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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished442 pages

About this granth

The Kalika Purana (कालिका पुराण) is a Shakta upapurana closely tied to Kamarupa in Assam and the shrine of Kamakhya. It glorifies the Goddess as Kalika, Mahamaya and Yoganidra, tells the story of Sati and the origin of the Shakti pithas, and gives detailed rules of worship, which makes it important for students of Tantra and Shakta practice.

Its contents list the glory of the Purana and of Kali, her form and descent, the coming of spring, hymns to Yoganidra and Kali, the words of Madana, Hari's entreaty to Shiva, the proposal of marriage to Sati, the unity of the three gods, the calming of Hara's anger, the story of Mount Kshipra and the river Kshipra, the curse on the Moon, Vasishtha's initiation of Sandhya and his marriage to Arundhati, primal creation, the origin of the Varaha sacrifice and the Kapila incarnation. Later sections describe the falling of Sati's body, the Kamarupa pitha, the testing of Gauri, the Mahamaya rite, the Shakradhvaja festival, the Kamakhya kavacha and matrika nyasa.

This edition is a Hindi translation published by Kalyan Mandir, Prayag. Its 442 pages serve devotees of the Goddess and readers of Shakta Puranic literature.

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൵७५ श्रीकालिका पुराण ൵७५ ३१३
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मन्त्र साधना के अंग
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-भैरव के द्वारा इस सम्वाद को राजा
सगर ने श्रवण करके और भर्ग से वेताल के द्वारा भी सुनकर पुनः और्व
से पूछा । सगर ने कहा-हे द्विज! आपने मन्त्र अंगों के सहित बतला
दिया है । हे द्विजोत्तम! अब देवी के अंगमन्त्र मुझसे कहिए । तथा
समस्त्र मन्त्र और सभी ओर पूजा के स्थान हैं । ठीक उसी भाँति उत्तर
मन्त्र और पृथक्-पृथक् कवचों को और कामाख्यान के माहात्म्य को
जो रहस्य और मन्त्रों के सहित होवे । जैसा भगवान् उमापति महादेव
ने कहा था और वेताल, भैरव दोनों को बतलाया था उसे विस्तार
सहित आप कहने की कृपा करें । यह महान् अद्भुत है, इसका श्रवण
करते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती है । जबकि आपको इसे कहते हुए मैं
देखता हूँ तो मुझे बहुत ही अधिक कौतूहल होता है । और्व ने कहा-हे
राज शार्दूल! जो भी उमापति ने अपने पुत्रों से कहा था और जो एक
महान् आख्यान है । मैं अब आपको कहता हूँ मुझसे आप श्रवण
कीजिए । यह परमाधिक रहस्य है, बहुत ही पवित्र है और पापों का
नाश करने वाला है ।
पुरुषों का परम स्वस्त्ययन अर्थात् कल्याण का आलय है और
इसको गर्भ में पुसंवन कहा गया है, यह कल्याण करने वाला, परम
भद्र और चारों वर्गों के फल का प्रदान करने वाला हैं । इसको ऐसे
व्यक्ति को भी भूलकर भी नहीं देना चाहिए जो शठ होवे, चंचल चित्त
वाला हो । जो नास्तिक हो, जो अजित आत्मा वाला हो, जो देव, द्विज
और गुरु वर्ग का मिथ्या निर्बन्धकारी होवे । जो पापी हो तथा
अभिशाप्त हो, खञ्ज हो, काणा हो और रोगी हो ऐसे पुरुष से यह नहीं
करना चाहिए और न देना भी चाहिए । जिसमें श्रद्धा का अभाव हो
उसे भी यह न देवे । उमापति ने उन दोनों को वेताल, भैरव से कहकर
अर्थात् इस महामाया के मन्त्र कल्प का उपदेश देकर पुनः यह बोले थे ।
भगवान् ने कहा- उत्तम मन्त्र तो मैंने कह दिया है किन्तु अब मूल मन्त्र
को बताऊँगा वह ही सर्वप्रथम जान लो । यह सब पूजाओं में संगत हैं ।

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३१४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
आचमन करके, शुचिता को प्राप्त हुआ, सुन्दर रीति से स्नान किया
हुआ देव पूजा में स्थित होवे । पूजा की वेदी से बाहर स्थित होकर
बुद्धि से चार हाथों के अन्तर में स्थित रहे । घर में अथवा द्वार देश में
स्थित होता हुआ शिर से गुरु को प्रणाम करे अपने इष्टदेव को इसी
भाँति प्रणाम करना चाहिए तथा चित्त के ही द्वारा दिक्पालों को प्रणाम
करना चाहिए ।
जो पाप में अथवा पूर्वकाल में अर्जित किया है उन दिनों में अथवा
अन्य किसी दिन में प्रायश्चितों के द्वारा अपनुन्न नहीं किया गया है उस
पाप का बुद्धि के द्वारा स्मरण करना चाहिए । उस पाप के अपनोदन
करने के लिए दो मन्त्रों का उच्चारण करे । हे देवि! जो कि एक प्राकृत
चित्त है पाप से आक्रांत हो गया था आप मेरे चित्त से आप पाप को
निकाल दो, हूँ फट् आपके लिए नमस्कार है । पाप पुण्य के कुछ देव
प्रत्यक्षा देखने वाले हैं उनमें सूर्य, सोम, यम, काल, और पाँच महाभूत
ये नौ हैं । ये शुभ और कर्म के नौ देव साक्षी होते हैं । इसके अनन्तर
'हूँ फट्' इसके पार्श्व में, ऊर्ध्व में और अधोभाग में आत्मा को क्रोध
की दृष्टि से निरीक्षण करके सुनना चाहिए । ऐसा करने पर प्रथम से
पापों के उत्सारण कर्म किए जाने पर जो भी दृढ़त्तर पाप होता है वह
दूर ही स्थित रहा करता है । पूजन के अतीत होने पर जो अपने स्थान
को पुनः प्रणाम करता है तो जो भी अल्पतर पाप हो वह नाश को प्राप्त
हो जाया करता है । ॐ अः फट्, इस मन्त्र के द्वारा पूजा की वेदी से
वह प्रवेश करे ।
पूजन में पापों के त्याग कर देने वाले की जो भी अभीष्ट कामना
है वह क्षण भर में पूरी हो जाया करती है । पुष्प, नैवेद्य, गन्ध प्रभृति
'ह्रीं हूँ फट्' मन्त्र से जो अपने द्वारा अवज्ञात न होवें भली भाँति से पुष्प
आदि का दूषण, स्पर्श न करने के योग्य का स्पर्श, जो अन्याय से
अर्जित होवे तथा निर्माल्य में संतुष्ट में जो कीट आदि का आरोहरण
हो वह सभी नाश को प्राप्त हो जाता है । नैवेद्य आदि के अवलोकन
से फिर 'रम्', इस मन्त्र से दीप की शिखा का संस्पर्श करना चाहिए ।

