सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

1. गुरु ज़रूरी है

गुरु ज़रूरी है

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरु वे नमः ।।

माता-पिता के योग का नाम संतान है । आश्चर्यमय है, पर सत्य है, गुरु के योग से जो सत्ता उत्पन्न होती है, वो ईश्वर है । बिना गुरु के ईश्वर उत्पन्न ही नहीं हो सकता है ।

गुरु की शरणा लीजे भाई । जासे जीव नरक नहिं जाई ।।

गुरुमुख होई परमपद पावै । चौरासी में बहुरि न आवै ।।

गुरु की बड़ी महिमा है। 'ऋग्वेद' कहता है कि गुरु का एक पल ध्यान भी काशी में हज़ारों वर्ष रहने से श्रेष्ठ है। त्रेतायुग में ऋषि बाल्मीकि जी की 'रामायण' में भी गुरु को ही पूर्ण रूप से स्थापित किया गया है । द्वापर में भी जितने ऋषि-मुनि आए, वे भी गुरु भक्ति की बात कह रहे हैं। 'गीता' में भी वासुदेव श्री कृष्ण ने अर्जुन को अन्य - अन्य भक्तियों को छोड़कर अपने में समाने को कहा, क्योंकि वे अर्जुन के गुरु थे। कलयुग के मान्य ग्रंथ 'रामचरित मानस' में भी गोस्वामी तुलसीदास जी ने गुरु को बड़ा ऊँचा स्थान दिया है।

बंदऊँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि ।

महामोह तप पुंज जासु वचन रवि कर निकर ।।

अर्थात् मैं उस गुरु-महाराज के चरणकमलों की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नररूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूप घने अँधकार के नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं । फिर संतों ने तो इस क्षेत्र में कमाल ही कर दिया है। साहिब ने किसी को खुश करने या पक्षपात की बात नहीं की। गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय ।

बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोविंद दियो बताय ।।

संतों से पहले गुरु को ईश्वर के बराबर कहा गया था। हमारे सभी धर्म-शास्त्रों तथा ऋषि-मुनियों ने गुरु को ईश्वर के समान लाकर खड़ा किया था; लेकिन संतों ने आध्यात्मिक क्षेत्र में अद्भुत क्रांति लाई । उन्होंने गुरु को ईश्वर से ऊँचा दर्जा दिया। गुरु चरणदास जी की शिष्या सहजोबाई बड़े सुन्दर तर्क द्वारा गुरु को ईश्वर से ऊँचा स्थान देती हुई कहती है-

