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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

by महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री

DevanagariSanskritpublished506 pages
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( ३ )
एक समय दिन जब एक पहर चढ़ गया तब उत्तर की ओर घोड़ों की हिनहिनाहट
सुन पड़ी। कुतूहल से सरस्वती ने लतामण्डप से बाहर निकल कर देखा कि धूल उड़ाता
हुआ घोड़ों का समूह चला आ रहा था, जिसके साथ हजारों पैदल युवक चले आ रहे थे।
अश्वारोहियों के बीच अट्ठारह वर्ष की आयु के एक सुन्दर युवक को देखा। एक ओर
अधिक अवस्था वाला पुरुष भी उसके साथ था। वह युवक दिव्य आकृति वाली दोनों
कन्याओं को देखता हुआ कुतूहल से लतामण्डप के समीप आ पहुँचा और घोड़े से उतर
गया। साथ के और लोगों को दूर पर ही उसने रोक दिया और उस दूसरे सज्जन के
साथ पैदल ही वहाँ आया। सरस्वती के साथ सावित्री ने उसका बनवास के उचित
सामग्री से सत्कार किया और उस वृद्ध से पूछा—'यह युवक कहाँ से आया है? इसे ·
जाना कहाँ है? इसके पिता कौन हैं, माता का क्या नाम है और इसका क्या नाम है?'
सावित्री के इस अनुरोध पर उस पुरुष ने कहा—'यह च्यवन का पुत्र दधीच है, इसकी
माता राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या है। शर्याति पुत्री को गर्भवती जान कर पति के घर
से अपने घर ले गए। वहीं उसने इसे जन्म दिया। अपने ननिहाल में ही यह बढ़ा। जब
इसकी माता अपने पति के घर जाने लगी तब नाना ने स्नेह से इसे अपने साथ ही रख
लिया। वहीं पर इसने समस्त विद्याओं और कलाओं को सीखा तब किसी प्रकार नाना
ने इसे पिता के पास जाने के लिए छोड़ा। मैं उन्हीं शर्याति का निकुक्षि नामक आज्ञाकारी
भृत्य हूँ। मुझे इसे पिता के घर पहुँचाने के लिए भेजा गया है। शोण के उस पार
भगवान् च्यवन का आश्रम है, हम वहीं जा रहे हैं।' यह कह कर उस पुरुष ने उन
दोनों का भी परिचय पूछा। तब सावित्री ने कहा—'आर्य, हम दोनों का यहाँ बहुत दिनों
तक रहने का विचार है अतः धीरे-धीरे सब कुछ ज्ञात हो जायगा।' फिर दधीच और वह
पुरुष दोनों च्यवनाश्रम की ओर घोड़े पर सवार होकर चल दिए। इधर सरस्वती दधीच
के चले जाने पर उस दिशा की ओर ही देर तक आँखें फैलाए बैठी रही, फिर किसी तरह
वह दिन बीता। रात में भी दधीच के दर्शन की चिन्ता में ऊभ-चूभ होती रही। इस
प्रकार कई रातें बीतीं तो अपने देश की ओर लौटते समय विकुक्षि वहाँ पहुँचा। सावित्री
ने दधीच का कुशल पूछा। विकुक्षि ने दधीच की मालती नाम की दूती के आने का
समाचार कह कर विदा ली। विकुक्षि के जाने पर अश्वारूढ होकर मालती वहाँ पहुँची।
दोनों ने उसका सम्मान किया। मालती कुछ देर तक ठहरी और फिर दधीच को लाने
के लिए च्यवनाश्रम गई और दधीच को साथ लेकर लौटी। प्रणय हो जाने पर दधीच
सरस्वती के साथ एक वर्ष तक वहीं रह गए। दैवयोग से सरस्वती ने गर्भ धारण किया
और समय पर पुत्र पैदा किया। पैदा होते ही सरस्वती ने अपने पुत्र को समस्त वेदों,

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शास्त्रों, कलाओं और विद्याओं में प्रवीण हो जाने के लिए वर दिया और दधीच तथा
पितामह के आदेश से सावित्री के साथ ब्रह्मलोक चली गई। सरस्वती के चले जाने पर
दधीच ने भार्गव वंश में उत्पन्न अपने भाई की अक्षमाला नाम की पत्नी के पास उस
सारस्वत पुत्र को पालने के लिए छोड़ कर तपस्या करने के लिए जंगल में प्रस्थान किया।
जिस समय सरस्वती ने पुत्र पैदा किया था उसी अवसर पर अक्षमाला के गर्भ से भी पुत्र
उत्पन्न हुआ था। अक्षमाला ने दोनों पुत्रों को पाल-पोस कर बड़ा किया। एक का नाम
सारस्वत और दूसरे का नाम वत्स था। दोनों में सहोदर भाई जैसा स्नेह था। माता के
वरदान से सारस्वत यौवन के आरम्भ में ही समस्त शास्त्रों का पारंगत विद्वान् हो गया।
उसने वत्स को भी अपनी सारी विद्या दे दी और उसका विवाह करके प्रीतिकूट नाम का
स्थान बनवा दिया तथा पिता दधीच जहाँ तपस्या कर रहे थे वहीं स्वयं दण्ड-चीवर धारण
करके चला गया।

वत्स से वंश चला। उसी वंश की परम्परा में बाण का जन्म हुआ। बाण ने वात्स्यायन-
वंश की परम्परा भी दी है। वत्स के बाद अनेक वर्ष बीते और बहुत से वात्स्यायन
ब्राह्मण उस कुल में क्रमशः उत्पन्न हुए। उसी क्रम में कुबेर नाम का ब्राह्मण उत्पन्न हुआ।
उसके चार पुत्र हुए—अच्युत, ईशान, हर और पाशुपत। पाशुपत के पुत्र का नाम
अर्थपति था। अर्थपति ने ग्यारह पुत्रों को उत्पन्न किया जिनके नाम ये हैं—मृगु, हंस,
शुचि, कवि, महीदत्त, धर्म, जातवेदस्, चित्रभानु, लक्ष, अहिदत्त और विश्वरूप। चित्रभानु
के ही पुत्र बाण थे। बाण की माता का नाम राजदेवी था। बाण के दो पारशव भाई
(शूद्र स्त्री से उत्पन्न) थे—चित्रसेन और मित्रसेन, और चार चचेरे भाई थे—गणपति,
अधिपति, तारापति और श्यामल।

बाण की आत्मकथा

इस प्रकार बाण ने अपने वात्स्यायनवंश का उद्भव बताते हुए प्राचीन कुलपुरुषों की
क्रमबद्ध वंशावली दी है और इसी क्रम में अपनी भी चर्चा की है। कहा जा चुका है कि
बाण के पिता का नाम चित्रभानु और माता का नाम राजदेवी था। बालपन में ही उसे
माता का वियोग सहना पड़ा और पिता ने मातृस्नेह के साथ उसका पालन किया। वह
अपने घर पर ही रह कर बढ़ा। उसके उपनयन आदि संस्कार यथासमय पिता ने किए।
जब वह चौदह वर्ष का हुआ तब उसके पिता का भी देहान्त हो गया। उस समय तक
उसका समावर्तनसंस्कार और उसके साथ ही विवाह भी हो चुका था। पिता की मृत्यु के
बाद दुखी और शोकसंतप्त बाण ने किसी प्रकार अपने घर पर ही रह कर वह समय

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( ५ )

काटा। कुछ दिन के बाद जब पितृशोक कुछ कम हुआ तब बाण की स्वतंत्र प्रकृति ने
जोर मारा। उसमें वह विनय अब न रहा। अल्हड़पन के कारण बालक बाण में नई-नई
वस्तुओं के देखने का कुतूहल बढ़ा। फलतः वह यौवन के आरम्भ होते ही धैर्य को त्याग
कर घुमक्कड़ और आवारा बन गया। इसके साथी और सहायक भी बहुत से हो गए। वह
उनके साथ देश-देशान्तरों को देखने की इच्छा से अपने पिता-पितामह के वैभव और विद्या
की परवाह न करके घर-द्वार छोड़ कर निकल पड़ा। स्वच्छन्द होकर वह इस प्रकार
मनमौजी हो गया कि उसकी खिल्ली उड़ने लगी।

अपने उसी उच्छृङ्खल भ्रमण के अवसर में घूम-घूम कर बाण ने अपने युग के जीवन
का गहरा अध्ययन किया। वह राजकुलों में पहुँचा जहाँ के व्यवहार अत्यन्त उदार होते
थे, गुरुकुल या उस समय के शिक्षासंस्थानों में भी कुछ काल तक रहा, बहुमूल्य
बात-चीत करने वाले गुणवान् लोगों की गोष्ठियों में बैठा और विदग्ध जनों के बीच पहुँचा।
इस प्रकार युवक बाण को अनुभव के चार स्रोत जीवन के आरम्भ में ही मिल गए।
अनुभवी होकर बाण की चंचल प्रकृति बदल गई। वह वात्स्यायन वंश के अनुरूप गम्भीर
स्वभाव वाला बन गया। बहुत दिनों तक देश-देशान्तरों का चक्कर काट कर वह फिर
अपनी जन्मभूमि प्रीतिकूट को लौटा और अपने बालमित्रों से बड़े स्नेह के साथ मिला।

