गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
About this granth
Beyond the Bhagavad Gita, the epics and Puranas contain many other dialogues called 'Gitas'. Gita Sangraha (गीता-संग्रह, Gita Press book no. 1958) gathers twenty-five of them, each with its original text and a Hindi translation.
The contents show the range: the Ganesha Gita from the Ganesha Purana; the Bhikshu, Paramahamsa, Hamsa and Avadhuta Gitas from the Bhagavata; from the Mahabharata the Shadja, Pingala, Shampaka, Manki, Ajagara, Harita, Vritra, Putra, Kama and Narada Gitas, a second Hamsa Gita and the Uttara Gita; two Yama Gitas from the Vishnu and Agni Puranas; two Rama Gitas from the Adhyatma and Adbhuta Ramayanas; the Bhagavati (Parvati) Gita from the Devi Purana; and the Ashtavakra Gita and Dattatreya's Avadhuta Gita.
Many of these are short teachings on detachment, contentment, self-knowledge and devotion, such as the courtesan Pingala's awakening or the sage who lives like a python. The copy here is the sixth reprint, of Samvat 2074, and its 675 pages bring these scattered texts together in one volume.
५२६ * गीता-संग्रह *
क्व तमः क्व प्रकाशो वा हानं क्व च न किञ्चन।
निर्विकारस्य धीरस्य निरातङ्कस्य सर्वदा ॥ ७८ ॥
जो स्थितप्रज्ञ सर्वदा निर्विकार अतएव निरातंक है, उसके लिये अज्ञान कहाँ, ज्ञान कहाँ और त्याग कहाँ? उसके लिये किसीका अस्तित्व नहीं रहता ॥ ७८ ॥
क्व धैर्यं क्व विवेकित्वं क्व निरातङ्कतापि वा।
अनिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्वभावस्य योगिनः ॥ ७९ ॥
तत्त्वज्ञको धैर्य कहाँ, विवेक कहाँ? और निर्भयता भी कहाँ? उसका स्वभाव अनिर्वचनीय होता है। वास्तवमें तो वह स्वाभावरहित होता है ॥ ७९ ॥
न स्वर्गो नैव नरको जीवन्मुक्तिर्न चैव हि।
बहुनात्र किमुक्तेन योगदृष्ट्या न किञ्चन ॥ ८० ॥
स्थितप्रज्ञ पुरुषके लिये न स्वर्ग है, न नरक और न जीवन्मुक्ति। इस सम्बन्धमें बहुत कहनेसे क्या लाभ? वस्तु-तत्त्वके साक्षात्कारकी दृष्टिसे कुछ नहीं है ॥ ८० ॥
नैव प्रार्थयते लाभं नालाभेनानुशोचति।
धीरस्य शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम् ॥ ८१ ॥
स्थितप्रज्ञका चित्त ऐसा शीतल रहता है मानो उसमें अमृत ही भर रहा हो। न वह लाभकी अभिलाषा करता है और न हानिका शोक ॥ ८१ ॥
न शान्तं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निन्दति।
समदुःखसुखस्तृप्तः किञ्चित्कृत्यं न पश्यति ॥ ८२ ॥
स्थितप्रज्ञ पुरुष न सन्तकी स्तुति करता है न दुष्टकी निन्दा। वह दुःख एवं सुखमें सम रहता है, अपने आपमें तृप्त रहता है और वह अपने लिये कुछ कर्तव्य नहीं देखता ॥ ८२ ॥
* अष्टावक्रगीता * ५२७
धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति।
हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति॥८३॥
स्थितप्रज्ञ न संसारसे द्वेष करता है और न तो आत्म-दर्शन ही करना चाहता है। वह हर्ष एवं रोषसे रहित होता है। वह (सामान्य रूपसे) न तो मृत है न जीवित ॥८३॥
निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च।
निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः॥८४॥
जो पुत्र-स्त्री आदिके प्रति स्नेहरहित है, विषयोंके प्रति निष्काम है और अपने शरीरके लिये भी निश्चिन्त है, जिसे किसी वस्तुकी आशा नहीं है, ऐसा वह ज्ञानी शोभायमान होता है॥८४॥
तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः।
स्वच्छन्दं चरतो देशान् यत्रास्तमितशायिनः॥८५॥
जहाँ सूर्यास्त हुआ, वहाँ सो गया। जहाँ मौज हुई, वहीं विचर गया। जो सामने आया वैसा व्यवहार कर लिया। इस प्रकार स्थितप्रज्ञ सर्वत्र सन्तुष्ट होता है॥८५॥
पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः।
स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥८६॥