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8002 श्रीकालिका पुराण 8002 ३९५
उसका वह दीप स्पर्शन मात्र से ही सुभग हो जाता है । पतंग कीट-केश
आदि के दाह से, कन्याद से संहत, वसा, मज्जा, अस्ति सम्पूति जो
यज्ञादि में उपयोजन हैं ऐसे अज्ञात रूप वाला सभी दोष स्पर्श से ही
विनाश को प्राप्त हो जाया करता है । नारसिंह मन्त्र के द्वारा देवतीर्थ से
संस्पर्श करे । याजक को चाहिए कि घट के मध्य मैं स्थित जल को
देखते हुए अभ्युक्षण करे ।
बांये हाथ से पकड़ कर उस समय में वाम पार्श्व में स्थित पात्र को
आधार मन्त्र के द्वारा संस्कार करता हुआ जल का संस्पर्श करना
चाहिए । यहाँ पर यज्ञ दान से अपेय आदि का संसृष्टि संगता है । शव
के स्पर्श से जलाशय और स्नान से संगत जल से दूषण सब देव पूजन
में विष्ट हो जाया करते हैं । चन्द्रार्थ बिन्दु से रहित यह नारसिंह मन्त्र
है । अपनी संज्ञादि का अक्षर जो बिन्दु और चन्द्रार्द्ध से परियोजित
होवे । इसको कार्य की सिद्धि के लिए आधार मन्त्र साधक जान लेवे ।
फिर आधार मन्त्र के द्वारा अपने आसन को हाथों से लाकर और
रखकर शीघ्र ही पाणि में संस्पर्श करे । उस समय में उस श्रेष्ठ आसन
पर आत्मा मन्त्र के द्वारा उपवेशन करे ।
पूर्व में सोम से समन्वित स्वाक्षर के समाहूत करके साधक को
बिन्दु के सहित आत्मा मन्त्र जानना चाहिए । इसके अनन्तर नाद बिन्दु
से समन्वित मातृका न्यास करे । विचक्षण पुरुष को अपने शरीर में
मातृका के मन्त्रों के द्वारा न्यास करना चाहिए । जो भी दुष्ट हो तथा
स्पष्ट हो और मात्राओं के भ्रष्ट आदि का दोष होवे न्यास किए हुए
मातृका के मन्त्र साथ ही उनका नाश कर दिया करते हैं । समस्त व्यंजन
तथा विष्णु आदि स्वर ये सभी मातृका के मन्त्र है जो कि चन्द्रबिन्दु के
विभूषण वाले हैं । सब युगान्त स्वयं बन्धों के न्यस्त होने पर न्यूनता की
पूर्ति है । विन्यास की हुई मातृका स्वयं ही मन्त्र में और कल्प में न्यूनता
की पूर्ति कर देती है । जिसमें एक मात्रा हो तो वह ह्रस्व होता है मात्रा
का अर्थ कम से कम समय होता है । दो मात्राओं वाला स्वर दीर्घ कहा
जाता है । तीन मात्राओं वाला या दो से अधिक मात्राओं वाला स्वर
प्लुत जानना चाहिए । वर्ण इसी प्रकार से व्यवस्थित होते हैं ।

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३५६ ॥ श्रीकालिका पुराण ॥
सभी वर्णों की मात्रा देवियाँ ही मातृका हैं। वे शिवदूती प्रभृति है।
तनु में स्थित उसके न्यास हैं। ये उन न्यूनताओं की पूर्ति किया करते
हैं तथा शीघ्र ही चतुर्वर्ग को देती हैं और सुतों के पूजन में सदा ही रक्ष
किया करती हैं। सर्वदा मातृका का न्यास करना धर्म, अर्थ, काम मोक्ष
के चार वर्गों का प्रदान करने वाला होता है और सभी कामनाओं को
देने वाला है तथा यह तुष्टि और पुष्टि कर भी देने वाला होता है। जो
मनुष्य सुरों के पूजन के बिना भी मातृका का न्यास किया करता है
उससे चारों प्रकार का भूतों का समूह निरन्तर भयभीत रहा करता है।
उस महान् ओज वाले पुरुष के दर्शन करने के लिए देवगण भी स्पृहा
किया करते हैं। उसमें ऐसी विलक्षण शक्ति समुत्पन्न हो जाती है कि
वह सबको अपने वश में कर लिया करता है और स्वयं कभी भी
पराभव को प्राप्त नहीं होता है।
साधक को चाहिए कि कुसुम को विष्णु के मन्त्र के द्वारा अंगुलि
के अग्र भाग से विमर्दन के लिए ग्रहण करे और इसका ग्रहण कर
शोधन के कर्म में करना चाहिए। उस कुसुम को ग्रहण करके हाथों
से मर्दन करना चाहिए। उपान्त सामिचन्द्र से राजित, शून्य से संयुत,
रुद्रान्तोपरि संसृष्ट यह मन्त्र वैष्णव मन्त्र माना गया है। प्रासाद मन्त्र के
द्वारा साधक अंगुलि के अग्र भाग से ग्रहण करके करों से पुष्प मर्दन
करे। काम बीज के द्वारा निमन्थन करे ब्राह्मण के द्वारा अवघ्राण करे।
ऐशानी दिशा में विशेष रूप से प्रसाद के द्वारा परित्याग करना चाहिए।
ऐसा करने पर करों की अनुपम विशुद्धि होती है। जलों का, गूढ़पाद
आदि के स्पर्श से विशोधन करने से विशुद्धि हुआ करती है। जो हाथों
में दुर्गन्धि एवं उच्छिष्ट के संस्पर्श से दूषण होता है। वह सब अज्ञान
रूप वाला है उसका सुन्दर विधान से विनाश कर देता है। पुष्पों के
ग्रहण करने से अंगुलियों के अग्रभाग शुद्ध हो जाते हैं और करों के
दोनों तले पुष्पों के मर्दन से विशुद्धि को प्राप्त होते हैं। सभी तीर्थ
नासिका में और कर के प्रति समापात होते हैं। हे भैरव! इस कारण
से ये कार्य यत्नों के साथ करने चाहिए।

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൵७०४ श्रीकालिका पुराण ൵७०४ ३१७
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शम्भु चूड़ा और बिन्दु से युक्त हो वह प्रसाद कहा जाता है ।
वासुदेव इन्द्र बिन्दुओं से कर्म बीज जानना चाहिए । व्यञ्जन और आद्य
दन्त्य और आद्य दन्त्य पूर्वक तथा पीछे आद्य दन्त्यद्वय व्यंजन होवे
जिसके उत्तर में प्रणव हो, यह ब्रह्मबीज कहा गया है जो सब पापों
का विनाश करने वाला है । मुख की शुद्धि के लिए प्रथम दीर्घ प्रणव
का उच्चारण करे । वासुदेव के बीज के द्वारा प्राणायाम का समाचरण
करे । जिस देव का जो भी रूप हो वैसा ही भूषण और वाहन होना
चाहिए । उसके पूजन में वह ही पूरक आदि के द्वारा चिन्तन करना
चाहिए । जो सदा पूर्ण चन्द्र के समान है । प्रथम गंगावतार बीज से धेनु
मुद्रा के द्वारा अर्घ्यपात्र के सहित जल में अमृतीकरण करना चाहिए ।
चन्द्र के खण्ड से युत कण्ठ में पञ्चमी बल बीजक है ।
यह गंगावतार बीज है जो सब पापों का नाश करने वाला है । दो
मात्राओं से युत विष्णु बलबीज उदाहृत किया गया है । अमृतीकरण के
होने पर जो जल दिया जाता है, वह अमृत होकर सुरों के पूजन में
देवता की प्रीति के लिए जाया करता है । पूजा के मात्र के जल की
और गंगा भी स्वयं आ जाया करती है । धर्म, काम और अर्थ की
सिद्धि के लिए अमृतीकरण करना चाहिए । अभीष्ट सुर पूजन में
स्वास्तिक, गोमुख, पद्म अर्धस्वस्तिक, पर्यंक आसन प्रशस्त होते हैं ।
वह पादयन्त्र कहा गया है जो सब मन्त्रों से स्वत्युत्तम है । दूध पुरुष को
उसे प्रथम वाराह के बीज के साथ प्रथम ग्रहण करना चाहिए ।
अग्निबीज काया आदि समव्याप्तिक चतुर्थ छठवें स्वरोपरिचर वाराह
बीज कहा जाता है । मन्त्र के दो पादों में किया हुआ वाराह बीज संशुद्ध
है । अभीष्ट देव का दर्शन करते हुए पाद रोष को नहीं देखा करता है ।
अन्य प्रकार से सुरों के पूजन में पाददर्शन युक्त नहीं होता है । मन्त्र
के द्वारा अभीष्ट का लाभ किया करता है । इस कारण से मन्त्र में ही
होना चाहिए । साधना करने वाले पुरुष को कर्म मन्त्र के द्वारा कर की
कच्छपिका बनावे । वहाँ पर संस्कार किए हुए पुरुष से अपने शरीर का
पूजन करे । उस पुष्प के द्वारा पूजित होने पर अपने आपको देवत्य हो

