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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages
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१४८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
हे भद्रे! तुम्हारे मन का आन्तरिक भाव की चिन्ता से युक्त जैसा लक्षित
हो रहा है। इसलिए तुम मुझे जो भी गोपनीय रहस्य की बात हो और
जो भी इस दुःख का कारण हो उसे बतला दो। मार्कण्डेय मुनि ने
कहा-इसके अनन्तर वह नीचे की ओर मुख वाली होकर लज्जा से
कुछ भी नहीं बोली थी जबकि बड़ी माता सावित्री के द्वारा वह पूछी
भी गई थी तब भी बस लज्जा से कुछ भी नहीं बोली थी। जब
मेधातिथि की पुत्री अरुन्धती ने उस समय में कुछ भी नहीं कहा था तो
मनस्विनी सावित्री ने स्वयं प्रकाश करके उससे कहा था। हे वत्से! जो
तुमने सूर्य के समान प्रभा से समन्वित मुनि को देखा था वह ब्रह्माजी
के पुत्र वशिष्ठ मुनि हैं जो कि तेरा स्वामी होगा और उसका दाम्पत्य
भाव को होना तो पहले ही विधाता ने निर्मित कर दिया है। इसलिए
आपका जो सतीभाव है वह उस मुनि दर्शन से हीन नहीं हुआ है अथवा
जो उसके दर्शन से आपका हृदय कामवासना से संयुत हो गया है इससे
भी सतीभाव का निवास नहीं हुआ है। अतएव जो तुम्हारे मन में दुःख
है उसका परित्याग कर दो। हे शोभने! तुमने पूर्व जन्म में परम दारुण
तप करके ही उस मुनि को अपना पति बनाना तय किया था। इसी
कारण से वह भी तुम्हारे लिए सकाम हो गये थे। हे वत्से! तुम श्रवण
करो कि अपने ही इस वशिष्ठ मुनि को अपने पति के स्थान में वरण किया
था जैसा कि वहाँ पर जिस भाव से निरन्तर आपने तप किया था।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उस सावित्री ने यह कहकर जैसे पहले
सन्ध्या हुई थी और अपने चन्द्रभागा के तट पर पर्वत में जिसके लिए
तप किया था जिस तरह से ब्रह्मचारी के रूप में वशिष्ठ मुनि ने बोधा
के वचन से उपदेश की हुई तपस्या की थी और जैसे भगवान् विष्णु
प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुए थे। जिस प्रकार से उसके लिए
वर दिया था और जैसे भार्या ही की स्थापना की थी अथवा जिस
प्रकार से उसके द्वारा वशिष्ठ मुनि को अपना पति होना चाहा था।
जिस प्रकार से मेधातिथि ने यज्ञ किया था और जैसे तुमने अपने शरीर
का त्याग किया था और जिस रीति से उसकी पुत्री ने जन्म ग्रहण किया

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था उस समय में उसको यह विस्तारपूर्वक क्रम से बहुला के साथ
सावित्री से कहा था।
इसके अनन्तर इसके वचन का श्रवण करके जो भी पूर्व जन्म में
हुआ था। उस समय में यह सुन करके मेरे मन में जो था वह मैंने जान
लिया था। इस रीति से वह अत्यधिक लज्जा को प्राप्त कर नीचे की
ओर मुख वाली हो गई थी और सावित्री के वचन से वह पूर्व जन्म के
स्मरण वाली हो गई थी। उसी भाँति अधोमुखी होकर पूर्व जन्म में जो
भी हुआ था उस समय में उस दिव्य ज्ञान वाली अरुन्धती ने सब
घटनाओं का स्मरण किया था। पहले भगवान् विष्णु के प्रसाद से वह
दिव्य दर्शन होकर इस समय में वह दिव्य दर्शन वाली बाल्यभाव के
द्वारा प्रच्छन्न हो गई थी। सावित्री के वचन का श्रवण करके पूर्व जन्म
में वृतान्त को सबको प्रत्यक्ष की ही भाँति वह सम्पूर्ण पूर्व ज्ञान को प्राप्त
करने वाली हो गयी थी। पूर्व ज्ञान की प्राप्ति करके जो पहले भगवान
विष्णु ने दिया था कि मैंने पूर्ण जन्म में इन्हीं वशिष्ठ मुनि का अपने
स्वामी के स्थान में वरण किया था। इस ज्ञान के रखने वाली वह देवी
अरुन्धती स्वयं ही परम आमोद से समन्वित हो गयी थी और वशिष्ठ
मुनि ने दर्शन से पूर्व में उसकी कामवासना के अद्भुत होने का भी पूर्ण
ज्ञान हो गया था।
जिस प्रकार से उसके मन में सतीत्व के निवारण करने में आतंक
समुत्पन्न हो गया था उस समय में उस मेधातिथि की पुत्री ने उस समय
में उस आतंक को स्वयं ही त्याग दिया था। इसके उपरान्त चिन्ता को
त्याग देने वाली उस अरुन्धती सती को समझकर तब सावित्री सूर्यदेव
के भवन को चली गई थी। इसके अनन्तर सावित्री अरुन्धती को उस
सूर्यदेव के मन्दिर में बिठाकर वह सर्वज्ञा और श्रेष्ठ सती सावित्री
ब्रह्माजी के भवन को चली गई थी वहाँ पर ब्रह्माजी को प्रणाम किया
था और ब्रह्माजी के द्वारा पूछी गई उस सावित्री से अमित ओज वाले
ब्रह्माजी ने कहा था- हे भगवान्! आप तो समस्त जगतों के स्वामी हैं।
आपके पुत्र वशिष्ठ मुनि को मानस पर्वत के शिखर पर उस सती

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१५० श्रीकालिका पुराण
अरुन्धती ने देखा था । फिर उसके केवल अवलोकन करते ही कामदेव
की वासना अधिक बढ़ गई थी । हे प्रजापते! वे दोनों ही परस्पर स्पृह
करने वाले हुये थे । वे दोनों ही ने बड़े धीरज से बहुत ही दुःखित होकर
काम की वासना का स्तम्भन किया था । वे दोनों ही अन्य मनस्क होकर
अथवा उदास होते हुए परम लज्जित होकर अपने-अपने स्थान को चले
गये थे ।
हे सुरश्रेष्ठ! ऐसा हो जाने पर जो भी कुछ समुचित होवे उस समय
में यही आप कीजिए । भविष्य काल की भलाई में लोकों की
हितकामना से वही आप करें जो उचित हो । समस्त जगतों के गुरु
ब्रह्माजी ने यह उसके वचनों को श्रवण करके आगे होने वाले कर्म की
प्रवृत्ति का दिव्य ज्ञान के द्वारा दर्शन किया था अर्थात् समझ लिया था
कि भविष्य में क्या होने वाला है । उस अवसर पर लोक पितामह ने
इसका स्वागत ही किया था क्योंकि उन दोनों के दाम्पत्य भाव का
समय यह उपस्थित हो गया था । इसीलिए लोकों के हित के लिए
उसकी प्रवृत्ति के लिए अवश्य ही जाऊँगा । ऐसा मन के द्वारा निश्चय
करके सावित्री के साथ ब्रह्माजी ने गमन किया था और वे मानव गिरि
के प्रस्थ पर गये थे जहाँ पर कि उन दोनों का दर्शन हो जावे । पितामह
के वहाँ चले जाने पर शिव समस्त सुरगुणों सहित नन्दी प्रभृति गणों
के साथ वृषभध्वज वहाँ पर आ गये थे । भगवान वासुदेव भी ब्रह्माजी
के द्वारा परिचिन्तित होकर वहाँ पर आ गये थे जो कि जगत् के साथ
वह भी भक्ति की भावना से शंख, चक्र, गदा के धारण करने वाले
थे । जहाँ पर ब्रह्मा और शिव स्थित थे वे भी वहाँ पर स्वयं ही आ
गये थे । इसके अनन्तर जगतों के स्वामी ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर इन तीनों
ने मेधातिथि के समीप में देवर्षि नारदजी को दूत बनाकर भेजा था ।
उन्होंने नारदजी ने कहा-हे नारद! आप शीघ्र ही चन्द्रभागा नामक
पर्वत पर चले जाइए । वहाँ पर उस पर्वत की उपत्यका में परम श्रेष्ठ
मुनि मेधातिथि विराजमान हैं । आप उनको हमारे वचन से यथाकाम
स्वयं ही हमारे पास ले आइए । आप स्वयं ही मेधातिथि को साथ में

