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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 147 of 442

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Page 147

१४८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
हे भद्रे! तुम्हारे मन का आन्तरिक भाव की चिन्ता से युक्त जैसा लक्षित
हो रहा है। इसलिए तुम मुझे जो भी गोपनीय रहस्य की बात हो और
जो भी इस दुःख का कारण हो उसे बतला दो। मार्कण्डेय मुनि ने
कहा-इसके अनन्तर वह नीचे की ओर मुख वाली होकर लज्जा से
कुछ भी नहीं बोली थी जबकि बड़ी माता सावित्री के द्वारा वह पूछी
भी गई थी तब भी बस लज्जा से कुछ भी नहीं बोली थी। जब
मेधातिथि की पुत्री अरुन्धती ने उस समय में कुछ भी नहीं कहा था तो
मनस्विनी सावित्री ने स्वयं प्रकाश करके उससे कहा था। हे वत्से! जो
तुमने सूर्य के समान प्रभा से समन्वित मुनि को देखा था वह ब्रह्माजी
के पुत्र वशिष्ठ मुनि हैं जो कि तेरा स्वामी होगा और उसका दाम्पत्य
भाव को होना तो पहले ही विधाता ने निर्मित कर दिया है। इसलिए
आपका जो सतीभाव है वह उस मुनि दर्शन से हीन नहीं हुआ है अथवा
जो उसके दर्शन से आपका हृदय कामवासना से संयुत हो गया है इससे
भी सतीभाव का निवास नहीं हुआ है। अतएव जो तुम्हारे मन में दुःख
है उसका परित्याग कर दो। हे शोभने! तुमने पूर्व जन्म में परम दारुण
तप करके ही उस मुनि को अपना पति बनाना तय किया था। इसी
कारण से वह भी तुम्हारे लिए सकाम हो गये थे। हे वत्से! तुम श्रवण
करो कि अपने ही इस वशिष्ठ मुनि को अपने पति के स्थान में वरण किया
था जैसा कि वहाँ पर जिस भाव से निरन्तर आपने तप किया था।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उस सावित्री ने यह कहकर जैसे पहले
सन्ध्या हुई थी और अपने चन्द्रभागा के तट पर पर्वत में जिसके लिए
तप किया था जिस तरह से ब्रह्मचारी के रूप में वशिष्ठ मुनि ने बोधा
के वचन से उपदेश की हुई तपस्या की थी और जैसे भगवान् विष्णु
प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुए थे। जिस प्रकार से उसके लिए
वर दिया था और जैसे भार्या ही की स्थापना की थी अथवा जिस
प्रकार से उसके द्वारा वशिष्ठ मुनि को अपना पति होना चाहा था।
जिस प्रकार से मेधातिथि ने यज्ञ किया था और जैसे तुमने अपने शरीर
का त्याग किया था और जिस रीति से उसकी पुत्री ने जन्म ग्रहण किया