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३१८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
जाता है । दूसरा वैष्णवी तन्त्र बीज है जो बिन्दु इन्द्र से संयुत है । षष्ठ
स्वर के उपरिचर कूर्मबीज कीर्तित किया गया है । दहन और प्लवन
के आदि में दशम रन्ध्र का भेदन साधक को प्रणव मन्त्र के द्वारा भेदन
करना चाहिए । वासुदेव के बीच के द्वारा आकाश में विनिधापति करे ।
प्रणव के सहित जो बीज है वह सब प्रतिपादित कर दिया है ।
आज भी समस्त देवगण क्षति को पद से स्पर्श नहीं किया करते
हैं और अपने शरीर की छाया को भूतल में योजित नहीं किया करते
हैं । उस दोष के मोक्ष के लिए क्षिति पर मन्त्रराज को लिखना चाहिए ।
प्रोक्षण करने से अथवा वीक्षण से भी भेदिनी, शुद्ध हो जाया करती
है । स्थण्डिल का वीक्षण धर्म बीज के द्वारा समाचरण करना चाहिए ।
दान्त बल से संयुक्त और बिन्दु से समन्वित धर्म बीज कहा गया है जो
धर्म, काम और अर्थ का साधन होता है । आदान, धारण तथा संस्थान,
पूजन सलिल से ही पूर्ण, गन्ध और पुरुष का निक्षेप मण्डल का
विन्यास और पुनः पुष्प का सश्रय अमृतीकरण यह पात्र प्रतिपति है ।
मनुष्य अनिरुद्ध के द्वारा आदान करके अस्त्र मन्त्र से धारण करे और
पात्र में वाग्बीजराग्र से मण्डल न्यास योजित करे ।
आद्य बिन्दु के उत्तर अनिरुद्ध बीज होता है । वह अनिरुद्ध जब
फट् अन्त में होता है तो अस्त्र मन्त्र कहा गया है । शम्भु आद्यबल
प्रान्तःसपूर्व ये संहिता है । पर से पूर्व समाप्ति के अन्तवाले बिन्दु के
सहित तीसरा वाग्भव बीज है यह सकल निष्फल नाम वाला है । चतुर्थ
स्वर संकल्प संसृष्टि में बिन्दु से और इन्दु से वर्गादि का द्वितीय तो
वाग्बीज कहा जाता है और यह कामराज नाम वाला है जो धर्म, अर्थ
और काम का साधन होता है । मनोभाव का बीज कुण्डली शक्ति से
संयुक्त होता है वह वासुदेव से सम्पृक्त होता है जो आद्य वाग्भव कहा
गया है । एक-एक काम बीज आदि तीनों से तो त्रिपुरामद है । आद्य,
तृतीय सामीन्दु बिंदुओं से समलंकृत है । यह मदन का मन्त्र है जो काम
के भोग का फल प्रदान करने वाला है ।
ओत्, ऐत के रूप से विन्यस्त यन्त्र भास्कर के सदृश है । उसको

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३१९
में बताऊँगा जो कि कुण्डली की शक्ति है । जो अभेद से कही जाती
है । मार्जक इस मन्त्र के द्वारा भूतों का अपसारण करे इसके करने पर
स्थानभूत जो है वे सुरार्चन के समय में दूर चले जाया करते हैं । भूतों
के वहाँ पर स्थित रहने पर सदा ही वे लुब्धक नैवेद्य मण्डल को विशेष
रूप से लुप्त कर दिया करते हैं और देवता उसका ग्रहण नहीं किया
करते हैं । इस कारण से यत्नपूर्वक भूतों का अपसारण करना ही
चाहिए । वह अपसारण अस्त्र मंत्र के सहित ही करे । उसका मन्त्र यह
कहा गया है । वे भूत इस भूमि के पालक होवें । मैं भूतों के अविरोधक
के द्वारा ही पूजा कर्म कर रहा हूँ । साधक इसके द्वारा स्थण्डिल से
भूतों को अपसारित करके इसके पश्चात् दिग्बन्धन में मन्त्र स्थित
होता है ।
अपनी आत्मा के पूजन के द्वारा ही कर्म के आरम्भ करने की
अधिकारिता प्राप्त हुआ करती है और पूजित आसन योगपीठ के सदृश
हो जाया करता है । यह पाँचों भूतों के स्वरूप वाले वपु स्वाभाविक
रूप से सदा ही अशुद्ध होता है । यह मल की पूर्ति से समायुक्त है और
श्लेष्मा, विष्ठा, मूत्र, इनसे पिच्छल रहा करती है, यह शरीर अपरिष्कृत
रहा करता है । इस शरीर के बीजभूत ये पाँच महाभूत होते हैं । उन
समस्त भूतों को जो देह की संङ्गी हैं और बीज हैं । जो वायु, तेज,
पृथ्वी, जल और आकाश है इनकी वृद्धि के लिए क्रम से शोषण,
दहन, भस्म, प्रोत्साह, अमृतवर्षण और आप्लवन करना चाहिए जो कि
चिंता मोक्ष की विशुद्धि के लिए है । अण्ड के चिंतन से, भेद से उसके
मध्य में देव का चिंतन से, स्वकीय इष्टदेव की चिन्ता सर्वात्मा रूप से
होती है जो कि आत्मा को हो जाती है ।
मैं देव हूँ, ऐसा संस्कार हो जाता है । इसके अनन्तर जो नैवेद्य और
पुष्प गन्ध आदिक है और भी पूजा के उपकरण के लिए है यहाँ पर
देवत्व हो जाता है । देव आधार है, मैं देव हूँ, देव के लिए योजित
करें । सबको देवता की सृष्टि से शुद्धता भी समुत्पन्न हो जाया करती
है । मन और जीवात्मा की शुद्धि प्राणायाम से हुआ करती है । अन्तर्गत