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लाकर शीघ्र ही यहाँ पर आ जाइए। ब्रह्मा आदि के वचन का श्रवण
करके नारदजी शीघ्र ही चले गये थे और सब कार्य की सिद्धि के लिए
वे मेधातिथि को वहाँ पर लाने के लिए प्रस्थान कर गए थे। उन देवर्षि
ने मेधातिथि से सम्भाषण करके देवों के वचनों से मेधातिथि को अपने
साथ लाकर मानस पर्वत पर चले गये थे। वहाँ मानस पर्वत पर समस्त
देवगण इन्द्र के सहित और सब तपोधन, मुनिगण, साध्य, विद्याधर,
दक्ष और गन्धर्व भी वहाँ पर समागत हो गये थे। सब देव और समस्त
देवियों और जो देवों के अनुचर थे तथा जो अन्य जन्तुगण थे वे सभी
मानस के प्रस्थ को समायात हो गये थे। इसके पश्चात् देवों के समाज
के सम्पन्न हो जाने पर कमलासन ने मेधातिथि मुनि से अतिदेश करते
हुए यह वचन कहा था।
ब्रह्माजी ने कहा- हे मेधातिथे ! आप अपनी सुचारित व्रत वाली
पुत्री अरुन्धती को इस देवों के समाज में ब्रह्मविधि से दे दीजिए। मैंने
इन दोनों का वर वधू होना पहले ही सृजित कर दिया है। भगवान हरि
ने भी इस परम समुचित कर्म के विषय में आज्ञा प्रदान कर दी थी।
ऐसा समाचरण करने पर आपके कुल में बड़ा भारी यश होगा और
इससे समस्त प्राणियों की भलाई भी होगी। अतएव शीघ्र ही दे दीजिए
और इस कार्य में विलम्ब नहीं कीजिए। फिर ब्रह्माजी ने इस वचन का
श्रवण करके वह मुनि बहुत ही अधिक प्रसन्न हुए थे और उन्होंने कहा
था- 'ऐसा ही होगा' फिर उसने समस्त देवों को प्रणाम किया था। उस
मुनि के वचन का श्रवण करके वह अपनी पुत्री अरुन्धती को ले आये
थे। ध्यान में स्थित वशिष्ठ मुनि के समीप में देवों के साथ चले गये
थे। देवों के द्वारा पतिव्रत मुनि ने वशिष्ठ जी के समीप में पहुँचकर जो
मुनि ब्रह्मश्री से देदीप्यमान थे और प्रज्जवलित अग्नि के ही समान
कान्ति वाले थे। उनके पृथक-पृथक उस मानस पर्वत की कन्दरा में
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में बुद्धि को धारणा किये हुए समासीन मुनि
का दर्शन किया था। वहाँ पर अरुन्धती के पिता के ओजस्वियों में
परमश्रेष्ठ, उदितवान सूर्य के समान, नियत आत्मा वाले वशिष्ठ मुनि

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १५३
के जल को रखकर आशीर्वाद करने वाले मन्त्रों से, गायत्री से और
द्रुपदादि मन्त्रों से ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ने स्वयं ही उन दोनों का
स्नपन किया था। इसके अनन्तर अन्य महर्षियों ने और जो देवर्षियों ने
शान्ति की थी।
उन सबने महान स्वर समन्वित ऋक्, यजु और साम वेदों के मन्त्र
भागों द्वारा गंगा आदि सरिताओं के जलों से उन दोनों को फिर शान्ति
की थी। तीनों भुवनों में सञ्चरण करनेवाला सूर्य के समान वर्चस् वाला
विमान जो अव्याहत गति से समन्वित था और जल के सहित कमण्डलु
उन दोनों के लिए ब्रह्माजी ने हाथ में दिया था। भगवान् विष्णु ने
दुष्प्राप्य उत्तम स्थान दिया था जो मरीचि आदि के समीप में सब देवों
का ऊर्ध्व था। भगवान् रुद्रदेव ने उन दोनों के लिए सात कल्पों के अन्त
पर्यन्त जीवित बने रहने का वर दिया था। अदिति ने कुण्डलों का
जोड़ा दिया था जो ब्रह्माजी के द्वारा अपने ही द्वारा निर्माण किये गए
थे। उस समय में मेधातिथि ने कुण्डल अपने कानों से निकालकर पुत्री
के लिए दिये थे। सावित्री ने पतिव्रता होना ओर बहुला ने बहुत पुत्रों
वाली होना ये आशीर्वाद दिया था। देवेन्द्र ने बहुत से रत्नों का समूह
कुबेर के ही समान दिया था। इस रीति से देवगण, मुनियों, देवियों
और जो भी अन्य जन वहाँ पर उपस्थित थे सबने यथायोग्य दान उन
दोनों के लिए पृथक्-पृथक् दिया था। इस प्रकार से विधिपूर्वक
विवाह करके सुवर्ण के मानस पर्वत पर वशिष्ठ और अरुन्धती रहे थे
और वशिष्ठ जी ने उस अरुन्धती के साथ परम हर्ष प्राप्त किया था।
विवाह के अवभृथ के लिए और शान्ति के लिए जो सुरों के द्वारा
लाया हुआ जल था वहाँ पर वह जल मानस पर्वत की कन्दरा में गिरा
था। ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के हाथों में समुदीरित वही जल सात
भागों में विभक्त होकर मानस पर्वत से गिरा था। उससे शिप्रा नदी
समुत्पन्न हुई थी जो भगवान विष्णु के द्वारा भूमण्डल में प्रेरित की गई
थी। महाकौषी के प्रपात में जो पतित हुआ था उससे कौषकी नाम
वाली नदी उत्पन्न हुई थी और जो विश्वामित्र ऋषि के द्वारा अवतारित