हरि जूँ गुरु को न बिसाऊँ । गुरु के सम हरि को न निहारूँ ।।

हरि ने जन्म दियो जग माहीं । गुरु ने आवागमन छुड़ाई ।।

हरि ने पाँच चोर दियो साथा। गुरु ने लई छुड़ाय अनाथा ।।

हरि ने कुटुंब जाल में घेरी । गुरु ने काटी ममता बैरी ।।

हरि ने रोग भोग उरझायो । गुरु योगी कर सबै छुड़ायो ।।

हरि ने कर्म भर्म भरमायो । गुरु ने आतम रूप लखायो ।।

हरि ने मोंसे आप छिपायो । गुरु दीपक दे ताहि दिखायो ।।

चरनदास पर तन मन वारूँ। गुरु न तजूँ हरि को तज डारूँ ।।

गुरु की महत्ता बताते हुए वासुदेव श्री कृष्ण भी गीता में अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! जो गुरु का भक्त होता है और जो प्राणी गुरु के सम्मुख होकर भजन करता है, उसका भजन करना सफल है । जो गुरु से विमुख है, उसको बड़ा पाप लगता है । जिस तरह मदिरा का पात्र हो, उसमें जो गंगाजल है, सो अपवित्र है । इसी तरह गुरु से विमुख का भजन सदा अपवित्र होता है। उसके हाथ का देवता भी नहीं लेते। उसके सब कर्म निष्फल हैं। कूकर, सूकर, काग आदि योनियाँ बड़ी खोटी हैं। इन सबसे वो मनुष्य खोटा है, जो गुरु नहीं करता। गुरु बिना गति नहीं होती । वह अवश्य नरक में जायेगा । हमारी धार्मिक पुस्तकें तथा ग्रंथ 'गुरु' शब्द की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि मनुष्य के मन के अज्ञान रूपी अँधकार को दूर करने वाले और ज्ञान का प्रकाश देने वाले गुरुदेव होते हैं। गुरु के बिना दुनिया के भोग- विलासों में ग्रस्त भूले हुए प्राणियों को कौन सच्चा मार्ग दिखा सकता है ! ज्ञान की आँखें गुरु देता है। गुरु की महिमा का अंत ही नहीं है । यही कारण है कि कबीर साहिब गुरु की अपार महिमा का वर्णन करते हुए अंत में यह भी कह दिया है— गुरु की महिमा अनन्त है, मौसे कही न जाय।

तन मन गुरु को सौंपि के, चरणों रहुँ समाय ।।

गुरु के बहुत अधिक महत्व 'कारण' साहिब ने गुरु को परमात्मा से भी बड़ा बताकर गुरु- भक्त बनने का संदेश दिया है।

धन्य माता पिता धन्य है, धन्य सुहद अनुरक्त । धन्य ग्राम वह जानिये, जहँ जन्मे गुरु भक्त ।।

बड़े-बड़े महापुरुष, जो इस धरा पर आए, सभी के गुरु थे | राम जी आए तो वशिष्ठ मुनि उनके गुरु हुए। कृष्ण जी आए तो दुर्वासा ऋषि उनके गुरु हुए।

राम कृष्ण से को बड़ा, तिनहूँ तो गुरु कीन ।

तीन लोक के वै धनी, गुरु आगे अधीन ।।

जब इतने बड़े-बड़े महापुरुषों को गुरु की ज़रूरत पड़ गयी तो आम आदमी गुरु के बिना कहाँ जायेंगे ! इसलिए जब तक एक इष्ट नहीं मिल जाता तब तक किसी के प्रति भी आस्था बनाए रखो, लेकिन जब गुरु मिल जाए तो अन्दर से ही परमात्मा को खोजो। जैसे ‘नर्सरी' कोई वर्ग नहीं है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को इस वर्ग में भी साल-भर रहना पड़ता है। वास्तव में यह वर्ग बच्चों को स्कूल जाने का शौक पैदा करने के लिए है । इसमें बच्चों को तरह-तरह के झूले झुलाकर, उन्हें नाना तरह के खिलौनों से खुश किया जाता है ताकि उनके दिल में स्कूल आने का शौक पैदा हो सके; स्कूल के प्रति उनका मोह बन जाए। इसी तरह मंदिर आदि ईश्वर का शौक पैदा करने के लिए हैं, पर बाद में गुरु की ज़रूरत पड़ेगी-ही-पड़ेगी। यदि कोई सोचे कि वह गुरु के बिना ही भक्ति करता रहे तो फिर वह नर्सरी क्लास वाले खिलौनों में ही खुश रहना चाहता है, आगे बढ़कर लक्ष्य तक नहीं पहुँचना चाहता । अतः अध्यात्म की राह में आगे बढ़ने के लिए गुरु की खोज तो करनी ही होगी । हमें संसार में जीने के लिए पग-पग पर गुरु की ज़रूरत पड़ जाती है। पढ़ना है तो गुरु चाहिए। डॉ० बनना है तो गुरु चाहिए। बहुत सारी किताबें पड़ी हैं, पर उन्हें पढ़कर कोई डॉक्टर नहीं बना। किताबें पढ़कर कोई इंजीनियर नहीं बना। जब हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, जो दुनिया हमारी जानी पहचानी है, वहाँ पर जीने के लिए, कुछ करने के लिए, कदम आगे बढ़ाने के लिए हमें एक गाइड की ज़रूरत पड़ जाती है, तो जिस रास्ते से हम बिलकुल भी बेख़बर