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३२० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
जो भी मल है वह भी शुद्ध हो जाता है। ग्रह में यदि देव या यजन
करे तो उस समय में उसका विलोकन करना चाहिए और आदित्य बीज
के द्वारा क्रम से चारों पाश्र्वों में करे। हान्त समाप्ति से सहित और वह्नि
बीज से संहित होवे । चतुर्थ के सहित उपान्त वह सकल आगे हो, यही
आदित्य बीज कहा गया है जो कि समस्त रोगों का विनाश करने वाला
है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का कारण है और सन्तोष देने वाला
है । किसी अशुद्ध पक्षी का संयोग, पक्षी की विष्ठा का प्रसेचन तथा
मूषिकाओं का स्पर्श एवं कृमि और कीट आदि का संगम आदि दोष
नष्ट हो जाया करते हैं अवलोकन करने मात्र से ही इनका विनाश होता
है और गृह दूषण नष्ट हो जाया करता है । इसके अनन्तर प्रथम
योगपीठ का ध्यान का समाचरण करना चाहिए ।
योगपीठ का ध्यान मात्र ही पर्याप्त है। इसी से योगपीठ मण्डल में
प्रवेश किया करता है । योगपीठ के स्मरण करने पर सब कुछ योगपीठ
से परिपूर्ण सम हो जाता है । योगपीठ से परमोत्तम कोई आसन नहीं
हुआ करता है जिसके ध्यान से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है जिसमें
जड़-चेतन मनुष्य सभी हैं। उसके चिन्तन का बड़ा भारी महात्म्य है
जिसके कहने का उत्साह कौन कर सकता है ! उसके चिन्तन भर से ही
देखो मनुष्यों के शोक विनाश हो जाया करता है । योगपीठ के धारण
करने से तो चतुर्वर्ग के फल का वह प्रदायक होता है । अब उसके
ध्यान एवं चिन्तन का प्रकार बतलाया जाता है, वह विशुद्ध स्फटिक
मणि के सदृश है, चतुष्कोण है और चार वृत्तियों वाला है ।
आधारशक्ति से विदित प्रग्रह वाला है तथा सूर्य के समान है । आग्नेय
आदि चारों कोनों में क्रम से सदा ही धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य और वैराग्य
स्थित रहा करते हैं । पूर्व आदि दिशाओं में यह निम्नलिखित क्रम से
स्थिति करते हैं ।
अधर्म, अज्ञान, अनैश्वर्य, अवैराग्य, हैं इससे धारणार्थ व्यवस्थित
हैं। उसके ऊपर जल का समुदाय है। उसमें ब्रह्माण्ड अवस्थित हैं, उस
ब्रह्माण्ड के भीतर जल है। उसके ऊपर यह पृथ्वी स्थित है। उस कूर्म

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६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ ३२१
से ऊपर में अनन्त है और उसके ऊपर यह पृथ्वी स्थित है । अनन्त के
शरीर से संयुक्त एक नाल है जो पाताल तक गोचर होता है । पृथ्वी
के मध्य में एक पद्म स्थित है जिसके दल दिशायें हैं और गिरि उसका
केशर हैं । उसके आठ दिशाओं में दिक्पाल है और मध्यभाग में स्वर्ग
अवस्थित है । उस पद्म की कर्णिका में ब्रह्मलोक है । उसके नीचे भाग
में महालोक आदि हैं । स्वर्ग में ज्योतिर्मणि हैं और देवगण हैं । उनके
अनन्तर में चारों वेद हैं । रज, सत्व, तम ये तीन गुण हैं जो प्रकृति से
समुद्गत हैं । ये सदा ही पद्म के मध्य में स्थित है और परतत्व हैं ।
वहाँ पर आत्मा संस्थित है । जो ऊर्ध्वछेदन है, जो ऊपर की ओर है ।
अधः छेदन है जो नीचे की ओर है वहाँ पर केशर के अग्रभाग में पुनः
स्थित है ।
इसके अनन्तर सूर्य, अग्नि, चन्द्र और मरुत के मण्डल क्रम से है ।
योग पीठ में शिव का आसन है और इसके परे में सुखासन है फिर
आराध्य आसन है इसके पर में विमलासन है । मध्य में सम्पूर्ण इस
चराचर जगत् का विशेष चिंतन करना चाहिए । वहाँ पर तीन भागों
में विनिश्चित हुए ब्रह्मा, विष्णु और शिव का चिन्तन करना चाहिए ।
वहाँ पर अभ्यर्थना करने में समुपस्थित अपने आपका चिंतन करे ।
मण्डल, योगपीठ और पद्म का चिन्तन करना चाहिए । शव आदि
चारों आसनों का भी यहाँ पर चिन्तन करे । इसके उपरान्त योगपीठ का
ध्यान करके मण्डल के साथ एकता पुनः ध्यान करे । पीछे आसन का
यजन करे । योगपीठ के ध्यान के द्वारा जो जिस प्रकार से जल दिया
जाता है और नैवेद्य, पुष्प, धूप आदि स्वयं ही वहां पर उपस्थित हो
जाया करते हैं । योगपीठ के पूजन में गन्धर्वों के सहित सब देवगण
और चर, सचर, गुह्यक सभी चिन्तित और पूजित हो जाया करते हैं ।
अपने अभीष्ट देवता के पूजन बिना जिसके विचिन्तन से चतुर्वर्ग
का लाभ उपासक किया करता है और उसकी तुष्टि एवं पुष्टि हो जाती
है । आवाहन के अनन्तर ही दोनों करों के द्वारा अवतारित करना
चाहिए । पहले दोनों करों को ऊँचा करे और ऊपर की ओर उत्क्षिप्त

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३२२ श्रीकालिका पुराण

करके अन्तर सहित निरन्तर नीचे की ओर नमित करते हुए पूजक को
करना चाहिए । गणेश के बीज से उससे अवतरित होओ, यह कहे ।
अभीष्ट देवों के अवलम्बन के लिए दो बार उच्चारण करे । नासिका
की वायु निःसारण से देवता आकाश में स्थित हो जाते हैं । इस प्रकार
से करने पर उसी स्थिति मण्डल में हो जाया करती है । स्वान्तः अंशु
और बिन्दु से बीज कहा जाया करता है । यह विघ्नों के बीजों का
विनाश करने वाला है और धर्म, कर्म काम साधने वाला है ।
गन्ध पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और जो भी अन्य वस्तु दी जाती है तथा
वस्त्र और अलंकार आदि उनका देवता उच्चारण करके प्रोक्षण तथा
पूजन करे ।
मूल मन्त्र से उत्सर्जन करके प्रतिनाम से निवेदन करना चाहिए ।
वरुण के बीज के द्वारा उनका प्रोक्षण करे । इष्ट मूल मन्त्र के द्वारा
उसी भाँति उत्सर्ग और निवेदन करे । ऊपर चन्द्र और बिन्दु से वरुण
और बीज कहा जाता है । विलोकन, पूरक तथा पृथक्-पृथक्
दान-जप कर्म माला की प्रतिपत्ति यह तीन हैं । अपने इष्ट मन्त्र के द्वारा
माला का प्रोक्षण कीर्तिक किया गया है । पहले गाठापत बीज का
उच्चारण करके इसके अनन्तर ही करना चाहिए । हे माला! आप
अविघ्न करे, इसी मन्त्र के द्वारा माला का ग्रहण करे । जप के अन्त
में माला का न्यास शिर पर करे, ऐसा कहा गया है । हाथों से माला
लेकर श्री बीज के द्वारा उसी भाँति अर्चना करनी चाहिए । अन्त्य
दन्त्यान्य मात्राओं आदि वर्ग और तृतीय पर से पर के पूर्व में श्री बीज
बिन्दु से इन्दु से माला का अवतार शिर से सदा किया जाता है ।
उसके हाथों से आदान करके सारस्वत से श्री बीजों का आद्य-आद्य
बिन्दु चन्द्रार्ध से संयुत, यह चार बीज सारस्वत कहे जाते हैं ।
पौराणिकों और वैदिकों द्वारा और मूल मन्त्र के द्वारा करे । प्रदक्षिणा
और प्रणाम करे जो धर्म व अर्थ का साधक है । भूमि का वीक्षण
करके तथा उसका अध्युक्षण करके पूर्व से क्षिति बीज के द्वारा उस
भूमि का शिर से स्पर्श करता हुआ अपने इष्ट देवताओं को प्रणिपात