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१५४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
थी। उमा के क्षेत्र में जो जल गिरा था उससे महानदी समुत्पन्न हुई थी
जो महाकाल नामक सर से निकली है। सरों में श्रेष्ठ महाकाल में गिरि
वह जल पतित हुआ था। हिमवान पर्वत के पार्श्वभाग में भगवान शम्भु
की सन्निधि में जो जल गिरा था उससे गोमती नाम वाली नदी समुत्पन्न
हुई जो गोमद से उदीरित है।
मैनाक नाम वाला जो पुत्र मौलराज के ही समान था पहले वह
उसी शिखर में मेनका के उदर से समुत्पन्न हुआ। यह जल वहाँ गिरा
था उसका शुभनाम दविका था जो महादेव के द्वारा सागर की ओर
प्रेरित की गई थी। जो जल हंसावतार की सन्निधि में संगत हुआ था
उससे सरयू नाम वाली नदी उत्पन्न हुई थी जो परम पुण्यतम कही गई
है। जो जल खाण्डव वन की सन्निधि में महापाश्र्व के गिरे थे जो कि
हिमवान की कंदरा में याम्य में पतित हुये थे वहाँ इरा के द्रुद के मध्य
से इरावती नाम वाली नदी के जन्म धारण किया था जो सरिताओं में
परम श्रेष्ठ है। ये सभी सरितायें स्नान पान और सेवन से जाह्नवी गंगा
के तुल्य है। ये सब सदा दक्षिण सागर में गमन करने वाले मनुष्यों को
फल दिया करती हैं। ये नदियाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सनातन
बीज भर्ता हैं अर्थात् पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति के लिए कारण स्वरूप
ही हैं। ये सात महानदियाँ सर्वदा देवों के भोगों को प्रदान करने वाली
हैं। इस रीति से सता नदियाँ समुत्पन्न हुई थी जो सदा ही पुण्य जल
वाली थीं।
देवों की सन्निधि में अरुन्धती और वशिष्ठ मुनि का विवाह हो
जाने पर इस प्रकार से उस अरुन्धती के साथ विवाह करके उस अवार
पर वे वशिष्ठ मुनि उस अरुन्धती को लेकर देवों के द्वारा दिये हुए
स्थान में ही उसी समय से वशिष्ठ मुनि श्रेष्ठ ब्रह्मा, विष्णु और महेश
के वचन से ही उस पूर्वोक्त स्थान पर चले गये थे। वे समस्त जगतों
के हित के सम्पादन करने के लिए तीनों भुवनों में सर्वदा जिस-जिस
युग में स्त्रियों को जैसे भी है वैसे ही हो जाते हैं। वेशभाव और शरीर
को धर्म से नियोजन करके यह परम प्रसन्न बुद्धिवाले, प्रमाद से रहित

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १५५
होते हुए तीनों लोकों में विचरण किया करते हैं । इसी रीति से मुनि
वशिष्ठ ने पहले अरुन्धती के साथ परिणय की गई थी । जो पुरुष इस
धर्म के साधन स्वरूप आख्यान को नित्य ही श्रवण किया करता है वह
सब प्रकार के कल्याणों से युक्त होकर चिरायु और धनवान हुआ
करता है ।
जो कोई स्त्री निरन्तर अरुन्धती की इस कथा को सुना करती है
वह इस लोक में पतिव्रता हो परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति किया करती
है । यह आख्यान परम कल्याण का गृह है और यह परम धर्म के प्रदान
करने वाला है । यह आख्यान सर्वदा कीर्ति, यश, पुण्य का विशेष
बढ़ाने वाला है । पुरुष के विवाह में, यात्रा में और श्राद्ध में जो श्रवण
करता है उनकी स्थिरता, पुंसवन, सिद्धि और पितृगण प्रीति हो जाया
करती है । यह सम्पूर्ण महात्मा वशिष्ठ का आख्यान आपको कह दिया
है जिस प्रकार अरुन्धती उनकी भार्या और परम पतिव्रता हुई थी । वह
जिसकी पुत्री होकर उत्पन्न हुई और जिस तरह से उसने अपना जन्म
ग्रहण किया था तथा जिस स्थान में उसका समुद्भव हुआ था और जिस
प्रकार से उसने ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के वचन से अपने पति का
वरण किया था, यह सभी कुछ गुह्य से भी अत्यधिक गुह्य को मैंने
आपको वर्णन करके समझा दिया है । यह आख्यान पुण्य का दाता
पापों का हरण करने वाला और वायु तथा आरोग्य के बढ़ाने वाला है ।
यह बहुत वर्षों के पापों को क्षय करने वाला इतिहास है । इसको सभा
में द्विजों को कोई एक बार भी श्रवण करा देता है वह मनुष्य कलुषों
के समूह से हीन देह वाला हो जाता है और साथ में रहकर मुनिवरों
की सहचर्या को प्राप्त कर लेता है और मृत होने पर वह देवता ही हो
जाता है ।
[ सती का विभूति वर्णन ]
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा—इसके उपरान्त हिमालय पर्वत के प्रस्थ
पर क्षिप्र सरोवर के तट पर उपविष्ट हुए महादेवजी समीप में उस

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१५६ ६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२
सरोवर का अवलोकन कर रहे थे । बारम्बार ब्रह्मा और हरि के द्वारा
प्रेष्यमाण यह ध्यान करने के लिए मन को स्थिर करके दृढ़ आत्मा वाले
हुए थे। आत्मा के द्वारा आत्मा को आत्मा में ही विशेष रूप देखने के
लिए कामदेव को शमन करने वाले शिव के ध्यान के द्वारा परम यत्न
किया था। दुहिण प्रभृति ने ध्यान प्रविष्ट चित्त वाले उनको देखकर
यतमानस होते हुए हर में प्रवेश की हुई माया नाम वाली का स्तवन
किया था। माया मोहित हुए शिव बहुत ही अधिक सती के शोक से
व्याकुल हैं और वह उसी के लिए विलाप किया करते हैं उसमें मोह
के हेतु जगत्प्रभु की स्तुति करके शम्भु में कर देंगे। जब तब सती पुनः
शरीर का ग्रहण करके शिव की भामिनी होवे तब तक यह विगत शोक
वाले होकर निष्फल का ध्यान करें। ब्रह्मा आदि देवगण यही मन से
चिन्तन करके महामाया योगनिद्रा देवी की स्तुति करने का सभारम्भ
उन्होंने कर दिया था।
देवों ने कहा-उस श्री शक्ति पावनी पुष्टि और परम निष्कला का
जो महान् अव्यक्त रूप वाली है हम लोग महतीभक्ति की भावना से
स्तुति करते हैं। वह परम शिवा है, शिव अर्थात् कल्याण के करने
वाली हैं शुद्धा, स्थूला, सूक्ष्मा, परावरा, अन्तर्विद्या, अविद्या नाम
वाली, प्रीति और एकाग्र योगिनी हैं। आप ही मेधा हैं, आप ही धृति
हैं, ह्रीं हैं और आप एक सबके गोचरा हैं, आप ही दीधिति हैं, सूर्य
में गति हैं और सुप्रपञ्च के प्रकार करने वाली हैं। जो ब्रह्मांड संस्थान
है, जो जगत् के बीजों में जगत् है जो ब्रह्मा से आदि लेकर स्तम्ब के
अन्त पर्यन्त आप्यायित किया करती हैं। जो समस्त जगतों का प्राणभूत
सदागति और देवों का आधार है वह नभ भी आपका ही एक अंशभूत
हैं। इस प्रकार से जो तेज है वह सर्वत्र ही भली भाँति जायेगा वह
आपका रूप जगत् के बीच है और जो प्रायः दिखाई दिया करता है।
जो ब्रह्मलोक पाताल और सदा अन्तरात्मगता है वह आप वियत्
(आकाश) के मध्य में और बाहिर और ब्रह्माण्ड के सभी ओर है।
जो अचल चल चक्र से यांत्रित प्रपंच को उत्पन्न करने वाली है। आप

