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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ १४७
मैंने सती का भाव परित्याग कर दिया है, यही वह चिन्तन कर रही
थी। उसका कामवासना के द्वारा समुत्पन्न दुःख से मुख कान्तिहीन हो
गया था उसका सम्पूर्ण शरीर भी म्लान हो गया था और गति भी
मलिन हो गयी थी और उसने यह विचार किया था और अपने मन की
गर्हणा (बुराई) करती थी कि यह मन की वृत्ति मृणाल के तन्तु के ही
समान परम सूक्ष्म है और उस क्षण में छिन्न हो जाया करती है। सतियों
की स्थिति अत्यन्त अल्प चलपता से ही विनष्ट हो जाया करती है। यही
सती के धर्म को पढ़ाकर मुझे चरित्र व्रत वाली सावित्री ने कहा था।
सावित्री देवी ने धर्म को यह सार उद्धृत किया था अर्थात् मुझे
बतलाया था यह आज परकीय पुरुष में मनोरथ से नष्ट कर दिया है।
तात्पर्य यह है कि दूसरे पुरुष में रम जाने ही से वह नष्ट हो गया है।
उस समय उस मेधातिथि की पुत्री अरुन्धती क्या वहाँ पर पराये में मेरा
मन होगा इसी विचार को बढ़ाते हुए यही वह चिन्तन कर रही थी।
दुःख से आर्त्त वह बहुला और सावित्री देवी के समीप पहुँच गयी थी।
उस प्रकार से परम चिन्तित होती हुई, कान्तिहीन मुख वाली उस सती
को देखकर ध्यान के चिन्तन में परायण होकर सावित्री ने विचार किया
था और दिव्य ज्ञान के द्वारा विचार करती हुई उस सती को पूरा ज्ञान
हो गया। जिस प्रकार से वशिष्ठ मुनि ने साथ अरुन्धती का अवलोकन
हुआ था और जैसा उन दोनों में अत्यन्त दुःसह कामवासना प्रवृद्ध हुई
थी। दिव्य दर्शन करने वाली सावित्री ने अरुन्धती के मुख की कान्ति
की हीनता का हेतु भी जान लिया था। इसके अनन्तर उस सावित्री के
मेधतिथि की पुत्री के मस्तक पर हाथ रखकर उस महादेवजी ने जो
चरित्र व्रत वाली सावित्री थी यही कहा था-हे बेटी! किस कारण से
तुम्हारा मुख भिन्न वर्ण वाला हो गया है ?
हे गुणोत्तमे! जिस प्रकार से नाल से छिन्न होने वाला पद्म जो सूर्य
के ताप ते तापित हुआ होता है उसी भाँति तेरा शरीर कैसे म्लान हो
गया है। जिस तरह से चन्द्र का बिम्ब छोटे से काले बादल के द्वारा
सवृत होकर मलिन हो जाया करता है वैसे ही तुम्हारा मुख हो गया है।