कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context४३६ ] [ कल्कि पुराण
दण्डय मा दण्डय विभो योद्धृन्त्वादुद्यतायुधम् ।
येन कामादिरागेणत्वय्यात्मन्यपि वैरिना ॥२३॥
इति कल्किर्वचस्तेषा निशम्य हसितानन ।
त्वया जितोऽस्मीति नृप पुन पुनरुवाच ह ॥२४॥
ततः शशिध्वजो राज युद्धादाहूय पुत्रकान् ।
सुशान्ताया मति बुद्ध्वा रमा प्रादात्सकल्कये ॥२५॥
धर्म ने कहा — हे कलि का नाश करने वाले कल्किजी ! यह
राजा-रानी दम्पति जिस प्रकार आपकी भक्ति करते हुए आपका नाम-
संकीर्त्तन एव स्तोत्र करते है, उसे देख कर मैं कृतार्थ हो गया—
कृतार्थ हो गया ।२१। सत्युग बोला — हे प्रभो ! आज आपके इस सेवक
का दर्शन पाकर तो अवश्य ही मेरा सत्युग नाम यथार्थ हो गया ।
इस सेवक ने अपने तेज से आपको भी जगत्पूज्यत्व और ईश्वरत्व से
परिपूर्ण कर दिया ।२२। राजा शशिध्वज बोले — हे जगदीश्वर ! मैने
काम क्रोध आदि विषयो के वशीभूत होकर ही आप ईश्वर एव साक्षात्
अपने आत्मा के प्रति शत्रुता करके आपके देह पर अस्त्र प्रहार किया
है ।२३। राजा के वचन सुन कर कल्किजी ने मुसकराते हुए बारम्बार
कहा— हे राजन् ! आपने मुझे सब प्रकार जीत लिया है ।२४। इसके
पश्चात् राजा शशिध्वज ने रणभूमि से अपने पुत्रो को वापिस बुला
लिया और फिर रानी सुशान्ता की प्रेरणा से अपनी रमा नाम की
कन्या कल्किजी को प्रदान कर दी ।२५।
तदैत्य मरुदेवापी शंशिध्वजसमाहृतौ ।
विशाखयूपभूपश्च रुधिराश्वश्च संयुगात् ॥२६॥
श्याकशांनृपेणापि भल्लाटं पुरमाययुः ।
सेनागणैरसंख्यातैः सा पुरी मर्दिताभवत् ॥२७॥
गजाश्वरथसबाधैः पत्तिच्छत्ररथध्वजैः ।
कल्किनापि रमायाश्च विवाहोत्सवसम्पदाम् ॥२८!