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൲൲ श्रीकालिका पुराण ൲൲ १५७
इस जगत् की धात्री, लोकमाता हैं और आप माधवी क्षिति हैं। आप
बुद्धि हैं और आप ही उसके विषय हैं, आप माता हैं और छन्दों की
गति हैं आप गायत्री, वेदमाता और आप सावित्री तथा सरस्वती हैं।
आप ही जब जगती की वार्ता हैं और आप कामरूपिणीत्रयी हैं। आप
निद्रा के स्वरूप के द्वारा प्राणी हैं तथा निर्जर आदि हैं। निर्जर देवों का
नाम है जो स्वर्ग आदि के स्थान वाले हैं उन सबको आप सुख देती हुई
प्रकट रूप से मोहयुक्त किया करती हैं। आप पुण्य कार्य करने वालों
के लिए लक्ष्मी हैं और जो पाप कर्म किया करते हैं, उनके लिए
साक्षात यातना हैं। उसी भाँति जो नीति के धारण करने वाले पुरुष हैं
उनके लिए श्री हैं और नैतिकी धृति सुख देने वाली हैं। आप सब
जगतों की शान्ति हैं और आप चन्द्र में गोचर होने वाली कान्ति हैं।
आप समस्त प्राणियों की धात्री हैं और आप विष्णु का मोहन करने
वाली लक्ष्मी हैं। आप भूतों के तत्त्व रूप वाली हैं और आप पाँचों
भूतों की सार करने वाली हैं। त्रिलोकी की महामाया हैं।
भगवान महेश्वर सर्वभूत को संसार चक्रों में समारोपिति करके
जैसे भ्रमण कराते हुए हैं, हे महेश्वर! वह माया आप ही हैं। आप जय
से युक्तों की जयन्ती, ह्रीं, विद्या, उत्तमा नीति हैं, आप सामदेव की
गीतिका हैं, आप चतुर्वेदों की ग्रन्थि और हृति हैं। आप समस्त देवों के
समुदाय के प्रपंच को एक ही करने वाली हैं। जो स्तुति नहीं हुई वह
आप यहाँ भव्य के करने वाली होवें। इस संसाररूपी महासागर की
महान् कराल तरंगों के दुःखों से विस्तार करने वाली तरणि हैं। जो
स्थिति की रीति से हीन हैं। जो अष्टांग रूप परम पावन केलिगीत के
विक्षेप करने वाली हैं उसको निश्चय ही हम प्रणाम करते हैं। आप
नासिका, नेत्र, मुख, भुजा और वक्षःस्थल में और मानस में सुखों को
धारण करके सदा ही जन्तु का पालन किया करती हैं, जो संसार में
होने वालों सुभगा निद्रा हैं, ऐसे जानी जाया करती हैं यही आप हमारे
ऊपर धृति, स्मृति और वृत्ति रूप वाली प्रसन्न होवें। जो सृष्टि स्थिति
और अन्त में रूप वाली अथवा सृजन, पालन और संहार करने वाली

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१५८ ६०८३ श्रीकालिका पुराण ६०८३
हैं, जो सृष्टि, स्थिति और अन्न की शक्ति हैं वह माया हम पर
प्रसन्न होवें।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-महामाया योगनिद्रा यह उस समय में सुरों
के द्वारा संस्तुता है वह शीघ्र ही भगवान हर के हृदय से निकली थी।
उसके विनिःसृत होने पर उसमें मधुसूदन ने प्रायदेश किया था। विश्व
के रूप को धारण करने वाले भगवान ने स्वयं उन शम्भु की शान्ति
के लिए ही उनके अन्दर प्रवेश करके कल्प-कल्प में ऐसे हो गये थे
और अच्युत प्रभु ने सृष्टि, स्थिति और अन्त को वैसा ही दिखला दिया
था जिस रीति से उनकी सती जाया हुई और वह जो जिसकी पुत्री हुई
'थी तथा जैसे सती युक्त देह वाली हुई थी वह सभी दिखला दिया था।
बाहर व्यक्त हुआ प्रपञ्च और बहुत रजोगुण और पर ज्योति को
दिखलाकर फिर उस समय में उनको योग चित्त वाला कर दिया था।
फिर भगवान शंकर ने भी अनेक बार उन समस्त प्रपञ्चों का भक्षण
करके उस समय में उन्हें निःसार मानकर सार वस्तु में ही चित्त को
निवेशित किया था। उस समय में ब्रह्मा आदि देवों की माया उनके
द्वारा परितुष्टित होकर और कर्त्तव्य की प्रतिज्ञा करके वहाँ पर ही शीघ्र
अन्तर्धान हो गई थी। बैकुण्ठ नाथ भगवान भी पद में भगवान शम्भु
के चित्त को संयमित करके रवि मण्डल से राजा की ही भाँति शरीर
से निकल गये थे।
उस समय ब्रह्मा और नारायण प्रभृति समस्त देव कृतकृत्य अर्थात्
सफल हो गये थे और प्रीति से युक्त होकर गिरि पर हर को छोड़कर
अपने-अपने स्थान को चले गये थे। ध्यान में समास्त महादेव जी को
प्रणाम करके इन्द्र आदि सुगण मौनधारी देव को विज्ञापन करके
अपने-अपने स्थान को चले गये थे। उन देवों के चले जाने पर वृषभ
के वाहन वाले शम्भु दिव्यमान से एक सहस्र वर्ष पर्यन्त परज्योति के
ध्यान में संलग्न हो गये थे। ऋषियों ने कहा-भगवान् मधुरिपु ने कैसे
शम्भु के हृदय में शीघ्र प्रवेश करके कल्प-कल्प में सृष्टि, स्थिति और
संयम को दिखलाया था। जिस तरह से रजोगुण के द्वारा जगत् के

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൵ श्रीकालिका पुराण ൵ १५९
प्रपंच के लिए जगतीतल में गये थे। फिर कैटभारी प्रभु ने उनकी
निःसारता को किस प्रकार से दिखलाया था ? हे द्विजश्रेष्ठ! उन्होंने
फिर सारतर, गोपनीय, सनातन परज्योति को दिखलाया था ? वह सत्य
बतलाइए। यही हम सब श्रवण करने की इच्छा करते हैं। यह अतीव
अद्भुत है उसे हम आप मुनीन्द्र के मुख से ही सुनने के इच्छुक हैं। आप
इसको विस्तारपूर्वक कहिए क्योंकि यह परम निःश्रेयम धर्म है।

