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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished442 pages

About this granth

The Kalika Purana (कालिका पुराण) is a Shakta upapurana closely tied to Kamarupa in Assam and the shrine of Kamakhya. It glorifies the Goddess as Kalika, Mahamaya and Yoganidra, tells the story of Sati and the origin of the Shakti pithas, and gives detailed rules of worship, which makes it important for students of Tantra and Shakta practice.

Its contents list the glory of the Purana and of Kali, her form and descent, the coming of spring, hymns to Yoganidra and Kali, the words of Madana, Hari's entreaty to Shiva, the proposal of marriage to Sati, the unity of the three gods, the calming of Hara's anger, the story of Mount Kshipra and the river Kshipra, the curse on the Moon, Vasishtha's initiation of Sandhya and his marriage to Arundhati, primal creation, the origin of the Varaha sacrifice and the Kapila incarnation. Later sections describe the falling of Sati's body, the Kamarupa pitha, the testing of Gauri, the Mahamaya rite, the Shakradhvaja festival, the Kamakhya kavacha and matrika nyasa.

This edition is a Hindi translation published by Kalyan Mandir, Prayag. Its 442 pages serve devotees of the Goddess and readers of Shakta Puranic literature.

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३४६  श्रीकालिका पुराण 
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मूर्ति है फिर मैं भद्रकाली हूँ जिस मूर्ति के द्वारा मैं तेरा हनन करूँगी वह
दुर्गा कीर्त्तित की गयी है । इन मूर्तियों में सदा ही तुम मेरे चरणों के पूज्य
होओगे । प्राचीन काल में जब सृष्टि का आदि काल था उस समय
उग्रचण्डा मूर्ति के द्वारा तुम्हारा हनन किया गया था । दूसरी सृष्टि के
समय में आपको भद्र काली मेरे द्वारा निहित किया गया था । और इस
समय में दुर्गा के स्वरूप के द्वारा तुमको तुम्हारे अनुगामियों के सहित
हनन करूँगी किन्तु पूर्व में मेरे द्वारा चरण के तल में तुमको ग्रहण करने
वाले हो गए हो । अतएव पूर्व कालों में ग्रहण किए गए हो और पीछे
भी यज्ञ भाग की मुक्ति के लिए ग्रहण करने के योग्य हो गए हो ।
और्व मुनि ने कहा-इतना कहकर उस महामाया ने उग्रचण्डा नाम वाले
तनु को उस समय में महिषासुर को दिखा दिया था । जो मूर्ति सोलह
भुजाओं वाली थी और भद्रकाली, इस नाम से विश्रुति थी उसी भाँति
मूर्ति को अमर बाहुओं से धारण करने वाली थी ।
दक्षिण की ओर नीचे गदा रखे हुए बांये हाथ से पान पात्र को रखे
हुए थी जो सुरों से भरा हुआ था । शिर में नर मुण्डों की माला धारण
करने वाली थीं । भिन्न हुए अंजन के समान थी, प्रचण्ड स्वरूप वाली
और सिंह के वाहन वाली थी । लाल वर्ण वाले नेत्र थे, महती काया
थी और अठारह बाहुओं से युक्त थी । उग्रचण्डा और भद्रकाली ये दो
मूर्तियाँ थी । ऐसे स्वरूप का दर्शन करके शीघ्र ही महिषासुर ने उनको
प्रणिपात किया था और वह बहुत ही विस्मय को प्राप्त हो गया था ।
इसके अनन्तर जिस रीति से आक्रान्त करके महिषासुर को निहित
किया था ठीक उसी भाँति दोनों देवियों ने उसको चरण के तल से नीचे
ग्रहण कर लिया था । उसका हृदय शूल से विदीर्ण किया हुआ और
महिषासुर बिना शिर वाला था । देवी के द्वारा उसके केश ग्रहण किए
हुए थे और निकलती अँतड़ियों से भूषित हो रहा था । जिसके मुख से
रुधिर निकल रहा था, ऐसा जिसका शरीर था ऐसे अपने पूर्व शरीर
को उसने देखा था । वह असुर भय को प्राप्त करके बहुत चिन्ता एवं
शोक करने लगा था तथा मोह को प्राप्त हो गया था । इसके अनन्तर

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≎ श्रीकालिका पुराण ≎ ३४७
एक ही क्षण में दानव ने अपने आपको संस्तम्भित किया था और उसने
देवी को प्रणाम किया था तथा गद्गद् होकर देवी से उसने यह वचन
कहा-महर्षि ने कहा-हे देवि! यदि आप मुझ पर परम प्रसन्न हैं और
आपने यज्ञ के भागों को मेरे लिए कल्पित किया है तब मेरा अन्य जन्म
प्राप्त न करूँ। देवी ने कहा-आपने मेरी आराधना की है अतएव मैंने
आपको वर दे दिया है। यहाँ पर तुम मेरे ही द्वारा वध्य होगे, इस
विषय में कुछ भी विचार तुमको नहीं करना चाहिए। जो भी तुमने
प्रार्थना की है कि मेरा विरोध सुरों के साथ न होवे, यह भी सब हो
जायेगा। हे दानव! मेरे चरण के तल के स्पर्श से तेरा शरीर यज्ञ भागों
से उपभोग करने के लिए विशीर्ण नहीं होगा। हे महासुर! तेरे
जीवात्माओं के साथ प्राण सब ही भगवान् हर के पाद के संयोग से
केवल चिरकाल पर्यन्त स्थित रहेंगे। हे महिषासुर! सहस्रों करोड़ कल्प
तक और चिरकाल पर्यन्त तेरे जन्म न होंगे।
इस प्रकार से यह वर देवी ने उस महिषासुर को देकर उस असुर
के द्वारा शिर से प्रणत होती हुई वहाँ पर ही अन्तर्धान हो गई थी। वह
महिष भी हे नृप! पुनः माया के द्वारा सम्मोहित होता हुआ पूर्व की भाँति
आसुरी भाव का आदान करके अपने स्थान को चला गया था। राजा
सगर ने कहा-माया के द्वारा अनेक दैत्य निहित किए गए थे जिनका
वध लोकों की विभूति के लिए ही हुआ था। उसको शुभ वरदान देकर
वे पुनः प्रगृहीत नहीं हुए थे। यह किस कारण से वर देकर कैसे पुनः
प्रगृहीत हुआ था? हे द्विजोत्तम! मुझे यह बतलाने की कृपा करें।
और्व मुनि ने कहा-सुरों के बैरी रम्भ के द्वारा वे भगवान् शंकर
परम प्रसन्न हो गए थे। इसके अनन्तर परम प्रसन्न महादेव जी प्रत्यक्ष
रूप में उपस्थित होकर उस रम्भ से बोले थे कि मैं तुम पर परम प्रसन्न
हो गया हूँ अब जो भी तेरा इच्छित हो मुझसे वरदान का वरण कर
लो। इस रीति से कहा हुआ रम्भ भगवान् चन्द्रशेखर से बोला था। हे
महादेवजी! मैं बिना पुत्र वाला हूँ। यदि आपका मुझ पर अनुग्रह हो
तो, हे शंकर! मेरे तीन जन्मों में आप ही मेरे पुत्र होकर जन्म ग्रहण

