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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

by महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री

DevanagariSanskritpublished506 pages

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Page 11

शास्त्रों, कलाओं और विद्याओं में प्रवीण हो जाने के लिए वर दिया और दधीच तथा
पितामह के आदेश से सावित्री के साथ ब्रह्मलोक चली गई। सरस्वती के चले जाने पर
दधीच ने भार्गव वंश में उत्पन्न अपने भाई की अक्षमाला नाम की पत्नी के पास उस
सारस्वत पुत्र को पालने के लिए छोड़ कर तपस्या करने के लिए जंगल में प्रस्थान किया।
जिस समय सरस्वती ने पुत्र पैदा किया था उसी अवसर पर अक्षमाला के गर्भ से भी पुत्र
उत्पन्न हुआ था। अक्षमाला ने दोनों पुत्रों को पाल-पोस कर बड़ा किया। एक का नाम
सारस्वत और दूसरे का नाम वत्स था। दोनों में सहोदर भाई जैसा स्नेह था। माता के
वरदान से सारस्वत यौवन के आरम्भ में ही समस्त शास्त्रों का पारंगत विद्वान् हो गया।
उसने वत्स को भी अपनी सारी विद्या दे दी और उसका विवाह करके प्रीतिकूट नाम का
स्थान बनवा दिया तथा पिता दधीच जहाँ तपस्या कर रहे थे वहीं स्वयं दण्ड-चीवर धारण
करके चला गया।

वत्स से वंश चला। उसी वंश की परम्परा में बाण का जन्म हुआ। बाण ने वात्स्यायन-
वंश की परम्परा भी दी है। वत्स के बाद अनेक वर्ष बीते और बहुत से वात्स्यायन
ब्राह्मण उस कुल में क्रमशः उत्पन्न हुए। उसी क्रम में कुबेर नाम का ब्राह्मण उत्पन्न हुआ।
उसके चार पुत्र हुए—अच्युत, ईशान, हर और पाशुपत। पाशुपत के पुत्र का नाम
अर्थपति था। अर्थपति ने ग्यारह पुत्रों को उत्पन्न किया जिनके नाम ये हैं—मृगु, हंस,
शुचि, कवि, महीदत्त, धर्म, जातवेदस्, चित्रभानु, लक्ष, अहिदत्त और विश्वरूप। चित्रभानु
के ही पुत्र बाण थे। बाण की माता का नाम राजदेवी था। बाण के दो पारशव भाई
(शूद्र स्त्री से उत्पन्न) थे—चित्रसेन और मित्रसेन, और चार चचेरे भाई थे—गणपति,
अधिपति, तारापति और श्यामल।

बाण की आत्मकथा

इस प्रकार बाण ने अपने वात्स्यायनवंश का उद्भव बताते हुए प्राचीन कुलपुरुषों की
क्रमबद्ध वंशावली दी है और इसी क्रम में अपनी भी चर्चा की है। कहा जा चुका है कि
बाण के पिता का नाम चित्रभानु और माता का नाम राजदेवी था। बालपन में ही उसे
माता का वियोग सहना पड़ा और पिता ने मातृस्नेह के साथ उसका पालन किया। वह
अपने घर पर ही रह कर बढ़ा। उसके उपनयन आदि संस्कार यथासमय पिता ने किए।
जब वह चौदह वर्ष का हुआ तब उसके पिता का भी देहान्त हो गया। उस समय तक
उसका समावर्तनसंस्कार और उसके साथ ही विवाह भी हो चुका था। पिता की मृत्यु के
बाद दुखी और शोकसंतप्त बाण ने किसी प्रकार अपने घर पर ही रह कर वह समय