदि विभावों का आलम्बन करके उत्पन्न होने वाला हास है —
'विकृताकृतिवाग्वेषैरात्मनोऽथ परस्य वा ।'
(दश० ४.७५)
यह हास उत्तम, मध्यम तथा अधम प्रकृति का होने से छः प्रकार का
हो जाता है- (१) आत्मस्थ उत्तम प्रकृति, (२) आत्मस्थ मध्यम प्रकृति, (३)
आत्मस्थ अधम प्रकृति, (४) परस्थ उत्तम प्रकृति, (५) परस्थ मध्यम प्रकृति,
(६) परस्थ अधम प्रकृति ।
इस हास के पुनः छः भेद और होते हैं - (१) स्मित, (२) हसित, (३)
विहसित, (४) उपहसित, (५) अपहसित, और (६) अतिहसित ।
'स्मित' हास में केवल नेत्र विकसित होते हैं । 'हसित' में दाँत कुछ-
कुछ दिखाई देते हैं । 'विहसित' में मधुर स्वर होता है । मधुर स्वर (विहसित)
जब सिर हिलाने के साथ होता है तो 'उपहसित' कहलाता है । 'अपहसित'
वह है जिसमें नेत्र अश्रुयुक्त हो जाते हैं और 'अतिहसित' में अङ्गों को इधर-
उधर पटका जाता है-
स्मितमिह विकासिनयनं किञ्चिल्लक्ष्यद्विजं तु हसितं स्यात् ।
मधुरस्वरं विहसितं सशिरःकम्पमिदमुपहसितम् ॥ ७६ ॥
अपहसितं सास्त्राक्षं विक्षिप्ताङ्गं भवत्यतिहसितम् ।
द्वे द्वे हसिते चैषां ज्येष्ठे मध्येऽधमे क्रमशः ॥ ७७ ॥
(दश० ४)
इनमें से दो दो उत्तम, मध्यम और अधम प्रकृति के हुआ करते हैं,
अर्थात् स्मित और हसित उत्तम जन को, विहसित और उपहसित मध्यम
जन को और अपहसित तथा अतिहसित अधम जन को हुआ करते हैं ।
इस प्रकार प्रहसन में हास्य के छः भेदों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग
किया जाना चाहिए-