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३४८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
करें। ऐसा ही पुत्र हो जो समस्त प्राणियों के द्वारा अवध्य हो और
देवगणों का नेता होवे ।
हे शंकर! वह मेरा पुत्र ऐसा हो जिसकी आयु चिरकाल तक होवे,
यह यशस्वी और लक्ष्मीवान् होवे । इस प्रकार से जब उस दैत्य के द्वारा
प्रार्थना की गई तो भगवान् वृषभध्वज ने कहा- यह तेरा वांछित हो
जावे और मैं तेरा पुत्र जाऊँगा । इतना ही कहकर भगवान् वृषभध्वज
वहाँ पर जावे और मैं तेरा पुत्र जाऊँगा । इतना ही कहकर भगवान्
वृषभध्वज वहाँ पर ही अन्तर्धान हो गए थे । रम्भ भी प्रसन्न होता हुआ
अपने निवास स्थान को चला गया था । मार्ग में गमन करते हुए उस
रम्भ ने शुभ महिषी को देखा था । वह महिषी त्रिहायणी, चित्र वर्ण
वाली परम सुन्दरी और ऋतुशालनी थी । उस रम्भ ने उस महिषी को
देखा था और कामदेव से मोहित हो गया था अर्थात् महिषी को ग्रहण
करके उसके साथ सुरतोत्सव किया था फिर रति क्रीड़ा के प्रवृत्त हो
जाने पर उसी समय में वह महिषी उसके तेज से युक्त होकर वह
गर्भवती हो गयी थी । महिषी ने गर्भ धारण कर लिया था तभी उसके
उदर से महिषासुर समुत्पन्न हुआ था । उस महिषी में अपने ही यश से
भगवान् शंकर ने उसके पुत्र हो जाने की प्राप्ति की थी । वह रम्भ का
पुत्र राम्भि शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की ही भाँति बड़ा हो गया था ।
कात्यायन मुनि ने उस महिषासुर के लिए शाप दे दिया था । शिष्य के
अर्थ में उसको दुर्जय अवलोकन करके शिष्य पर अनुग्रह करने वाले
चन्द्रशेखर ने कात्यायन के द्वारा शाप दिए हुए उस महिषासुर का ज्ञान
प्राप्त करके चण्डिका से प्रणाम पूर्वक कहा-
ईश्वर ने कहा-आज हे देवि! यह महिषासुर कात्यायन के द्वारा
शापित किया गया है । इसके विनाश करने वाली योषित होगी । इससे
हे जगन्मये ! ऋषि का वाक्य बिना किसी सन्देह के ही पूर्ण होगा,
इसमें कुछ भी संशय नहीं है । यह महिष मेरा ही शरीर है । हे
जगन्मयि! यह तुम्हारे द्वारा करना है और इसका हनन करना है । पूर्व
और पर में भी निरन्तर योग से युक्त मैं हरि के स्वरूप से तुमको वहन

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३४२
करने में अब समर्थ नहीं हूँ। मेरा यह शरीर महिष तुम्हारा बोझा होगा।
यह महादेवजी ने पूर्व में पहले देवी से प्रार्थना की थी। इससे देवी ने
महिषासुर महादेव को ग्रहण किया था। उसने उसी प्रकार का आसुर
तप का तपन किया था जो परम दारुण था।
उसी भाँति भगवान् शम्भु की आराधना की थी और पुत्रार्थ वरदान
प्रदान किया था। उसी रीति से उसने अपनी महिषी की सुरत के लिए
सेवन किया था। उसमें उसी प्रकार से दानव महिषासुर दानव वीर हुआ
था। भगवान् कात्यायन भी उसी प्रकार के उसको शाप दिया था। पूर्व
जन्म में इस प्रकार से प्रवृत्त होने पर उसने अन्य जन्म में महिष ने देवी
का पूजन करके वर की याचना की थी। तीसरे जन्म में वर प्राप्ति
करके अशेष कल्पों में यहाँ पर मेरा जन्म न होवे, यह वरदान माँगा
था। इस कारण से देवी के चरणों के तल में इस समय में महिषासुर
स्थित रहा करता है।
इस प्रकार से देवी के प्रसाद से महादेवजी के अंश से उत्पन्न होने
वाले महासुर ने निरन्तर परा प्रतिपत्ति का लाभ किया था। यह आज
भी देवी के चरणों के तल की प्राप्ति से परम प्रसन्न होता है। हे राजन्!
यह आपके समक्ष में सब कहकर सुना दिया है। हे राजन! अब प्रस्तुत
विषय का आप श्रवण कीजिए। हे नृपोत्तम! मैं आपके सामने कहता
हूँ। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-जिस तरह से राजा सगर था और देवी,
महर्षि के यजन में और्व के साथ सम्वाद किया था। यह सभी आपको
बता दिया गया है।
कामाख्या माहात्म्य
और्व मुनि ने कहा-जिस रीति से भगवान् महादेव ने महात्मा भैरव
से कहा था। हे नृप श्रेष्ठ! आप उसी भाँति सुनो। श्री भगवान् ने
कहा-जो उग्रचण्डा मूर्ति हैं और जो अठारह भुजाओं वाली हुई थी वह
पहले कन्या राशिगत सूर्य के होने पर कृष्ण पक्ष में नवमी में करोड़ों
योनियों के सहित महामाया प्रादुर्भूत हुई थी। आषाढ़ मास की पूर्णिमा

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३५० ᠅ श्रीकालिका पुराण ᠅
में द्वादश वर्ष का होने वाला सत्र होता है । सत्र को करने के लिए
प्रजापति दक्ष ने समारम्भ किया था और सभी देवों का वरण किया
गया था, उसने मुझे वरण नहीं किया था । अर्थात् महात्मा दक्ष ने मुझे
आमन्त्रित नहीं किया था । वे कपाली अर्थात् कपालधारी हैं और सती
उनकी पत्नी है, इसलिए वरण नहीं किया था । इसके पश्चात् रोष से
समायुक्त होकर उस सती ने प्राणों का परित्याग कर दिया था । देह
के त्याग करने वाली सती फिर उस समय चण्डमूर्ति हो गई थी । फिर
बारह वर्ष में पूर्ण होने वाले उस यज्ञ के प्रवृत्त होने पर कन्या के सूर्य
में कृष्णपक्ष में नवमी तिथि के दिन चण्डमूर्ति को धारण करने वाली
योगनिद्रा महामाया ने करोड़ों योगिनियों के साथ यज्ञ का नाश कर
दिया था ।
उस महामाया ने सती के स्वरूप का परित्याग करके यज्ञ का
विध्वंस कर दिया था । वह सभी भगवान् शिव के गणों तथा शंकर
के भी सहित थी । महात्मा देव के उस महामन्त्र को उस देवी ने स्वयं
भंग किया था । फिर महादेवी के महान् क्रोध के व्यतीत हो जाने पर
देवगणों ने पूर्व में वर्णित प्रकार से उस अनुपम देवी की पूजा की थी ।
देवों ने पूर्व वर्णित विधान से इस देवी की पूजा की थी । देवों ने दुखों
की हानि के लिए पूजा करके ही परम निवृत्ति की प्राप्ति की थी । इसी
प्रकार से अन्य जनों को भी सदा देवी का पूजन करना चाहिए । अतुल
विभूति की प्राप्ति के लिए इस चतुवर्ग को प्रदान करने वाली पूजा को
अवश्य सदा सबको करनी चाहिए । जो मोह वश या आलस्य से इस
महोत्सव के अवसर में देवी पूजा नहीं करता है तो उससे देवी परम
क्रुद्ध हो जाती है और अभीष्ट कामनाओं का हनन किया करती हैं ।
बहुत जाति वाली बलियों के द्वारा, भोजनों से, सिन्दूर, रक्त वस्त्र
अनेक प्रकार के विलेपन, पुष्प जो नाना प्रकार के हों, बहुत तरह के
फलों के द्वारा पूजन करना चाहिए । इस महाष्टमी में जो पुत्र वाला हो
उसे उपवास नहीं करना चाहिए । जिस किसी प्रकार से भी पवित्र
आत्मा वाला व्रतधारी देवी का यजन करे । महाष्टमी में पूजा करके