हैं, जिस रास्ते का हमें पता ही नहीं है, जो राह हमारी कल्पना से परे है, वहाँ हम गुरु के बिना कैसे चल सकेंगे ! गुरु के बिना हम भटक जायेंगे । ज़रूर भटक जायेंगे। इसलिए गुरु तो हमें करना ही पड़ेगा। गुरु के बिना तीर्थ, व्रत, जप, तप, दान आदि सब व्यर्थ हैं। गुरु के बिना ये किसी खाते में नहीं आने वाले । गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान |

गुरु बिन साहिब कह रहे हैं कि वेद-पुराणों से पूछ लेना, गुरु के बिना दिया दान हराम है, पूछो वेद पुरान।।

हुआ दान भी हराम है।

जो निगुरा सुमिरन करे, दिन में सौ सौ बार ।

नगर नायिका सत करै, जरै कौन की लार ।।

नगर नायिका कहते हैं - वेश्या को । अगर वेश्या सती होना चाहे तो किसके साथ जले ! ....... सारा शहर उसका पति है । साहिब कह रहे हैं कि निगुरे व्यक्ति का भजन करना भी ऐसा ही है। निगुरे का भजन करना या नहीं करना एक ही बात है। शुकदेव जैसा ज्ञानी मनुष्य, जो माता के पेट से ही ज्ञान लेकर आया था, जो बाहर ही नहीं आ रहा था, जब गुरु के बिना भक्ति कर रहा था तो नहीं पहुँच पाया था। गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हरि की सेव ।

कहैं कबीर वैकुण्ठ से, फेर दिया शुकदेव ।।

गुरु के बिना इतने बड़े भक्त का क्या हाल हो गया ! विष्णु जी ने वापिस किया—जो तेरे लिए कोई जगह नहीं है; तूने गुरु नहीं किया है।

गुरु बिन हृदय शुद्ध न होई । कोटिन भांति करे जो कोई ।।

गुरु के बिना इंसान कभी निर्मल नहीं हो सकता है और निर्मल हुए बिना भक्ति संभव नहीं । मन किसी को भी अच्छा नहीं बनने देता। मन के छल, कपट के कारण ही यह दुनिया चल रही है। यदि मन निर्मल हो जाए तो दुनिया ही समाप्त हो जाएगी। यह मन कभी निर्मल नहीं होता, पर इसे काबू में करना है । गुरु के बिना यह काबू में नहीं आ सकता, इसलिए गुरु के बिना इंसान अच्छा नहीं हो सकता। गुरु की कृपा से ही मनुष्य अच्छा बनता है । गुरु अपने शिष्य को प्रदान करता है । एक बार नारद जी विष्णु महाराज के पास पहुँचे। वहाँ कुछ देर बैठने के बाद चले गये। लेकिन किसी काम से पुनः वापिस लौट आए। जब वे