सर्ग इत्यादि का वर्णन

मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विजश्रेष्ठों! मैं आदि सर्ग वाराह का
वर्णन करूँगा जिस तरह से कल्प-कल्प में वाराह में जैसी सृष्टि हुई
थी। भगवान् हरि ने प्रतिसर्ग में उसी भाँति आदि सृष्टि को दिखलाकर
भगवान् शम्भु के लिए प्रलय आदि को दिखलाया था, इसे समझ लो।
सबसे प्रथम मैं प्रलय का प्रर्णन करूँगा। उसके पीछे आदि सर्ग को
बतलाऊँगा। हे विप्रो! प्रति सर्ग में फिर वाराह का ज्ञान प्राप्त कर लो।
काल के एक अंश को निमेष कहा जाता है जो नेत्रों के उन्मेष से विशेष
लक्षित हुआ करता है। उन अठारह निमेषों से एक काष्ठा होती है और
तीस काष्ठाओं की एक कला है। उतनी ही अर्थात् बीस कलाओं से
एक क्षण नामक कहा गया है। बारह क्षणों से एक मुहूर्त कहा गया है
तथा बीस मुहूर्तों से मनुष्यों का अहोरात्र होता है और पन्द्रह अहोरात्र का
एक पक्ष होता है। पक्षों में मनुष्यों के वर्ष होते हैं जो कि पितृगणों का
एक अहर्निश हुआ करता है। बारह मासों का एक वर्ष होता है जो देवों
का एक अहोरात्र ही है। पितृगणों के कर्म के लिए कृष्ण पक्ष ही दिन
माना गया है।
स्वप्न अर्थात् शयन करने के लिए शुक्ल पक्ष होता है जो रजनी
कही गई है। उत्तरायण सूर्य के होने पर छः मास देवों का दिन कहा
गया है। दक्षिणायन के छः मास देवों की रात्रि शयन करने की हुआ
करती है। सूर्य के समुत्पन्न दो-दो मासों से ऋतु कहा गया है। तीन
ऋतुओं का एक अयन होता है जो मनुष्यों का माना गया है। छः

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ऋतुओं का एक वत्सर (वर्ष) होता है। और उनको आप पृथक्-पृथक
सुनिये। हे द्विजोत्तमो ! संज्ञा के भेद से चैत्र आदि दो मासों से ऋतु को
समझिए। चैत्र और वैशाख दो मास में बसन्त ऋतु होता है। ज्येष्ठ
और आषाढ़ दो मास में ग्रीष्म ऋतु हुआ करता है। श्रावण और भाद्रपद
इन दो मासों में वर्षा ऋतु हुआ करता है। आश्विन और कार्तिक मासों
में शरद् हुआ करता है। अगहन और पौष में हेमन्त ऋतु हाता है तथा
माघ और फाल्गुन मासों में शिशिर ऋतु होता है। ये छै ऋतुये कही गई
हैं जो यज्ञादि में पृथक विहित किये गये हैं। मनुष्यों के मान से सत्रह
क्षय है और अट्ठाईस सहस्त्र का मान कृतयुग का है। अन्तराल में
अर्थात युगों के मध्य में चार सौ वर्षों का सन्ध्याकाल होता है।
सन्ध्यांश उतने से ही कहा गया है जो अन्तर्गत ईक्षित होता है।
त्रेता युग मनुष्य के बारह लक्ष वर्षों का हुआ करता है और इस
युग की सन्ध्या का समय छियानवे हजार तीन सौ वर्षों का हुआ करता
है। उसके अन्दर तीन सौ सन्ध्यांश कहा गया है। प्रमाण से चौंसठ
हजार लक्ष और आठ वर्ष का द्वापर का नाम वाला युग होता है उनमें
दो सौ की सन्ध्या होती है। दो वर्ष का सन्ध्यांश अन्तर्गत ही अभीष्ट
हुआ करता है। चार लाख बत्तीस हजार वर्ष कलियुग का समय होता
है। वर्षों का मान होता है और एक सौ वर्ष की सन्ध्या का काल होता
है। इसके अनन्तर में एक-एक सौ वर्ष का सन्ध्यांश है। इस रीति से
कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग मानुषमाण से चार युग हुआ करता
हैं। ये चारों युग सैंतालीस लाख वर्षों के मान से हुआ करता है। बीस
सहस्त्र वर्षों की इन सबकी सन्ध्या का अंश हुआ करता है जो कि उस
सन्ध्यांश से संयुत है।
रात्रियों के सहित देवों का दिन मनुष्यों का एक वत्सर होता है।
इस प्रकार से क्रम की गणना करके मनुष्यों के चारों युगों से देवों के
बारह सहस्त्र वर्ष कीर्त्तित किये गए हैं। देवों के बारह सहस्त्र वर्षों का
दैविक युग हुआ करता है। वह मनुष्यों के चार युग हैं जिसमें सन्ध्या
और सन्ध्याँश भी सम्मिलित होता है। देवों के कृतयुग में त्रेता, द्वापर

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ൠ श्रीकालिका पुराण ൠ १६१
की व्यवस्था से युग व्यवहार नहीं है और धर्म आदि की भिन्नता भी नहीं
है । किन्तु मनुष्यों का चतुर्युग अर्थात् चारों युग सदा देवों का युग होता
है । इकहत्तर देवों के युगों से एक मन्वन्तर हुआ करता है । देवों के दो
सहस्त्र युगों का ब्रह्माजी का एक अहोरात्र हुआ करता है । मनुष्यों के
मान से दो सहस्त्र चारों युग होते हैं । एक ब्रह्माजी के दिन में चौदह मनु
होते हैं । इस प्रकार से ब्रह्मा के मान से तीन सौ दिनों से आठों से वत्सर
होता है जैसे मनुष्यों का है वैसे ही ब्रह्मा का वर्ष होता है । ब्रह्मा अर्थात्
ब्रह्मा के पाँच सौ वर्षों से परार्ध कीर्त्तित किया गया है । वह ईश्वर का
दिवस है और उतनी ही रात्रि कही जाती है ।
ब्रह्माजी के एक शत वर्ष का काल दूसरा परार्धक होता है द्वितीय
परार्ध के व्यतीत हो जाने पर जो ब्रह्मा का है, प्रलय होता है । पर ब्रह्मा
के लीन हो जाने पर जगतों का आधार, अव्यय और पर से भी पर है ।
उस ब्रह्मा के स्वरूप के दिवारात्र का जो होता है उससे हर नाम उसका
आधा परार्ध कहा जाता है । जगत् के स्वरूप वाले भगवान् परमात्मा
का अक्षर और अव्यय होता है । जो स्थूल से स्थूलतम और जो सूक्ष्म
से भी सूक्ष्मतम माना गया है उसका दिवारात्रि का व्यवहार नहीं होता
है और वत्सर ही है । किन्तु पूर्व पौराणिकों के द्वारा और उस प्रकार
के हमारे भी द्वारा सृष्टि और प्रलय का ज्ञान प्राप्त करने के लिए
अहर्निश कल्पित किया जाया करता है । वह ही रात्रि है, वही वर्ष है
और वह क्षिति है तथा सृष्टि के करने वाला हर है । वह विष्णु के रूप
वाले पुराण पुरुष हैं । उसी से यह समस्त उसी की भांति विभात होता
है । यह शाश्वत परमात्मा ब्रह्म के लीन होने पर यह सम्पूर्ण जगत् क्रम
से ही उसके रूपत्व के लिए गमन किया करता है अर्थात् उसी का
स्वरूप बन जाया करता है ।
ब्रह्मा के सौ वर्ष के अन्त में रुद्रदेव के स्वरूप वाले भगवान
जनार्दन स्वयं इस जगत का अन्त करके परमरूप में लीनता को प्राप्त
हो जाते हैं । सबसे प्रथम तो सवित अपनी परम तीक्ष्ण किरणों से
स्थावर और जंगम सम्पूर्ण जगत् के जल का शोषण करके स्वयं ग्रहण

