कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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अब उसके स्वरूप का वर्णन किया जाता है, धम्मिल पुष्पों के
द्वारा जिसके केश सुसंयत हैं, केशों के अन्त में और तिलक के ऊर्ध्व
भाग में चन्द्र की नीचे की ओर मुख वाली कला को धारण किए हुए
हैं और परम मनोहर है । मणियों से परिपूर्ण कुण्डलों से जिसके
गण्डस्थल संस्पृष्ट हो रहे हैं तथा जिसका मस्तक मुकुट से विभूषित
है । कर्णपूरों की सद्ज्योति कानों को आपूरित करके संगत हो रही है
और वह सुवर्ण, मणि तथा माणिक्यों के सहित नागहार से विराजमान
हैं । वह सर्वदा सुगन्धयुक्त पद्मों से जो कि म्लान नहीं है अत्यन्त सुन्दर
स्वरूप वाली है । जो अपनी ग्रीवा में माला को धारण किए हुए हैं रत्न
निर्मित केयूरों को पहने हुए हैं । यह मृणाल के सदृश आयत एवं सुवृत्त
तथा कोमल और शुभ बाहुओं से समन्वित है । जो कञ्चुकी के समेत
पीन एवं उन्नत पयोधरों वाली शोभायमान है । इनका मध्यभाग बहुत
क्षीण है, पीत वर्ण के वस्त्रों वाली हैं और त्रिवली से विभूषित हैं । वह
देवी अपने दाहिने ओर के करों के द्वारा शूल, वज्र, वाण, खंग और
शक्ति को धारण करके विराजमान हैं । वह देवी अपने बायें करों से
ऊर्ध्वादि क्रम से ही गदा, जटा, चाप, चर्म और शंख को धारण करने
वाली है ।
वह कौशिकी देवी सिंह के ऊपर संस्थित है तथा व्याघ्र के चर्म को
धारण किए हुए हैं । उनका रूप अनुपम है, जो सभी सुरों और असुरों
के मोदन करने वाला है । हे वत्स! इसकी जो आठ योगिनी पूजा के
योग्य हैं उनके विषय में आप श्रवण करिए । वे पूजित होती हुई मनुष्यों
के चतुर्वर्ग को सदा प्राप्त किया करता है । अब उन आठों के शुभ नाम
बताये जाते हैं । सर्वप्रथम ब्रह्माणी कही गयी हैं, फिर माहेश्वरी,
कौमारी, वाराही तथा पाँचवी वैष्णवी है, नारसिंही, ऐन्द्री तथा आठवीं
शिवादूती है । इन महामाया योगिनियों का अभ्यर्चन करना चाहिए । ये
कामनाओं के प्रदान करने वाली हैं । जो देवों के ललाट से विनिर्गत
हुई थी, वह काली इस नाम से प्रसिद्ध है । हे भैरव! उस काली का
मन्त्र मैं बताऊँगा, उसका आप श्रवण करिए । मन्त्र कामनाओं का प्रदान