Skip to content
SarvaKosh
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

by महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री

DevanagariSanskritpublished506 pages

Page 17 of 506

Read in context
Page 17

( १० )
होता है । आर्याओं को सुन कर बाण के चार चचेरे भाइयों—गणपति, अधिपति, तारापति
और श्यामल ने एक दूसरे की ओर देखा । तत्पश्चात् उन चारों में सबसे छोटा बाण का
अत्यन्त प्रिय श्यामल बोला—'तात बाण, प्रातःस्मरणीय, पुण्यों के राशि देव हर्ष का चरित
पूर्वपुरुषों की वंशपरम्परा के साथ हम सुनना चाहते हैं । बहुत दिनों से हम लोगों की
यह इच्छा बनी हुई है । अतः आप कहें । यह भार्गववंश पुण्यवान् राजर्षि के पवित्र
चरित्र को सुनकर और पवित्र बन जाय ।' बाण ने हँस कर अपनी असमर्थता प्रकट करते
हुए दूसरे दिन हर्षचरित का वर्णन आरम्भ करने के लिए निश्चय किया और संध्योपासन
के लिए शोण के तीर पर चले गए ।
इस प्रकार बाण ने दूसरे दिन हर्ष के पूर्व-पुरुषों की वंशपरम्परा के साथ हर्षचरित
का वर्णन आरम्भ किया । बाण के जीवन के सम्बन्ध में इसके अतिरिक्त कोई वृत्तान्त
उपलब्ध नहीं होता ।
हर्षचरित के अतिरिक्त बाण की दूसरी कृति कादम्बरी है । कादम्बरी संस्कृत गद्य-
साहित्य के चरम-उत्कर्ष का एक उज्ज्वल उदाहरण है । कादम्बरी के आरम्भ में भी
बाण ने संक्षेप में अपनी वंशपरम्परा दी है। कादम्बरी की वंशपरम्परा में कुबेर
के बाद अर्थपति का उल्लेख आता है । बीच में पाशुपत का नाम छूट गया है । हर्ष की
मृत्यु के पश्चात् बाण कन्नौज से प्रीतिकूट लौट आए । वहीं इन्होंने अपने दोनों ग्रन्थों को
लिखा । हर्षचरित से हर्ष के जीवनवृत्त के सम्बन्ध की आकांक्षा की पर्याप्त मात्रा में पूर्ति ,
नहीं होती । बाण जैसे ग्रन्थ को पूरा लिखने में उदासीन हो गए । कादम्बरी को भी वे
अपूर्ण छोड़ गए । सौभाग्य से उनके सुयोग्य पुत्र ने उसे पूरा किया । कुछ लोग उनके पुत्र
का नाम भूषणबाण या भूषणभट्ट बतलाते हैं । कादम्बरी की कुछ हस्तलिखित प्रतियों में
'पुलिन' या पुलिन्द नाम मिलता है । धनपाल की तिलकमञ्जरी में श्लेष से पुलिन्द ही
का उल्लेख है—
केवलोऽपि स्फुरन्बाणः करोति विमदान् कवीन् ।
किं पुनः क्लृप्तसन्धानं पुलिन्दकृतसन्निधिः ॥
( ति. म. २६ श्लोक )
बाण के समकालीन कवियों में मातंगदिवाकर और मयूर का उल्लेख आता है ।
अनुश्रुति के अनुसार मयूर जिन्होंने सूर्यशतक का निर्माण किया है, बाण के श्यालक
बताए जाते हैं । बाण ने अपने विवाह का उल्लेख सम्राट् हर्ष से मिलने के प्रसंग में ही
किया है—'दारपरिग्रहादम्यागारिकोऽस्मि ।' इसके अतिरिक्त उनके वैवाहिक जीवन के
सम्बन्ध में कोई प्रामाणिक तथ्य प्राप्त नहीं है ।