अपने बन्धु-बान्धवों से मिल कर बाण बड़ा प्रसन्न हुआ। बहुत दिनों तक प्रीतिकूट का
ही आनन्द लेता रहा। एक दिन स्थाण्वीश्वर के महाराज श्रीहर्ष के भाई का भेजा हुआ
मेखलक नाम का दीर्घाध्वग बाण से आकर गर्मी के दिनों में मिला। उस समय भोजन के
पश्चात् बाण अपने घर पर आराम कर रहा था। उसके पारशव भाई (शूद्रा जननी से
उत्पन्न) ने भीतर आकर उसके आगमन की सूचना दी। बाण ने कहा—'उसे शीघ्र अन्दर
लावो।' तब वह दीर्घाध्वग भीतर जाकर बाण के समीप कुछ हट कर बैठा। बाण के पूछने
पर उसने कृष्ण का कुशल-समाचार सुना कर पत्र अर्पित किया। बाण ने पत्र को स्वयं
पढ़ा। फिर मेखलक ने मौखिक सन्देश में कृष्ण की ओर से कहा—'मैं तुमसे बिना कारण
ही अपने बन्धु की तरह प्रेम करता हूं। तुम्हारी अनुपस्थिति में दुर्जन लोगों ने सम्राट् के
कान भर दिए, पर वह सत्य नहीं। किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति ने तुम्हारी बाल-चपलताओं से
चिढ़ कर कुछ इधर-उधर की बात कह दी। अन्य लोगों ने भी ठीक वैसा ही समझा और
कहने लगे। सम्राट् ने ऐसे मूर्खों की एक-सी बात सुन कर अपना मत स्थिर कर लिया।
तुम्हारे विषय में मैंने सम्राट् से निवेदन किया और उन्होंने मेरी बात मान ली। अब अपने
घर पर व्यर्थ समय-यापन करना ठीक नहीं, शीघ्र राजकुल में आओ।'

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( ६ )
यह सुन कर बाण ने उसी चन्द्रसेन को आज्ञा दी—'मेखलक को ले जाकर भोजना-
च्छादन की व्यवस्था कर आराम से ठहराओ ।' तब तक दिन ढल चुका था । बाण संध्यो-
पासन से निवृत्त होकर फिर अपने शयनीय पर आ गए और सम्राट् से मिलने के सम्बन्ध
में एकाकी सोचने लगे—'क्या करूँ ? महाराज ने मुझे कुछ और ही समझ लिया है, मेरे
अकारणबन्धु कृष्ण ने ऐसा संदेश भेजा है, सेवा बहुत कष्टदायिनी है, नौकरी करना मेरे
अनुकूल नहीं, राजकुल अतिगम्भीर और विशाल है, न तो मेरे पूर्वजों का राजकुल से
सम्बन्ध रहा है जिससे प्रेमभाव बना है, न तो मुझमें कुलक्रमागत क्षमता ही है, न तो
पहले राजकुल के द्वारा किए हुए उपकार का स्मरण मुझे आ जाता है, न तो बचपन में
राजकुल से ऐसी मदद मिली जिसका स्नेह मान कर चला जाय, न तो बड़े होने का अब
तक गौरव मिला है, न पहली मेल-मुलाकात की अनुकूलता है, न तो बुद्धि-सम्बन्धी विषयों
में आदान-प्रदान करने का प्रलोभन है, न तो अपनी विद्या के अतिशय प्रदर्शन का कुतूहल
है, न तो अपनी सुन्दर आकृति से मिलने वाले आदर की आकांक्षा है, न सेवावृत्ति के
अनुरूप चापलूसी करने की कला मुझे आती है, न तो मुझमें वैसी चतुराई है कि विद्वानों
की गोष्ठियों में भाग लूँ, न तो धन खर्च करके दूसरों को मुट्ठी में कर लेने की आदत
है, और न तो राजा के प्रिय जनों से मेरा परिचय है और कृष्ण के संदेशानुसार जाना
भी जरूरी है । त्रिभुवनगुरु भगवान् शंकर वहाँ जाने पर सब भला करेंगे ।' यह सोच
कर बाण ने प्रस्थान करने के लिए निश्चय किया ।
दूसरे दिन प्रातःकाल बाण ने स्नान करके उज्ज्वल दुकूल धारण किया और हाथ में
अक्षमाला लेकर प्रस्थानिक सूक्तों और मंत्रपदों को बार-बार दुहराया, फिर देवों के देव
भगवान् शङ्कर की साङ्गोपाङ्ग अर्चना की तथा तिल और घृत की आहुतियों से हवन
सम्पन्न किया । ब्राह्मणों को दक्षिणा में धन दिया । होमधेनु की परिक्रमा की । शुक्ल
अङ्गराग, शुक्ल माल्य, शुक्ल वसन एवं रोचनाचित्रित तथा दूर्वाग्रग्रथित गिरिकर्णिक नामक
पुष्प का कर्णपूर और शिखा में सिद्धार्थक आदि माङ्गलिक द्रव्यों से परिष्कृत होकर बाण
प्रस्थान के लिये तैयार हो गया । माता के समान स्नेह से आर्द्र हृदय वाली पिता की
छोटी बहिन मालती ने बाण के प्रस्थान की माङ्गलिक तैयारी की । गाँव की बांधव-वृद्धाओं
ने आशीर्वाद दिए, परिजनों की बूढ़ी स्त्रियों ने बाण का अभिनन्दन किया, पूजितचरण
गुरुओं ने बाण के प्रस्थान का समर्थन किया, कुलवृद्धों ने उसका सिर सूँघा, शुभ शकुनों
से उसका उत्साह और भी बढ़ा, ज्योतिषियों ने नक्षत्र की गणना की, फिर शोभन मुहूर्त
में जल से पूर्ण कलश की ओर दृष्टिपात करते हुए कुलदेवताओं को प्रणाम कर बाण प्रीतिकूट
से निकल पड़ा ।

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( ७ )
पहले दिन गर्मी में किसी प्रकार धीरे-धीरे चण्डिकायतन-कानन पार कर वह मल्लकूल
नामक गाँव में गया। वहाँ बाण का भाई और हार्दिक मित्र जगत्पति रहता था, उसने
बाण का सत्कार किया। बाण उस दिन वहीं सुख-पूर्वक ठहरा। दूसरे दिन गङ्गा पार करके
यष्टिगृहक नाम के बनगाँव में रात बिताई। फिर राप्ती (अजिरवती) के किनारे मणितारा
नामक गाँव के पास हर्ष के स्कन्धावार (छावनी) में पहुँचा। जो राज-भवन के
सन्निकट ही था।
स्कन्धावार में स्नान, भोजन और विश्राम के पश्चात् जब एक पहर दिन बाकी था और
जब हर्ष भी भोजन आदि से निवृत्त हो चुके थे तब वह मेखलक के साथ राजद्वार के
लिए चल पड़ा। मार्ग में प्रख्यात राजाओं के अनेक शिविर-सन्निवेश मिले। राजद्वार
पर सम्राट् के दर्शन के लिए नाना देशों से सामन्तगण पधारे हुए थे। झुण्ड के झुण्ड
हाथी, घोड़े और ऊँट खड़े थे और हजारों आतपत्रों से वहाँ श्वेतद्वीप का दृश्य था। सब
लोग राजद्वार के राजकीय अनुयायियों से यह पूछते हुए नहीं थकते थे कि बाह्य कक्षा में
उपस्थित होकर सम्राट् कब दर्शन देंगे ? एक ओर एकान्त में बौद्ध, जैन, पाशुपत, संन्यासी,
वर्णी सम्प्रदायों के साधु, सब देशों के लोग, समुद्री तटों के निवासी, म्लेच्छ और समस्त
द्वीपों से संवाद लेकर लौटे हुए दूत एकत्र थे। राजद्वार के इस दृश्य को देखकर बाण के
मन में आश्चर्य हुआ। द्वारपालों ने मेखलक को दूर ही से पहचान लिया। 'क्षण भर
आप यहीं ठहरें' बाण से यह कह कर मेखलक बेरोक भीतर चला गया। थोड़ी देर बाद
वह महाप्रतीहारों के प्रधान दौवारिक पारियात्र के साथ वापस आया। मेखलक द्वारा
परिचित होकर पारियात्र ने बाण को प्रणाम किया और विनयपूर्वक कहा—'देव के दर्शन
के लिए भीतर पधारिए, आप पर देव की प्रसन्नता है।' बाण ने 'मैं धन्य हूँ, जो देव मुझे इस
प्रकार अपने अनुग्रह का पात्र समझते हैं' यह कहते हुए उसके साथ भीतर प्रवेश किया।
तब बाण ने वनायु, आरट्ट, कम्बोज, भरद्वाज, सिन्ध और पारस देश के राजवल्लभ अश्वों से
भरी हुई मन्दुरा देखी। कुछ दूर हट कर बाईं ओर इभधिष्ण्यागार या हाथियों का लम्बा-
चौड़ा बाड़ा मिला। वहाँ बाण ने सम्राट् के मुख्य हाथी दर्पशात को देखा। उसे देखकर
बाण बहुत आश्चर्यित हुआ और सोचने लगा—निश्चय ही इस महागज के निर्माण में बड़े-
बड़े पर्वत परमाणु बनाए गए होंगे, नहीं तो यह गौरव कहाँ से इसमें आता ? इस प्रकार
फिर तीन कक्ष्याओं को पार कर बाण ने मुक्तास्थानमण्डप के सामने वाले आँगन में
सम्राट् हर्ष के दर्शन किए।
तब सम्राट् के सामने आकर बाण ने दाहिना हाथ उठा कर 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण

