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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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६०८२ श्रीकालिका पुराण ६०८२ ३५७
ही दो बिन्दु पूर्व में स्थित उपांत पावक है । छठे कला से शून्यों के
सहित प्रथम स्थित है । हे वत्स! अब मैं इसके स्वरूप का वर्णन
करूँगा । आप एकाग्रचित होकर ही इसका श्रवण करिए । इसकी चार
तो भुजायें हैं, परम विशाल शरीर है और सिंदूर के समान ही इसकी
आकृति है । रक्त वर्ण वाली इसकी दन्त पंक्ति है । कंठ में नर मुण्डों
की माला धारण किए हुए रहती है और मस्तक में जटाजूट तथा
अर्द्धचन्द्र विराजमान रहा करता है । कानों के कुण्डलों तथा हार से
शोभायमान हैं उसके नख परम उज्जवल हैं ।
यह देवी बाघम्बर का परिधान करती है । दक्षिण भुजाओं में शूल
शंख धारण किया करती हैं तथा बांये करों में पाश तथा चर्म ऊर्ध्व
तथा अधो भाग के क्रम से धारण करने वाले हैं । इनका मुख स्थूल
है, पीन अर्थात् मोटे ओष्ठ हैं, इनकी मूर्ति बहुत ऊँची है और यह
परमाधिक भयंकर है, यह दाहिने चरण को कुणप के ऊपर निक्षिप्त
करके संस्थित रहती है । उनका बाँया चरण शृगाल की पीठ पर रहता
है जो शृगाल सैंकड़ों ही फेरुओं से घिरा हुआ होता है । इस प्रकार की
शिवदूती की प्रतिमा है । इसका ध्यान विभूति की वृद्धि के लिए करना
चाहिए । इस देवी के केवल ध्यान ही करने से मनुष्य परम कल्याण
की प्राप्ति कर लिया करता है । और यदि इस देवी का अर्चन किया
जावे तो यह समस्त कामनाओं को प्रदान कर दिया करती है । जो कोई
पुरुष शिवाओं की ध्वनि का श्रवण करके शुभों की प्रदात्री शिवदूती
को साधक प्रणाम किया करता है और भक्ति की भावना से प्रणिपात
करता है तो उसकी सभी कामनायें उसके साथ ही में स्थित रहा करती
हैं । जिस अवसर पर समस्त जगतों की भलाई करने के लिए इसने
रक्तबीज का हनन किया था तो उस समय में महामाया महादेवी इसके
शरीर से निःसृत हुई थी । उस अम्बिका ने शुम्भ दैत्य के लिए शिव
को ही अपना दूत बनाकर उसके पास प्रेषित किया था । उसी कारण
से वह समस्त देवगणों के द्वारा शिवदूती इस शुभ नाम से गान की
जाया करती है ।