कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
About this granth
The Kalki Purana (कल्कि पुराण) is an Upapurana devoted to Kalki, the tenth avatar of Vishnu, who is to appear at the close of the Kali Yuga. Tradition attributes it to Vedavyasa. It is arranged in three amshas (parts) and opens as an account of things to come, told by Shuka to Markandeya and other sages.
This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi translation. A note at the front points out that the Purana speaks of future events in the past tense, saying that Kalki 'was born' in the village of Shambhala. The contents include the miseries of the Kali age, Kalki's birth and the weapons he receives from Shiva, the story of Padma and the parrot, Kalki's journey to Simhala and his marriage to Padma, the tale of the sage Ananta, battles with the Bauddhas and the demoness Kuthodari, the coming of Maru and Devapi, the lunar dynasty, the return of the Satya Yuga and the war with King Shashidhvaja.
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तृतीयांश —
अष्टम अध्याय
सेनागणै परिवृतः कल्किर्नारायण प्रभु ।
भल्लाटनगर प्रायात्खड्ग् धृक्सप्तिवाहन ।१।
स भल्लाटेश्वरो योगी ज्ञात्वा विष्णु जगत्पतिम् ।
निजसेनागणैः पूर्णो योद्धुकामो हरि ययौ ।२।
स हर्षोत्पुलक श्रीमान्दीर्घाङ्गः कृष्णभावन ।
शशिध्वजो महातेजा गजायुतबलः सुधी ।३।
तस्य पत्नी महादेवी विष्णुव्रतपरायणा ।
सुशान्ता स्वामिन प्राह कल्किना योद्धुमुद्ययम् ।४।
नाथ कान्त जगन्नाथ सर्वान्तर्यामिन प्रभुम् ।
कल्कि नारायण साक्षात्कथं त्वं प्रहरिष्यसि ।५।
सुशान्ते परमो धर्म्मः प्रजापतिविनिर्मित ।
युद्धे प्रहार (सर्वत्र गुरौ शिष्ये हरेरिव ।६।
सूत जी बोले — तदनन्तर अपने अश्व पर आरूढ हुए कल्कि जी
खडग धारण किये हुए, सेना के सहित भल्लाट नगर मे पहुँचे ।१।
योगिराज भल्लाट नरेश ने कल्कि जी को साक्षात् जगदीश्वर विष्णु
जाना और वह उनसे युद्ध करने के लिए सेना सहित नगर से बाहर
चले ।२। उस समय वह दीर्घाग, श्रीमान्, कृष्ण भक्त, महाबली एव
महा तेजस्वी राजा शशि ध्वज हर्ष से पुलकित हो रहे थे ।३। उन राजा
की पत्नी विष्णु व्रत-परायणा महादेवी सुशान्ता थी । उसने जब अपने
पति को कल्कि जी से युद्ध के लिए जाने को उद्यत देखा तब वह कहने
लगी ।४। हे नाथ ! हे स्वामिन् ! कल्कि जी तो साक्षात् जगन्नाथ विष्णु
४२०
अष्टम अध्याय-३ ] [ ४२१
और सर्वान्तर्यामी है। आप उन पर प्रहार कैसे कर सकेंगे ? ।५।
शशिध्वज बोले—हे सुशान्ते ! प्रजापति ब्रह्माजी ने जो धर्म निश्चित
किया है, उसके अनुसार युद्धेच्छुक गुरु, शिष्य अथवा नारायण ही
क्यो न हो, उन सब पर प्रहार करना चाहिए ।६।
जीवतो राजभोग स्यान्मृत स्वर्गे प्रमोद्ते ।
युद्धे जयो वा मृत्युर्वा क्षत्रियाणा सुखावह ।७।
देवत्व भूपतित्व वा विषयाविष्टकामिनाम् ।
उम्पदाना भवेदेव न हरे पादसेविनाम् ।८।
त्व सेवकः स चापीशस्त्व निष्काम स चाप्युद्म ।
युवयोर्युद्धमिलन कथ मोहाद्भविष्यति ।६।
द्वन्द्वा तीते यदि द्वन्द्वमोध्वरे सेवके तथा ।
देहावेशाल्लीलयैव सा सेवा स्यात्तथा मम ।१०।
देहावेशादीश्वरस्य कमान्या दंहिका गुण ।
मायाङ्ग यदि जायन्ते विषयाश्च न कि तथा ।११।
ब्रह्मात्रो ब्रह्मतेशस्य शरीरित्वे शरीरिता ।
सेवकस्याभेददृशस्तेवेव जन्मलयोदयाः ।१२।
यदि युद्ध भूमि से सकुशल लोट आवे तो वह अखण्ड राज्य का
भोगने वाला होता है और यदि मृत्यु हो जाय तो स्वग की प्राप्ति होती
है। इस प्रकार क्षत्रियो के लिये विजय और मरण दोनो मे ही सुख
की उपलब्धि है ।७। सुशान्ता ने कहा-हे नाथ ! कामी अथवा विषया-
सक्त पुरुषो के लिए ही युद्ध मे विजय अखण्ड राज्य के देने वाली
और मृत्यु देवत्व प्रदान करने वाली होती है। परन्तु हरि-चरणो के
सैदको को उससे क्या प्रयोजन है ? ।८। आप हरि-सेवक है। वह
ईश्वर आप निष्काम को फल प्रदान नही करेगे । तब आप दोनो मे
मोह पूर्वक युद्ध कैसे सभव है ? ।६। शशिध्वज बोले—परम पुरुष
परमात्मा तो सुख दुःख रूपी सब द्वन्दो से परे है। परन्तु उनके देह
धारण कर लेने पर उन ईश्वर और सेवक मे युद्ध होने लगे तो उसे
४२२ ] [ कल्कि पुराण
सेवा-स्वरूप विलाप लीला मात्र ही समझना चाहिये ॥१०। ईश्वर के
अवतार धारण करने पर कामादि माया अंश रूप दैहिक गुणों का
समन्वित होना भी अनिवार्य है । जब कामादि विषयों का आरोपित
होना देह-धर्म ही है, तो उनके शरीर मे भी वह क्यो नही व्याप्त होगे ?