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( ८ )
किया। हर्ष ने उसे देख कर दौवारिक से पूछा—'यह वही बाण है ?' दौवारिक ने कहा—
'देव का कथन सत्य है, वह यही बाण है।' इस पर हर्ष ने कहा—'मैं इसे तब तक नहीं
देखना चाहता जब तक यह मेरा प्रसाद प्राप्त न कर ले।' यह कह कर उन्होंने अपने पीछे-
बैठे हुए मालवराज के पुत्र (माधवगुप्त ? ) से कहा—'यह भारी भुजङ्ग (आवारा) है।'
बाण राजा के अभिप्राय को नहीं समझ सका। सारी राज-मण्डली में सन्नाटा छा
गया। बाण कुछ देर तक चुप रह कर बोला—'आप इस प्रकार की बात कैसे कहते हैं?
जैसे आपको मेरे विषय में सच्ची बात का पता न हो या मेरा विश्वास न हो, या आपकी
बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, अथवा आप स्वयं लोक के वृत्तान्त से अनभिज्ञ हों। लोगों
के स्वभाव और फैली हुई बात मनमानी और तरह-तरह की होती है। किन्तु श्रेष्ठ लोगों
को ठीक-ठीक देखना चाहिए। मुझे साधारण समझ कर अनाप-शनाप कल्पना न कीजिए।
मैं सोमपान करने वाले वात्स्यायन ब्राह्मणों के वंश में जन्मा हूँ। समय से मेरे यज्ञोपवीत
आदि संस्कार हुए हैं। मैंने अङ्गों के साथ वेद का सम्यक् प्रकार से स्वाध्याय किया है।
अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रों का भी श्रवण मैंने किया है। विवाह के क्षण से लेकर मैं
नियमित गृहस्थ हूँ। तो मुझमें क्या भुजङ्गपना है? मेरी नई अवस्था की कुछ चपलताएँ
अवश्य हैं पर वे ऐसी नहीं जिससे इस लोक या परलोक का कोई विरोध हो। मैं इस बात
को इनकार नहीं करता। मेरे हृदय में इसी बात का बहुत पश्चात्ताप है। हे देव, आप
भगवान् बुद्ध के समान शान्तचित्त, मनु के समान वर्णाश्रममर्यादा के रक्षक और यम के
समान दण्डधर हैं। सातों समुद्रों की करधनी और समस्त द्वीपों की माला से विराजित
पृथिवी पर आपका एकच्छत्र शासन है, तो कौन ऐसा निडर है जो सब प्रकार से दुःखद
अभिनय करने की मन से भी कल्पना करता है ?......समय से स्वयं आप मेरे विषय में
सब कुछ जान लेंगे, क्योंकि बुद्धिमानों का यह स्वभाव होता है कि वे किसी बात में
विपरीत हठ नहीं रखते।' इतना कह कर बाण चुप हो गया। सम्राट् ने भी 'मैंने ऐसा ही
सुना था' बस इतना ही कहा। लेकिन बातचीत और आसन-दान आदि के प्रसाद से उसे
अनुगृहीत नहीं किया। केवल स्नेह से भरे अमृत की वर्षा करने वाले दृष्टिपातमात्र से
उसको नहलाते हुए उन्होंने अपने अन्तरतम की प्रीति प्रकट की। जब सूर्य अस्त होने
लगा तो सम्राट् राजसमूह से विदा लेकर महल के अन्दर चले गए।
बाण वहाँ से निकल कर अपने निवास-स्थान स्कन्धावार में लौट आया। तब वह
अपने मन में सोचने लगा—'सचमुच देव हर्ष बड़े उदार हैं, क्योंकि मेरे बाल्यकाल की
चपलताओं से फैले हुए जनापवाद को सुनकर कुपित होने पर भी मन में मेरे प्रति स्नेह

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( ६ )
अवश्य रखते हैं। मैं उनकी आँखों पर चढ़ा हुआ ( अक्षिगत, अर्थात् कोपभाजन ) होता
तो कैसे दर्शन देने की कृपा करते । वह मुझे गुणी देखना चाहते हैं। बड़ों की यही रीति
है कि छोटों को बिना मुख से कहे ही केवल व्यवहार से विनय सिखा देते हैं। मुझे
धिक्कार है यदि अपने ही दोषों से अन्धा होकर और केवल अनादर से दुःखी होकर मैं ऐसे
गुणवान् राजा के विषय में कुछ सोचने लगूँ। अब मैं सर्वथा वही करूँगा जिससे समय से
वे ठीक मुझे पहचान लें।' बाण ने ऐसा निश्चय किया और दूसरे दिन प्रातःकाल वह
स्कन्धावार से निकल कर मित्रों और रिश्तेदारों के घर में ठहरा। तब तक सम्राट् स्वयं
उसके स्वभाव से परिचित होकर उस पर प्रसन्न हो गए और फिर वह राजभवन में
आकर जम गया। थोड़े ही दिनों में सम्राट् उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसे अपने
प्रसादजनित सम्मान, प्रेम, विश्वास, धन-सम्पत्ति, परिहास और प्रभाव की पराकाष्ठा पर
पहुँचा दिया।
इस प्रकार बाण सम्राट् हर्ष से पर्याप्त सम्मान पाकर किसी समय शरत्काल के आरम्भ
में बन्धुओं को देखने की उत्कण्ठा से अपनी जन्म-भूमि प्रीतिकूट आया। बाण के भाई-
बन्धु उसकी प्रशंसा करते हुए उसके स्वागत में निकल पड़े। सबसे मिलकर बाण बहुत
प्रसन्न हुआ। उसने सबसे पूछा—'आप लोग सुखपूर्वक तो रहे ? यज्ञ का कार्य चल रहा
है ? प्रतिदिन वेदाभ्यास तो अविच्छिन्न है न ? व्याकरण के सम्बन्ध में शास्त्रार्थ तो होते
रहते हैं ? काव्य की चर्चा तो बराबर रहती है ?' तब उन्होंने उससे कहा—'हम लोग
सर्वथा कुशल से हैं। अपनी शक्ति और विभव के अनुसार समय से सब लोग ब्राह्मण के
उचित क्रिया-कलाप करते हैं। जब तुम परमेश्वर महाराज हर्ष के पार्श्वभाग में वेत्रासन
पर स्थित हो तो विशेष रूप से हम लोग प्रसन्न हैं।' इस प्रकार की अनेक बातों से मन
बहलाता हुआ बाण उनके साथ देर तक ठहरा। मध्याह्न में उठ कर वह स्नानादि से निवृत्त
हुआ। भोजन के पश्चात् जब वह बैठा तो सब के सब जुट आए और उसे घेर कर बैठ
गए। इसी बीच सुदृष्टि नामक बाण का पुस्तक-वाचक आ गया और उसके कुछ दूर पर
रखी हुई वेत्रपीठिका पर बैठ गया। क्षणभर ठहर कर तत्काल उसने सूत की बेठन खोल
दी। पुस्तक को उसने सरकंडों के बने पीढ़े पर रख दिया। पीछे समीप में बैठे हुए मधुकर
और पारावत नामक वंशी बजाने वाले बाण के दो मित्रों ने जब अवकाश दिया, तब
सुदृष्टि वायुपुराण का पाठ करने लगा।
जब सुदृष्टि वायुपुराण का पाठ कर रहा था, उसी समय सूचीबाण नामक बन्दी ने
दो आर्याछन्दों का गान किया। उसने कहा कि वायु-पुराण हर्ष के चरित से अभिज्ञ प्रतीत

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( १० )
होता है । आर्याओं को सुन कर बाण के चार चचेरे भाइयों—गणपति, अधिपति, तारापति
और श्यामल ने एक दूसरे की ओर देखा । तत्पश्चात् उन चारों में सबसे छोटा बाण का
अत्यन्त प्रिय श्यामल बोला—'तात बाण, प्रातःस्मरणीय, पुण्यों के राशि देव हर्ष का चरित
पूर्वपुरुषों की वंशपरम्परा के साथ हम सुनना चाहते हैं । बहुत दिनों से हम लोगों की
यह इच्छा बनी हुई है । अतः आप कहें । यह भार्गववंश पुण्यवान् राजर्षि के पवित्र
चरित्र को सुनकर और पवित्र बन जाय ।' बाण ने हँस कर अपनी असमर्थता प्रकट करते
हुए दूसरे दिन हर्षचरित का वर्णन आरम्भ करने के लिए निश्चय किया और संध्योपासन
के लिए शोण के तीर पर चले गए ।
इस प्रकार बाण ने दूसरे दिन हर्ष के पूर्व-पुरुषों की वंशपरम्परा के साथ हर्षचरित
का वर्णन आरम्भ किया । बाण के जीवन के सम्बन्ध में इसके अतिरिक्त कोई वृत्तान्त
उपलब्ध नहीं होता ।
हर्षचरित के अतिरिक्त बाण की दूसरी कृति कादम्बरी है । कादम्बरी संस्कृत गद्य-
साहित्य के चरम-उत्कर्ष का एक उज्ज्वल उदाहरण है । कादम्बरी के आरम्भ में भी
बाण ने संक्षेप में अपनी वंशपरम्परा दी है। कादम्बरी की वंशपरम्परा में कुबेर
के बाद अर्थपति का उल्लेख आता है । बीच में पाशुपत का नाम छूट गया है । हर्ष की
मृत्यु के पश्चात् बाण कन्नौज से प्रीतिकूट लौट आए । वहीं इन्होंने अपने दोनों ग्रन्थों को
लिखा । हर्षचरित से हर्ष के जीवनवृत्त के सम्बन्ध की आकांक्षा की पर्याप्त मात्रा में पूर्ति ,
नहीं होती । बाण जैसे ग्रन्थ को पूरा लिखने में उदासीन हो गए । कादम्बरी को भी वे
अपूर्ण छोड़ गए । सौभाग्य से उनके सुयोग्य पुत्र ने उसे पूरा किया । कुछ लोग उनके पुत्र
का नाम भूषणबाण या भूषणभट्ट बतलाते हैं । कादम्बरी की कुछ हस्तलिखित प्रतियों में
'पुलिन' या पुलिन्द नाम मिलता है । धनपाल की तिलकमञ्जरी में श्लेष से पुलिन्द ही
का उल्लेख है—
केवलोऽपि स्फुरन्बाणः करोति विमदान् कवीन् ।
किं पुनः क्लृप्तसन्धानं पुलिन्दकृतसन्निधिः ॥
( ति. म. २६ श्लोक )
बाण के समकालीन कवियों में मातंगदिवाकर और मयूर का उल्लेख आता है ।
अनुश्रुति के अनुसार मयूर जिन्होंने सूर्यशतक का निर्माण किया है, बाण के श्यालक
बताए जाते हैं । बाण ने अपने विवाह का उल्लेख सम्राट् हर्ष से मिलने के प्रसंग में ही
किया है—'दारपरिग्रहादम्यागारिकोऽस्मि ।' इसके अतिरिक्त उनके वैवाहिक जीवन के
सम्बन्ध में कोई प्रामाणिक तथ्य प्राप्त नहीं है ।