जो अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपकी भूमिमें विश्राम करके समस्त प्रपंचका बाध कर चुका है, उस स्थितप्रज्ञ महात्माको शरीर नष्ट हो जाय अथवा बना रहे—ऐसी चिन्ता नहीं होती॥८६॥
अकिञ्चनः कामचारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः।
असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः॥८७॥
ज्ञानी पुरुष अकिंचन, स्वेच्छाचारी, निर्द्वन्द्व और सन्देहरहित होता है। वह किसी भी पदार्थमें आसक्त नहीं होता। वह तो केवल आनन्दमें विहार करता है॥८७॥
५२८ * गीता-संग्रह *
निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
सुभिन्नहृदयग्रन्थिर्विनिर्धूतरजस्तमः ॥ ८८ ॥
स्थितप्रज्ञकी हृदय-ग्रन्थि खुल जाती है। रजोगुण, तमोगुण धुल जाते हैं। वह मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेको सम-दृष्टिसे देखता है, उसको कहीं ममता नहीं होती। वास्तवमें वही शोभा पाता है॥ ८८॥
सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद्वासना हृदि।
मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ ८९ ॥
जो प्रपंचकी किसी वस्तुपर ध्यान नहीं देता; जो आत्मतृप्त है; उसके हृदयमें तनिक भी वासना नहीं होती—ऐसे मुक्तात्माकी बराबरी किसके साथ की जा सकती है!॥ ८९ ॥
जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति।
ब्रुवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते ॥ ९० ॥
वासनाहीन स्थितप्रज्ञ पुरुषके अतिरिक्त ऐसा और कौन है जो जानता हुआ भी न जाने, देखता हुआ भी न देखे और बोलता हुआ भी न बोले॥ ९० ॥
भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि यो निष्कामः स शोभते।
भावेषु गलिता यस्य शोभनाशोभना मतिः ॥ ९१ ॥
राजा हो चाहे रंक, जो निष्काम है वही शोभा पाता है। जिसकी दृश्य-पदार्थोंमें शुभ और अशुभ बुद्धि समाप्त हो गयी है, वही निष्काम है॥ ९१ ॥
क्व स्वाच्छन्द्यं क्व सङ्कोचः क्व वा तत्त्वनिश्चयः।
निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ ९२ ॥
तत्त्वज्ञ निष्कपट, सरल और कृतकृत्य होता है। उसके लिये स्वच्छन्दता कहाँ, संकोच कहाँ और तत्त्व-निश्चय भी कहाँ?॥ ९२ ॥
- अष्टावक्रगीता * ५२९
आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना।
अन्तर्यदनुभूयेत तत्कथं कस्य कथ्यते॥ ९३॥
जो अपने स्वरूपमें विश्राम करके तृप्त है, किसी वस्तुकी आशा नहीं रखता, आर्तिरहित है, वह अपने अन्तःकरणमें जिस आनन्दका अनुभव करता है, वह कैसे किसको बतलाया जाय ? ॥ ९३ ॥
सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च।
जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे॥ ९४॥
स्थितप्रज्ञ पुरुष पद-पदपर तृप्त रहता है। वह सोकर भी नहीं सोता, वह स्वप्न देखकर भी नहीं देखता और वह जाग्रत्-अवस्थामें रहनेपर भी वस्तुतः नहीं जागता ॥ ९४ ॥
ज्ञः सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपि निरिन्द्रियः।
सबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहङ्कारोऽनहङ्कृती ॥ ९५ ॥
तत्त्वज्ञ सचिन्त होनेपर भी निश्चिन्त होता है, इन्द्रियवान् होनेपर भी निरिन्द्रिय है, बुद्धिमान् होनेपर भी बुद्धिहीन है और साहंकार होनेपर भी निरहंकार रहता है॥ ९५॥
न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न सङ्गवान्।
न मुमुक्षुर्न वा मुक्तो न किञ्चिन्न च किञ्चन॥ ९६ ॥
तत्त्वज्ञ न सुखी होता है न दुःखी। न विरक्त होता है न अनुरक्त। वह न मुमुक्षु है, न मुक्त। न कुछ है, न कुछ नहीं ॥ ९६ ॥
विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः समाधौ न समाधिमान्।
जाड्येऽपि न जडो धन्यः पाण्डित्येऽपि न पण्डितः॥ ९७ ॥
तत्त्वज्ञ विक्षेपमें भी विक्षिप्त नहीं होता, समाधिमें भी समाधिस्थ नहीं रहता। वह जड़तामें जड़ नहीं है और पाण्डित्यमें भी पण्डित नहीं है॥ ९७॥
५३० * गीता-संग्रह *
मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्तव्यनिर्वृतः।
समः सर्वत्र वैतृष्ण्यान्न स्मरत्यकृतं कृतम्॥ ९८॥
तत्त्वज्ञ समस्त स्थितियोंमें स्वरूपस्थित रहता है। कृतकृत्य होनेके कारण परम शान्त होता है। सर्वत्र सम रहता है। तृष्णाका अभाव होनेके कारण वह 'क्या किया, क्या नहीं किया'—इन बातोंका स्मरण नहीं करता॥ ९८॥