।१। पूर्ण ब्रह्मभाव सम्पन्न ईश्वर ब्रह्म कहे जाते है और जब वह शरीर
धारण कर लेते हैं तब उन्हें शरीरिता कहते है । सेवक की भेद दृष्टि
के लय होने अर्थात् अभेद-ज्ञान की उपलब्धि होने पर उसका जन्म लय
और उदय भी उसी प्रकार सम्भव है ।१२ ।
सेव्यसेवकता विष्णोर्माया सेवेति कीर्त्तिता ।
द्वैताद्वैतस्य चेष्टैषा त्रिवर्गजनिका सताम् ॥१३।
अतोऽहं कल्किना योद्धुं यामि कान्ते स्वसेनया ।
त्वञ्च पूजय कान्तेऽद्य कमलारतिमीश्वरम् ॥१४।
कृतार्थोऽहं त्वया विष्णुसेवासम्मिलितात्मना ।
स्वामिन्निह परत्रापि वैष्णवी प्रथिता गति ॥१५।
इति तस्या वल्गुवाग्भिः प्रणतायाः शशिध्वजः ।
आत्मानं वैष्णवं मेने साश्रुनेत्रो हरिं स्मरन् ॥१६।
तामालिङ्ग्य प्रमुदितः शूरैर्बन्धुभिरावृतः ।
वहन्नाम स्मरन्नूरुं वैष्णवैर्योद्धुम ययौ ॥१७।
गत्वा तु कल्किसेनाया विद्राव्य महती चमूम् ।
शय्याकर्णाग्रणीर्वीरैः सन्नद्धै रुचितायुधैः ॥१८।
सेव्य-सेवक भाव ही सेवा है । यह कार्य विष्णु-माया का ही
है । इस द्वैताद्वैत चेष्टा के द्वारा ही सत्कर्मी पुरुष त्रिवर्ग को प्राप्त
कर लेते हैं ।१३। हे कान्ते ! यही कारण है कि मैं अपनी सेना के सहित
कल्किजी से युद्ध करने के लिए प्रस्थान कर रहा हूँ । हे प्रिये ! इधर
तुम कमलापति भगवान् विष्णु का पूजन करो ।१४। सुशान्ता ने कहा—
हे नाथ ! आप विष्णु सेवा द्वारा उन्हीं मे लीन हो गये, इससे मैं भी
धन्य हो गई हूँ । इहलोक और परलोक मे भगवान् विष्णु की सेवा के
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:
अष्टम अध्याय ] [ ४२३
अतिरिक्त अन्य कोई गति नही ।१५। सुशान्ता के यह विनम्र वचन
सुन कर राजा के नेत्रो मे हर्षाश्रु छा गये और वे अपने को परम
वैष्णव मानते हुए भगवान् विष्णु का स्मरण करने लगे ।१६। उन्होने
अपनी प्रिय पत्नी को हृदय से लगो लिया और फिर अपने वीर वैष्णव
सैनिको के सहित विष्णु नाम का स्मरण करते हुए रण भूमि के लिये
चल दिये ।१७। उन्होने कलिक-सेना मे प्रविष्ट होकर उनकी विशाल-
सेना को द्रवित कर दिया । उस समय महाबली शय्या कर्णगण आयुधो
से सुसज्जित हुए उनसे युद्ध मे तत्पर हुए ।१८।
शशिध्वजसुतः श्रीमान्सूर्यकेतुर्महाबल ।
मरुभूपेन युयुधे वैष्णवो धन्विनां वरः ।१९।
तस्यानुजो वृहत्केतुः कान्तः कोकिलनिस्वनः ।
देवापिना स युयुधे गदायुद्ध विशारदः ।२०।
विशाखयूपस्तुभूपस्तु शशिध्वजनृपेण च ।
रुधिराश्वो धनुर्धारी लघुहस्त प्रतापवान् ।
रजस्यनेन युयुधे भर्ग्य शान्तेन धन्विना ।२२।
शूलै प्रासैर्गदाघातैर्बाणशक्त्यष्टितोमरै ।
भल्लै खड्गैर्भुशुण्डीभि कुन्तै समभवद्रणः ।२३।
पताकाभिर्ध्वजैश्चिष्टमैस्तोमरैश्छत्रचामरै
प्रौद्धूतधूलिपटलैरन्धकारो महानभूत ।२४।
मह बली, धनुर्धारी एव परम वैष्णव राज-पुत्र सूर्य केतु राजा
मरु से युद्ध करने लगा ।१९। सूर्यकेतु का छोटा भाई बृहत्केतु कोकिल
के समान मधुरवाणी वाला और अत्यन्त कमनीय होते हुए भी गदा
युद्ध मे पार गत था, वह राजा देवापि के साथ संग्राम मे तत्पर हुआ
।२०। हाथियो से सम्पन्न और विविध प्रकार के शस्त्रास्त्रो से सुसज्जित
विशाखयूप-नरेश राजा शशिध्वज से युद्ध करने लगे ।२१। लाल अश्व
पर आरोहण किये हुए हस्त लाघव सम्पन्न धनुर्धारी एवं प्रतापी भर्ग्य
धूलिमयो पृथिवी पर धनुर्धारी शान्त से युद्ध मे भिड गया ।२२। इस
४२४ ] [ कल्कि पुराण
प्रकार रणक्षेत्र मे सब ओर से शूल, प्रास, गदा, बाण, शक्ति, यष्टि,
तोमर, भाले, खड्ग, भुशु डी और कुन्त आदि अस्त्र-शस्त्र चलने लगे
।२३। उस समय छत्र, चमर, ध्वजा, पताका आदि की छाया और
बहुत धूल उडने से रणभूमि मे अन्धकार छा गया ।२४।
गगनेऽजुघना देवा केवा वास न चक्रिरे ।
गन्धर्वे साधुसन्दभैर्गायन्तैरमृतायनै. ।२५।
द्रष्टु समागता, सर्वे लोका, समरमद्भुतम् ।
शखदुन्दुभिसन्नादैरास्फोटैर्बृं हितैरपि ।।२६
ह्रेषितैर्योधनोत्कृष्टैर्लोकावमूका इभवन् ।
रथिनो रथिभि साक पदात्राश्च पदातिभि ।।२७।।
हया हयैरैभाश्चेभै समरोऽमरदानवै ।
यथामवत्स तु घनो यमराष्ट्रविवर्द्धन २८।।
शशिध्वजचमूनाथै कल्किसेनाधिप सह ।
निपेतु सैनिका भूमौ छिन्नबाह्वङ्घ्रिकन्धराः ।२६।।
धावन्तोऽतिब्रुवन्तश्च विकुर्वन्तोऽसृगुक्षिता ।