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( ११ )
बाण की रचनाएँ
बाण की प्रामाणिक रचनाओं में हर्षचरित और कादम्बरी के अतिरिक्त कोई दूसरी
नहीं है। यों तो उनके नाम पर कई अन्य रचनाओं का भी उल्लेख आता है। चण्डीशतक
बाण का निर्मित समझा जाता है। इसमें १०० श्लोकों में बाण ने भगवती दुर्गा की स्तुति की
है। पार्वती-परिणय नाटक को भी कुछ लोगों ने बाण ही का निर्माण समझा था। परन्तु
कीथ ने स्पष्ट कर दिया कि यह नाटक १५ वीं शताब्दी के कवि वामनभट्ट बाण की
रचना है। वामनभट्ट बाण तैलंगदेशीय वत्सगोत्री ब्राह्मण थे। नलचम्पू के टीकाकार
चण्डपाल और गुणविनयगणि के अनुसार बाण ने मुकुटताड़ितक नाटक की भी रचना
की थी, पर यह ग्रन्थ अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है। जहाँ तक बाण की शैली और
कल्पना का क्षेत्र है उसकी भूमिका में बाण के हर्षचरित और कादम्बरी के अतिरिक्त ये
अन्य कृतियाँ किसी अंश में भी संगत नहीं बैठतीं। अतः प्रामाणिक तथ्य के अभाव
में यह मान लेना ही ठीक है कि इन दोनों के अतिरिक्त बाण की कोई अन्य
रचना नहीं है।
हर्षचरित
हर्षचरित एक आख्यायिका है। बाण ने ग्रन्थ के आरम्भ में स्वयं कहा है—'करोम्य-
ख्यायिकाम्भोथौ जिह्वाप्लवनचापलम्' (श्लोक २०)। आचार्यों ने आख्यायिका का जो
स्वरूप निर्धारित किया है उसका समन्वय विशेष रूप से हर्षचरित में मिल जाता है।
प्रसंगतः हम कथा और आख्यायिका के भेद की चर्चा करेंगे। हर्षचरित एक ऐतिहासिक
काव्य है। यह कहा जा सकता है कि संस्कृत-साहित्य में ऐतिहासिक काव्य लिखने का
शुभारम्भ बाण के द्वारा ही हुआ। प्राचीन कवि ऐतिहासिक पुरुषों के चरित को
लेकर काव्य का निर्माण करने में सम्भवतः अपनी हीनता समझते थे। सामान्य व्यक्ति
को काव्य का नायक बनाकर लिखना उनके विचार में शोभन न था। बाण ने हर्षचरित
लिख कर इस कलंक को मिटाने का प्रथम प्रयास किया। आगे चलकर कई ऐतिहासिक
पुरुषों के जीवनवृत्त पर कवियों ने अनेक चरित-काव्य लिखे। हर्षचरित आठ उच्छ्वासों
में विभक्त है। प्रथम सवा दो उच्छ्वासों में बाण ने आत्मकथा लिखी है और शेष में
सम्राट् हर्षवर्धन का चरित है। आरम्भ हर्ष के वंश-प्रवर्तक पुष्पभूति के वर्णन से किया
गया है। हर्ष के पिता का नाम प्रभाकरवर्धन और माता का यशोवती था। उनके बड़े
भाई का नाम राज्यवर्धन था। राज्यवर्धन का जन्म ५८८ ई० में हुआ। दो वर्ष के बाद

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हर्ष उत्पन्न हुए तथा तीन वर्ष के बाद राज्यश्री का जन्म हुआ। राज्यश्री का विवाह
ग्रहवर्मा से हुआ। ग्रहवर्मा मौखरि क्षत्रिय एवं अवन्तिवर्मा का पुत्र था। हूणों द्वारा
राज्य के उत्तर में आक्रमण किए जाने पर राज्यवर्धन एक बड़ी सेना लेकर उन्हें रोकने के
लिए गए। राज्यवर्धन लौटे न थे कि इधर प्रभाकरवर्धन का देहान्त हो गया। हर्ष की
माता यशोवती पति की मृत्यु होने से पूर्व ही चिता में बैठ कर सती हो गई। इधर
मालवा के राजा ने कन्नौज पर आक्रमण कर दिया। ग्रहवर्मा को मार कर राज्यश्री
मालवाधिप के कैद में आ गई । राज्यवर्धन ने हर्ष को राज्य का भार देकर
शत्रु के विरुद्ध प्रयाण किया। उन्होंने मालवराज को परास्त कर दिया, परन्तु उसके
सहायक गौडाधिप ने धोखे से उन्हें मार डाला। हर्ष को बड़े भाई की असामयिक मृत्यु से
बहुत क्षोभ हुआ। प्रतिशोध के लिये उन्होंने प्रस्थान किया। मार्ग में उन्हें दिवाकरमित्र
नामक बौद्ध भिक्षु द्वारा अपनी बहन राज्यश्री का पता लगा जो बन्दीगृह से छूट कर
विन्ध्याटवी में भाग निकली थी। राज्यश्री के मिलने के बाद हर्षचरित समाप्त हो
जाता है।
इस प्रकार यह एक ऐतिहासिक तथ्य बाण की रचना में अलंकृत काव्यमय शैली में
आया है। जगह-जगह पर अलौकिक पात्रों और पौराणिक कथाओं का भी उपयोग किया
गया है। किसी घटना के तिथिक्रम का उल्लेख नहीं है। कुछ ऐतिहासिक पात्रों के नाम
का भी उल्लेख नहीं है। राज्यवर्धन को मारने वाले गौडाधिप का हर्षचरित में नामोल्लेख
नहीं किया है। इन कारणों से हर्षचरित के ऐतिहासिक महत्त्व के कम होने पर भी हर्ष के
समकालीन युग की सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों के अध्ययन
के लिए हर्षचरित से बढ़ कर कोई दूसरा सहायक ग्रन्थ नहीं है। किसी का कहना कि
'हर्षचरित सभ्यता का विश्वकोश है' किसी अंश में अत्युक्ति नहीं। समकालीन संस्थाओं
का चित्र इस तरह हर्षचरित में निखर उठा है। हर्षचरित को अजन्ता के कलामण्डप से
सन्तुलित करना भी सर्वोशतः ठीक है। ह्वेनसांग के संस्मरणों और हर्षचरित के घटना-
क्रमों का ठीक-ठीक मेल हो जाने से हर्षचरित के महत्त्व का पता चलता है। इसके अतिरिक्त
संस्कृत-साहित्य के इतिहास की दृष्टि से भी हर्षचरित का महत्त्व है। आरम्भ में बाण ने
महाभारत, वासवदत्ता एवं बृहत्कथा नामक ग्रन्थों की तथा भास, कालिदास, प्रवरसेन,
भट्टार हरिचन्द्र एवं आढ्यराज नामक कवियों की प्रशंसा की है। बाण के स्थिति-
काल का निश्चय हो जाने से अन्य कवियों के स्थितिकाल के निर्णय में बड़ी सहायता
मिलती है।
हर्षचरित बाण की प्रथम रचना है। यद्यपि भाषा और भाव की दृष्टि से कादम्बरी

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की तरह प्रौढ़ता हर्षचरित में नहीं, तथापि इन दोनों की अभिव्यक्ति-सामर्थ्य में अपूर्णता
भी कोई अभिलक्षित नहीं होती। बाण की स्फुरत्कलालापविलासकोमला कविता-नववधू
कादम्बरी में जो कौतुकाधिक राग उत्पन्न करती है, हर्षचरित में विवाह की योग्यता होने
पर भी अविवाहिता होने के कारण अज्ञातयौवना-सी लगती है। सम्भव है इसी कारण
वह कादम्बरी की तरह सहृदय-जनों में कौतुकाधिक राग उत्पन्न न कर सकी हो।
स्थान-स्थान पर बाण की अद्भुत वर्णनशक्ति का पूर्वाभास हर्षचरित में मिल जाता है।