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௬०२ श्रीकालिका पुराण ௬०२ ३५१
नवमी तिथि में बलियों का समर्पण करके विदा करे । दशमी तिथि में
श्रवण में शावरोत्सवों के द्वारा जिस समय में दिवा के भाग में पुरुष
को सम्प्रेषण करना चाहिए । सुवासिनयों के द्वारा, कुमारियों, वेश्याओं
के, नर्तकियों के द्वारा शंख, तूर्यों की ध्वनियों से, मृदंग और पटहों के
द्वारा ध्वज, बहुत प्रकार के वस्त्रों से, लाजा ( खील ) और पुष्पों के
प्रकीर्ण के द्वारा देवी का पूजन करे ।
उसी समय नवमी में निशा के भाग में देवी का समुत्थान दिन में
नहीं करे । निशा के भाग में जब अन्तिम चरण श्रवण को होवे उसी
समय में देवी का समुत्थान नवमी में दिन के भाग में होता है । हे वत्स
भैरव! इस मन्त्र के द्वारा विसर्जन करना चाहिए । हे देवि! हे चण्डेशे!
आप समुत्थान कीजिए और शुभ पूजा को ग्रहण करिए । अपनी आठों
शक्तियों के सहित मेरा कल्याण करिए । हे देवि! चण्डिके! अपने
परम स्थान को गमन कीजिए प्रस्थान करिए । हे देवि! मेरे द्वारा जो
पूजन किया है वह मुझे परिपूर्ण होवे ।
जल में निमज्जन करके पत्रिका वर्जित जल में भली भाँति त्याग
करके पुत्र, आयु और धन की वृद्धि के लिए मेरे द्वारा जल में आपको
संस्थापन करना चाहिए । यह सब लोकों की विभूति के लिए करे ।
महोत्सव में दुर्गा तन्त्र के द्वारा भद्रकाली, महामाया उग्रचण्डा दोनों ही
देवियों का पूजन करना चाहिए । सब देवियों के पूजन में नेत्रबीज
परिकीर्तित किया गया है । सब योगिनियों का और मूलमूर्ति का तथा
उग्रचण्डा का मन्त्र, हे भैरव! आप पृथक् श्रवण कीजिए । अन्त में मन्त्र
का उपांत आद्यद्वय नेत्रबीज है । अन्तः स्वरवह्नि से बिन्दुओं से औग्रक
तन्त्र है । द्वितीया तो नेत्र द्विधा वर्जित कहा गया है । यह भद्रकाली का
मन्त्र है जो धर्म, काम और अर्थ की सिद्धि के लिए है ।
आठ योगिनियों वाली तन्त्र में वर्णित वैष्णवी देवी का यजन किया
जाया करता है । हे भैरव! पूर्व कल्प में वे शैल की पुत्री कही गई है ।
उग्रचण्डा आदि आठ दुर्गा तन्त्र की कीर्तित की गई है । भद्रकाली के
मन्त्र के द्वारा भद्रकाली का पूजन करना चाहिए । ये आठों योगिनियों

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३५२ ௬ श्रीकालिका पुराण ௬

का भूति की वृद्धि के लिए अभ्यर्चन करना चाहिए । अब उन आठों
के नाम बताये जाते हैं, जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी,
दुर्गा, शिवा, क्षमा, धात्री इनका आठ दलों में पूजन करे । जिस समय
में उग्रचण्डा तन्त्र के द्वारा वहाँ पर वह देवी पूजी जाती है, हे भैरव!
वहाँ पर आठ योगिनियाँ जो अन्य हैं, पूजन चाहिए । अब इनके भी
नाम बताये जाते हैं-कौशिकी, शिव की दूती, उमा, हेमवतीश्वरी,
शाकम्भरी, दुर्गा, सातवीं महोदरी हैं ।
हे भैरव! सौम्य मूर्ति उमा का तन्त्र अब आप श्रवण कीजिए ।
समाप्ति के सहित आदि फट् जिसके अन्त में होवे और अन्त हीन होवे ।
एक अक्षर वाला और तीन अक्षरों से संयुत उमा का मन्त्र कहा
गया है ।
अब ध्यान बताया जाता है-सुवर्ण के समान वर्ण वाली है, गौरी
दो भुजाओं से युक्त है दाँये हाथ से नील कमल का सदा धारण किए
रहती हैं । शुक्ल चामर को धारण करके गर्भ के दाहिने अंग में दाहिने
हाथ का विन्यास करके संस्थित है, ऐसा ही परिचिन्तन करना चाहिए ।
भक्त को शम्भु के बिना भी रुद्राणी का ध्यान करना चाहिए । जो दो
भुजाओं वाली है, स्वर्ण के सदृश परम शुभ अंगों से समन्वित है । पद्म
तथा चामरा को धारण करने वाली है । व्याघ्र के चर्म पर स्थित पद्म
पर सदा पद्मासन में संस्थित हैं । हे बेताल भैरव! इसके पूजन में आठ
योगिनियों बताई गयी हैं । योगिनियों और नायिकायें भी पृथक्
व्यवस्थित हैं । अब उन आठों के नाम बताये जाते हैं, जया, विजया,
मातंगी, ललिता, नारायणी, सावित्री, स्वधा, स्वाहा ये आठ हैं । पहले
समय में शुम्भ और निशुम्भ ये दो भाई दानव थे । ये दोनों महान् सत्व
वाले थे । इनका विशाल शरीर था । ये महान् बल वाले थे, अन्धक
दानव के पुत्र थे और ये दोनों मतवाले दुर्मद गजों के ही समान थे ।
ये दोनों सेना के साथ रहते थे और उनके वाहन भी थे, वे पाताल तल
में समाश्रित थे ।
इसके उपरान्त उन दोनों महान् असुरों ने परम तीव्र तपश्चर्या की