उपर्युपरि सच्छन्ना गजाश्वरथमर्दिताः ।।३०।।
गगन मण्डल मे स्थित हुए देवगण इस सग्राम को देख रहे थे ।
गधर्व भी अमृत-ध्वनि मे गाते हुए उस युद्ध को देखने के लिए आ गये
थे ।२५। सभी लोक उम अद्भुत सग्राम को देखने के उद्देश्य से वहाँ
आ गये थे । शख और नक्कारे बज रहे थे । परस्पर धौल मारने से,
हाथियो की चिघाड से, अश्वो के हिनहिनाने से तथा शस्त्रास्त्रो के टक-
राने से जो शब्द निकल रहे थे, उनके मिलने से रणभूमि गूँज रही थी ।
सभी लोक मूक जैसे लग रहे थे, क्योकि किसी को किसी की बात सुनाई
नही देती थी, रथी रथी से, पैदल पैदल से, घुडसवार घुडसवार से भिड
रहे थे । देवासुर-सग्राम के समान भीषण यह युद्ध यमराष्ट्र की वृद्धि
कर रहा था ।२६-२८ । कल्किजी के सेनापतियो से भिडे हुए शंशिध्वज
के सेनापति एवं वीरगण शिर कटा कर पृथिवी पर गिर रहे थे ।२६।
अष्टम अध्याय-३ ] [ ४२५
आहत होकर कोई भाग रहा है, कोई चीत्कार कर रहा है, कोई आर्त्त-
नाद कर रहा है, किसी पर रक्त की धार पड रही है, कोई एक-दूसरे से
गूँथे हुए ही पृथिवी पर गिर रहे हैं तथा कोई हाथी या अश्व के पावो
अथवा रथो के पहियो से ही कुचले जा रहे हैं ।३०।
निपेतु प्रधरे वीरा. कोटिकोटिसहस्रशः ।
भूते सानन्दसन्दोहा. स्रवन्तो रुधिरोदकम् ॥३१॥
उष्णीषहंसा सच्छिन्न गजरोघोरथप्लवा. ।
करोरुमीनाभरणमसिकाच्छानवालुका ३२
एव प्रवृत्ता सग्रामे नद्य सद्योऽतिदारुणा ।
सूर्यकेतुस्तु मरुणा सहिनो युयुधे बली ॥३३॥
कालकल्पो दुराधर्षा मरु बाणैरताडयत् ।
मरुस्तु तत्र दशभिर्मार्गणैर्दर्रदयद्भृशम् ॥३४॥
मरुबाणाहतो वीरा सूर्यकेतुरमर्षित ।
जघान तुरगान्कोत्पापदोद्धातेन तद्रथम् ॥३५॥
चूर्णयित्वाऽथ तेनापि तस्य वक्षस्यताडयत् ।
गदाघातेन तेनापि मरुमूर्च्छामवापह ॥३६॥
इस प्रकार, इस युद्ध मे हजारों करोड वीर नाश को प्राप्त हुए ।
रणक्षेत्र मे रक्त की नदी बह चली । इस नदी के प्रवाह को देख कर
भूत-पिशाचादि अत्यन्त आनन्दित हुए ।३१। इम लोहित नदी मे बहती
हुई पगडिया सरोबरो मे सुशोभित हस के समान प्रतीत होती थी ।
उसमें गिरे हुए हाथी ऐसे लगते थे जैसे टापू हो । रथ उसमे नावो के
समान तैरने लगे और कटे हुए हाथ-पांव मच्छ जैसे लगने लगे । उसमे
गिरे हुए खड्ग ऐसे लगते थे मानो स्वर्णिम रेती चमक रही हो ।३२। इस
प्रकार रणक्षेत्र मे यह अत्यन्त दारुण नदी बहने लगी । सूर्यकेतु मरु के
साथ युद्ध कर रहा था ।३३। काल के समान विकट सूर्यकेतु के बाणो से
मरु आहत हो गये तब मरु ने भी दश बाणो से सूर्यकेतु को आहत कर
दिया ।३४। मरु के बाणो से आहत हुए सूर्यकेतु ने मरु के सभी अश्व
४२६ ] कल्कि पुराण
मार डाले और पदाघात से रथ तोड डाला । फिर मरु के हृदय पर
भीषण गदाघात किया, जिससे वह मूच्छित होकर पृथिवी पर गिर
पडे ।३५-३६।
सारथिस्तमपोवाह रथेनान्येन धर्म्मवित् ।
बृहत्केतुश्च देवापि बाणै प्राच्छादयद्बली ॥३७॥
धनुर्विकृष्य तरसा नीहारेण यथा रविम् ।
स तु बाणमय वर्षं परिवार्य्य निजायुधै ॥३८॥
बृहत्केतुं दृढ जघ्ने कङ्क पत्रै शिलाशितै. ।
भिन्न शूलमथालोक्य धनुर्गृह्य पत्रिभि ॥३६॥
शितधारै स्वर्ण पुखैर्गाद्ध्र्पत्रैरयोमुखै ।
देवापिमाश्रुगैर्जघ्ने बृहत्केतु ससैनिकम् ॥४०॥
देवापिस्तद्धनुर्दिव्य चिच्छेद निशितै शरै ।
छिन्नधन्वा बृहत्केतु खड गपाणिजिघासया ॥४१॥
तब मरु का धर्मवित् सारथि उन्हे उठा कर अन्य रथमे ले गया ।
उधर महाबली बृहत्केतु ने देवापि पर बाण-वर्षा की ।३७। जैसे सूर्य
कुहरे से आच्छादित हो जाता है, वैसे ही बाणो से आच्छादित देवापि ने
तुरन्त धनुष लेकर शत्रु की बाण वर्षा को अपनी बाण वर्षा से काट
दिया ।३८। बृहत्केतु ने शान चढे हुए बाणो से अपने शूल को भी नष्ट
हुआ देख कर पुन; धनुष उठाया और उस पर स्वर्ण जटित, गृद्ध पख
के समान तथा लोह-मुख वाले तीक्ष्ण बाण चढा कर देवापि पर सैन्य
सहित भीषण प्रहार किये । ३६-४०। परन्तु बृहत्केतु के उस दिव्य धनुष
को देवापि ने अपने तीक्ष्ण बाणो से काट दिया । तब देवापि को मारने
के विचार से वृहत्केतु ने हाथ मे खड्ग ग्रहण किया ।४१।
देवापे: सारथि साश्व जघ्ने शूरो महामृधे ।
स देवापिर्धनुस्त्यक्त्वा तलेनाहत्य त रिपुम् ॥४२॥
भुजयोरन्तरानीय निष्पिपेष स निर्दय: ।