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१६२ ൵ श्रीकालिका पुराण ൵
कर लेंगे। शुष्क वृक्ष, तृण, गण, प्राणी तथा पर्वत चूर्ण होकर दिव्य
सौ वर्ष में विकीर्ण हो जायेंगे। फिर बारह सूर्यों की बहुत ही अधिक
प्रबल किरणें हुई और जगत के भोग्य से उपबृंहित द्वादश आदित्य हुए
थे। द्यौ और मेदिनी उष्णता को प्राप्त हो गये थे। इसके उपरान्त सम्पूर्ण
स्थावर और जंगम के विनष्ट जाने पर आदित्य की किरण से रुद्ररूपी
देव जनार्दन उन्नत हो पाताल नदी को प्राप्त हो गये थे।
सात पाताल के संस्थानों को नाग, गन्धर्व और राक्षसों को, देवों
को, ऋषियों को और शेष को नर शूल के धारण करने वाले ने हनन
कर दिया था। इसी प्रकार से स्वर्ग में, पाताल में, पृथ्वी में और सागरों
में जो भी प्राणधारी जीव थे उन प्रभु जनार्दन ने उन सबको मार दिया
था। इसके पश्चात मुख से महावायु का रुद्रदेव ने स्वयं सृजन किया
था। वह अव्याहत गति वाला वायु दृढ़ता से संसार के तीनों भुवन के
गर्भ में गमन करने वाला सौ वर्ष तक भ्रमण करता हुआ जो भी कुछ
था उस सबको तुला राशि के ही समान उसको उत्साहित कर दिया था।
सभी ओर जगत में रहने वाले सम्पूर्ण को समुत्साहित करके वेग में
अत्यधिक वह वायु बारह आदित्यों में प्रवेश कर गया था। उनके
मण्डल में प्रवेश करके उनके तेज के साथ वायु गुरुदेव के द्वारा
प्रतियोजित होते हुए महान मेघों का उसने समारम्भ कर दिया था। फिर
प्रेरित हुए वे मेघ जो उस वेग वाले वायु के द्वारा ही प्रेरित किये गये
थे अतिरौद्र के द्वारा मेघों ने स्थल को घेर लिया था।
सम्वर्त नाम वाले महामेघ जो भिन्न अञ्जन के समूह के समान थे।
उनमें कुछ तो धूम्र वर्ण वाले थे, कुछ शुक्ल और कुछ चित्र विचित्र
वर्ण वाले महाभीषण थे। कुछ मेघ पर्वत के तुल्य आकार से युक्त थे,
कुछ नाम के समान प्रजा के समन्वित थे, कुछ बड़े विशाल प्रासाद के
समान थे और कुछ क्रौंच के वर्ण वाले महान भीषण थे। वे महामेघ
गर्जन करते हुए सौ वर्ष से भी अधिक समय तक महान शब्द करने
वाले वे मेघ तीनों लोकों का प्लावन करते हुए वर्षा करते थे। इसके
अनन्तर स्तम्भ (खम्भा) के प्रमाण वाले धाराओं के पास से खूब दृढ़

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𑁍 श्रीकालिका पुराण 𑁍 १६३
धारासार से जो कि बहुत ही महान थी तीनों भुवनों को पूरित कर दिया
था। आधुवस्थान को प्राप्त करके जल समूह के स्थित होने पर रुद्ररूपी
प्रभु जनार्दन ने अपने मुख से वायु का सृजन किया था। उस वायु के
ओघ से क्षित मेघ सौ वर्ष तक अव्याहत गति वाले वायु के द्वारा फिर
ध्वस्त हो गये थे। उन मेघों के विनिष्ट हो जाने पर फिर दया से सहित
रुद्रदेव ने ब्रह्मभुवन तक जानलोक आदि का विध्वंस कर दिया था।
समस्त भुवनों के विध्वस्त हो जाने पर और विशेष रूप से
ब्रह्मलोक के विध्वस्त होने पर गुरुदेव द्वादश अरुणों के समीप गये थे।
वे हरि महान वेग के साथ द्वादश आदित्यों के समीप में पहुँचे थे और
उनको ग्रसित कर लिया था फिर उन गर्भ में स्थित दिवाकरों के द्वारा
अत्यन्त प्रज्वलित हो गए थे। इसके उपरान्त कालान्तक के समान महान
बलवान रुद्रदेव ब्रह्माण्ड में प्राप्त हुए थे और वह सबको मुष्टिपेष चूर्ण
कर दिया था। ब्रह्माण्ड चूर्ण करते हुए उन्होंने पृथिवी को भी चूर्णित
कर दिया था। उन हरि ने योग के बल से समस्त जलों को धारण कर
लिया था। जो जल पूर्व में सब और ब्रह्माण्ड से बाहर स्थित था
अथवा जो अभ्यन्तर में रहने वाला जल था वह सब एक-रूपता को
प्राप्त हो गया था। सब ओर सर्वव्यापी जनों के एकीभूत हो जाने पर
ब्रह्माण्ड के खण्डों में पूर्णोध वह नौका की ही भाँति प्लवन करते हुए
थे। इसके अनन्तर पृथ्‍वी का सार गन्ध तन्मात्रक से क्रम से जल ने
ग्रहण कर लिया था और सम्पूर्ण पृथ्‍वी विनष्ट हो गई थी।
फिर उन रुद्रदेव ने गर्भ में स्थित तेजों को अपने शरीर से निकाल
दिया था। पुनः भीषण रूप से वे पुञ्जीभूत हो गये थे। उन तेजों ने छोर
तक स्थित सबको ग्रहण कर लिया था और भीतर, बाहर ब्रह्माण्ड से
जो तेज था तथा अन्य से गया हुआ था उस सबको ग्रहण किया था!
जगत में रहने वाले सम्पूर्ण तेज का ग्रहण करके एक ही स्थान के
जलते हुए ने रौद्र ब्रह्माण्ड के खण्डों को जल में त्रिदोष कर दिया था।
ब्रह्माण्ड के चूर्णों का दाह करके वे तेज उज्ज्वलित हो गये थे फिर
जलों से जो उनकी रस तन्मात्रा थी जो कि सारभूत थी उसका ग्रहण

