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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

by महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री

DevanagariSanskritpublished506 pages

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काटा। कुछ दिन के बाद जब पितृशोक कुछ कम हुआ तब बाण की स्वतंत्र प्रकृति ने
जोर मारा। उसमें वह विनय अब न रहा। अल्हड़पन के कारण बालक बाण में नई-नई
वस्तुओं के देखने का कुतूहल बढ़ा। फलतः वह यौवन के आरम्भ होते ही धैर्य को त्याग
कर घुमक्कड़ और आवारा बन गया। इसके साथी और सहायक भी बहुत से हो गए। वह
उनके साथ देश-देशान्तरों को देखने की इच्छा से अपने पिता-पितामह के वैभव और विद्या
की परवाह न करके घर-द्वार छोड़ कर निकल पड़ा। स्वच्छन्द होकर वह इस प्रकार
मनमौजी हो गया कि उसकी खिल्ली उड़ने लगी।

अपने उसी उच्छृङ्खल भ्रमण के अवसर में घूम-घूम कर बाण ने अपने युग के जीवन
का गहरा अध्ययन किया। वह राजकुलों में पहुँचा जहाँ के व्यवहार अत्यन्त उदार होते
थे, गुरुकुल या उस समय के शिक्षासंस्थानों में भी कुछ काल तक रहा, बहुमूल्य
बात-चीत करने वाले गुणवान् लोगों की गोष्ठियों में बैठा और विदग्ध जनों के बीच पहुँचा।
इस प्रकार युवक बाण को अनुभव के चार स्रोत जीवन के आरम्भ में ही मिल गए।
अनुभवी होकर बाण की चंचल प्रकृति बदल गई। वह वात्स्यायन वंश के अनुरूप गम्भीर
स्वभाव वाला बन गया। बहुत दिनों तक देश-देशान्तरों का चक्कर काट कर वह फिर
अपनी जन्मभूमि प्रीतिकूट को लौटा और अपने बालमित्रों से बड़े स्नेह के साथ मिला।

अपने बन्धु-बान्धवों से मिल कर बाण बड़ा प्रसन्न हुआ। बहुत दिनों तक प्रीतिकूट का
ही आनन्द लेता रहा। एक दिन स्थाण्वीश्वर के महाराज श्रीहर्ष के भाई का भेजा हुआ
मेखलक नाम का दीर्घाध्वग बाण से आकर गर्मी के दिनों में मिला। उस समय भोजन के
पश्चात् बाण अपने घर पर आराम कर रहा था। उसके पारशव भाई (शूद्रा जननी से
उत्पन्न) ने भीतर आकर उसके आगमन की सूचना दी। बाण ने कहा—'उसे शीघ्र अन्दर
लावो।' तब वह दीर्घाध्वग भीतर जाकर बाण के समीप कुछ हट कर बैठा। बाण के पूछने
पर उसने कृष्ण का कुशल-समाचार सुना कर पत्र अर्पित किया। बाण ने पत्र को स्वयं
पढ़ा। फिर मेखलक ने मौखिक सन्देश में कृष्ण की ओर से कहा—'मैं तुमसे बिना कारण
ही अपने बन्धु की तरह प्रेम करता हूं। तुम्हारी अनुपस्थिति में दुर्जन लोगों ने सम्राट् के
कान भर दिए, पर वह सत्य नहीं। किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति ने तुम्हारी बाल-चपलताओं से
चिढ़ कर कुछ इधर-उधर की बात कह दी। अन्य लोगों ने भी ठीक वैसा ही समझा और
कहने लगे। सम्राट् ने ऐसे मूर्खों की एक-सी बात सुन कर अपना मत स्थिर कर लिया।
तुम्हारे विषय में मैंने सम्राट् से निवेदन किया और उन्होंने मेरी बात मान ली। अब अपने
घर पर व्यर्थ समय-यापन करना ठीक नहीं, शीघ्र राजकुल में आओ।'