तं द्वयष्टवर्ण निष्क्रान्तं मूच्छितं शत्रुणुर्दितम् ॥४३॥
अष्टम अध्याय ] [ ४२७
अनुजं वीक्ष्य देवापिमूर्ध्नि सूर्यध्वजोऽवधीत् ।
मुष्टिना वज्रपातेन सोऽपतन्मूर्च्छितो भुवि ।
मूच्छितस्थं रिपुं क्रोधासेनागणमताडयत ॥४४॥
शशिध्वज सर्वजगन्निवास कल्कि पुरस्तादभिसूर्यवर्चसम्
श्याम पिशङ्गाम्बरमम्बुजेक्षणं ।
वृहद्भुजं चारुकिरीटभूषितम् ॥४५॥
नानामणिवातचिताङ्गशोभया निरस्तलोकेक्षणहृत्तमोमयम्
विशाखयू पादिभिरावृतं प्रभु ददर्श धर्मेण कृतेन पूजितम् ॥४६
फिर उस घोर युद्ध मे बृहत्केतु ने देवापि के घोड़ो और सारथि
को मार डाला । तब देवापि ने भी धनुष छोड कर शत्रु पर हथेली का
प्रहार किया ।४२। फिर उसे दोनो भुजाओ मे दबा कर मर्दन करने
लगा । उस समय अट्ठाईस वर्षीय वह राजपुत्र बृहत्केतु पीडित होता
हुआ मूच्छित हो गया ।४३। अपने छोटे भाई की ऐसी दशा देखकर
सूर्यकेतु ने देवापि के मस्तक पर वज्र के समान मुष्टिका-प्रहार किया,
इससे देवापि मूच्छित होकर गिर पडा । तब शत्रु को मूच्छित जान कर
सूर्यकेतु उसकी सेना पर प्रहार करने लगा ।४४। इधर राजा शशिध्वज
ने उस रणक्षेत्र में सूर्यके समान तेजोमय, विश्वाधार, कमलाक्ष, पीताम्बर
धारी, विशाल भुजा वाले और सुरम्य किरीट से सुशोभित कल्किजी को
अपने सामने देखा ।४५। अनेक मणियो से सुसज्जित अङ्ग वाले, प्राणियो
के नेत्रो और हृदयोँ के अन्धकार को नष्ट करने वाले कल्किजी के सब
ओर विशालयूप नरेश जैसे अनेक राजागण नत-मस्तक खडे हैं तथा
सत्य और धर्म उनका पूजन कर रहे हैं ।४६।
•••
तृतीयांश—
नवम अध्याय
हृदि ध्यानास्पद रूपं कल्केर्दृष्ट्वा शशिध्वजः ।
पूर्णं खड्गधरं चारुतुरगारूढमब्रवीत् ॥१॥
धनुर्बाणधरं चारु-विभूषणावरोङ्कतम् ।
पापतापविनाशार्थमुद्यतं जगतां परम् ॥२॥
प्राह तं परमात्मानं हृष्टरोमा शशिध्वजः ।
एह्येहि पुण्डरीकाक्ष ! प्रहारं कुरु मे हृदि ॥३॥
अथवात्मन् बाणभिया तमोऽन्धे हृदि मे विश ।
निर्गुणस्य गुणज्ञत्वमद्वैतस्यास्त्रताडनम् ॥४॥
निष्कामस्य जयोद्योगसहायं यस्य सैनिकम् ।
लोकाः पश्यन्तु युद्धे मे द्वैरथे परमात्मनः ॥५॥
परबुद्धिर्यदि दृढा प्रहर्त्ता विभवे त्वयि ।
शिवविष्णोर्भेदकृते लोकं यास्यामि सयुगे ॥६॥
सूतजी ने कहा—हे ऋषियो ! कल्किजी का हृदय में ध्यान के
योग्य, सुन्दर, खड्गधारी एवं तुरंगारूढ पूर्ण स्वरूप देख कर शशि-
ध्वज ने विचार किया।१। धनुर्बाणधारी सुन्दर आभूषणों से विभूषित
जगदीश्वर भगवान् कल्कि का अवतार संसार के पाप-ताप के निवारणार्थ
हुआ है ।२। राजा शशिध्वज ने पुलकित शरीर से परब्रह्म कल्किजी के
प्रति निवेदन किया—हे पुण्डरीकाक्ष ! आइये, मेरे हृदय पर प्रहार
कीजिये ।३। हे परमात्मन् ! मेरे बाणों की मार से बचने के लिए मेरे
तमाच्छादित हृदय में आकर छिप जाओ । जो निर्गुण होकर भी गुणों
के ज्ञाता हैं, जो अद्वैत होकर भी अस्त्र प्रहार में तत्पर हैं तथा जो
निष्काम होकर भी विजय की इच्छा से सैन्य-संहार कर रहे हैं मैं उन्हीं
नवम-अध्याय ] ४२६
भगवान् के साथ द्वैरथ युद्ध मे तत्पर हो रहा हूँ। सभी लोक इसका
अवलोकन करें। ४-५। मैं आप विभु पर प्रहार करूँगा। परन्तु प्रहार
करते समय भी यदि मैं आपको ब्रह्म से भिन्न समझने लगूँ तो शिव
और विष्णु मे भेद जानने वाले को जिस लोक की प्राप्ति होती है, मुझे
उसी लोक की प्राप्ति हो ।६।
इति राज्ञो वच श्रुत्वा अक्रोध. क्रुद्धवद्दिभुः ।
बाणैस्ताडयतस्तस्य धृतायुधमरिन्दमम् ॥७॥
शशिध्वजरतत्प्रहारमगणय्य वरायुधैः ।
तं जघ्ने बाणवर्षेण धाराभिरिव पर्वतम् ॥८॥
तद्बाणवर्षभिन्नान्तः कल्क परमकोपनः ।
दिव्यै शस्त्रास्त्रसघातैस्तयोर्युद्धमवर्त्तत ॥६॥
ब्रह्मास्त्रस्य च ब्रह्मास्त्रं वायव्यस्य च पार्वतै. ।
आग्नेयस्य च पार्जन्यै. पन्नगस्य च गारुडै ॥१०॥
एव नानाविधैरस्त्रै रन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
लोका; सपाला सत्रस्ता युगान्तमिव मेनिरे ॥११॥
देवा बाणाग्निसत्रस्ता अगमन्खगमाः किल ।
ततोऽतिवितथोद्योगो वासुदेवशशिध्वजौ ॥१२॥
निरस्त्रौ बाहुयुद्धेन युयुधाते परस्परम् ।
पदाघातैस्तलाघातैर्मुष्टिप्रहर णैस्तथा ॥१३॥
राजा के इन वचनो को सुन कर क्रोध से परे कल्किजी क्रोधित