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१६४ ६० श्रीकालिका पुराण ०३
कर लिया था। रूप तन्मात्रा के ग्रहण किये जाने पर सम्पूर्ण तेज
विनष्ट हो गये थे और अनादित वायु प्रबल हो गया था। इसके अनन्तर
वायु महान शब्द वाले को प्राप्त करके अग्नि की भाँति प्रज्वलित होते
हुए रुद्रदेव संक्षुब्ध हो गये थे और उस समय में आकाश को गया था।
उससे संक्षुब्ध आकाश की वायु ने ग्रहण कर लिया था। उसके
अन्दररूप की तन्मात्रा को लेकर फिर वायु भी नष्ट हो गया था। वायु
के नष्ट हो जाने पर यह रुद्रदेव उस समय ब्रह्मा के शरीर में प्रवेश कर
गये थे। उस अवसर पर ब्रह्मशरीर आकुल, निराधार और निराकुल
हो गया था फिर शंख, चक्र और गदा के धारण करने वाले भगवान
विष्णु के शरीर में उसने प्रवेश किया था। इसके उपरान्त महान् तेजस्वी
भगवान कृष्ण ने अपना पञ्च भौतिक शरीर जो अच्युत और शंख, चक्र
तथा गदा धारण करने वाला था सबसे सार का आदान करके अपनी
शक्ति के द्वारा शीघ्र ही त्याग दिया था। जो बिना आधार वाला तथा
आकार से रहित, निःसत्त और निरवह था। जो आनन्द से परिपूर्ण, अद्वैत,
द्वैत से हीन और बिना विशेषण वाला था उसका त्याग कर दिया था।
जो न तो स्थूल और न सूक्ष्म ही है जिसका ज्ञान नित्य एवं
निरञ्जन है। वह एक ही परब्रह्म है जो सभी ओर से अपने द्वारा ही
प्रकाश वाला है। जो न तो दिन है और न रात्रि ही है। न आकाश है
और पृथ्वी है। वह तप भी नहीं था और अन्य ज्योति भी नहीं था।
श्रोत्रादि और बुद्धि आदि से उपलब्ध एक प्राधानिक ब्रह्म है। उस
समय में पुमान् था। इस प्रकार से जब तक यह सृष्टि स्थित थी तब
तक ही सृष्टि का बलाबल था। एक ही परतत्व था फिर उससे सृष्टि
प्रवृत्त होती है। क्योंकि सभी तन्मात्राओं का संचय प्रकृति में संस्थित
था जो प्राकृत लय था उसके अहंकार और महत्तत्व गत हो गये थे।
जो अतीत प्रलय वाला अव्यक्त था वह भी प्रकृति में संस्थित था इसी
कारण से प्रत्येक यह संज्ञा प्राकृत संज्ञा वाला है और ऐसा कहा जाया
करता है। हे विप्रो ! यह प्राकृत नाम वाला महान लय आपको बतला
दिया है। मेरे द्वारा पुनः इस आदि सृष्टि का आप लोग श्रवण कीजिए।

आदि सृष्टि का वर्णन

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ൠൡ श्रीकालिका पुराण ൠൡ १६५
आदि सृष्टि का वर्णन
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-यह काल नाम वाला स्वयं देव ही है जो
सृजन, पालन और संहार करने वाला है। उसके किसी भाग से सृजन
और प्रलय अविच्छिन्न है। लय भाग के व्यतीत हो जाने पर सृजन करने
की इच्छा समुत्पन्न हुई थी और ज्ञान के स्वरूप वाले उस समय परब्रह्म
विभु को ही सृजन की इच्छा उत्पन्न हुई थी। इसके अनन्तर उसके द्वारा
प्रकृति स्वयं ही भली भाँति धृति के द्वारा संक्षोभित हुई थी।' वह
संक्षुब्ध होकर त्रिगुण के स्वरूप वाली (सत्व, रज, तम ये तीन गुण
हैं) वह प्रकृति सभी कार्य करने के लिए हुई थी। जिस प्रकार से
सन्निधि मात्र से ही गन्ध क्षोभ के लिए हुआ करती है उसी भाँति लोकों
के कर्ता होने से यह परमेश्वर मन का होता है। हे ब्राह्मण वह भी क्षोभ
के करने वाला है और वही क्षोभ करने के योग्य होता है। वह संकोच
और विकास के प्रधान होने पर भी स्थित है। परमेश्वर प्रभु को पुराण
पुरुष अपनी केवल इच्छा के करने ही से सृष्टि की रचना करने के
लिए कारण हुआ करता है। इसके अनन्तर उन जगतों के स्वामी ने
फिर भी संक्षोभ किया था। फिर गुणों के अर्थात् सत्व, रज और तम
इन गुणों के सामान्य होने से जो कि क्षेत्र के ज्ञाता में अधिष्ठित थे उस
स्वर्ग अर्थात् सृजन के काल में गुणों के व्यञ्जन की उत्पत्ति हो गई थी।
ईश्वर की इच्छा से समीचीन प्रधान तत्व से प्रथम ही अद्भुत
महतत्व प्रधान को समावृत किया था। प्रधान के द्वारा आवृत्त उस
महतत्व से अहंकार उत्पन्न हुआ था। यह अहंकार वैकारिक, तैजस
और तामस भूतादि था। सबसे आगे अर्थात् पहले तो अहंकार समुत्पन्न
हुआ था। वह तीन प्रकार का था वह सनातन भूतादि का और इन्द्रियों
का हेतु था। उस महत् ने अर्थात् महतत्व ने उत्पन्न होते ही अहंकार को
समावृत्त कर लिया था। उस समावृत्त अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ
समुत्पन्न हुई थीं। सबसे पहले शब्द तन्मात्रा और फिर रसतन्मात्रा एवं
पाँचवीं गन्ध तन्मात्रा क्रम से ही समुत्पन्न हुई थीं। उन सभी तन्मात्राओं
में प्रत्येक तन्मात्रा को अहंकार ने समावृत्त कर लिया था। फिर उन