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३२३
करना चाहिए । समाप्ति से हीन बीज है और बिन्दु-बिन्दु से संयुत
क्षिति बीज है इसको जान लेना चाहिए । यह चारों वर्गों का प्रदान
करने वाला है । फिर दर्पण, व्यंजन, घण्टा, चामर का प्रोक्षण करे ।
हे भैरव! यह प्रोक्षण पूर्व में कहे हुए नैवेद्य लोकमन्त्र के द्वारा करे ।
इनके बिन्दु और इन्दु से युक्त आद्य नामों के अक्षर हैं-तस्मै नमः
अर्थात् उसके लिए नमस्कार है, यह प्रांतः में, ग्रहण करना चाहिए ।
हे भैरव! वाग्भव के द्वितीय कामबीज से मुद्रा का बन्धन करना
चाहिए । मूल मन्त्र से दर्शन करे । मुद्रा का परित्याग तारा बीज के द्वारा
समाचरण करे । चन्द्र बिन्दुओं से प्रांतादि षष्ठ स्वर से संयुत जो है वह
ताराबीज कहा गया है जो धर्म अर्थ और काम का साधन होता है ।
क्योंकि वह मुद्रा अर्थात् आनन्द को दिया करती है इसलिए यह
मुद्रा-नाम से कीर्तित की गई है । मुद्रा दर्शित किए जाने पर पूजा का
समापन हुआ करता है । वह स्वयं काम, मोक्ष, धर्म, अर्थ और मोद
से समन्वित होती हैं । गमन करने के लिए अन्त में इन छः महामन्त्रों का
उच्चारण करना चाहिए और भक्ति मार्ग के द्वारा पत्र-पुष्प फल, जल
दिया गया है और जो नैवेद्य आवेदित किया गया है उसे कृपा करके
ग्रहण करिए । मैं आवाहन कैसे किया जाता है, यह नहीं जान पाता हूँ
और मुझे विसर्जन करने का भी ज्ञान नहीं हैं । मैं यजन के भाव को
भी नहीं समझता हूँ अतएव हे परमेश्वरि! मेरी आप ही गति हैं ।
कर्म, मन और वचन से आपसे अन्य मेरी कोई भी गति नहीं है ।
हे माता! जिन-जिन सहस्रों योनियों में मैं गमन करूँ, हे अच्युते! उन
योनियों में सदा आपके प्रति मेरी भक्ति होवे जो कभी भी च्युत न
होवे । देवी, दात्री, भोक्त्री यह सम्पूर्ण जगत् देवीमय ही है । देवी सर्वत्र
जय प्राप्त करती है । जो देवी है वह मैं ही हूँ । जो अक्षर परिभ्रष्ट हो
और जो मात्रा से हीन हो, हे देवी! वह सभी आप क्षमा कर देवें । कौन
ऐसा है जिसका मन स्खलित न होता हो । हे भैरव! इन मन्त्रों के पढ़े
जाने पर देवी स्वयं ही प्रसन्न हो जाया करती है और वह अविलम्ब ही
चतुर्वर्ग को प्रदान कर दिया करती है । ऐशानी दिशा में मण्डल की

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३२४
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ

रचना करे जो द्वार और पद्म से वर्जित होवे । विसर्जन के लिए
निर्माल्य धारिणी के पूजन के लिए मण्डल रचना करे । निर्माल्य
धारिण का ध्यान पाद्य आदि के पूजन करे । उसमें निर्माल्य का
निक्षेपण करके मन्त्र से विसर्जन करे । हे परमेश्वरि! अपने परमस्थान
को गमन कीजिए जहाँ पर ब्रह्मा आदि देवगण परम को नहीं जानते हैं ।
इस मन्त्र के द्वारा विसर्जन करके अनन्तर पूरक वायु के द्वारा ध्यान
करते हुए इस मन्त्र से नमस्कार करके उसको हृदय में स्थापित करे ।
हे परमेश्वरि! हे देवि! परमोत्तम स्थान पर अपने आसन पर विराजमान
होइए । जहाँ पर मेरे हृदय में ब्रह्मादिक सब देवता स्थिति हैं । इसके
उपरान्त एक जटा बीजों से इष्ट देवी का बुद्धि से स्मरण करता हुआ
निर्माल्य को मूर्धा में ग्रहण करे जो कि धर्म-काम और अर्थ का साधन
होता है । इसके अनन्तर विभूति के मण्डल की प्रतिपत्ति करे । समस्त
अंगुलियों के समूहों से आठ दलों से संयुत पद्म को क्षति बीज के द्वारा
निर्मन्थन करे । हे भैरव! मण्डल का भी निर्मन्थन करना चाहिए । इसके
पश्चात् मूल मन्त्र के द्वारा अथवा पुनः सर्ववश्य के द्वारा अनामिकाओं
के अग्रभाग से ललाट का संस्पर्श करे । समाप्ति के सहित प्रान्त, उसके
आगे ताराबीज, स्मरबीज विसर्ग के सहित पर सभी-परम एक जटाबीज
होता है जो धर्म काम और अर्थ का साधन है ।
इसके अनन्तर आत्मा के सहित भास्करबीज के मन्त्र के द्वारा
भास्कर के लिए अच्छिद्रार्थ अर्घ्य का निवेदन करना चाहिए । हे ब्रह्मन्!
भास्वान्, कर्मदायी के लिए नमस्कार है । इसके बाद दोनों हाथों को
जोड़कर कथित मन्त्र को पढ़कर एकाग्रमन से वागियों द्वारा अच्छिद्र का
अवधारण करे । यज्ञ का छिद्र, तपश्चर्या का छिद्र, जो छिद्र, मेरे पूजन
में हो वह सब अच्छिद्र हो जावे । भास्कर भगवान् के प्रसाद से ही
अच्छिद्रता हो जावे । इसके पश्चात् पुष्प, नैवेद्य, जलपात्र आदि जो भी
हे उन सबको देवीबीज के द्वारा पुनःविलोकन करना चाहिए । हाथ से
अथवा चक्षु से जहाँ-जहाँ पर पहले मन्त्र न्यास किया है वहाँ-वहाँ ही
इससे विसृष्टि होती है ।