हो उठे । यह देख कर आयुधधारी एव अरिमर्दन राजा शशिध्वज न
उन पर बाण-प्रहार प्रारम्भ किया ।७। जब राजा ने अपने उस प्रहार
को निष्फल हुआ देखा तो वह पर्वत पर वर्षणशील मेघ के समान घोर
बाणो की वर्षा करने लगे ।८। उस बाण-वर्षा से कल्किजी का शरीर
आहत हो गया । तब वे अत्यन्त क्रोध करके आगे बढे । इस प्रकार
दोनो मे घोर युद्ध होने लगा ।६। ब्रह्मास्त्र के द्वारा ब्रह्मास्त्र काटने लगे ।
पार्वतास्त्र से वायव्यास्त्र, मेघास्त्र से आग्नेयास्त्र और गारुडास्त्र से
सर्पास्त्र नष्ट होने लगे ।१०। इस प्रकार विविध भाँति के दिव्यास्त्रो के
द्वारा वे दोनो भीषण प्रहारमे तन्मय थे । इसमे लोक और लोकपाल सभी
यह समझते हुए कि कही आज ही प्रलय न हो जाय, अत्यन्त भयभीत
हुए ।११। बाणाग्नि का देख कर युद्ध देखने के लिए गगन मण्डल मे
एकत्र हुए देवता भयभीत हो गये । दिव्यास्त्रो को व्यथ हुए देख कर
कल्किजी और राजा शशिध्वज दोनो बाहु युद्ध के निमित्त अस्त्र त्याग
कर उतर पडे । फिर पदाघात, करतलाघात और मुष्टिका-प्रहार से
युद्ध होने लगा ।१२-१३ ।
नियुद्धकुशलो वारौ मुमुदाते परस्परम् ।
वराहोद्धूनशब्देन त तलेनाहनद्धरिः ।१४।
स मूर्च्छितो नृपः कोपात्समुत्थाय च तत्क्षणात् ।
मुष्टिभ्या वज्रकल्पाभ्यामवध त्कल्कि मोजसा ।
स कल्किस्तत्प्रहारेण पपात भुवि मूर्च्छित ।।१५।।
धर्म्म. कृतञ्च तं दृष्ट्वा मूर्च्छित जगदीश्वरम् ।
समागतौ तमानेतु कक्षौ तौ जगृहे नृप ।।१३।।
कल्कि वक्षस्युपादाय लब्धार्त्त प्रययौ गृहम् ।
युद्धेन नृपाणामन्येषा पुत्रौ दृष्ट्व सुदुर्ज्जयौ ।।१७।।
दोनो ही रणविद्या मे अत्यन्त कुशल थे और परस्पर एक
दूसरे के कौशल को देखते हुए प्रसन्न हो रहे थे । सृष्टि के आरम्भ
मे पृथिवी का उद्धार करने के लिए वाराह भगवान् ने जैसा शब्द किया
था, कल्किजी द्वारा किये गये करतलाघात से वैसा ही भीषण शब्द
हुआ ।१। उस आघात से राजा शशिध्वज मूर्च्छा को प्राप्त हो गए ॰
फिर तुरन्त ही सचेत होकर उन्होने कल्किजी पर वज्र के समान मुष्टि
प्रहार किया, जिससे कल्किजी अचेत होकर पृथिवी पर लेट गये ।१५।
तब जगत्पति कल्किजी को मूर्च्छित देख कर धर्म और सत्युग, वहाँ आकर
उन्हे ले जाने लगे । परन्तु राजा शशिध्वज ने उन दोनो को कांख मे
दबा लिया ।१६। और कल्किजी को अङ्क मे उठा कर कृत कृत्य होते हुए
नवम अध्याय ] [ ४३१
उन्हे अपने घर ले गये और सोचने लगे कि मेरे दोनो पुत्रो को भी युद्ध
मे कोई राजा जीत नही सकता है ।१७।
कल्कि सुराधिपपति पृधने विजित्य धर्म्म कृतञ्च ।
निजकक्षयुगे निधाय । हर्षोल्लसद्धृदय उत्पुलक ।
प्रमाथी गत्वा गृह हरिगृहे ददृशे सुशान्ताम् ॥१८॥
दृष्ट्वा तस्या. सुललितमुख वैष्णवीनाञ्च मध्ये
गायन्तीना हरिगुणकथारतामथ प्राह राजा ।
देवानाना विनयवचसा शम्भले जन्मनावा ।
विद्यालाभ परिणयविधि म्लेच्छपाषण्डनाशम् ॥१६॥
कल्किः स्वय हृदि समायमिहागोऽद्धा मूर्च्छिच्छ-
लेन तव सेवनीक्षणार्थम् । धर्म्म कृतञ्च मम कक्षा-
युगे सुशान्ते ! कान्ते विलोकय समर्च्यय सविधेहि ॥२०॥
इति नृपवचसाविनोदपूर्णा हरिकृत धम्म युत प्रणम्य नाथम्
सह निजसखिभिनंनर्त्त रामा हरिगुणकीर्त्तनवर्त्तना विलज्जा।
इस प्रकार देवराज इन्द्र के भी स्वामी कल्किजी को हरा कर
और धर्म तथा सत्युग को काँख दवा कर राजा शशिध्वज प्रसन्न हृदय
से सेनाओ का मर्दन करता हुआ अपने घर को गया और वहाँ उसने
अपनी भार्या सुशान्ता को विष्णु मन्दिर मे स्थित पाया ।१८। उसके
चारो ओर वैष्णवी नारियां बैठ कर विष्णु-गुण-गान में तन्मय थी ।
राजा ने सुशान्ता का सुन्दर मुख देखते हुए कहा—हे सुशान्ते ! देवताओ
की प्रार्थना पर जो शम्बल ग्राम मे अवतीर्ण हुए हैं और जिन्होने विद्या
प्राप्त कर म्लेच्छो और पाखण्डियो को नष्ट कर दिया है, वही हृदयो मे
विहार करने वाले कल्कि भगवान अपनी माया द्वारा मूर्च्छा रूपी छल से
आवृत होकर तुम्हारी शक्ति की परीक्षा लेने के निमित्त यहाँ पधारे हैं ।
मेरी काँखो मे यह धर्म और सत्युग दोनो दबे हुए है, तुम इनका पूजन
करो ।१६-२०। राजा के यह विनोदपूर्ण वचन सुन कर रानी बडी
प्रसन्न हुई और धर्म तथा सत्युग के सहित कल्किजी को उसने प्रणाम