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१६६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
परमेश्वर प्रभु ने शब्द के लक्षण वाले आकाश को शब्द की तन्मात्रा
से सृजित किया था। उस प्रकार से शब्द मात्रा को उस भूतादि ने
समावृत्त कर लिया था।
शब्द तन्मात्रा के सहित स्पर्श तन्मात्रा से शब्द से समन्वित स्पर्श
गुण वाला वायु समुत्पन्न हुआ। आकाश और वायु से संयुत रूप
तन्मात्रा से देदीप्यमान तेज हुआ था जो सभी ओर से समन्वित हुआ था
इसके उपरान्त वायु तेज से युक्त विपत से जल की उत्पत्ति हुई। वह
रत तन्मात्रा से भली-भाँति सभी ओर से उसके द्वारा व्याप्त हो गया था।
जल को भी जो अपरमिति वाले भगवान विष्णु की आधार शक्ति है।
उसने निराधार और अनिल के द्वारा आन्दोलितों को धारण किया था।
सबसे प्रथम परमेश्वर प्रभु ने उनमें बीज का सृजन किया था। यह बीज
हेमअंड हो गया था जिस अण्ड की प्रभा सहस्त्रांशु के ही समान थी।
महत्तत्व के आदि लेकर विशेष के अन्त पर्यन्त सबसे समावृत होकर
आरम्भ किया था। जल, अग्नि, अनिल, आकाश, तम और भूतादि से
समावृत्त जिस तरह से महान से भूतादि होते हैं वह अण्ड दश गुणों
से समावृत्त था। जिस रीति से वाह्य दलों में बीज व्याप्त होता है ठीक
उसी भाँति से ही हे द्विजो! यह तोय आदि से अतुल ब्रह्माण्ड
व्याप्त था।
उस अण्ड के मध्य भगवान विष्णु स्वयं ही ब्रह्मा के स्वरूप वाले
शरीर को रखकर दिव्यमान से वह एक वर्ष पर्यन्त स्थित होकर उन्होंने
अपनी बुद्धि से बीजगण को ग्रहण किया था। ध्यान के द्वारा उस
अण्ड को स्वयं ही दो भागों में करके वह एक क्षणभर उसमें संस्थित
रहे थे। उसी समय इसी के द्वारा सृष्टि गन्धोत्तर समस्त तन्मात्राओं के
समूह हुए थे और यह स्पर्श, शब्द, समस्त का रूप गन्ध और रस की
आधारभूत थी और समस्त उन तन्मात्राओं के समुदाय से सम्पूर्ण पृथ्वी
आधार की गयी थी। उनके उत्थित हुओं से यह कनकाचल समुत्पन्न
हुआ था और जटायुओं से पर्वतों का संचय हुआ था। गन्धोदकों से
सात सागर हुए और दो स्कन्धों से त्रिदशालय अर्थात देवों के निवास

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का स्थान हुआ था । दूसरे देश में उत्पन्न दो स्कन्धों से वे सात नागों को
गृह हुए थे । जिनकी संज्ञा पाताल है और जो महान सुखप्रद है जहाँ पर
महेश स्वयं रहते हैं । उसके तेज समूहों से यह लोक उत्पन्न हुआ था जो
कि महर्लोक इस नाम से श्रुत हुआ था । गर्भ से मरुत् जनलोक नाम
वाला हुआ था और ध्यान से परम श्रेष्ठ तपोलोक उत्पन्न हुआ था । उस
अण्ड की ऊर्ध्वगति में सत्यलोक समुत्पन्न हुआ था । उस ब्रह्माण्ड के
खण्ड के भगवान् अच्युत विष्णु हैं जिनको धीर पुरुष परमपद कहते
हैं और जो ज्ञान के ही द्वारा जानने के योग्य वीर परिनिष्ठित रूप से
समन्वित है ।
इसी रीति से सबसे प्रथम विष्णु स्वरूप वाले हुए थे और वे ही
स्थिति अर्थात् पालन के लिए हुए । क्योंकि ये स्वयं ही समुत्पन्न शरीर
वाले थे अर्थात् इनकी उत्पत्ति स्वयं अपनी इच्छा से ही हुई थी और
इनको किसी ने उत्पन्न नहीं किया था । अतएव उन भगवान् विष्णु ने
'स्वयम्भू' यह प्रसिद्धि प्राप्त की थी । इसके अनन्तर भगवान् विष्णु यज्ञ
वाराह के रूपधारी हुए थे जो भूमि के समुद्धरण करने के लिए
परमाधिक पीन थे । उन वराह के रूपधारी प्रभु ने मध्य में निमग्न होती
हुई इस पृथ्वी का भेदन करके अत्यधिक वेग से अन्दर चले गये थे ।
अपनी दाढ़ के अग्र भाग में पृथ्वी को रखकर वे सम्पूर्ण जल का
अतिक्रमण करके ऊपर आगत हो गये थे । इसके अनन्तर यह सात
फनों से सयंत अनन्त की मूर्ति होकर इस पृथ्वी को धारण करने के
लिए प्रकट हो गये थे । शेषनाग ने भी अपने फन को फैलाकर और
उसने एक फन पर धरित्री धारण करके जल में संस्थित होते हुए जल
के ऊपर उसको रख दिया था और यज्ञ वाराह ने भी पृथ्वी को त्याग
दिया था । उन शेष ने भी फनों को फैला दिया था । उनमें से एक फन
तो पूर्व दिशा की ओर था तथा दूसरा फन पश्चिम में था और अन्य
फन दक्षिण और उत्तर दिशा की ओर थे । उनका एक फन ऐशानी
दिशा में और दूसरा फन आग्नेय दिशा में था । एक फन पृथ्वी के मध्य
में था और उसका तनु नैर्ऋत्य दिशा में था । वहाँ पर वायव्य दिशा शून्य

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थी। फिर नग्न भूमि स्थित थी। वह दीर्घ तनु जल में था जिसको अनन्त
न धारण कर सके थे। उस समय हरि कर्म के रूप वाले हो गये थे
और अनन्त के काम को उन्होंने धारण किया था।
उस कच्छप ने अपने चरणों से नीचे ब्रह्माण्ड का आक्रमण करके
वायव्य दिशा में ग्रीवान्वित के पृष्ठ में अनन्तर को धारण किया था।
विशाल शरीरधारी भगवान् अनन्त देव ने कूर्म के पृष्ठ पर नौ वेष्टनों
(लपेटों) से अपने शरीर को देखकर सुख से ही पृथ्वी को धारण
किया। उसके अनन्तर अनन्त देव के फन पर चलती हुई पृथ्वी स्थित
हुई थी। वराह भगवान ने इस पृथ्वी को अचल बनाने का प्रयत्न किया
था और उसको अति सुदृढ़ अचलायमान कर दिया था। मेरु पर्वत को
अपने सुरों के द्वारा प्रहत करके पृथ्वीतल में गाड़ लिया था फिर उसका
भेदन करके वह पृथ्वी के अन्दर प्रवेश कर गये थे। वराह भगवान के
चरणों के प्रहारों से वह महान पर्वत सोलह सहस्त्र योजन तक रसातल
में प्रवेश कर गया था। हे द्विजोत्तमो! मेरु पर्वत का शिर उससे बत्तीस
हजार यौजन के विस्तार वाला हो गया था।

रुद्र और ब्रह्मा का नाम विभाजन

इसके उपरान्त ब्रह्माजी ने महान् ओज वाले वराह भगवान को
प्रणाम किया था और देवों के देव अर्धनारीश्वर को शरीर से समुत्पन्न
किया था। पहले ही उत्पन्न होने के साथ वह महान ध्वनि वाले वे रूदन
करने लगे थे। ब्रह्माजी ने उनसे कहा था कि तुम क्यों रो रहे हो। उन
महेश्वर ने उत्तर दिया था कि उनका नाम रखो। रुदन करने से वे रुद्र
नाम वाले हुए थे। उन ब्रह्माजी ने कहा- हे महाशय! आप रूदन मत
करो। इस प्रकार से कहे हुए वे रुद्र सात बार रोये थे अर्थात् सात बार
उन्होंने रुदन किया था। फिर ब्रह्माजी ने इसके उपरान्त सात दूसरे नाम
किये थे। शर्व, भव, भीम और चौथा नाम महादेव किया था। पाँचवाँ
नाम उग्र, छठवाँ नाम ईशान और परम पशुपति ये नाम किए थे।
ब्रह्माजी ने कहा-मेरे द्वारा जिस प्रकार से आपका विभाग किया गया