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४०२ श्रीकालिका पुराण ४०२ ३२५
प्रान्तादि पञ्चम वह्निबीज षष्ठ स्वर से आहित तथा उपांत वाग्भव
दुर्गा बीज कहा जाता है । स्थण्डिल, जलती हुई अग्नि, जल सूर्य की
किरणों, और शुद्ध प्रतिमाओं में तथा शालग्राम की शिलाओं में,
शिवलिंग में, शिला में विभूति के लिए पूजा करना चाहिए । एकाग्रमन
वाला होकर सभी जगह मण्डल का न्यास करे । योगपीठ के बीज से
स्थण्डिल आदि में साधक वासुदेव भगवान्, रुद्र देव, ब्रह्माजी की और
सूर्य की पूजाओं में सर्वत्र बुद्ध पुरुष को यह प्रतिपत्ति करनी चाहिए ।
इस प्रकार से इन प्रतिपत्तियों से जो विष्णु भगवान् की पूजा करे तो
उसको भगवान् हरि अविलम्ब ही चार वर्गों के प्रदाता हो जाया करते
हैं । शिव हों या मिहिर हों जो भी अन्य प्रभृति होवे सभी सुरगण इस
विधि में प्रसन्न हो जाया करते हैं विशेष रूप से जगन्मयी महामाया
महादेवी प्रसन्न होती हैं ।
महामाया महादेवी इस प्रतिपत्ति का नित्य ही पूजन में चाहती रहती
हैं । इस प्रकार से जो भी कोई भी पूजा किया करता है वह सम्यक
फल का भागी होता है । इनसे विहीन जो भी पूजा होती है उससे अल्प
से भी अल्प फल हुआ करता है । यह परम रहस्य है और परमाधिक
कल्याण का अयन है । मन्त्र वेदों से परिपूर्ण और शुद्ध समस्त पापों
का विनाश करने वाला होता है । जो इसका ब्राह्मणों के सन्निधान में
श्रवण कराता है, श्राद्ध, यज्ञ, सुरों के पूजनों में इसको सुनाता है वह
इस कर्म का बहुत अच्छा फल प्राप्त करता है । वह पूजा के बिना भी
अनन्त का लाभ करता है ।
देवी तन्त्र कथन
श्री भगवान् ने कहा-आप दोनों ही भली भाँति देवी के तन्त्र का
श्रवण करिए जिसके द्वारा आराधना की हुई देवी शीघ्र ही फल
प्रदायक हो जाया करती है । पूर्व में दिए हुए तन्त्र से विशेष रूप से
यह निश्चय ही उत्तम तन्त्र है । सामान्यतया से यह पहले आपके आगे
कहा गया है । फिर देवी की पूजा में भक्ति कर्म में विशेष रूप से जो

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३२६ ६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२
तन्त्र शेष हैं उनको मैं पुनः बतलाऊँगा । जो पुरुष महामाया की भक्ति
को एकाग्रमन वाला होकर किया करता है । फल, पुष्प, ताम्बूल और
जो अन्न पान आदिक हैं वह सब देवी को समर्पित किए बिना कभी
नहीं खाना चाहिए । मार्ग में अथवा पर्वत के शिखर पर और सभा में
साधक जैसे-तैसे निवेदन करके ही अपने अर्थ को कल्पित करना
चाहिए । मदिरा के पात्र को, रक्त वर्ण वाली स्त्रियों को, सिंह को,
शिव को, रक्त पद्म को, व्याघ्र और वारण (गज) के संगम को
देखकर ही गुरु के लिए, राजा के लिए और फिर महामाया के लिए
नमन अर्थात् नमस्कार करे । जो भार्या पतिव्रता हो उससे सदा ही
ऋतुकाल में संगम करना चाहिए ।
चण्डिका देवी का ध्यान करके जो किया जाता है तब वह कार्य
विभूति के लिए होता है । चाहे शान्तिक कर्म हो अथवा पौष्टिक कर्म
हो तथा इष्टापूर्त्त कर्म हों । जब भी करे तब नमस्कार करके देवी मन्त्र
का समाचरण करना चाहिए । जिस समय में तौर्यत्रिक (नृत्यगान)
अथवा केवल गति को हीं देखें । और वह देवी के लिए निवेदन करके
ही अपना उपयोग करना चाहिए । जो भी कोई भूषण हो अथवा वस्त्र
हो या मलय से समुत्पन्न चन्दन हो उसे अपने शरीर में यदि उपयोग करे
तो वहाँ पर 'धी' अर्थात् बुद्धि से मन्त्र का न्यास करना चाहिए । चाहे
वह व्यायाम में हो और वह विधान में हो, सभा में हो, जल में हो या
स्थल में हो, कहीं पर भी हो मन्त्र का बुद्धि से न्यास करे । जहाँ-जहाँ
पर भी स्वयं गमन करे वहाँ पर ही सदा देवी का स्मरण करना
चाहिए । जो जो भी कर्म पूजन का अंग स्वरूप हो उसका समाचरण
मन्त्र के द्वारा ही करना चाहिए । मंत्र से हीन पूजन का जो भी अंग होता
है वह तो सब निष्फल होता है । जिस कर्म में जो भी अभीष्ट हो हे
भैरव! जो मन्त्र पूजाओं में होवे । वह-वह कर्म नैवेद्य के आलोक मन्त्र
के द्वारा उस-उस कर्म को समाचरित करे । देवी का मण्डल न्यास इष्ट
मन्त्र के द्वारा करना चाहिए ।
पूजा के अन्त में मण्डल को लीप कर उसके द्वारा तिलक कराना

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३२७
चाहिए । और उसको सर्ववश्य मन्त्र के द्वारा ललाट में तिलक का
न्यास करे जो कि धर्म, काम और अर्थ का प्रदान करने वाला है ।
उसके वश में सम्पूर्ण जगत् हो जाता है ।
यज्ञ पूजा तथा राजा सर्वशास्त्र है, यह श्रुत है । पूजन के बिना जो
भी कोई नर इस मन्त्र के द्वारा निरन्तर करे उसके सब वश में हो जाते
हैं चाहे वह राजा हो, राजा का पुत्र हो, स्त्रियाँ हों अथवा यक्ष तथा
राक्षस हों । चारों प्रकार के भूत ग्राम सब उसके वश में हो जाया करते
हैं । प्रवास में अर्थात् अपने घर से दूर देश में हो, अथवा मार्ग में हो,
दुर्ग में हो, स्थान के न प्राप्त होने पर कहीं भी हो अथवा जल में हो
अथवा कारागार में घिरा हुआ हो अथवा निरन्तर भूखा हो वहीं पर
महामाया की पूजा करके जो कि बुद्धि पुरुष को मानसी ही करनी
चाहिए । मन में भय के समुत्पन्न हो जाने पर तथा सिंह और व्याघ्र
आदि के द्वारा समाकुल होने पर, दूसरे के चक्र में समागम होने पर
मानसिक पूजन ही इन स्थितियों में रहने पर करना चाहिए क्योंकि ऐसी
दशा में अन्य कोई भी चारा नहीं है । मन के द्वारा हृदय के अन्दर योग
नामक पीठ का ध्यान करके वहीं पर पृथ्वी के मध्य में पूजन का
समाचरण करना चाहिए । प्रसाधन, स्नान, दन्तधावन कर्म और अन्य
सभी मन के द्वारा हो करके पूजन करना चाहिए ।
इसके पीछे बाहर के देश में पुष्प आदि के द्वारा पूजन की जाती
है उसी भाँति हृदय में भी सभी प्रतिपत्तियाँ करनी चाहिए । देवी का
यजन करने वाला निरन्तर अष्टमी तिथि में अपने रुधिरों से पूजा करनी
चाहिए । लिंग में विराजमान देवी का पूजन करे । उसी भाँति पुस्तक
में संस्थित देवी का पूजन करे । स्थण्डिल में संस्थित महामाया का और
पादुका प्रतिमाओं में पूजन करे । चित्र और त्रिशिख में शंख का यजन
करे अथवा जल में पूजन करे । शिला में, पर्वत के अग्रभाग में तथा
पर्वतों में खोह में नित्य ही भक्तिभाव और श्रद्धा से संयुत देवी का
पूजन करना चाहिए । वाराणसी पुरी में सदा का पूजन करना सम्पूर्ण
फलों की देने वाली हुआ करती है । उससे भी दुगुनी फलप्रदाती