किया । फिर लज्जा को छोड कर सखियो के सहित हरि नाम संकीर्त्तन
और नृत्य करने मे तत्पर हुई ।२१।
तृतीयांश —
दशम अध्याय
जयहरेऽमराधीशसेवित तव पदाम्बुज । भूरिभूषणम्
कुरु ममाग्रतः साधुसत्कृत त्यज महामते । मोहमात्मनः ।।१।।
तव वपुर्जगद्रूपसम्पदा विरचितं सता मानसे स्थितम् ।
रतिपतेर्मनोमोहदायक कुरु विचेष्टित कामलम्पटम् ।।२।।
तव यशो जगच्छोकनाशन मृदुकथामृतप्रीतिदायकम् ।
स्मितसुधोक्षित चन्द्रवन्मुख तवकरोत्वल लोकमङ्गलम् ।।३।।
मम पतिस्त्वय सर्वदुर्जयो यदि तवाप्रिय कर्मणाचरेत् ।
जहि तदात्मनः शत्रुमुद्यत कुरु कृपा न चेदोटगीश्वर ।।४।।
महदहयुत पञ्चमात्रया प्रकृतिजायया निर्मिंत वपु ।
तव निरीक्षणल्लीलया जगत्स्थितिलयोदयं ब्रह्मकल्पितम् ।५।
सुशान्ता बोली—हे हरे ! आपकी जय हो । महामते ! अब
आप अपने इस महोच्छन्न भाव को त्याग कर इन्द्र से भी सेवित,
सुन्दर आभूषणों से विभूषित तथा साधुओ के द्वारा सत्कारित अपने
चरणारविन्द मेरे समक्ष कीजिये ।१। जगत् की श्रेष्ठ सम्पदा से विर-
चित तथा साधुओ के हृदय मे विद्यमान रहने वाला आपका यह देह
कामदेव को भी मोहित करने वाला है । अब आप हमारी कामना पूर्ण
कीजिये ।२। आपके यशगान से जगत् के शोक नष्ट होते हैं, आपके
मुस्कान सुधा सम्पन्न चन्द्र वदन से निकली हुई मधुर वाणी सब को
प्रसन्न करती है । हे प्रभो ! आपका यह मुख लोककल्याण के करने
दशम अध्याय ] [ ४३३
वाला है ।३। मेरे सर्व दुर्जेय पति के द्वारा यदि आपका कोई अपराध
बन पडा हो तो भी इनके प्रति शत्रु-भाव न रख कर इन पर कृपा
करिये, अन्यथा कोई आपको कृपामय ईश्वर नही कहेगा ।४। आपकी
पत्नी प्रकृति महत्तत्व, अहकार और पचतन्मात्र के द्वारा देह रचती है ।
आपके ही निरीक्षण में लीला से ही ब्रह्म कल्पित विश्व में सृष्टि, स्थिति
और लय का क्रम चलता है ।५।
भूविष्न्मरुद्वारितेजसा राशिभिः शरीरेन्द्रियाश्रितैः ॥
त्रिगुणया स्वया मायया विभो कुरु कृपा भवत्सेवनाथिनाम्
तव गुणालय नाम पावन कलिमलापह कीर्तयन्ति ये ।
भवभयक्षय तापनाशिनो मुहुरहो जनाः ससरन्ति नो । ।७।।
तव जन्म सतां मानवर्द्धनं निजकुलक्षय देवपालकम् ।
कृतयुगार्पकं धर्म्मपूरकं कलिकुलान्तक शन्तनोतु मे ।।८।।
मम गृहं पतिपुत्रनप्तृक गजरथैर्ध्वजैश्चामरैर्धनै ।
मणिवरासनसत्कृतिं विना तवा पदाम्बजयोः शोभयन्ति किम्
तव जगद्वपुः सुन्दरम्मिन मुखमनिन्दितं सुन्दरारवम् ।
यदि नमे प्रिय वल्गुचेष्टिते परिकरोत्यहो मृत्युरस्तिवह ।।१०।।
हे देव ! पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश तत्व से युक्त
यह पच भूतात्मक शरीर इन्द्रियो के आश्रित रहते हैं। अपनी त्रिगुणा-
त्मिका माया से अपने भक्तो पर कृपा कीजिये ।६। हे प्रभो ! आपके नाम
गुण-कीर्तन से कलियुग के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । आपका वह
नाम अनन्त गुणो से युक्त और भवभय का नाश करने वाला है, जो
ससार ताप से पीडित प्राणी उसका स्मरण करते हैं, उनका जन्म-
मरण रूप बधन कट जाता है ।७। आपका यह अवतार साधुओ का
मान बर्द्धक, कलिकुल नाशक, देवताओ का पालक, धर्म पूरक तथा
सत्युग का पुनः स्थापक है । आपके इस अवतार से हमारा कल्याण हो
।८। मेरे घर मे पति, पुत्र, पौत्र, गज, रथ, ध्वज, चमर, धन और
मणि जटिल श्रेष्ठ आसनादि सब कुछ वर्तमान हैं। परन्तु आपके
तृतीय अंश: अध्याय १-३ (सत्ययुग पुनर्स्थापना व सूर्य-चन्द्रवंश वर्णन)
४३४ ] [ कल्कि पुराण
चरणारविन्दो के पूजन किये बिना उनकी शोभा नही हो सकती ।६।
हे जगद्रूप ! सुन्दर मुस्कान से सुशोभित, मधुर वाणी से विभूषित,
सुरम्य चेष्टा से युक्त आपका यह मुख यदि हमारा प्रिय नही करना
चाहेगा तो हमारी तत्काल मृत्यु ही हो जायगी ।१०।
हयचरभयहरकरहरशरणाखरतरवरदशबलमदन ।
जयहतपरभरभवरणनशनशशधरशतसमरसभरवदन ।।११।।
इति तस्याः सुशान्ताया गीतेन परितोषित ।
उत्तस्थौ रणशय्याया. कलिर्युद्धस्थवीरवत् ।।१२।।
सुशान्ता पुरतो दृष्ट्वा कृत वामे तु दक्षिणे ।
धर्मं शशिध्वज पश्चात्प्राहोऽति व्रीडितानन ।।१३।।
का त्व पद्मपलाशाक्षि ! मम सेवार्थमुद्यता ।
कान्ते शशिध्वज. शूरो मम पश्चादुपस्थित ।।१४।।
हे धर्म्म ! हे कृतयुग ! कथमत्रागता वयम् ।
रणाङ्गण विहायास्याः शत्रोरन्त पुरे वद ।।१५।।
