हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
by महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री
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एक समय दिन जब एक पहर चढ़ गया तब उत्तर की ओर घोड़ों की हिनहिनाहट
सुन पड़ी। कुतूहल से सरस्वती ने लतामण्डप से बाहर निकल कर देखा कि धूल उड़ाता
हुआ घोड़ों का समूह चला आ रहा था, जिसके साथ हजारों पैदल युवक चले आ रहे थे।
अश्वारोहियों के बीच अट्ठारह वर्ष की आयु के एक सुन्दर युवक को देखा। एक ओर
अधिक अवस्था वाला पुरुष भी उसके साथ था। वह युवक दिव्य आकृति वाली दोनों
कन्याओं को देखता हुआ कुतूहल से लतामण्डप के समीप आ पहुँचा और घोड़े से उतर
गया। साथ के और लोगों को दूर पर ही उसने रोक दिया और उस दूसरे सज्जन के
साथ पैदल ही वहाँ आया। सरस्वती के साथ सावित्री ने उसका बनवास के उचित
सामग्री से सत्कार किया और उस वृद्ध से पूछा—'यह युवक कहाँ से आया है? इसे ·
जाना कहाँ है? इसके पिता कौन हैं, माता का क्या नाम है और इसका क्या नाम है?'
सावित्री के इस अनुरोध पर उस पुरुष ने कहा—'यह च्यवन का पुत्र दधीच है, इसकी
माता राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या है। शर्याति पुत्री को गर्भवती जान कर पति के घर
से अपने घर ले गए। वहीं उसने इसे जन्म दिया। अपने ननिहाल में ही यह बढ़ा। जब
इसकी माता अपने पति के घर जाने लगी तब नाना ने स्नेह से इसे अपने साथ ही रख
लिया। वहीं पर इसने समस्त विद्याओं और कलाओं को सीखा तब किसी प्रकार नाना
ने इसे पिता के पास जाने के लिए छोड़ा। मैं उन्हीं शर्याति का निकुक्षि नामक आज्ञाकारी
भृत्य हूँ। मुझे इसे पिता के घर पहुँचाने के लिए भेजा गया है। शोण के उस पार
भगवान् च्यवन का आश्रम है, हम वहीं जा रहे हैं।' यह कह कर उस पुरुष ने उन
दोनों का भी परिचय पूछा। तब सावित्री ने कहा—'आर्य, हम दोनों का यहाँ बहुत दिनों
तक रहने का विचार है अतः धीरे-धीरे सब कुछ ज्ञात हो जायगा।' फिर दधीच और वह
पुरुष दोनों च्यवनाश्रम की ओर घोड़े पर सवार होकर चल दिए। इधर सरस्वती दधीच
के चले जाने पर उस दिशा की ओर ही देर तक आँखें फैलाए बैठी रही, फिर किसी तरह
वह दिन बीता। रात में भी दधीच के दर्शन की चिन्ता में ऊभ-चूभ होती रही। इस
प्रकार कई रातें बीतीं तो अपने देश की ओर लौटते समय विकुक्षि वहाँ पहुँचा। सावित्री
ने दधीच का कुशल पूछा। विकुक्षि ने दधीच की मालती नाम की दूती के आने का
समाचार कह कर विदा ली। विकुक्षि के जाने पर अश्वारूढ होकर मालती वहाँ पहुँची।
दोनों ने उसका सम्मान किया। मालती कुछ देर तक ठहरी और फिर दधीच को लाने
के लिए च्यवनाश्रम गई और दधीच को साथ लेकर लौटी। प्रणय हो जाने पर दधीच
सरस्वती के साथ एक वर्ष तक वहीं रह गए। दैवयोग से सरस्वती ने गर्भ धारण किया
और समय पर पुत्र पैदा किया। पैदा होते ही सरस्वती ने अपने पुत्र को समस्त वेदों,