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३२८ ௵ श्रीकालिका पुराण ௵
भगवान् पुरुषोत्तम की सन्निधि में हुआ करती है । उससे भी दुगुने फल
की देने विशेष रूप से द्वारका में कही है । समस्त क्षेत्रों में और तीर्थों
में की हुई पूजा द्वारावती की पूजा के ही समान हुआ करती है ।
विंध्याचल में की हुई पूजा सौगुनी फलदायिका होती है, ऐसा कहा
गया है और गंगा में भी की गई पूजा उसी के समान होती है ।
आर्यावर्त्त, मध्यदेश, ब्रह्मवर्त्त तथा पुष्कर में करतोया नाम की नदी के
जल में उससे भी चौगुनी फल देने वाली कही गई है । हे भैरव! उससे
भी चौगुने फल देने वाली पूजा नन्दि कुण्ड में होती है । उसमें भी
चौगुनी जाल्पिपेश्वर की सन्निधि में की हुई बतलायी हुई है । वहाँ पर
सिद्धेश्वरि की योनि में की गई पूजा उससे भी दुगुनी बताई गई है ।
उससे भी चौगुने फल को देने वाली लौहित्य नदी के जल में कही गई
है । उसी के समान कामरूप देश में सभी जगह जल और स्थल में मानी
गई है । जैसे सबसे श्रेष्ठ भगवान् विष्णु हैं तथा लक्ष्मी सबसे उत्तम है ।
कामरूप में सुरालय में देवी की पूजा प्रशस्त होती है । देवी का क्षेत्र
कामरूप देश है और अन्यत्र उसके समान है अन्य स्थल में देवी विरल
ही हुआ करती है और कामरूप में तो घर-घर में ही विद्यमान रहती है ।
इससे भी सौ गुने महत्व वाली पूजा नीलकूट पर्वत के शिखर पर
होती है ।
उससे भी दुगुने शिवलिंग में की गई पूजा फलदायिनी होती है ।
उससे भी दुगुनी फलदायिनी शैल पुत्र्यादि की योनियों में कही गई हैं ।
उससे भी सौ गुनी अधिक महत्व वाली पूजा कामाख्या देवी की योनि
मण्डल में बतलाई गई है । कामाख्या में महामाया की पूजा को एक
बार कर चुका है वह इस लोक में कामनाओं को प्राप्त करता है और
परलोक में भगवान् शिव की स्वरूपता का लाभ किया करता है । उस
पुरुष के समान अन्य कोई भी भाग्यशाली नहीं है और फिर उसका
कोई भी कृत्य शेष नहीं रह जाता है । वह पुरुष अपना मनोवांछित अर्थ
इस लोक में प्राप्त करके चिरायु हो जाता है । उसकी गति वायु के ही
समान हो जाती है जो अन्यों के द्वारा कभी भी बाधित नहीं हुआ करती

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௰ श्रीकालिका पुराण ௰ ३२९
है । वह पुरुष संग्राम अथवा शास्त्रावाद में दुर्जय हो जाता है । वैष्णवी
तन्त्र के द्वारा कामाख्या के योनि मण्डल में एक बार अभ्यर्चन करके
उसका सौ गुना फल का लाभ किया करता है । मूलमूर्ति महामाया
योगनिद्रा जगन्मयी है उसका वैष्णवी तन्त्र पहले ही प्रतिपादित कर
दिया गया है । अन्य जो मूर्तियाँ कही गई है जो शैलपुत्री आदि दूसरी
हैं वे सब उसी के विभाग हैं और उसके ही शरीर से निर्गत हुई हैं ।
जिस रीति से नित्य ही सूर्य के बिम्ब से किरणें निःसकरण किया
करती हैं ठीक उसी भाँति देवी महामाया के शरीर से उग्रचण्डा आदि
निकला करती हैं । मेरे द्वारा आपको उन्हीं के अंगरूप कहने चाहिए
महामाया का स्वरूप तो एक ही है और कार्यों के सम्पादन करने के
लिए वही भिन्नता को प्राप्त हुई हैं । कामाख्या तो महामाया है और
मूलमूर्ति गान ही गाया जाया करता है । वह पीठों के द्वारा विभिन्न नामों
वाली होकर महामाया गायी जाया करती है । जिस प्रकार से एक ही
भगवान् विष्णु नित्य होने से सनातन हैं । जनों के पीड़ा को दूर करने
से वही प्रभु जनार्दन, इन नाम से कहे गए हैं । ठीक उसी भाँति
महामाया कामार्थ गिरि में संगत हुई थी उसी समय यह महादेवी के द्वारा
और नरों के द्वारा निरन्तर कामाख्या कही जाती है । जैसे कोई पुरुष
छत्र के ग्रहण करने से छत्री हो जाया करता है और स्नान काल में
स्नापक कहा जाता है ठीक उसी रीति से नाम से यह कामाख्या हो गई
है । महामाया का शरीर के लिए समुपस्थित हुआ था । लोहित, कुकर्मों
से पीत जो कामार्थ उपयोजित किए गए हैं । कामकाल में खंड का
परित्याग करके वह स्वयं ही स्त्रक् को ग्रहण किया करती है । जिस
समय वह काम को त्याग कर देने वाली होती है उस समय में वह
असिधारिणी होती है ।
लोहित पंकज को न्यस्त करने वाले शिव प्रेम कामकाल में सित
प्रेत के ऊपर संस्थित काम को परित्यक्त कर देने वाली रमण करती
है । उसी भाँति इधर-उधर गमन करके सिंह के ऊपर विराजमान होती
हुई कामदा हो जाती है । किसी समय तो वह सित प्रेत पर होती है और