आप अश्वारोही सब को अभय देते हुए विचरते हैं ? आपके
तीक्ष्ण बाणो के प्रहार से जो वीर पुरुष युद्ध मे मृत्यु को प्राप्त होते
हैं, उनका आप ही प्रतिपालन करते हैं । आपके मुख मण्डल पर सैकडो
चन्द्रमाओ की आभा चमकती है । शिव और ब्रह्मा भी सदा आपके
आश्रय की याचना करते रहते हैं ।११। सुशान्ता द्वारा किये गये इस
प्रकार के विनय-गान से सन्तुष्ट होकर कलिजी उसी प्रकार उठ पडे,
जिस प्रकार रणक्षेत्र मे मूर्च्छित वीर उठ जाता है ।१२। उन्होने अपने
सामने रानी शान्ता को, वाम पार्श्व मे सत्युग और दक्षिण पार्श्व मै
धर्म को और अपने पीछे राजा शशिध्वज को खडे देखा तो लज्जा से
मुख नीचा करके बोले ।१३। हे कमलपत्र जैसे नेत्र वाली ! तुम कौन
हो और मेरी सेवा में क्यों तत्पर हुई हो ? यह बलवान् राजा शशिध्वज
मेरे पीछे क्यो उपस्थित है ? ।१४। हे धर्म ! हे सत्युग ! हम युद्ध क्षेत्र
दशम अध्याय ] ४३५
को छोड़ कर शत्रु के अन्तःपुर मे क्यो आ गये यह ? सब मुझे
बताओ ।१५।
शत्रुपत्न्य कथं साधु सेवन्ते मामरिं मुदा ।
शशिध्वज, शूरमानी मूर्च्छित हन्ति नो कथम् ॥१६॥
पाताले दिवि भूमौवा नरनागसुराऽसुराः ।
नारायणस्य ते कल्के केवा सेवा न कुर्वते ॥१७॥
यत्सेवकाना जगता मित्राणा दर्शनादपि ।
निवर्तन्ते शत्रुभावस्तस्य साक्षात्कृतो रिपुः ॥१८
त्वया सार्द्धं मम पतिः शत्रुभावेन संयुगे ।
यदि योग्यस्तदानेतुं कि समर्थो निजालयम् ॥१९॥
तत दासो मम स्वामी अह दासी निजा तव ।
आवयो. सप्रसादाय आगतोऽसि महाभुज ॥२०॥
मुझे शत्रु की यह शत्रु-पत्नियाँ प्रसन्न होती हुई क्यो परिचर्या
कर रही हैं ? जब मैं मूर्च्छित हो गया था, तब इन शूर एव मानी राजा
शशिध्वज ने मेरा सहार क्यो नही कर दिया ? ।१६। रानी बोली-
पाताल, स्वर्ग अथवा पृथिवी पर, नाग, सुर और असुर मे ऐसा कौन
है जो भगवान् कल्कि की सेवा नही करता ? ।१७। संसार जिनका
सेवक और मित्र है तथा जिनके दर्शन मात्र से शत्रु भाव नष्ट हो जाता
है, क्या उनका कोई प्रत्यक्ष रूप से कभी शत्रु हो सकता है ? ।१८।
मेरे पति यदि आपके प्रति शत्रु-भाव रख कर आपसे युद्ध करते तो क्या
वह आपको अपने घर मे इस प्रकार ले आते ? ।१९। हे महाभुज !
मेरे पति आपके दास हैं, इसलिए मैं भी आपकी दासी हूँ । इस प्रकार
हम पर प्रसन्न होकर ही आप स्वयं यहाँ पधारे हैं ।२०।
अह तवैतयोर्भक्तया नामरूपानुकीर्तनात् ।
कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि कलिकेव ॥२१॥
अधुनाह कृतयुग तव दासस्य दर्शनात् ।
त्वमोध्वरो जगत्पूज्यसेवकस्यास्य तेजसा ॥२२॥
४३६ ] [ कल्कि पुराण
दण्डय मा दण्डय विभो योद्धृन्त्वादुद्यतायुधम् ।
येन कामादिरागेणत्वय्यात्मन्यपि वैरिना ॥२३॥
इति कल्किर्वचस्तेषा निशम्य हसितानन ।
त्वया जितोऽस्मीति नृप पुन पुनरुवाच ह ॥२४॥
ततः शशिध्वजो राज युद्धादाहूय पुत्रकान् ।
सुशान्ताया मति बुद्ध्वा रमा प्रादात्सकल्कये ॥२५॥
धर्म ने कहा — हे कलि का नाश करने वाले कल्किजी ! यह
राजा-रानी दम्पति जिस प्रकार आपकी भक्ति करते हुए आपका नाम-
संकीर्त्तन एव स्तोत्र करते है, उसे देख कर मैं कृतार्थ हो गया—
कृतार्थ हो गया ।२१। सत्युग बोला — हे प्रभो ! आज आपके इस सेवक
का दर्शन पाकर तो अवश्य ही मेरा सत्युग नाम यथार्थ हो गया ।
इस सेवक ने अपने तेज से आपको भी जगत्पूज्यत्व और ईश्वरत्व से
परिपूर्ण कर दिया ।२२। राजा शशिध्वज बोले — हे जगदीश्वर ! मैने
काम क्रोध आदि विषयो के वशीभूत होकर ही आप ईश्वर एव साक्षात्
अपने आत्मा के प्रति शत्रुता करके आपके देह पर अस्त्र प्रहार किया
है ।२३। राजा के वचन सुन कर कल्किजी ने मुसकराते हुए बारम्बार
कहा— हे राजन् ! आपने मुझे सब प्रकार जीत लिया है ।२४। इसके
पश्चात् राजा शशिध्वज ने रणभूमि से अपने पुत्रो को वापिस बुला
लिया और फिर रानी सुशान्ता की प्रेरणा से अपनी रमा नाम की
कन्या कल्किजी को प्रदान कर दी ।२५।
तदैत्य मरुदेवापी शंशिध्वजसमाहृतौ ।
विशाखयूपभूपश्च रुधिराश्वश्च संयुगात् ॥२६॥
श्याकशांनृपेणापि भल्लाटं पुरमाययुः ।
सेनागणैरसंख्यातैः सा पुरी मर्दिताभवत् ॥२७॥
गजाश्वरथसबाधैः पत्तिच्छत्ररथध्वजैः ।
कल्किनापि रमायाश्च विवाहोत्सवसम्पदाम् ॥२८!