न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति।
नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति॥ ९९॥
वन्दना करनेसे वह प्रसन्न नहीं होता, निन्दा करनेसे क्रुद्ध नहीं होता, मृत्युसे उद्वेग नहीं करता और जीवनका अभिनन्दन नहीं करता॥ ९९॥
न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः।
यथा तथा यत्र तत्र सम एवावतिष्ठते॥ १००॥
शान्तचित्त तत्त्वज्ञ न तो जनसमूहकी ओर दौड़ता है और न जंगलकी ओर। जहाँ जिस स्थितिमें वह होता है, वहाँ समचित्त ही रहता है॥ १००॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शान्तिशतकं नामाष्टादशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १८॥
उन्नीसवाँ प्रकरण
तत्त्वज्ञानीकी विवेक-प्रक्रिया
तत्त्वविज्ञानसन्दंशमादाय हृदयोदरात्।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया॥ १॥
जैसे सफल चिकित्सक सँड़सीके द्वारा पेटमें घुसे हुए बाणोंको बड़ी चतुरतासे निकाल लेता है, वैसे ही मैंने तत्त्वज्ञानके द्वारा अपने हृदयसे अनेक प्रकारके संकल्प-विकल्प, विचार-विमर्शको निकाल फेंका है॥ १॥
- अष्टावक्रगीता * ५३१
क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकता।
क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥२॥
मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये धर्म कहाँ ? काम कहाँ ? अर्थ कहाँ? विवेक कहाँ? द्वैत कहाँ और अद्वैत कहाँ?॥२॥
क्व भूतं क्व भविष्यद्वा वर्तमानमपि क्व वा।
क्व देशः क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥३॥
मैं सदा-सर्वदा अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये भूत, भविष्य तथा वर्तमान-रूप काल कहाँ, देश कहाँ?॥३॥
क्व चात्मा क्व च वानात्मा क्व शुभं क्वाशुभं तथा।
क्व चिन्ता क्व च वाचिन्ता स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥४॥
मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये आत्मा-अनात्मा, शुभ-अशुभ चिन्ता एवं अचिन्ताका अस्तित्व ही कहाँ है?॥४॥
क्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणं तथा।
क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥५॥
मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ स्वप्न और कहाँ सुषुप्ति ? कहाँ जागरण और कहाँ तुरीय ? मेरे लिये भय ही कहाँ है?॥५॥
क्व दूरं क्व समीपं वा बाह्यं क्वाभ्यन्तरं क्व वा।
क्व स्थूलं क्व च वा सूक्ष्मं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥६॥
मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ दूर और कहाँ समीप? कहाँ बाह्य और कहाँ आभ्यन्तर? कहाँ स्थूल और कहाँ सूक्ष्म ?॥६॥
क्व मृत्युर्जीवितं वा क्व लोकाः क्वास्य क्व लौकिकम्।
क्व लयः क्व समाधिर्वा स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥७॥
मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ मृत्यु और कहाँ
५३२ * गीता-संग्रह *
जीवन ? कहाँ लोक और कहाँ लौकिक विषयवस्तु ? कहाँ लय और कहाँ समाधि ? ॥ ७ ॥
अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाप्यलम्।
अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥ ८ ॥
अर्थ, धर्म, कामकी बात बन्द करो। योगकी कथा भी अनावश्यक है। अब विज्ञानकी चर्चा भी बहुत हो चुकी। बस, मैं तो अपने स्वरूपमें स्थित हूँ॥ ८ ॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामात्मविश्रान्तिनाम एकोनविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १९ ॥
बीसवाँ प्रकरण
स्वस्वरूपमें स्थित पुरुषकी स्थिति
क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः।
क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ १ ॥
मेरे निर्मल स्वरूपमें पंचभूत कहाँ ? देह कहाँ ? इन्द्रियाँ कहाँ ? मन कहाँ ? शून्य कहाँ ? और निराशा भी कहाँ ? ॥ १ ॥
क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः।
क्व तृप्तिः क्व वितृष्णत्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा ॥ २ ॥
