कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextअष्टम अध्याय-३ ] [ ४२५
आहत होकर कोई भाग रहा है, कोई चीत्कार कर रहा है, कोई आर्त्त-
नाद कर रहा है, किसी पर रक्त की धार पड रही है, कोई एक-दूसरे से
गूँथे हुए ही पृथिवी पर गिर रहे हैं तथा कोई हाथी या अश्व के पावो
अथवा रथो के पहियो से ही कुचले जा रहे हैं ।३०।
निपेतु प्रधरे वीरा. कोटिकोटिसहस्रशः ।
भूते सानन्दसन्दोहा. स्रवन्तो रुधिरोदकम् ॥३१॥
उष्णीषहंसा सच्छिन्न गजरोघोरथप्लवा. ।
करोरुमीनाभरणमसिकाच्छानवालुका ३२
एव प्रवृत्ता सग्रामे नद्य सद्योऽतिदारुणा ।
सूर्यकेतुस्तु मरुणा सहिनो युयुधे बली ॥३३॥
कालकल्पो दुराधर्षा मरु बाणैरताडयत् ।
मरुस्तु तत्र दशभिर्मार्गणैर्दर्रदयद्भृशम् ॥३४॥
मरुबाणाहतो वीरा सूर्यकेतुरमर्षित ।
जघान तुरगान्कोत्पापदोद्धातेन तद्रथम् ॥३५॥
चूर्णयित्वाऽथ तेनापि तस्य वक्षस्यताडयत् ।
गदाघातेन तेनापि मरुमूर्च्छामवापह ॥३६॥
इस प्रकार, इस युद्ध मे हजारों करोड वीर नाश को प्राप्त हुए ।
रणक्षेत्र मे रक्त की नदी बह चली । इस नदी के प्रवाह को देख कर
भूत-पिशाचादि अत्यन्त आनन्दित हुए ।३१। इम लोहित नदी मे बहती
हुई पगडिया सरोबरो मे सुशोभित हस के समान प्रतीत होती थी ।
उसमें गिरे हुए हाथी ऐसे लगते थे जैसे टापू हो । रथ उसमे नावो के
समान तैरने लगे और कटे हुए हाथ-पांव मच्छ जैसे लगने लगे । उसमे
गिरे हुए खड्ग ऐसे लगते थे मानो स्वर्णिम रेती चमक रही हो ।३२। इस
प्रकार रणक्षेत्र मे यह अत्यन्त दारुण नदी बहने लगी । सूर्यकेतु मरु के
साथ युद्ध कर रहा था ।३३। काल के समान विकट सूर्यकेतु के बाणो से
मरु आहत हो गये तब मरु ने भी दश बाणो से सूर्यकेतु को आहत कर
दिया ।३४। मरु के बाणो से आहत हुए सूर्यकेतु ने मरु के सभी अश्व