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३३० [ornament] श्रीकालिका पुराण [ornament]
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
किसी समय में रक्त पंकज पर स्थित होती हैं । किसी अवसर पर वह
केशरी के पीठ पर संस्थित होती हुई कामरूप वाली रमण किया करती
है । जिस अवसर पर वह लोहित पद्म पर संस्थित हुआ करती है तो
उस समय उसके आगे केशरी चरण किया करता है । जिस समय प्रेत
पर स्थित देवी होती है उस समय आगे अन्य का निरीक्षण किया करती
है । जिस समय वह महामाया के स्वरूप से वह वरदा होती है उस
समय पूजा के काल में प्रेत, पद्म और सिंह के ऊपर स्थित होती है ।
जिस अवसर पर रक्त पद्म में ध्यान करे तब आगे हरि का चिन्तन करना
चाहिए । जब हरि में ध्यान करे तब अन्य दो आगे चिन्तन करे । एक ही
स्थान तीनों के ध्यान करने पर प्रेत पद्म हरि में क्रम से करना चाहिए ।
उन पर कामदा देवी के स्थित होने पर कामदा हरि में क्रम से
करना चाहिए । एक-एक पर भी जैसे भी उसी भाँति शिवा का चिन्तन
करे । वह एक समस्त जगतों की प्रकृति जहाँ-तहाँ ब्रह्मा, विष्णु, देवों
के द्वारा वह जगन्मयी धारण की जाया करती है । सित प्रेत महादेव हैं,
ब्रह्मा लोहितपद्म हैं, हरि हरि हैं ऐसे ही महान् ओज वाले के वाहन
जानने चाहिए । क्योंकि अपनी मूर्ति से उनका वाहन होना युक्त नहीं
होता है । इसी कारण से अन्य मूर्ति करके तीनों वाहनता को प्राप्त हुए
हैं । जिस-जिस में महामाया शिव निरन्तर प्रसन्न होती हैं उसी-उसी रूप
से तीनों ही आसन हुए थे । सिंह के ऊपर रक्त पद्म स्थिति है, उसके
ऊर्ध्व में गत शिव हैं । उनके ऊपर वह वर देने वाली अभय दायिनी
महामाया है । इस प्रकार के स्वरूप से ध्यान करके निरन्तर शिव का
पूजन करना चाहिए । उससे ब्रह्मा, विष्णु और शिव बिना ही संशय
के पूजित हो जाते हैं । इस प्रकार से सदा कामाख्या एक रूप वाली
महामाया ध्यान से और रूप से भिन्न है इससे वहाँ पर उसका पूजन
करना चाहिए । इस प्रकार से दुर्गा के विशेष तन्त्रों को आप दोनों को
कह दिए हैं । हे परमश्रेष्ठों! अब उसके अंग मन्त्रों का आप श्रवण
करिए ।

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३३२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
मृणाल के सदृश आयत स्पर्श वाली दश बाहुओं से युक्त है ।
दाहिने हाथ में त्रिशूल, देव, खड्ग, चक्र क्रम से नीचे की ओर हैं ।
बाहुओं के संघों में तीक्ष्ण बाण तथा शक्ति से संगत है । ऊपर की ओर
खेटक, पूर्ण, चाप, पाश और अंकुश धारण किए हुए हैं । नीचे की
ओर बिना शिर वाले महिष असुर को प्रदर्शित करना चाहिए । जिसका
शिर छिन्न हो गया है और जो दानव अपने हाथ में खण्ड लिए हुए हैं ।
जो हृदय में बल से विद्ध हो रहा है और जिसकी अँतड़ियाँ बाहर
निकल रही हैं । स्रवित होते हुए रक्त से जिसके अंग रुधिर प्लावित
हो रहे हैं और जो रक्त से विस्फुरित नेत्रों वाला हो रहा है । जो
नागपाश से वेष्टित है और जो क्रोधावेश के कारण कुटिल भौंहों से
समन्वित मुख वाला है । जो पाश के सहित बाँये हाथ से दुर्गा के द्वारा
मस्तक के केश पकड़ा हुआ है । जिसमें मुख से रुधिर प्रवाहित हो रहा
है ऐसी देवी के सिंह का भी प्रदर्शन करना चाहिए । देवी का दाहिना
चरण सिंह के ऊपर संस्थित है तथा कुछ ऊपर की ओर वाम चरण
का अंगुष्ठ महिषासुर पर स्थित है ।
इस प्रकार के ध्यान को करते हुए फिर देवी का ध्यान करे जो उग्र
चण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चामुण्डा
चण्डिका है । इन आठ शक्तियों से निरन्तर परिवेष्टित है । इसी रीति
से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी का निरन्तर
चिन्तन करना चाहिए । इसका एक मन होकर श्रवण करो । यह धर्म
काम और अर्थ का साधन है । इसका अंग मन्त्र दुर्गा तन्त्र, यह श्रुत
किया गया है । सूर्य के मकर राशि पर स्थित होने पर जो शुक्ल पक्ष
की पंचमी होती है । उसमें इस तन्त्र के द्वारा विधि-विधान के साथ
शिवा का भली भाँति पूजन करके फिर शुक्ल पक्ष की अष्टमी में
यथाविधि देवी का पूजन करके नवमी तिथि में बहुत बलिदानों का
समाचरण करना चाहिए और सन्ध्या के समय में अपने शरीर से उक्षित
रुधिर की बलि करनी चाहिए । उस प्रकार से करने पर कल्याणों से
युक्त होता हुआ पुरुष नित्य ही प्रमुदित होता है ।

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वह मनुष्य पुत्रों और प्रपौत्रों से समृद्ध और धन-धान्य समृद्धियों से
समन्वित होता है और वह दीर्घ आयु वाला, सर्व प्रकार के सुभग इस
लोक में होता है । शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि में चैत्र मास में उस
समय में होने वाले पुष्पों से और अशोकों से भी जो पुरुष इस मन्त्र के
द्वारा पूजन किया करता है उसे कभी शोक नहीं होता है अथवा कोई
रोग भी नहीं होता है और न दुर्गत ही होती है । ज्येष्ठ मास के शुक्ल
पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन मनुष्य भली भाँति उपवास करे और
नवमी तिथि में तिलों सहित अन्नों, यावकों, मोदकों से, क्षीर, घृत-शहद,
शर्करा के सहित पिष्टक से, अनेक पशुओं के रुधिर से और माँसों से
पूजन करे । इसके अनन्तर शुक्ल पक्ष की दशमी में तिलों से मिश्रित
जल से दुर्गा मन्त्र के द्वारा तीन अंजलियाँ देनी चाहिए । इस रीति से
करने पर दशमी तिथि में दस जन्मों में भी जो पाप किया है वह प्रलीन
हो जाता है और ऐसा करने वाला पुरुष दीर्घायु भी हो जाता है ।
आषाढ़ मास के शुक्ल की दशमी में तिलों से मिश्रित जल से दुर्गा मन्त्र
के द्वारा तीन अंजलियाँ देनी चाहिए । इस रीति से करने पर दशमी
तिथि में दस जन्मों में भी जो पाप किया है वह प्रलीन हो जाता है और
करने वाला पुरुष दीर्घायु भी हो जाता है । आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष
की जो अष्टमी है और श्रावण मास की अष्टमी है उसमें पवित्रा धारण
करावे ।
पवित्राओं का आरोपण देवी का परमाधिक प्रीति करने वाला
होता है । हे भैरव! दुर्गा तन्त्र से मन्त्र के द्वारा और दुर्गा बीज से, हे
भैरव! पवित्रारोपण का समाचरण करे । विशेष रूप से श्रवण को
प्राप्त करके देवी को पवित्रारोपण करना चाहिए । समस्त देवों का
पवित्रारोपण करना चाहिए । आषाढ़ में अथवा श्रावण में सम्वत्सर के
फल का प्रदायक होता है । द्वितीया तो देवी के श्री की है जो अन्य सब
तिथियों में उत्तम है, ऐसा कहा गया है । तृतीया तिथि भवभामिनी की
है और चतुर्थी उसके सुत की है, पंचमी सोमराज की है और षष्ठी गुही
की बतायी गयी है । सप्तमी भुवन भास्कर की कही गई है तथा अष्टमी