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और उस समय तप के द्वारा ब्रह्मा जी को परम सन्तुष्ट कर लिया था ।
ब्रह्माजी के द्वारा वर प्राप्त कर लिया था । शुम्भ ने इन्द्र के पद को
प्राप्त करके इन्द्रत्व प्राप्त कर लिया था और निशुम्भ ने चन्द्रत्व प्राप्त
कर लिया था । इन्होंने समस्त देवगणों के जो यज्ञों में भाग थे उनका
उपाहरण कर लिया था । स्वयं शुम्भ और निशुम्भ ने दिक्पालों के पद
को प्राप्त कर लिया था । इन्द्र के सहित समस्त देवगण फिर हिमाचल
पर गए थे और गंगावतरण के स्थल के समीप में उन्होंने महामाया की
स्तुति की थी । नाना भाँति से स्तवन की हुई देवी जो कि सभी देवों
के समुदायों द्वारा स्तुत हुई थी । मातंग वनिता का स्वरूप धारण करके
उस देवी ने देवगणों से पूछा था-हे देवगणों! यहाँ पर आपके द्वारा
कौन सी भामिनी का स्तवन किया जा रहा है और आप लोग यहाँ पर
किसलिए समागत हुए हैं ? किस प्रयोजन की सिद्धि के लिए इस
मातंग के आश्रम की ओर आये हैं ?
इस प्रकार से यह बोलती हुई उस मातंगी के कायकोष से समुद्भूत
हुई देवी ने कहा-ये सुरगण मेरा ही स्तवन कर रहे हैं । शुम्भ और
निशुम्भ ये असुर समस्त देवों को बाधा दिया करते हैं । इसी कारण से
उन दोनों का वध करने के लिए इन समस्त सुरों के द्वारा मेरा स्तवन
किया जा रहा है । मातंगी के कायकोष से देवी के विनिःसृत होने पर
वह गौरी पिसे हुए अञ्जन के समान ही एक ही क्षण में कृष्ण वर्ण की
हो गयी थी और वह हिमवान् पर्वत में समाश्रय वाली थी । ऋषिगण
जो मनीषी है उसको यहाँ पर उग्रतारा नाम से कहा करते हैं । यह
अम्बिका देवी सदा भय से भी परित्राण किया करती हैं । इसका प्रथम
बीज तीनों ही कहे गए हैं । यह इसी कारण से एक जटा नाम वाली
है क्योंकि एक ही जटा वाली है । हे बेताल भैरव! इसका चिन्तन
अर्थात् ध्यान जिस प्रकार से भक्त ध्यान करके अपना अभीप्सित प्राप्त
किया करता है कि वह चार भुजाओं से समन्वित है उनका वर्ण एकदम
कृष्ण है और यह नरमुण्डों की माला से शोभायमान है ।
दाहिने हाथ से वह खंड को धारण किए हुए हैं और अधोभाग में

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३५४ ०८ श्रीकालिका पुराण ८०
चमर धारण कर रही है । क्रम से बायें में हाथ खर्पर को धारण करने
वाली हैं । स्वयं शिर के शरीर एक जटा को धारण कर रही हैं । जो
द्युलोक को मानो जटा से लिख रही होवें । मस्तक में मुण्डों की माला
पहने हुए हैं और सर्वदा ग्रीवा में भी मुण्डमाला धारण करती है । उनके
वक्षस्थल में नागों का हार है और उनके नेत्र रक्तवर्ण के हैं । कटि में
कृष्ण वर्ण के वस्त्र धारण करने वाली हैं तथा बाघम्बर से भी समन्वित
रहती हैं । उनका बाँया चरणशिव के हृदय पर है तथा दाहिना चरण
सिंह की पीठ पर संस्थापित हो रहा है और स्वयं शव को अपनी लम्बी
जिह्वा से चाट रही है । अट्टहास करती हुई महान् घोर ध्वनि वाली
अत्यन्त ही भीषण स्वरूप वाली है । निरन्तर सुख की इच्छा वाले
भक्तियुक्त भक्तों के द्वारा आगे वह तारा देवी चिन्तन के योग्य हैं ।
अब देवी को जो आठ योगिनियाँ कही गई हैं उनको मैं बतलाऊँगा ।
उनके सब नाम बताये जाते हैं, महाकाली, रुद्राणी, उग्रा, भीमा, घोरा,
भ्रामरी, महारात्रि और आठवीं भैरवी बताई गई है । उन योगनियों का
यजन करना चाहिए ।
हे भैरव! जो कालिका के कायकोष से निकली थी वह कौशिकी
इस शुभ नाम से विख्यात हुई थी । यह परम सुन्दर, स्वरूप वाली और
अत्यधिक मनोहर थी । यह देवी के हृदय से निःसृत हुई थी । रसना के
अग्रभाग से चण्डिका निकली थी । यह इतनी अधिक सुन्दर थी कि
इनके समान कोई भी अपनी मूर्ति की चारुरूपता से युक्त नहीं थीं ।
तीनों लोकों में कान्ति से इसके तुल्य कोई भी नहीं है और न होगी ।
जो महामाया योगनिद्रा मूल प्रकृति मानी गयी है । जो यह कौशिकी
देवी कही गयी है यह उसकी प्राण की स्वरूप वाली है तथा इसका नेत्र
बीज कहा गया है । हे भैरव! इसका मन्त्र और मूर्तिरूप को मैं कहूँगा ।
समाप्ति नान्त्य दन्त्य बिन्दुओं के सहित सर्वांगादि और परस्पर में
संस्पृष्ट हो और बिन्दु से समलंकृत होवे यह कौशिकी मन्त्र का तन्त्र है
जो समस्त काम और अर्थ का देने वाला है । उसकी जो यहाँ पर मूर्ति
है उसको मैं बताऊँगा । आप एक मन वाले होकर उसका श्रवण करिए
यह जगत् के आह्लाद को करने वाला है ।

अब उसके स्वरूप का वर्णन किया जाता है, धम्मिल पुष्पों के

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௵ श्रीकालिका पुराण ௵ ३५५
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अब उसके स्वरूप का वर्णन किया जाता है, धम्मिल पुष्पों के
द्वारा जिसके केश सुसंयत हैं, केशों के अन्त में और तिलक के ऊर्ध्व
भाग में चन्द्र की नीचे की ओर मुख वाली कला को धारण किए हुए
हैं और परम मनोहर है । मणियों से परिपूर्ण कुण्डलों से जिसके
गण्डस्थल संस्पृष्ट हो रहे हैं तथा जिसका मस्तक मुकुट से विभूषित
है । कर्णपूरों की सद्ज्योति कानों को आपूरित करके संगत हो रही है
और वह सुवर्ण, मणि तथा माणिक्यों के सहित नागहार से विराजमान
हैं । वह सर्वदा सुगन्धयुक्त पद्मों से जो कि म्लान नहीं है अत्यन्त सुन्दर
स्वरूप वाली है । जो अपनी ग्रीवा में माला को धारण किए हुए हैं रत्न
निर्मित केयूरों को पहने हुए हैं । यह मृणाल के सदृश आयत एवं सुवृत्त
तथा कोमल और शुभ बाहुओं से समन्वित है । जो कञ्चुकी के समेत
पीन एवं उन्नत पयोधरों वाली शोभायमान है । इनका मध्यभाग बहुत
क्षीण है, पीत वर्ण के वस्त्रों वाली हैं और त्रिवली से विभूषित हैं । वह
देवी अपने दाहिने ओर के करों के द्वारा शूल, वज्र, वाण, खंग और
शक्ति को धारण करके विराजमान हैं । वह देवी अपने बायें करों से
ऊर्ध्वादि क्रम से ही गदा, जटा, चाप, चर्म और शंख को धारण करने
वाली है ।
वह कौशिकी देवी सिंह के ऊपर संस्थित है तथा व्याघ्र के चर्म को
धारण किए हुए हैं । उनका रूप अनुपम है, जो सभी सुरों और असुरों
के मोदन करने वाला है । हे वत्स! इसकी जो आठ योगिनी पूजा के
योग्य हैं उनके विषय में आप श्रवण करिए । वे पूजित होती हुई मनुष्यों
के चतुर्वर्ग को सदा प्राप्त किया करता है । अब उन आठों के शुभ नाम
बताये जाते हैं । सर्वप्रथम ब्रह्माणी कही गयी हैं, फिर माहेश्वरी,
कौमारी, वाराही तथा पाँचवी वैष्णवी है, नारसिंही, ऐन्द्री तथा आठवीं
शिवादूती है । इन महामाया योगिनियों का अभ्यर्चन करना चाहिए । ये
कामनाओं के प्रदान करने वाली हैं । जो देवों के ललाट से विनिर्गत
हुई थी, वह काली इस नाम से प्रसिद्ध है । हे भैरव! उस काली का
मन्त्र मैं बताऊँगा, उसका आप श्रवण करिए । मन्त्र कामनाओं का प्रदान