वापिस चले आए तो यह देखकर अत्यंत दुखी हुए कि जिस जगह पर वे बैठे हुए थे, उस जगह को विष्णु जी और लक्ष्मी जी साफ़ कर रहे हैं। नारद जी को बुरा लगा; कहने लगे - हे प्रभु! क्या मैं इतना गंदा हूँ कि जहाँ बैठा था, वहाँ सफ़ाई कर रहे हो! विष्णु जी ने गंभीर होकर कहा – हाँ नारद ! यह सच है, तू बड़ा गंदा है, क्योंकि तूने गुरु नहीं किया है। नारद जी चौक गये। प्रभु ! मैं इतना ब्रह्मज्ञानी; मुझे क्या ज़रूरत है गुरु की ? विष्णु जी ने कहा- नहीं, गुरु तो तुम्हें करना ही पड़ेगा। नारद जी ने पूछा- हे प्रभु! फिर मैं किसे गुरु मानूँ ? विष्णु जी ने बताया कि दक्षिण दिशा में सुबह-सुबह निकल पड़ना; जो पहला मनुष्य मिल जाए, उसे ही अपना गुरु मान लेना। नारद जी वहाँ से चल पड़े। सुबह जब नारद जी दक्षिण दिशा में जा रहे थे तो सामने उन्हें एक मछुआरा आता दिखाई दिया। मछुआरे ने रात को जाल लगाया था, सुबह देखने के लिए आ रहा था कि कितनी मछलियाँ पकड़ में आई हैं। नारद जी घबरा गये...... अब सत्यानाश हो गया; यह मछुआरा मिल गया; क्या अब इसी को गुरु बनाना पड़ेगा ! पर विष्णु महाराज की आज्ञा थी.......क्या करते! उसके पास आ गये; कहने लगे, मुझे दीक्षा दीजिए, मैं आपको गुरु धारण करने आया हूँ । मछुआरा कहने लगा कि मैं तो नीची जाति का हूँ, धीमर हूँ; आप ऊँची जाति के लग रहे हैं, जनेऊ पहन रखा है। कौन हैं आप ? नारद जी ने बताया—मैं ब्रह्मा का बेटा नारद हूँ । मछुआरा बेचारा प गया। ओ नारद महाराज - आप ! यह आप क्या कह रहे हैं ! भला मैं आपको क्या दीक्षा दूँगा ! नारद जी कहने लगे- नहीं ! मुझे आप ही को गुरु धारण करना है; विष्णु जी की आज्ञा है। पहले तो मछुआरा माना नहीं, पर जब नारद जी ने बहुत समझाकर कहा कि विष्णु महाराज की आज्ञानुसार उन्हें आप ही को गुरु करना है, तब कहीं जाकर उसने डरते-डरते बैठकर नारद जी को दीक्षा दी। नारद जी गुरु को प्रणाम करके चल पड़े और वैकुण्ठ में विष्णु जी के पास पहुँचे। विष्णु जी ने पूछा- कहो नारद! गुरु बना आए। नारद जी कहने लगे - गुरु तो बनाया, पर....... 'खामोश नारद' कहते हुए नारद को वहीं रोक लिया विष्णु जी ने । गुरु करके 'पर' लगा रहा है। 'पर' यानी कमी 'पर' यानी निंदा। जा! चौरासी भोग। ज्ञानी होकर मेरे आगे गुरु की निंदा ! जा ! चौरासी भोग । नारद जी डर गये कि अब तो चौरासी लाख योनियों में जाना पड़ेगा;

गधा बनना पड़ेगा, चूहा बनना पड़ेगा, बिल्ली बनना पड़ेगा, कुत्ता बनना पड़ेगा, गंदी-गंदी योनियों में जाना पड़ेगा। सोचने लगे कि अब क्या करूँ ! फिर ध्यान आया कि अंत में गुरुदेव ही रक्षा करते हैं । चल पड़े गुरु के पास । जाकर सारी बात गुरु जी को साफ़-साफ़ बता दी । मछुआरे ने नारद जी को समझा दिया; बचने का उपाय बता दिया। तब नारद जी पुनः विष्णु महाराज के पास वैकुण्ठ में आए और पूछने लगे कि मुझे किन-किन योनियों में जाना होगा? विष्णु जी ने कहा कि चौरासी लाख योनि यानी सभी योनियों में जाना है। नारद जी कहने लगे कि जिन-जिन योनियों में मुझे जाना है, वो कृपा करके किसी जगह लिख दें। जहाँ सब योनियों के नाम विष्णु जी ने लिखे, उसकी एक तरफ नारद जी लेट गये और लोटते हुए दूसरी तरफ से पार हो गये । फिर उठकर कहने लगे—यह लो प्रभु! मैंने चौरासी भोग ली; अब मुझे क्षमा करो । विष्णु जी कहने लगे कि यह क्या बात हुई ! नारद जी ने कहा कि मैं तो चौरासी भोग चुका। विष्णु जी सोच में पड़ गये कि यह कैसे हुआ ! फिर ध्यान आया कि गुरु ने इसे (नारद को ) बचाया है । तब विष्णु जी ने नारद को गले से लगा लिया और गुरु की महिमा बताते हुए समझाया कि गुरु ही इंसान का सच्चा साथी है, क्योंकि वह लोक और परलोक दोनों का साथी है। गुरु में बैठकर ही ईश्वर अपना काम करता है । गुरु के बिना परमात्मा पंगु है । जो राह हमें गुरु ने बताई, वो परमात्मा नहीं बता सकता था। वो हमारे पास था, पर हम फिर भी उससे दूर थे। यह दूरी बिना गुरु के कभी समाप्त नहीं होनी थी, इसलिए गुरु को कभी परमात्मा से कम नहीं मानना है। साहिब की वाणी बार-बार समझा रही है— गुरु हैं बड़े गोविंद ते, मन में देख विचार ।