पात्रालोचन

[ अब यहाँ संक्षेप में हर्षचरित के पात्रों के सम्बन्ध में जानना आवश्यक है। मुख्य पात्र
के रूप में सरस्वती, सावित्री, बाण, पुष्पभूति, भैरवाचार्य, प्रभाकरवर्धन, यशोवती,
राज्यवर्धन, हर्षवर्धन तथा राज्यश्री के चरित्र हर्षचरित में निर्दिष्ट हैं। अतः उन्हीं के
सम्बन्ध में अग्रिम वक्तव्य है ]

सरस्वती और सावित्री—सरस्वती वाणी की अधिष्ठात्री देवी और ब्रह्माजी की कुमारी
कन्या थी। विद्या की देवी होने के कारण और बालभाव की चपलता से अंशतः उसमें
कुछ अभिमान की मात्रा भी थी। दुर्वासा के स्वरहीन सामगान पर वह हँस पड़ी जिससे
उस क्रोधान्ध ऋषि के शाप से ग्रस्त हुई। दुर्वासा ने उसकी विद्याजनित उन्नति को चूर
करने के लिए नीचे मर्त्यलोक में चले जाने का शाप दे डाला। परन्तु सरस्वती ने ऋषि
के शाप को शिर झुका कर मान लिया। उसकी प्रिय सखी सावित्री ऋषि के इस अन्याय
को न सह सकी और स्वयं प्रतिशाप देने के लिए उद्यत हो गई। तब सरस्वती ने उसे
रोका और कहा—'सखी, तू अपना क्रोध शान्त कर, संस्कारशून्य बुद्धि होने पर भी ब्राह्मण
सर्वथा आदरणीय है।' सरस्वती की इस वाणी में उसकी अपार सहिष्णुता निहित है।
वह निरपराध होने पर भी कुछ नहीं बोलती और सावित्री को साथ लेकर मर्त्यलोक के
लिए ब्रह्मलोक से प्रस्थान कर देती है। ब्रह्मा जी ने उसके शाप को पुत्र का मुख देखने
की अवधि दी। सावित्री ने उसे बहुत ढाढस दिया और वे दोनों शोण के तट पर निवास
करने लगीं। वहीं पहुँचे हुए दधीच से सरस्वती का प्रणय हो गया। सरस्वती की अपेक्षा
सावित्री अधिक प्रगल्भ थी। सरस्वती मुग्धा और सावित्री प्रगल्भा थी। दधीच के प्रथम
दर्शन से आकृष्टहोने पर भी सरस्वती ने अपना प्रणय-भाव बिलकुल छिपाए रखा। उसके
चले जाने पर शून्य-शून्य सी रहने लगी। जब दधीच का कुशल-समाचार लेकर मालती
आई तब एकान्त में सरस्वती ने दधीच के प्रति अपना अनुराग व्यक्त किया। दधीच को
लाने के लिए मालती के चले जाने पर उसने सावित्री से यह रहस्य प्रकट कर दिया। इस

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प्रकार सरस्वती एक सहिष्णु, लज्जाशील नारी के रूप में चित्रित है और सावित्री का
चित्रण एक संवेदनशील नारी के रूप में हुआ है।
बाण—हर्षचरित के रचयिता बाण भी एक मुख्य पात्र हैं। मानना तो यह चाहिए
कि हर्षचरित दो विभागों में विभक्त आख्यायिका है। प्रथम भाग के मुख्य पात्र स्वयं
महाकवि बाण हैं और द्वितीय भाग के सम्राट् हर्षवर्धन । बाण ने अपने चरित्र का जितनी
धार्मिकता और स्पष्टता से चित्रण किया है उतना शायद ही हर्ष के चित्रण में हो। यद्यपि
यह बात नहीं फिर भी कवि ने अपना दोष और गुण सब एक तटस्थ पर्यवेक्षक के नाते
कह डाला है। बाण की तटस्थता इसी से व्यक्त होती है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में
'उत्तम पुरुष' के स्थान पर अन्य पुरुष का ही प्रयोग किया है। 'मैं उत्पन्न हुआ' के स्थान
पर 'बाण उत्पन्न हुआ, बढ़ा और यौवन के आरम्भ में आवारा (इत्वर) बन गया' आदि
साधारण पात्र के रूप में ही बाण ने अपने को रखा है। सम्भव था अगर उत्तम पुरुष 'मैं'
का प्रयोग करते तो अपने दोष-पक्ष के उल्लेख में इतनी स्पष्टता न होती। छोटी अवस्था
में ही बाण की माता मर गई। पिता ने ही किसी प्रकार पाल-पोस कर बढ़ाया। दुर्भाग्य
से जब बाण चौदह वर्ष का हुआ तभी उसके पिता भी दिवंगत हो गए। अब मातृ-पितृहीन
बाण को सुधारने वाला कोई नहीं मिला। मिले वही नाचने-गाने के शौकीन संगी-साथी।
उनके साथ रहने से बाण की स्वतन्त्रता बढ़ती गई और फलतः यौवन के आरम्भ में ही वह
आवारा (इत्वर) हो गया। इन्हीं साथियों के साथ यहाँ-वहाँ मारा-मारा फिरने लगा।
कभी किसी नगर में जाकर नाटक खेलता, कभी किसी नगर में। इस इत्वरवृत्ति ने
यद्यपि बाण को पितृ-पितामह द्वारा अर्जित विभव एवं अविच्छिन्न विद्या-प्रसंग से वंचित
कर दिया तथापि बाण ने अपने उसी भ्रमणशील जीवन में, जब उसकी लोग खिल्ली उड़ा
रहे थे, अनुभव के चार स्रोत पकड़ लिए थे। उसके अनुभव के प्रथम स्रोत राजकुल थे,
उनमें घूम-घूम कर वह उनके प्रत्येक कर्मचारी से मिलता और वहाँ के उदार व्यवहारों से
परिचित होता। दूसरा स्रोत उस समय के गुरुकुल थे, वहाँ जा-जा कर अध्ययन-अध्यापन
की विधियों को उसने खूब समझ लिया। तीसरा स्रोत गुणी जनों की गोष्ठियाँ मिलीं,
जिनमें उसने अनमोल बातें सुनीं। चौथा स्रोत सूझ-बूझ वाले विदग्ध जनों की मंडलियाँ
थीं, उसने उनमें भीतर घुस कर थाह ली। इस प्रकार वह अपने जीवन के अल्हड़पन
और घुमक्कड़ी प्रवृत्ति से अपनी आँखों देखा हुआ लोकजीवन का चौचक अनुभव पाकर
अपने घर वापस आया। तब उसके अन्दर जो पुस्तैनी प्रतिभा थी वह चमक उठी।
बाण स्वभावतः अपने भाई-बन्धुओं में हिल-मिल जाता था। उसे अपने गाँव में अपने
लोगों के बीच मोक्ष का आनन्द मिलता था। वह सम्राट् के पास से भी उस आनन्द के

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लिए चला आता था। अपनी इस प्रकृति से बाण बहुत अधिक जनप्रिय हो गया था।
उसमें नम्रता भी खूब थी। अपने बड़ों के सामने झुक जाता था। उसने अपनी
आरम्भिक जीवन की समस्त बुराइयों को जड़ से खोद कर निकाल दिया था और अनुभवी
होने के बाद स्वयं अपना निर्माण किया। यद्यपि बाण ने कादम्बरी में भर्तु या भत्सुं
नामक अपने गुरु का उल्लेख किया है, तथापि यह नहीं विदित होता कि बाण के जीवन के
निर्माण में भर्तुशर्मा का कितना हाथ था। बाण के व्यक्तित्व में दो बातें बड़े महत्त्व की थीं,
एक तो वह जन्म से ही स्वभावगम्भीर अर्थात् विस्तृत मेधाशक्ति वाला था, दूसरे वह
प्रत्येक वस्तु की जानकारी प्राप्त करने के लिए सदा उत्सुक रहता था। इन दोनों बातों
से बाण को मार्गस्थ होने में बड़ी सहायता मिली।

बाण के व्यक्तित्व की एक और विशेषता है, वह है उसका स्वाभिमान। वह जितना
नम्र था उतना ही स्वाभिमानी भी। वह किसी की परवा नहीं करता था। उसे क्या पड़ी
थी कि वह राजकुल में प्रवेश पाकर सेवा में हाजिरी बजाता और सेवकों जैसी चापलूसी
करता ? जब हर्ष के भाई कृष्ण ने अपने दूत द्वारा संदेश भेजा कि बिना समय गँवाए
राजकुल में पधारें तो बाण बहुत सोच में पड़ गया। कृष्ण के दूत ने संदेश में यह भी
कहा कि सेवा में झंझट सोच कर उदासीन न होना चाहिए। इससे प्रतीत होता है कि
बाण के स्वाभिमानी व्यक्तित्व से कृष्ण खूब परिचित थे। उन्हें डर था कि बाण कहीं सम्राट्
के पास आना अस्वीकार न कर दें। बाण से डाह करने वालों ने उसकी आरम्भिक
चाल-चलन की बात लेकर सम्राट् के कान भर दिये थी, जिसका परिमार्जन बड़े
प्रयत्न से कृष्ण ने कर दिया। बाण अपने अकारणबन्धु कृष्ण का संदेश सुन कर बहुत
सोच में पड़ गए। राजसेवा उन्हें कष्टप्रद लगती थी। राजदरबार में बड़े खतरे नजर
आते थे। न उनके पुरखों में किसी की इस तरफ रुचि रही, न उनके ही मन में ऐसी
बात थी कि वे राजकुल में जाकर बुद्धि-सम्बन्धी विषयों का आदान-प्रदान करें। न विद्वानों
की गोष्ठियों में बैठने की विलक्षण चतुराई ही उनके पास थी। चापलूसी से भी उन्हें बड़ी
चिढ़ थी। ऐसी स्थिति में भी उन्होंने जाने का निश्चय कर लिया। स्वाभिमान उन्हें
रोकता था, परन्तु जब यह ध्यान में आता कि सम्राट् कुछ ऐसा-तैसा मुझको समझ गए
हैं तो उनका स्वाभिमान उनको चलने के लिए ही प्रेरित करने लगा। स्वाभिमानी बाण
को यह कैसे सह्य होता कि दूसरा उसे हीन दृष्टि से देखे, जब कि वह हीन नहीं। अपनी
अहीनता का सम्यग्ज्ञान होने पर भी बाण में अहंकार का लेश भी न था। उन्हीं के निर्देश
से पता चलता है कि वे रूप-सम्पन्न थे, पर उनके मन में सुन्दर रूप से मिलने वाले आदर
२ ह० मू०