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३५६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
करने वाला है । समाप्ति के सहित दन्त्य है और उसके आगे रहने वाला
प्रान्त होता है । छठवें स्वर अग्नि और बिन्दु के सहित होता है तथा
आदि के भी सहित होता है । यह काली का मन्त्र बताया गया है । यह धर्म,
काम और अर्थ का प्रदान करने वाला है । अब इसकी मूर्ति का वर्णन
करूँगा । हे वत्स! तुम एकाग्रमन वाले होकर उसका श्रवण करिए ।
वह नीलकमल से समान श्याम वर्ण वाली है और चार बाहुओं से
समन्वित उनका वपु है । वह अपने दाहिने कर में खट्वांग और
चन्द्रहास को धारण करने वाली है । वाम कर में पुनः ऊर्ध्व और अधो
भाग में चर्म और पाश को धारण किए हुए हैं । कण्ठ में नरमुण्डों की
माला पहने हुए हैं और व्याघ्र के चर्म को धारण करने वाली परम श्रेष्ठ
हैं । उनका अंग कृश हैं और लम्बी दाढ़ों वाली है तथा अत्यन्त दीर्घ
अर्थात् लम्बी एवं अत्यन्त भीषण स्वरूप से समन्वित है । उनकी जिह्वा
अतीव चंचल है, निम्न रक्त वर्ण वाले नेत्रों से संयुत है, उनका महान्
भैरव नाद है । मृत मनुष्य के धड़ को वाहन बनाकर उपविष्ट है और
उनके श्रवण तथा मुख विस्तार वाले हैं । इस प्रकार के स्वरूप से
सम्पन्न यह तारा देवी है और यह चामुण्डा, इस नाम से गान की जाया
करती हैं । इस देवी की आठ योगिनियाँ हैं यदि उनका यजन एवं ध्यान
किया जावे । उनके ये शुभ नाम हैं, त्रिपुरा, भीषण, चण्डी, कर्त्री,
विधायनी, कराला और शूलिनी, ये आठ के कीर्त्तित की गई हैं । यह
देवी अतिकाम की हानि करने वाली है । उस देवी के समान कोई भी
कामनाओं के देने वाली नहीं है । यह देवी कौशिकी के हृदय से
निकली हैं ।
यह देवी शिवदूती नाम से प्रसिद्ध है और सैंकड़ों देवों से सर्वदा
समावृत रहा करती है । अब मैं इसका मन्त्र बताऊँगा जो धर्म काम और
अर्थ का प्रदान करने वाला है और मनुष्य अविलम्ब ही समस्त
कामनाओं की प्राप्ति कर लिया करता है और सब विजय प्राप्त कर
लेने वाला हो जाता है । अन्त समाप्ति के सहित है और बिन्दु तथा इन्दु
से दशावर है । उपान्त्य स्वर से अन्त से पूर्व में संम्पृष्ट होता है । वह

सहित प्रथम स्थित है । हे वत्स! अब मैं इसके स्वरूप का वर्णन

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६०८२ श्रीकालिका पुराण ६०८२ ३५७
ही दो बिन्दु पूर्व में स्थित उपांत पावक है । छठे कला से शून्यों के
सहित प्रथम स्थित है । हे वत्स! अब मैं इसके स्वरूप का वर्णन
करूँगा । आप एकाग्रचित होकर ही इसका श्रवण करिए । इसकी चार
तो भुजायें हैं, परम विशाल शरीर है और सिंदूर के समान ही इसकी
आकृति है । रक्त वर्ण वाली इसकी दन्त पंक्ति है । कंठ में नर मुण्डों
की माला धारण किए हुए रहती है और मस्तक में जटाजूट तथा
अर्द्धचन्द्र विराजमान रहा करता है । कानों के कुण्डलों तथा हार से
शोभायमान हैं उसके नख परम उज्जवल हैं ।
यह देवी बाघम्बर का परिधान करती है । दक्षिण भुजाओं में शूल
शंख धारण किया करती हैं तथा बांये करों में पाश तथा चर्म ऊर्ध्व
तथा अधो भाग के क्रम से धारण करने वाले हैं । इनका मुख स्थूल
है, पीन अर्थात् मोटे ओष्ठ हैं, इनकी मूर्ति बहुत ऊँची है और यह
परमाधिक भयंकर है, यह दाहिने चरण को कुणप के ऊपर निक्षिप्त
करके संस्थित रहती है । उनका बाँया चरण शृगाल की पीठ पर रहता
है जो शृगाल सैंकड़ों ही फेरुओं से घिरा हुआ होता है । इस प्रकार की
शिवदूती की प्रतिमा है । इसका ध्यान विभूति की वृद्धि के लिए करना
चाहिए । इस देवी के केवल ध्यान ही करने से मनुष्य परम कल्याण
की प्राप्ति कर लिया करता है । और यदि इस देवी का अर्चन किया
जावे तो यह समस्त कामनाओं को प्रदान कर दिया करती है । जो कोई
पुरुष शिवाओं की ध्वनि का श्रवण करके शुभों की प्रदात्री शिवदूती
को साधक प्रणाम किया करता है और भक्ति की भावना से प्रणिपात
करता है तो उसकी सभी कामनायें उसके साथ ही में स्थित रहा करती
हैं । जिस अवसर पर समस्त जगतों की भलाई करने के लिए इसने
रक्तबीज का हनन किया था तो उस समय में महामाया महादेवी इसके
शरीर से निःसृत हुई थी । उस अम्बिका ने शुम्भ दैत्य के लिए शिव
को ही अपना दूत बनाकर उसके पास प्रेषित किया था । उसी कारण
से वह समस्त देवगणों के द्वारा शिवदूती इस शुभ नाम से गान की
जाया करती है ।

