कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextऋषियों ने कहा-जो राजा सगर ने महान् बुद्धिमान् और्व मुनि ने
पूछा था, हे गुरुवर! नीति से जिस तरह से भार्या सुत और बोधिक
किए जाते हैं। राजनीति में सत्पुरुषों की नीति में और सदाचार में स्थित
है। हे जगत् के गुरुवर! आप तो महान् भाग वाले हैं उनको आप
बताइए। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-महान् आत्मा वाले और्व ने जो-जो
विशेष बताये थे। हे मुनियों में श्रेष्ठ वरो! यह सब आपको बताऊँगा
आप श्रवण करिए। राजा सगर ने इस तरह से मन्त्र कल्यादित को
सुनकर उन महा मुनि से पुनः नित्यादिक की विशेषता पूछी थी। सगर
से कहा-जिस प्रकार से नीति के द्वारा सुत, आत्मा और प्रिया के साथ
नीति से प्रयोग करना था उनकी विशेषता के सहित जो सदाचार हैं
उनको आप मुझे बताइए।
और्व मुनि ने कहा-हे राजेन्द्र! अब आप क्रम से ही श्रवण कीजिए
जिस प्रकार से नीति के द्वारा आत्मा, सुत और भार्या को नियोजित
किया जाता है उसकी विशेषता मुझसे सुनिये। ज्ञान में बड़े, वय में
बड़े, विद्या और तप में बड़े, सुरदक्षिणों का सबसे प्रथम सेवन करे
तथा निन्दा से रहित विप्रों का सेवन करना चाहिए और उनसे नित्य ही
वेदों और शास्त्रों के विशेष निश्चय का श्रवण करना चाहिए। उन्होंने
जो भी कुछ कहा हो, वह करना चाहिए। प्राज्ञ नृप है, उसे उसका
समाचरण करना चाहिए। ये पाँच इन्द्रियों पाँच अश्व हैं और यह
शरीर रथ कहा जाता है। आत्मा रथी अर्थात् रथ का स्वामी है अश्वों
को हाँकने के लिए ज्ञान कशा चाबुक है इस रथ का सारथी मन होता
है। अश्वों को सदा सुदृढ़ करे तथा शरीर की स्थिरता रखनी चाहिए।
जिस तरह से आदान्त अश्वों पर समारोहण करके रथी अश्वों की
इच्छा के अनुसार से अश्वों को प्रेरित करता हुआ सारथी वहाँ पर
अवश होता है वह परम प्रथित वीर को भी परवश कर देता है।
इसी भाँति राजा को विषयों के परिग्रहण करने में इन्द्रियों को
अपने ही वश्य करना चाहिए। हे नृपश्रेष्ठ! ज्ञान के सुदृढ़ होने पर
कशा की सुदृढ़ता में अपने वश में रहने वाला सारथि दाँत अश्वों प्रेरित