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( १६ )

की इच्छा न थी। उनमें प्रगाढ़ शास्त्रीय ज्ञान था लेकिन बुद्धि-सम्बन्धी विषयों पर लड़-
झगड़ के लिए दिखावा करने जाना वह सर्वथा व्यर्थ समझते थे।
जब सम्राट् हर्ष ने प्रथम बार बाण को देख कर हँसते हुए 'महानयं भुजङ्गः' कह डाला
तो बाण अपनी स्वतंत्र प्रकृति और स्वाभिमान से संवलित ब्रह्मतेज का संवरण न कर सके।
थोड़ी देर तक चुप रह कर उन्होंने पूछ ही डाला—'का मे भुजङ्गता ?' बाण का व्यक्तित्व
इस प्रकरण में जितना स्पष्ट खुल सका है उतना अन्यत्र नहीं। उस समय बाण को यह
सुध-बुध न थी कि वे महाराजाधिराज हर्षवर्धन के सामने खड़े हैं। उनका स्वाभिमान
तत्काल प्रज्वलित हो उठा था। जब कि बाण में अब कोई भुजंगपना न रह गया था तब
भी दूसरों के कान भर देने से केवल ऐसी निराधार कल्पना कर देना कहाँ तक उचित
था। उसने हर्ष से स्पष्ट कह दिया कि 'आप नेय की तरह बोलते हैं अर्थात् आपकी बुद्धि
दूसरों पर निर्भर करती है। आप मुझे साधारण व्यक्ति मत समझिए। मैंने वात्स्यायन
ब्राह्मणों के कुल में जन्म लिया है। सांगवेद का स्वाध्याय और अनेक शास्त्र भी सुने हैं।
विवाह हो जाने के बाद नियमित गृहस्थ हूँ। (इससे यह पता चलता है कि बाण उस
समय तक विवाहित हो गए थे और तभी से उनके जीवन में स्थिरता हुई)। यौवन के
आरम्भ में अवश्य ही मुझ में कुछ चपलताएँ थीं, इससे मैं इनकार न करूँगा, किन्तु वे
ऐसी थीं जिनका इस लोक या उस लोक में विरोध न हो।' बाण की इस वाणी में सचमुच
उनका ब्रह्मतेज निखर उठा है। फिर बाण अपनी नम्रता का अवलम्बन ले लेते हैं। बाण
ने अपने आप को खूब पहचाना था। वे अपनी कमजोरियों को अच्छी तरह समझ गए
थे और उन्हें हटाने का प्रयत्न भी करते थे। जैसा कि उन्होंने स्कन्धावार में दरबार से
लौटने पर सोचा था कि मुझे धिक्कार है यदि मैं अपने दोषों के प्रति अन्धा होकर केवल
अनादर की पीड़ा अनुभव करके इस गुणी सम्राट् के प्रति कुछ और सोचने लगूँ। अवश्य
ही मैं वह करूँगा जिससे यह कुछ समय बाद मुझे ठीक जान ले।
पुष्पभूति और भैरवाचार्य—पुष्पभूति ही हर्ष के वर्धनवंश के आदि संस्थापक थे।
वे शिव के अनन्य उपासक थे। उनके प्रभाव से घर-घर में शिव की पूजा होती थी। राजा
पुष्पभूति बेताल-साधना भी करते थे इस कार्य में उनका सहायक भैरवाचार्य नामक
दाक्षिणात्य महाशैव था। भैरवाचार्य से मिलन का वृत्तान्त यह है कि एक दिन उस राजा
के पास एक परिव्राट् आया। वह भैरवाचार्य का मुख्य शिष्य था। राजा के पूछने पर कि
'भैरवाचार्य कहाँ हैं?' उस शिष्य ने 'सरस्वती के किनारे शून्यायतन में ठहरे हैं'
यह कह कर पाँच चाँदी के कमल भैरवाचार्य की ओर से अर्पित किए। दूसरे दिन
पुष्पभूति ने पुराने देवी के मन्दिर के उत्तर बिल्ववाटिका में आसन लगाए भैरवाचार्य

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को साक्षात् शिव की तरह देखा। भैरवाचार्य से राजा की मित्रता हो गई। भैरवाचार्य के
शिष्य ने ब्रह्मराक्षस के हाथ से छीन कर लाई हुई अट्टहास नामक तलवार राजा को अर्पित
की। राजा ने भैरवाचार्य की बेताल-साधना में बड़ी सहायता की। फलतः श्रीकंठ नाग
को हरा कर उसने लक्ष्मी को प्रसन्न किया। प्रसन्न लक्ष्मी द्वारा वर माँगने के लिए प्रेरित
किए जाने पर पुष्पभूति ने अपने प्रिय सुहृद् भैरवाचार्य की सिद्धि के लिए ही वर माँगा।
इससे पुष्पभूति की निःस्वार्थपरता व्यक्त होती है। लक्ष्मी ने उसे देकर राजा की शिव-
भट्टारक के प्रति अनन्य भक्ति देखकर वरदान में यह भी कहा—'तुम महान् राजवंश के
संस्थापक होगे जिसमें हरिश्चन्द्र के समान सर्वद्वीपों का भोक्ता हर्ष नाम का चक्रवर्ती जन्म
लेगा।' भैरवाचार्य विद्याधर के शरीर को प्राप्त हुआ। उसने राजा का बहुत बड़ा उपकार
माना। इस प्रकार पुष्पभूति के रूप में एक ऐसे व्यक्ति का चित्रण किया गया है जो परोप-
कार में ही जीवन को लगा देता है और स्वप्न में भी स्वार्थ का चिन्तन नहीं करता।
प्रभाकरवर्धन और यशोवती—पुष्पभूति के वंश में प्रभाकरवर्धन बड़ा प्रतापी
राजा हुआ। उसने सिन्धु, गान्धार, गुर्जर, लाल, मालव देशों पर विजय प्राप्त की थी।
हूणरूपी हिरन के लिए वह केसरी था। इस प्रकार वह स्थाण्वीश्वर के छोटे से राज्य
को बढ़ा कर महाराजाधिराज की पदवी से विभूषित हुआ। इसी कारण उसका दूसरा
नाम प्रतापशील था। प्रभाकरवर्धन अत्यन्त पराक्रमी होते हुए भी दयावान् था।
उसने मालवा के राजा के मारे जाने पर उसके अनाथ कुमारों के साथ मृदु व्यवहार
किया। वह सूर्य का भक्त था। उसकी रानी यशोवती थी। हर्षचरित में यशोवती के
चरित्र का चित्रण एक भारतीय पतिव्रता के रूप में हुआ है। रानी यशोवती के गर्भ से
ही राज्यवर्धन, हर्षवर्धन और राज्यश्री ने जन्म लिया। प्रभाकरवर्धन ने राज्यश्री
का विवाह बड़ी धूम-धाम से मौखरिवंशज अवन्तिवर्मा के ज्येष्ठ पुत्र ग्रहवर्मा के साथ
किया। राजा प्रभाकरवर्धन ने अपने योग्य पुत्र राज्यवर्धन को हूणों से युद्ध करने के
लिए भेजा। उसके पीछे-पीछे १४-१५ वर्ष की आयु वाला हर्ष भी कुछ पड़ावों तक गया, .
पर वह शिकार खेलने की रुचि से हिमालय की तराइयों में रुक गया। अचानक पिता की
बीमारी का समाचार पाकर हर्ष वहाँ से लौट आया। हर्ष के आने पर पति के मरने के
पूर्व ही रानी यशोवती ने अग्नि में प्रवेश कर भारतीय नारी के आदर्श का उज्ज्वल चित्र
प्रस्तुत किया। बाद में प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हुई।
राज्यवर्धन—एक आज्ञाकारी पुत्र, स्नेहशील भाई और शूर योद्धा के रूप में
राज्यवर्धन का चित्रण किया गया है। वह पिता की आज्ञा पाते ही हूणों के साथ युद्ध
करने के लिये चला जाता है। बालक हर्ष भी कुछ पड़ावों तक उसके साथ चलता है,