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३५८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
इसके पूजन में बारह योगिनियाँ कीर्तित की गई हैं, उनके शुभ नाम
से हैं, क्षेमकारी, शांता, वेदमाता, महोदरी, कराला, कामदा, भगास्या,
भगमालिनी, भगोदरी, भगारोहा, भगजिह्वा, भगा, ये द्वादश योगिनियाँ
हैं जिनका पूजन कहा गया है । देवी स्वयं ही विचरण करती हुई
जहाँ-तहाँ पर गमन किया करती हैं । जिस प्रकार से अन्यों की हुआ
करती है वैसे ही पुनः ये योगिनियाँ सखियाँ होती हैं । चण्डिका की
योगिनियाँ यहाँ पर सब सखियाँ बताई गई हैं । ये सब रीति से
आपके-सामने अंग मंत्र संक्षेप में वर्णित कर दिए गए हैं । अब आप
दोनों के समक्ष में कामाख्या देवी का कल्पमात्र महात्म्य बताता हूँ ।
नृप धर्म कथन
ऋषियों ने कहा--आपने सर्ग का वर्णन किया और जो भी कुछ
संशय उसमें हुए थे उनका भी आपने निवारण कर दिया है । हे गुरो!
आपके प्रसाद से, हे महाभाग! हम कृत-कृत्य हो गए हैं । हे द्विजात्मा
फिर हम आपसे कुछ श्रवण करना चाहते हैं यह अन्य भृंगी महाकाल
कौन है जो यह वेताल तथा भैरव समुत्पन्न हुए हैं । बेताल को महाकाल
और भृंगी भैरव को हम सुनते हैं । इनका चतुष्टय कैसे हुआ अर्थात्
चार कैसे हो गए थे । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विजोत्तमो! महाकाल
के भूमण्डल में उत्पन्न होने पर और मनुष्यत्व में भृंगी के होने पर उन
दोनों से ये बेताल और भैरव नामों वाले समुद्भूत हुए थे । वेताल को
वरदान प्राप्त होने पर और उसके साथ भैरव के संगत हो जाने पर
भगवान् हर ने तप से युक्त अन्धक को भृंगी कर दिया था । अन्धक
पहले हर से विरुद्ध होकर आपदा में फँस गया था । इससे उसने
भगवान् हरि की समाराधना की थी और उनका पुत्र हुआ था । भगवान्
हरि ने स्नेह से उसका नाम भृंगी रख दिया था । भगवान् हरि ने स्नेह
से जो महाकाल में था उसको बलि का पुत्र बाण कर दिया । भगवान्
विष्णु के द्वारा कटे हुए बाहुओं वाले को महाकाल बना दिया था । इस
प्रकार से, हे मुनिवरो! उनका चार होना संयत होता है । अनुक्रम से
वेताल, भैरव, भृंगी और महाकाल है ।

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ऋषियों ने कहा-जो राजा सगर ने महान् बुद्धिमान् और्व मुनि ने
पूछा था, हे गुरुवर! नीति से जिस तरह से भार्या सुत और बोधिक
किए जाते हैं। राजनीति में सत्पुरुषों की नीति में और सदाचार में स्थित
है। हे जगत् के गुरुवर! आप तो महान् भाग वाले हैं उनको आप
बताइए। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-महान् आत्मा वाले और्व ने जो-जो
विशेष बताये थे। हे मुनियों में श्रेष्ठ वरो! यह सब आपको बताऊँगा
आप श्रवण करिए। राजा सगर ने इस तरह से मन्त्र कल्यादित को
सुनकर उन महा मुनि से पुनः नित्यादिक की विशेषता पूछी थी। सगर
से कहा-जिस प्रकार से नीति के द्वारा सुत, आत्मा और प्रिया के साथ
नीति से प्रयोग करना था उनकी विशेषता के सहित जो सदाचार हैं
उनको आप मुझे बताइए।
और्व मुनि ने कहा-हे राजेन्द्र! अब आप क्रम से ही श्रवण कीजिए
जिस प्रकार से नीति के द्वारा आत्मा, सुत और भार्या को नियोजित
किया जाता है उसकी विशेषता मुझसे सुनिये। ज्ञान में बड़े, वय में
बड़े, विद्या और तप में बड़े, सुरदक्षिणों का सबसे प्रथम सेवन करे
तथा निन्दा से रहित विप्रों का सेवन करना चाहिए और उनसे नित्य ही
वेदों और शास्त्रों के विशेष निश्चय का श्रवण करना चाहिए। उन्होंने
जो भी कुछ कहा हो, वह करना चाहिए। प्राज्ञ नृप है, उसे उसका
समाचरण करना चाहिए। ये पाँच इन्द्रियों पाँच अश्व हैं और यह
शरीर रथ कहा जाता है। आत्मा रथी अर्थात् रथ का स्वामी है अश्वों
को हाँकने के लिए ज्ञान कशा चाबुक है इस रथ का सारथी मन होता
है। अश्वों को सदा सुदृढ़ करे तथा शरीर की स्थिरता रखनी चाहिए।
जिस तरह से आदान्त अश्वों पर समारोहण करके रथी अश्वों की
इच्छा के अनुसार से अश्वों को प्रेरित करता हुआ सारथी वहाँ पर
अवश होता है वह परम प्रथित वीर को भी परवश कर देता है।
इसी भाँति राजा को विषयों के परिग्रहण करने में इन्द्रियों को
अपने ही वश्य करना चाहिए। हे नृपश्रेष्ठ! ज्ञान के सुदृढ़ होने पर
कशा की सुदृढ़ता में अपने वश में रहने वाला सारथि दाँत अश्वों प्रेरित

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३६० श्रीकालिका पुराण
करने में समर्थ होता है । इसलिए नृप को चाहिए कि अपनी इन्द्रियों
को तथा मन को अपने वश में रखकर ज्ञान के मार्ग में अविष्टित होकर
आत्मा का हित सम्पादित करे । फिर अपनी इच्छा से भोग करना
चाहिए । जो सुनने योग्य है उसे ही श्रवण करना चाहिए । श्रवण में
अधिक समाचरण न करे । शास्त्रों के तत्त्वामृत में धीर श्रुति वश्य नहीं
होता है । इस रीति से इच्छा से घ्राण, त्वचा को वशीकृत करके अपनी
इच्छा से उपभोग न करे और उद्दाम विषय का गमन न करना चाहिए ।
यदि राजा इसी रीति से समाचरण करने वाला होवे तो उसी समय में
वह इन्द्रियों को जीत लेने वाला हो सकता है । जितेन्द्रिय होने में शास्त्रों
और वृद्धों का उपसेवन करना ही हेतु हुआ करता है ।
जो नृप वृद्धों का सेवन करने वाला नहीं होता तथा शास्त्रों का
ज्ञाता नहीं होता है वह शत्रुओं के वशीभूत हो जाया करता है । इस
कारण से शास्त्रों में अधिष्ठित होकर राजा को जितेन्द्रिय होना चाहिए ।
धृति, दान, मैत्री, कृतज्ञता, वाक्पटुता, विवेचन, दक्षता, धारयिष्णुता,
दान, दृढ़नुशासनता, सत्य, शौच, युद्ध का विशेष निश्चय, दूसरों के
अभिप्राय का ज्ञान करना, चरित्र, आपत्ति में धीरज, निन्दा न करना,
क्रोधी न होना, गुरु द्विजों का अर्चन, इन गुणों का राजा को अभ्यास
करना चाहिए । धर्म अर्थ और काम में कार्य और अकार्य का विभाग
का निरन्तर प्रतिबोध करना चाहिए और अवसर होने पर उसे करना
चाहिए । साम, दाम, भेद और दण्ड वह चतुष्टय अर्थात् चार बातें हैं ।
उसके कालों में उपायों का ज्ञान करके उनके उपायों का प्रयोग करे ।
साम विषय में भेद मध्यम कहा गया है । दान के समय में साम योग्य
ही उपलक्षित होता है ।
दान के विषय में दण्ड अधम कहा गया है । दण्ड के विषय में
दान जो होता है, वह भी अधम ही कहा जाता है । साम के गोचर
अर्थात् प्रत्यक्ष होने पर जो दण्ड का प्रयोग है वह अधम से भी अधम
कहा गया है । राजा के दण्ड और भेद में निरन्तर सौजन्य जानना
चाहिए । साम और दाम की सुजनता गोचर में जाती है । काम, लोभ,