दशम-अध्याय ] ४३७
द्रष्टु समीयुस्त्वरिता हर्षात्सबलबाहनाः ।
शंखभेरी मृदङ्गाना वादित्राणाञ्च निस्वनैः ॥२६॥
नृत्यगीतविधानैश्च पुरस्त्रीकृतमङ्गलैः ।
विवाहो रमयाकल्केरभूदतिसुखावहः ।३०।
उस अवसर पर मरु, देवापि, विशाखयूपनरेश और रुचिरारव
आदि सभी कल्कि-पक्ष के राजागण शशिध्वज द्वारा आमन्त्रित किये
गये । वे सब राजा शय्याकरण को साथ लेकर रणभूमि से भल्लाट
नगरी मे आ पहुँचे । उस समय असंख्य कल्कि-सेना के पाँवो से वह
नगरी मर्दित्ता हो गई। २६-२७। गज, अश्व, रथ, पदाति, छत्र और रथ
की ध्वजाएँ आदि सभी से सुशोभित विवाह मण्डप मे कल्किजी और
रमा का विवाहोत्सव सम्पन्न हुआ ।२८। हर्ष से प्रफुल्लित हुए सभी
व्यक्ति अपने दल बल और वाहनो के सहित उस उत्सव को देखने के
लिए वहाँ आये । राजकुमारी रमा का विवाह शंख, भेरी, मृदंग आदि
वाद्यो की सुमधुर ध्वनि और पुर-नारियो के श्रेष्ठ मङ्गलाचारो तथा
नृत्य-गीतादि के सानन्द सम्पन्न हुआ । २६-३०।
नृपा नानाविधैर्भोज्यै पूजिता विविशु सभाम् ।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या शूद्राश्चावरजातयः ॥३१॥
विचित्रभोगाभरणाः कल्कि द्रष्टुमुपाविशन् ।
तस्या सभाया शुशुभे कल्कि कममलोचनः ॥३२॥
नक्षत्रगणमध्यस्थ पूर्ण शशधरो यथा ।
रेजे राजगणाधीशो लोकान्सर्वाग्विमोहयन् ।६६।
रमापति कल्किमवेक्ष्य भूप सभागत पद्मदलायतेक्षणम् ।
जामातर भक्तियुतेन कर्मणा विबुध्य मध्ये निषसाद तत्रह ।३४
विविध प्रकार भोज्य एव पान-पदार्थों से सत्कार प्राप्त करते
हुए राजागण सभा मे प्रविष्ट हुए । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रीदि
४३८ ] कल्कि पुराण
सभी वर्ण के लोग अद्भुत आभूषणो और विविध प्रकार की भोग-
सामग्रियो को प्राप्त करके उस सभा मे सुशोभित कल्किजी के सब ओर
बैठ कर शोभा को प्राप्त होने लगे ।३१-३२। जैसे तारागण के मध्य
पूर्ण चन्द्र की अत्यन्त शोभा होती है, वैसे ही सब लोगो के मध्य मे
सुशोभित राजाओ के भी स्वामी कल्किजी सब लोको को मोहित करने
लगे ।३३। पद्म पलाश जैसे नेत्र वाले कल्किजी ने सभा मे उपस्थित
राजाओ आदि के समक्ष रमा का पाणिग्रहण किया। उस समय राजा
शशिध्वज भी कल्किजी को जामाता-भाव से देखते हुए भक्ति-युक्त हृदय
से सभा मे अत्यन्त शोभा को प्राप्त हुए ।३४।
तृतीयांश—
एकादश अध्याय
तत्राहूस्ते सभामध्ये वैष्णव त शशिध्वजम् ।
मुनिभि कथिताशेष-भक्तिव्यासक्तविग्रहम् ॥१॥
सुशान्ताञ्च कृतेनापि धर्मेण विधिद्युताम् । २॥
युंवा नारायणास्यास्य कल्केः श्वशुरता गतौ ।
वय नृपा इमे लोका ऋषयो ब्राह्मणाश्च ये ॥३॥
प्रेक्ष्य भक्तिवितान वा हरौ विस्मितमानसा. ।
पृच्छामस्त्वामिय भक्ति क्व लब्धा परमात्मनः ॥४॥
कस्य वा शिक्षिता राजन् ! किंवा नैसर्गिकी तव ।
श्रोतुमिच्छामहे राजन् ! त्रिजगज्जतपावतीम् ।
कथा भागवती त्वत्तः संसाराश्रमनाशिनीम् ॥५॥
सूतजी ने कहा—मुनियो के द्वारा अशेष कहे गए भक्तिमय
देह वाले, विष्णु भक्त, धर्म और सत्युग के साथ स्थित एव रानी सुशान्ता
के सहित शोभायमान् राजा शशिध्वज की ओर देखते हुए आगत
राजा आदि व्यक्तियो ने कहा। १-२। राजागण बोले—अब आप
साक्षात् नारायण के अवतार भगवान् कल्कि के श्वसुर-पद को प्राप्त
हुए हैं। परन्तु हम सब राजागण, ऋषिगण और विप्रगण तथा अन्यान्य
सभी उपस्थितजन आपकी भक्ति को ऐसे विस्तृत रूप मे देख कर अत्यन्त
आश्चर्य को प्राप्त हुए हैं। हम आपसे यह पूछते है कि परमात्मा की
४३६