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पर हिमालय की तराइयों में आखेट के लिये रुक जाता है। जब तक राज्यवर्धन परदेश
से नहीं लौटा था, इसी बीच प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो गई और माता यशोवती भी न
रहीं। हर्ष ने राज्यवर्धन के पास खबर भिजवा दी। इधर हर्ष के मन में बड़ी भारी
चिन्ता यह होने लगी कि पिताजी का समाचार सुनकर बड़े भैया (आर्य) भी कहीं
बुद्ध की तरह आचरण न कर बैठें। कहीं राजर्षि राज्यवर्धन आश्रम में प्रविष्ट न हो जायें ?
कहीं वह पुरुष-सिंह किसी गुफा में न चला जाय। अनाथ पृथिवी को देखकर कहीं निरन्तर
अश्रुधारा प्रवाहित न करने लगें। प्रथम बार इस आपत्ति से विह्वल होकर आत्मचिन्तन
में न लग जायें। संसार को अनित्य समझकर पास आती हुई राज्यलक्ष्मी से विरक्त न
हो जायें। कहीं दुःखज्वाला का शमन करने के लिये जल में न डूब जायें। यहाँ लौटने
पर राजाओं के कहने पर पराङ्मुख न हो जायें। इस प्रकार हर्ष अपने मन में कल्पना
करते हुए राज्यवर्धन की बाट देखते रहे। भ्रातृप्रेम से अभिभूत हर्ष के मन के ये भाव
राज्यवर्धन के शम-प्रधान व्यक्तित्व की ओर संकेत करते हैं। लगता है राज्यवर्धन आरम्भ से
ही भगवान् बुद्ध के धर्म से आस्थावान् था। जैसा कि एक ताम्रपत्र के अनुसार उसे परम-
सौगत भी कहा गया है। हर्ष को भी उपर्युक्त चिन्ता में भी राज्यवर्धन में विरक्त होने के
पश्चात् बुद्ध के जीवन की झलक मिलती है। हर्ष को यह सन्देह था कि बुद्ध के समान
वे भी कहीं न चले जायें।
पितृ-शोक से अभिभूत होकर राज्यवर्धन जब लौटा तब यही घटना घटी। हर्ष से
उसने कहा—'तुम राज्यभार ग्रहण करो, मैंने आज शस्त्र छोड़ा।' और तलवार
हाथ से फेंक दी। राज्यवर्धन के इस कथन में उसकी निःस्पृहता, पितृप्रेम, भ्रातृप्रेम आदि
समस्त सद्प्रवृत्तियाँ एक साथ उमड़ पड़ीं हैं। इसी अवसर पर एक विचित्र घटना घट जाती
है। एक परिचारक ने आकर खबर दी कि सम्राट् के मरने की खबर सुनकर दुरात्मा मालव-
राज ने ग्रहवर्मा को जान से मार डाला और राज्यश्री को कान्यकुब्ज के कारावास में डाल
दिया। इस समाचार से तत्काल राज्यवर्धन का शोक जाता रहा, उसके स्थान पर क्रोध
प्रतिष्ठित हो गया। उसने हर्ष से कहा—'तुम राज्य सँभालो, मैं मालवराज के कुल का
नाश करने चला।' हर्ष ने जब यह कहा कि 'आर्य के प्रसाद से पहले भी मैं कभी वञ्चित
न रहा। कृपाकर मुझे भी साथ ले चलें।' तो राज्यवर्धन ने कहा—'तुम ठहरो, मुझे अकेले
ही शत्रु का नाश करने दो।' यह कहकर उसने उसी दिन शत्रु पर धावा बोल दिया।
राज्यवर्धन मालवराज की सेना को खेल ही खेल में जीत लेने पर भी गौड़ाधिप के
कुचक्र से मारा जाता है। हर्ष के हृदय में राज्यवर्धन के प्रति अपार स्नेह था। उसने
उसके मारे जाने का समाचार सुनकर उसकी चरण-रज का स्पर्श करके प्रतिज्ञा की—'कुद्ध

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ही दिनों में यदि गौड़ाधिप को न मार डालूँ तो स्वयं जल कर भस्म हो जाऊँगा।' हर्ष-
चरित में राज्यवर्धन का व्यक्तित्व सर्वथा अकलुषित और स्नेह तथा पराक्रममय देखने
में आता है।
हर्षवर्धन—कहा जा चुका है कि वर्धनवंश के आदि संस्थापक राजा पुष्पभूति को
लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था—'तुम्हारे वंश में हरिश्चन्द्र के समान समस्त
द्वीपों का भोक्ता हर्ष नाम का चक्रवर्ती जन्म लेगा।' इसलिए यह स्वाभाविक था कि हर्ष के
समस्त गुण जन्मजात थे। जैसा कि बाण ने हर्ष के यशोवती के गर्भ में आते ही रानी का
वर्णन करते हुए लिखा है—उसके मन में यह दोहद इच्छा हुई कि चार समुद्रों का जल
एक में मिलाकर स्नान करूँ और समुद्र के वेला-कुंजों में भ्रमण करूँ। नंगी तलवार के
पानी में मुँह देखने की, वीणा अलग हटा कर धनुष की टंकार सुनने की और पंजर-
बद्ध केसरियों के देखने की इच्छा हुई। इस प्रकार हर्ष जन्म से ही एक महापुरुष था।
किसी ब्राह्मण ने ज्योतिष के अनुसार हर्ष के जन्म के समय भविष्यवाणी भी कर दी थी।
हर्ष में शैशव काल से ही अपूर्व रणोत्साह और साहस का आभास मिलने लगा था। जब
पिता ने अपने सुयोग्य पुत्र राज्यवर्धन को हूणों से भिड़न्त के लिए भेजा तो १४-१५ वर्ष
की अवस्था वाले हर्ष भी बड़े भाई के साथ चलने के उत्साह का संवरण न कर सके। कुछ
पड़ावों के बाद ही हर्ष का मन आखेट में लग गया तो वे आगे न जाकर हिमालय की
तराइयों में शिकार करने लगे। यहीं से हर्ष के जीवन का आकस्मिक परिवर्तन आरम्भ
हो जाता है। उन्हें पिता जी की बीमारी की खबर मिलती है। शीघ्र ही दौड़ पड़े, मार्ग में
कुछ भी नहीं खाया-पिया। इससे उनका अनन्य पितृ-प्रेम व्यक्त होता है।
राजद्वार पर पहुँचते ही उन्होंने उद्विग्न होकर सुषेण नामक वैद्यकुमार से पिता जी की
हालत पूछी। सुषेण ने कोई आशाजनक बात न कही तो घबड़ाए हुए पिता जी के पास
पहुँचे। उन्होंने उन्हें रुग्णावस्था में देखा। प्रभाकरवर्धन ने हर्ष को देख कर उठने की
चेष्टा की। उन्होंने बड़ी कठिनता से यह कहा—'हे वत्स, दुबले जान पड़ते हो।' तब भंडि
ने कहा कि हर्ष को भोजन किए हुए तीन दिन हो चुके हैं। यह सुन कर पिता ने गद्गद
कंठ से कहा—'तुम्हारे आहार ही के बाद मैं पथ्य लूँगा।' पिता का पुत्र के प्रति स्नेह
स्वाभाविक है, पर यहाँ स्वाभाविकता की सीमा पर वह स्नेह पहुँच गया है। गुणवान् पुत्र
के प्रति पिता का इससे बढ़ कर क्या भाव हो सकता है? हर्ष की गुणग्राहिता भी
असामान्य थी। जब उन्होंने सुना कि रसायन नामक वैद्यकुमार ने सम्राट् के प्रति भक्ति
और स्नेह से अभिभूत होकर आग में कूद कर जान दे दी तो उनकी प्रतिक्रिया यह हुई कि
उसने कुलपुत्रता धर्म को चमका दिया। स्वयं बाण ने हर्ष की गुणग्राहिता की प्रशंसा

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अपनी प्रथम भेंट के अवसर पर की थी। जब बाण ने अपना विशिष्ट परिचय दिया तब
हर्ष ने कहा था कि मैंने भी ऐसा ही सुना है। तब बाण ने एकान्त में हर्ष की उदारता एवं
गुणग्राहिता की प्रशंसा की है। अस्तु, इसी बीच जब प्रभाकरवर्धन मृत्युशय्या पर अन्तिम
सांस तोड़ने ही वाले थे तब हर्ष केजीवन की दूसरी मार्मिक घटना—माता यशोमती के सती
हो जाने की तैयारी सुनकर हुई। किसी प्रकार वे माँ को उनके निर्णय से विचलित न
कर सके। तत्पश्चात् पिता जी भी दिवंगत हो जाते हैं। इन उद्वेजक घटनाओं से हर्ष
अत्यन्त शोकमग्न अवस्था में पड़ गए। अनेक कुलपुत्र, गुरु, वृद्ध ब्राह्मण, मूर्धाभिषिक्त
अमात्य, मस्करी, मुनि, वेदान्ती तथा पौराणिक लोगों ने हर्ष के शोक को उदाहरणों और
दृष्टान्तों द्वारा कम किया। तब हर्ष के मन में राज्यवर्धन के विषय में अनेक विचार
आने लगे। कहीं बड़े भाई पिता जी के मरण का घातक समाचार सुन कर बुद्ध की तरह
आश्रम में न प्रविष्ट हो जायें ? हर्ष की यह भावना राज्यवर्धन के प्रति अपार भ्रातृ-प्रेम
और हृदय की पवित्रता को व्यंजित करने वाली है। सचमुच इस प्रकार की आन्तरिक
वृत्ति के कारण महानता की दृष्टि से हर्ष एक उच्च आदर्श का रूप धारण कर लेते हैं।
जैसा हर्ष ने राज्यवर्धन के विषय में मन में सोचा था, शोक से भरे हुए राज्य-
वर्धन ने आकर वही सोचा और अपनी तलवार फेंक दी। राज्यवर्धन के इस विचार से
हर्ष का हृदय विदीर्ण हो गया। उन्होंने अपने आप में ही कोई ऐसा दोष अनुभव किया
जिसके कारण राज्यवर्धन ने यह निश्चय कर डाला। हर्ष के उस विदीर्ण हृदय में कितनी
पवित्रता और विशालता थी। इसी बीच एक घटना और घटती है। मालवराज द्वारा
ग्रहवर्मा की मृत्यु और राज्यश्री के कारागार में बन्द होने की खबर तत्काल मिली।
सुनते ही राज्यवर्धन का विषाद जाता रहा. वे आग-बबूला हो गए। हर्ष को राज्यभार
सम्भालने के लिए कहा और स्वयं फिर हाथ में कृपाण उठा लिया। यहाँ भी हर्ष ने साथ
जाने के लिए आग्रह किया। राज्यवर्धन हर्ष के पराक्रम से परिचित थे, उन्होंने कहा—
'सारी पृथिवी को जीतने के लिए मान्धाता की तरह तुम धनुष उठाओगे, तो तुम ठहरो।
मुझे अकेले ही शत्रु का नाश करने दो।' यह कह उन्होंने प्रस्थान किया। जब हर्ष को
चौथी घटना यह सुन पड़ी कि एक मालवराज को खेल-खेल में पराजित कर लेने पर भी
राज्यवर्धन को धोखे से गौड़ाधिप ने मार डाला, तो उनकी क्रोधाग्नि फूट पड़ी। तब हर्ष
ने यह प्रतिज्ञा की—'यदि कुछ ही दिनों में इस पृथिवी को गौड़रहित न बना दूँ और
समस्त राजाओं के पैरों में बेड़ियाँ न पहना दूँ तो घी से धधकती हुई आग में पतंगे की तरह
अपने शरीर को जला दूंगा।' हर्ष की इस प्रतिज्ञा में उसका समस्त ओज प्रदीप्त हो उठा
है। युद्ध की तैयारियाँ होने लगीं। कुछ दिन बाद प्राग्ज्योतिषेश्वर कुमार ने हंसवेग के