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३६१
हर्ष, नाम, मद, इनको अतिशय रूप में होने वालों का राजा के शत्रुओं
की तरह विनष्ट कर देना चाहिए । संयुक्त काल में ही उसका सेवन
करना चाहिए । लोभ और गर्व को विवर्जित कर देवे । नृपों का तेज
ही तीव्र होता है । जिस तरह से सूर्य का हुआ करता है । उसमें गर्व रोग
से युक्त होता है जिस कायमान् को उसको त्याग कर देना चाहिए ।
आखेट, अक्ष, स्त्री सेवन, पान और अर्थ दूषण, वाणी और दण्ड में
कठोरता इन सबका वर्जन कर देना चाहिए । विरक्त पुरुष पराई स्त्रियों
में सेवन करना एकान्त रूप से वर्जित कर देवे । अपनी सती नारियों
में युक्त सेवन करना चाहिए ।
जो दाराऐं रति और पुत्र के फल वाली हैं उनका रूप से त्याग नहीं
करें । रति और पुत्र दोनों की सिद्धि के लिए स्त्रियों को सेवन करना
चाहिए । किन्तु उनमें अत्यन्त आसक्ति का वर्जन कर देवे । मृगया जो
प्रमादो का स्थान होता है, इसका नित्य वर्जन कर देवे । अक्षों का भी
सेवन न करे, ये सत्यकार्य और शक्ति का विनाश करने वाले होते हैं ।
अकार्यों के करने में और कृत्यों के वर्जन में यह बीज होता है । अकाल
मन्त्र भेद में कलह में सत्कार के क्षय में निरन्तर सुरापान का वर्जन कर
देवे जो कि यह मदिरा पान, शौच और मांग्ल्य का विनाश करने वाला
होता है । यह अर्थ के क्षय का करने वाला होता है । अतएव इसका
त्याग कर देना चाहिए । अभिशस्त, चोर-घातक, आततायी में राज को
निरन्तर दण्ड की कठोरता नहीं करनी चाहिए । सदा सत्य की रक्षा
करनी चाहिए । एक सत्य में ही परायण रहे ।
क्षमा और तेजस्विता का प्रस्ताव से नृप को समाचरण करना
चाहिए । यान, आसन, आश्रय, द्वैध, सन्धि तथा विग्रह-इन छह गुणों
तथा इनके शाश्वत स्थान का नृप को अभ्यास करना चाहिए । जो
स्थान, वृद्धि, क्षय, कोष, जनपद में और दण्ड में जो परिमाण को नहीं
जानता है वह राज्य पर अवस्थित नहीं करता है । वह एक-एक में
तीन-तीन हैं । प्रस्ताव से विनियोग करना चाहिए । किसी एक की ही
रक्षा न करे, इन सबकी रक्षा करनी चाहिए । मित्र, शत्रु और उदासीन

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३६२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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तीनों में ही अपने प्रभाव करना चाहिए । नृपों को विजय की इच्छा में,
धर्म कृत्य में अष्ट वर्ग में, शरीर यात्रा निर्वाह मे निरन्तर उत्साह करना
चाहिए । मन्त्र के निश्चय से समुत्पन्न बुद्धि को सर्वत्र योजित करे,
अमात्य में, शास्त्र में, राज्य में, पुत्रों में और अन्तःपुर में बुद्धि का
योजन करना चाहिए ।
कृषि, दुर्ग, वाणिज्य, खङ्गों का कर साधन, सैन्य करों का
आदान, गजों और अश्वों का बन्धन, सदम सुखों के शून्य में जनों के
द्वारा निरन्तर योजन और तीन सार सेतुओं का बन्धन आठवाँ हैं । इन
आठ वर्गों में चारों को भली भाँति प्रयोजित करना चाहिए । कार्य और
अकार्य के विभाग के लिए अष्ट वर्ग के अधिकारियों को योजित
करे । राजा को अष्ट वर्गों के लिए नियोजित करे । दश को शून्य में
नियुक्त करे । उनको क्रम से मुझसे सुनिए । स्वामी, सचिव, राष्ट्र,
मित्र, कोष, जल, दुर्ग और गुरु भाषित राज्य के अंग हैं । दुर्ग से युक्त
अपने अष्ट वर्ण से चारों को योजित करे । इस कारण से इन शेष पाँच
चार पदों को शुद्धान्तों में, पुत्रों में, यथादि में, अहासन में, शत्रु और
उदासीनों से, बल, अबल के विशेष निश्चय में, इन अठारहों में राजा
चारों को प्रयुक्त करे । प्रकाश में इनको कोई भी न जान पावे उसी
भाँति चारों के द्वारा निरूपित कर देना चाहिए ।
उसका प्रतिकार अवश्य ही निरूपण करके छिद्र से समाचरण
करे । यहाँ पर नृप को ज्ञान प्राप्त करके जो कि चारों के द्वारा किया
जावे दण्ड देवे या चारों को अलग कर देवे । नृप मन्त्री के साथ एकांत
में स्थित रहे । राजा को चाहिए कि प्रदोष के समय में पूछे और उसी
समय में साधन करे । अपने पुत्र के समय में शुद्धान्तः पुर में और जो
चार महासन (रसोई गृह) में नियुक्त होवें उनसे मध्य रात्रि में पूछना
चाहिए । और जो अपने मन्त्री के विषयवार हों उनसे राजा के बिना
मन्त्री के स्वयं ही पूछे । अन्य जो चार हों उनसे मन्त्री के साथ निरूपण
करके फल को प्रदेशन करके चार एक के धारण करने वाला न होवे,
न एक ही होवें और न उत्साह से रहित होना चाहिए । चार सर्वत्र