हरि सुमिरै सो वार है, गुरु सुमिरै सो पार ।।

आज विज्ञान का युग है। सभी क्षेत्रों में मानव तरक्की पर है। क्या खुद मनुष्य वहाँ तक नहीं जा सकता ! क्या जररूत है गुरु की ! आओ, कुछ देर के लिए गुरु को एक तरफ रखते हैं और स्वयं रूहानी दुनिया में चलते हैं। रुको! रुको! सभी धर्मशास्त्र कह रहे हैं, नहीं! ऐसा नहीं करना । गुरु के बिना अन्दर की दुनिया में जाने का प्रयत्न नहीं करना । साहिब सावधान कर रहे हैं-

यह घट मंदिर प्रेम का, मत कोई बैठो धाय ।

जो कोई बैठे धाय के, वो बिन सिर सेती जाय ।।

साहिब कह रहे हैं कि यह घट ईश्वर का मंदिर है, पर इसमें गुरु के बिना प्रवेश नहीं करना । यदि ऐसा किया तो बिना सिर कटे ही मरोगे। अन्दर की दुनिया में घना अँधकार फैला हुआ है। वहाँ नाम प्रकाश की ज़रूरत है। 'शून्य महल में घोर अँधेरा, करो नाम उजियारा ।' और नाम गुरु के द्वारा ही मिलेगा । गुरु बिन मुक्ति न पावै भाई । नर्क उर्ध्वमुख वासा पाई ।। गुरु बहुत ज़रूरी है।

गुरु बिन पढ़े जो वेद पुराना । ताको नाहिं मिले भगवाना ।।

गुरु बिन प्रेत जन्म सो पावै । वर्ष सहस्र गरभ रहावै ।।

गुरु बिन दान पुण्य जो करहीं । मिथ्या होय कबहुँ नहिं फलहीं ।।

गुरु बिन भर्म न छूटे भाई । कोटि उपाय करे चतुराई ।। निगुरा करे मुक्ति की आसा । कैसे पावै मुक्ति निवासा ।।

औरो शूकर देह सो पावै । सतगुरु बिना मुक्ति नहिं पावै ।।

गुरु बिन आतस कैसे जाने । सुख सागर कैसे पहिचाने।।

भक्ति पदारथ कैसे पावै । गुरु बिन कौन राह बतलावै ।।

गुरु बिन लख भरमे चौरासी । जन्म अनेक नरक के वासी ।।

गुरु बिन पशु जन्म सो पावै । फिर फिर गर्भवास में आवै ।।

साहिब कह रहे हैं, गुरु के बिना मुक्ति नहीं मिलेगी। गुरु के बिना तो मनुष्य नरक में ही जायेगा । जो गुरु के बिना वेद, पुराण आदि पढ़ते हैं, उन्हें प्रमात्मा नहीं मिलता। गुरु के बिना तो प्रेत योनि में भी जा सकता है और हज़ार साल का महादुख भोगना पड़ सकता है । जो गुरु के बिना दान, पुण्य आदि करते हैं, उनके सब कर्म बेकार जाते हैं; वो फलित नहीं होते । गुरु के बिना कितने भी उपाय कर लो, भ्रम नहीं छूट सकता है। निगुरे इंसान की मुक्ति की आशा बेकार है। गुरु के बिना आत्म-ज्ञान नहीं हो सकता है । गुरु के बिना जीव चौरासी में ही फिरता रहेगा और बार-बार गर्भवास में आता रहेगा । इसलिए समझाते हुए कह रहे हैं-

तेहि कारण निश्चय गुरु कीजै । सुर दुरलभ तन खोय न दीजै ।।

कह रहे हैं कि यह सब विचारकर गुरु ज़रूर करना । देवताओं को भी दुर्लभ इस मानव-तन को बेकार में नहीं जाने देना ।