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साथ एक छत्र और अनेक उपहार भेजे। हर्ष के हृदय में प्रत्युपकार की भावना का यह
कितना सुन्दर प्रसंग है जब एकान्त में बैठे-बैठे उन्होंने यह सोचा—'आमरण मैत्री के
अतिरिक्त इस प्रकार के सुन्दर उपहार का बदला और क्या हो सकता है ?' भण्डि ने आ
कर राज्यश्री के विन्ध्याटवी में भाग जाने की खबर दी तो हर्ष स्वयं सब काम छोड़ कर
उसे खोजने निकल पड़े। बीच में शबर युवक निर्घात के माध्यम से दिवाकरमित्र नामक
एक बौद्ध भिक्षु से भेंट होती है। दिवाकरमित्र के एक शिष्य ने हर्ष को राज्यश्री का
पता बताया। अन्त में राज्यश्री मिल जाती है।
इस प्रकार हर्ष का व्यक्तित्व आदि से अन्त तक निर्भीक और साहसी, कर्त्तव्यपरायण
और स्नेहमय मिलता है। बाण ने सम्राट् के उदात्त जीवन का बहुत नजदीक से अध्ययन
किया था। बाण की लेखनी के स्पर्श से हर्ष के व्यक्तित्व की जो परिस्फूर्ति हर्षचरित में
दिखाई देती है वह अपूर्व है। यह कहना कठिन है कि बाण की लेखनी ने हर्ष का स्पर्श
कर इतनी सामर्थ्य प्राप्त की अथवा हर्ष का व्यक्तित्व ही बाण की लेखनी के स्पर्श से समृद्ध
हो गया। इसमें सन्देह नहीं कि हर्ष जैसा सम्राट् भारतवर्ष में कोई दूसरा नहीं हुआ।
हर्ष की महती सफलता तो इसमें भी अभिलक्षित होती है कि उसने परस्परविरोधी, साम्प्र-
दायिक तथा धार्मिक वातावरण को भी एक सन्तुलित रूप दिया था। हर्ष किसी एक धर्म
और एक सम्प्रदाय का पक्षपाती न था। उसके मन में सबके प्रति समान आदरभाव था।
बाण ने एक तटस्थ दर्शक के रूप में ही उसके व्यक्तित्व का चित्रण किया है। व्यर्थ प्रशंसा
का पुल बाँधना बाण जैसे स्वाभिमानी के लिए कहाँ तक सम्भव था।
हर्ष के व्यक्तित्व की यह प्रसंगतः सामान्य चर्चा है। ग्रन्थ के आद्योपान्त अवलोकन से
ही पाठक उसकी विशेषताओं से परिचित हो सकेंगे। बाण की चित्रग्राहिणी प्रतिभा में
हर्ष के व्यक्तित्व का चित्र ऐसी स्वाभाविकता से आलिखित है कि देखते ही बनता है।
राज्यश्री—यह हर्ष की छोटी बहन थी। वह नृत्य, गीत आदि कलाओं में प्रवीण थी।
प्रभाकरवर्धन ने धूम-धाम से ग्रहवर्मा के साथ उसका विवाह किया। पिता के मरते ही
राज्यश्री पर भी दुर्भाग्य के बादल उमड़ आए। मालवराज ने ग्रहवर्मा को जान से मार
दिया और उसे कान्यकुब्ज के कारागार में बन्द कर रखा। वह किसी तरह बन्धन से छूट
कर परिवार के साथ विन्ध्याचल के जंगल में चली गई। जब वह वहाँ अग्निप्रवेश करने
के लिए तैयार थी तब हर्ष उसे ढूँढते हुए पहुँच गए। इस अवस्था में सहसा भाई को
पाकर वह विलाप करने लगी। हर्ष ने रोते हुए कहा—'अब धीरज धरो, अपने को
सम्हालो।' राज्यश्री पर इस समय दुःख का पहाड़ टूट पड़ा था, हर्ष ने मृत्यु के मुख से
खींच कर उसे बचा लिया। वह अपने सतीत्व की रक्षा के लिए शत्रु के कारावास से भी

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भाग निकली। भारतीय नारी का यह उच्च आदर्श राज्यश्री में एकान्ततः प्रस्फुरित होता
है। बौद्धभिक्षु आचार्य दिवाकरमित्र के सामने राज्यश्री ने हर्ष से विनय-पूर्वक काषाय
वस्त्र धारण की अनुज्ञा मांगी। एक विधवा के तपस्वी जीवन के लिए आत्मसंयम के
अतिरिक्त और दूसरा क्या कर्तव्य रह जाता है। हर्ष ने भाई के वध का बदला लेने की
जो प्रतिज्ञा की थी उसे सुनाकर तत्काल राज्यश्री को ऐसा न करने के लिए कहा। उन्होंने
भिक्षु दिवाकरमित्र से कह दिया कि प्रतिज्ञा पूरी होने पर मैं और यह एक साथ काषाय
ग्रहण करेंगे। तब राज्यश्री ने भाई की बात पर आग्रह नहीं किया।
इस प्रकार इन प्रमुख पात्रों की चर्चा के साथ ही हर्षचरित का कथानक भी बहुत
अंश में सामने आ जाता है।
कादम्बरी
महाकवि बाणभट्ट की दूसरी 'अतिद्वयी' रचना कादम्बरी है। यह एक कथा है।
आधुनिक परिभाषा में कथा को ही उपन्यास कहते हैं। यद्यपि कथा और उपन्यास में
बहुत अन्तर है, तथापि काल्पनिकता का सम्बन्ध दोनों में एक-सा अभिलक्षित होता है।
आधुनिक उपन्यास कथा का विकसित रूप है और कथा उपन्यास का पूर्व रूप। कादम्बरी
संस्कृत-साहित्य की सर्वोत्कृष्ट गद्य-रचना है और बाण की अमर कृति है। 'हर्षचरित इस
पृथिवी-लोक की तथ्यात्मक आख्यायिका है पर कादम्बरी दिव्य-लोक को भूतल पर लाने
वाली काव्य-कल्पना है।' यह दृढ़ता के साथ कहा जा सकता है बाण हर्षचरित की
अपेक्षा कादम्बरी में अधिक सफल हुए हैं। कादम्बरी की कथा के सम्बन्ध में यह मान्यता
है कि यह गुणाढ्यकृत बृहत्कथा से ली गई है। गुणाढ्य ने बृहत्कथा को पैशाची भाषा में
लिखा था, जो अब तक उपलब्ध नहीं है। उसके संस्कृत अनुवाद के रूप में क्षेमेन्द्रकृत
बृहत्कथामंजरी और सोमदेवकृत कथासरित्सागर में कादम्बरी-कथा का मूल रूप सुरक्षित
है। भारतीय प्राचीन साहित्य के उपजीव्य तीन ग्रन्थ विशेष रूप से रहे हैं—रामायण,
महाभारत और बृहत्कथा। अतः सम्भव है कि बाण ने अपनी कथा की मूल घटनाएँ
बृहत्कथा से ली हों, किन्तु यह निर्विवाद है कि उन्होंने अपनी प्रतिभा से उसे एक सर्वथा
नवीन और मौलिक रूप दे दिया है।
कादम्बरी की कथा संक्षेप में इस प्रकार है—'विदिशा के राजा शूद्रक के समीप एक
चाण्डालकन्या पंजरबद्ध आश्चर्यकारी शुक को उनकी सेवामें अर्पित करती है। यह
शुक अपने जन्म से लेकर महर्षि जाबालि के आश्रम में पहुँचने तक का वृत्तान्त सुनाता
है। महर्षि जाबालि शुक के पूर्वजन्म की कथा सुनाते हैं—उज्जयिनी के राजा तारापीड़