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३६३
संस्तुत नहीं होना चाहिए। वह अत्यन्त लम्बा न होवे और न बोना ही
होना चाहिए। निरन्तर दिन में चरण करने वाला चार होना चाहिए।
और वह रोगी तथा बुद्धि रहित भी नहीं होवे। चार चित्त के वैभव
से हीन भी न होवे और ऐसा भी नहीं चाहिए जिसके भार्या तथा पुत्र
न होवे। ऐसा ही चार राजा को तत्व गुह्य के विशेष निर्णय के नियुक्त
करना चाहिए।
राजा को अपना चार कैसा बनाना चाहिए यह बताया जाता है, जो
अनेक प्रकार के वेषभूषा के ग्रहण करने में समर्थ हो, भार्या और पुत्रों
में संयुत होवे। बहुत से देश और वाणियों का अभिज्ञ होवे तथा दूसरों
के अभिप्राय का ज्ञाता होवे। चार ऐसा ही करना चाहिए जो दृढ़भक्त,
समर्थ और भय रहित होवे। राजा कृषि में अपने ही समानों के साथ
स्थित होवे। वाणिक्पथ में और दुर्ग आदि में जो शक्त हों उनको ही
नियोजित करना चाहिए। अन्तःपुर में चारों को नियुक्त करे जो पिता
के तुल्य होवें, धीर होवें और वृद्ध होवें। शुद्धान्तःपुर में तथा द्वार में
ऐसों की नियुक्ति करे जो वृद्ध और मनीषिणी होवें। राजा को अकेला
कभी शयन नहीं करना चाहिए और अकेला भोजन भी नहीं करना
चाहिए। अकेली महिषी का गमन न करे और एक ही की मैत्री के
लिए भी कुछ नहीं करना चाहिए। अमात्यों की, उपधा शुद्धों की,
भार्याओं को तथा पुत्रों को प्रसाद के सहित समाचरण करते हुए नृप
को निरन्तर करना चाहिए। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से प्रत्येक का
परिशोधन के द्वारा प्राप्त होकर धारण किया जाता है इसी कारण से
वह उपधा कही जाती है।
अर्थ, काम की उपधाओं से भार्या और पुत्रों का परिशोधन करे।
धर्म की उपधाओं से सचिवों का शोधन करे। इनके द्वारा, यज्ञों से और
दोनों के द्वारा यहाँ पर ही नृप होता है। इस कारण से आप राज्य के
अर्थी हैं अतएव इसी भाँति धर्म का ही समाचरण करे। इसी अभिचार
से अथवा अज्ञों के यह राजा प्राणों का त्याग करता है और तुम राजा
हो जावोगे। इसमें कुछ भी संशय नहीं है। यही नृप का धर्म है और

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३६४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
जो अश्वमेध का आदिक है राजा स्वयं नहीं करता है इस कारण से
हे श्रेष्ठतम! तुम करो । इस प्रकार से नृप कायान्तिक द्विज से मंत्रों के
द्वारा मंत्रणा करके उनके द्वारा अज्ञातों को स्वयं ज्ञान प्राप्त करके उनसे
उसके मन को ग्रहण करे । यदि राज्य की अभिलाषा से सचिव अधर्म
का आचरण करे अथवा राजा के विषय में अधिक करे तो उस धर्म
को हीन बना देवे । अत्यन्त आभिचारिक कर्म को करने वाले का
विघात कर देवे । राजा को चाहिए कि अभिचारिक ब्राह्मण हो तो
उसको देश से बाहर निकलवा दे ।
यह धर्मोपधा जाननी चाहिए उनके अमात्यों को और सुतों को
विजित करे । इस प्रकार की उसी भाँति अन्य उपधा का धर्म से
समाचारण करना चाहिए । कोषाध्यक्षों को समन्वित करके राजा
अमात्यों को प्रतारित कर देवे तथा पुत्रों को अथवा अन्यों को जो मन्त्र
के संवरण करने में असमर्थ होवें प्रतारित कर देना चाहिए । हे नरोत्तम!
यह प्रचुर बहुत बड़ा कोष मेरे अधीन है यदि उसकी आप प्रतीक्षा करते
हैं तो आपकी सम्मति से उसे ले आता हूँ । आपके अर्थ के लग्न दोनों
में हमारा जीवन होगा और आप भी इन प्रचुर कोषों के द्वारा क्या-क्या
नहीं करोगे । इस प्रकार से अन्य कोषगत उपायों से नृप श्रेष्ठ पुत्र,
अमात्य आदिक सबका निरन्तर परिशोधन करे । जो कोष में दोषों के
करने वाले हैं उनका हनन कर देवे और जो करने की इच्छा रखते हों
उनको देश से बाहर निकाल देना चाहिए । जो द्वैध चित्त वाले होवें
उनको विमानित कर देवें किन्तु कोष की रक्षा हर प्रकार से करनी
चाहिए । जो द्वैध चित्त वाले होवें उनको विमानित कर देवें किन्तु कोष
की रक्षा हर प्रकार से करनी चाहिए । दासियाँ, शिल्पनी, वृद्धा, मेधा
और धृति वाली स्त्रियाँ जो बाहर और भीतर गमन किया करती हैं तथा
सचिवों आदि के द्वारा विदित हैं । राजा उसको भार्या आदि से
अलक्षित होकर स्थित होकर स्थित रहकर एकांत में अभिमन्त्रण करके
तथा इसके अनन्तर भली भाँति मन्त्रणा करके सचिवों के पास प्रेषित
कर देवे । वे आकर वहाँ हृदय का ज्ञान प्राप्त करके विज्ञान में तत्पर

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३६५
राजा की महिषी प्रमुख तुमको चाहती हैं यदि आपकी स्पृहा हो तो वहाँ
पर मैं योजित कर दूँगी । सचिव तुमको चाहता है । हे वरवर्णिनि!
आपके योग्य भी है यदि आपकी श्रद्धा हो तो में उसका संगम कराने
के लिए समर्थ हूँ । इस रीति से तथा अनेक उपायों से और उत्तरों के
द्वारा भार्याओं, पुत्र, दुहित्रियों, स्नुषाओं, सचिवों, पुत्रों, सेवकों, आदि
का शोधन करना चाहिए । काम की उपधाओं से अविशुद्ध के बिना
ही कुछ विचार किए हुए विघात कर देना चाहिए । स्त्रियों को दण्ड
के द्वारा योजित करे और ब्राह्मणों को प्रवासित कर देवे । मोक्ष के मार्ग
में अवसक्त तथा हिंसा और पैशुन्य से रहित, क्षमा को ही एक सार
मानने वाले सचिव का राजा को परिवर्जन कर देना चाहिए ।
जो मोक्ष मार्ग में विशेष रूप से शक्त हों, दण्ड योग्य भी हों तो
भी उन्हें दण्ड नहीं देना चाहिए । वह सर्वत्र सम बुद्धि वाला हैं इसी
कारण से उसको परिवर्जित कर देवे । उपधाओं का यह सूत्र है । पुनः
उपधा का बहुत सा विवेचन किया गया है । उशना ने इसका अच्छा
विवेचन किया है । वहाँ पर उसके शास्त्र में इसका बोध करे । राजा
को दूसरों के साथ निरन्तर विग्रह का भली प्रकार से आचरण नहीं
करना चाहिए । भूमि, वित्त, मित्र, लाभों से जब से निश्चय हो जावें
तो ही विग्रह होते हैं । उत्तम नृपों के द्वारा स्वतः अंगों में सदा प्रसाद
ही करना चाहिए । कोष की रक्षा और निरन्तर सञ्चय भली भाँति
करना चाहिए । राजा को अपने मंत्रीगण विद्या में विशारद विप्रों को
ही करना चाहिए । जो विशेष रूप से धर्मशास्त्र के ज्ञाता, कुलीन, धर्म
और अर्थ में कुशल एवं सरल स्वभाव वाले होवें । उनके साथ ज्ञान
की मन्त्रणा करे और अत्यंत अधिक बहुतों के साथ कभी भी समाचरण
करे । एक-एक के ही साथ मन्त्रणा का विशेष निश्चय करे ।
अरण्य से निशिलोक में मन्त्रणा करे किन्तु रात्रि में कभी भी
मन्त्रणा नहीं करना चाहिए । मन्त्रणा के गृह में छोटे बच्चों को, शाखा
मृगों को, (बन्दरों) षण्डों को, शुकों को, सारिकाओं को तथा विकृत
मनुष्यों को वर्जित कर देना चाहिए । नृपों के मन्त्र भेदों में भी जो दूषण