मैं सर्वदा निर्द्वन्द्व हूँ। मेरे लिये कहाँ शास्त्र और कहाँ आत्म-विज्ञान ? कहाँ मनकी निर्विषयता, कहाँ तृप्ति और कहाँ तृष्णासे रहित होना ? ॥ २ ॥
क्व विद्या क्व च वाविद्या क्वाहं क्वेदं मम क्व वा।
क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः स्वरूपस्य क्व रूपिता ॥ ३ ॥
स्वरूपमें विद्या कहाँ ? अविद्या कहाँ ? अहं कहाँ और इदं कहाँ ? ममता कहाँ ? बन्धन कहाँ ? मोक्ष कहाँ ? उसमें रूपका होना भी कहाँ है ? ॥ ३ ॥
- अष्टावक्रगीता * ५३३
क्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा।
क्व तद्विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा॥४॥
जो सर्वदा निर्विशेष एकरस वस्तु है, उसमें प्रारब्ध-कर्म कहाँ? जीवन्मुक्ति कहाँ और विदेहकैवल्य भी कहाँ?॥४॥
क्व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा।
क्वापरोक्षं फलं वा क्व निःस्वभावस्य मे सदा॥५॥
मैं सदा-सर्वदा एकरस, स्वभावरहित हूँ। मुझमें कर्ता कहाँ? भोक्ता कहाँ? निष्क्रिय स्फुरण भी कहाँ? अपरोक्ष ज्ञान कहाँ और फल-ज्ञान कहाँ?॥५॥
क्व लोकः क्व मुमुक्षुर्वा क्व योगी ज्ञानवान् क्व वा।
क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥६॥
अद्वितीय स्वस्वरूपमें कहाँ लोक और कहाँ मुमुक्षु? कहाँ योगी और कहाँ ज्ञानवान्? कहाँ बद्ध और कहाँ मुक्त?॥६॥
क्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम्।
क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥७॥
अद्वितीय स्वस्वरूपमें कहाँ सृष्टि और कहाँ संहार? कहाँ साध्य और कहाँ साधन? कहाँ साधक और कहाँ सिद्धि?॥७॥
क्व प्रमाता प्रमाणं वा क्व प्रमेयं क्व च प्रमा।
क्व किञ्चित् क्व न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे॥८॥
मैं सर्वदा शुद्धस्वरूप हूँ। मुझमें न प्रमाता है न प्रमाण। न प्रमेय है न प्रमा। न कुछ है, न कुछ नहीं॥८॥
क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं क्व निर्बोधः क्व मूढता।
क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे॥९॥
मैं सर्वदा निष्क्रिय हूँ। मुझमें न विक्षेप है न एकाग्रता। न बोध है न मूढ़ता। न हर्ष है न विषाद॥९॥
५३४
- गीता-संग्रह *
क्व चैष व्यवहारो वा क्व च सा परमार्थता।
क्व सुखं क्व च वा दुःखं निर्विमर्शस्य मे सदा॥१०॥
निर्विमर्श मुझमें संकल्प, विकल्प, विचार, बोध कुछ भी नहीं है। इसलिये न व्यवहार है न परमार्थ। न सुख है न दुःख॥१०॥
क्व माया क्व च संसारः क्व प्रीतिर्विरतिः क्व वा।
क्व जीवः क्व च तद् ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे॥११॥
मैं सर्वदा एकरस सम्पूर्ण मलोंसे रहित हूँ। मुझमें माया कहाँ, संसार कहाँ? राग कहाँ? वैराग्य कहाँ? जीव कहाँ? ब्रह्म कहाँ?॥११॥
क्व प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा क्व मुक्तिः क्व च बन्धनम्।
कूटस्थनिर्विभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा॥१२॥
मैं कूटस्थ और निरवयव हूँ। सदा-सर्वदा अपने स्वरूपमें ही स्थित हूँ। तब मेरे लिये प्रवृत्ति-निवृत्ति क्या है? और मुक्ति तथा बन्धन क्या है?॥१२॥
क्वोपदेशः क्व वा शास्त्रं क्व शिष्यः क्व च वा गुरुः।
क्व चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे॥१३॥
मैं उपाधिरहित शिव हूँ। मेरे लिये उपदेश क्या ? शास्त्र क्या ? शिष्य क्या और गुरु क्या ? मेरे लिये पुरुषार्थका अस्तित्व भी नहीं है॥१३॥
क्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकं क्व च द्वयम्।
बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम॥१४॥
‘है’ कहाँ और ‘नहीं’ कहाँ? न एक है, न दो है। बहुत कहनेसे क्या लाभ? मेरे स्वरूपमें कुछ नहीं है, कुछ नहीं है॥१४॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां जीवन्मुक्तिनाम विंशतिकं प्रकरणं समाप्तम्॥२०॥
* अष्टावक्रगीता * ५३५
इक्कीसवाँ प्रकरण
अष्टावक्रगीताके प्रकरणोंके नाम और उनकी श्लोक-संख्या
विंशतिश्चोपदेशे स्युः श्लोकाश्च पञ्चविंशतिः।
सत्यात्मानुभवोल्लासे उपदेशे चतुर्दश॥ १॥
(इस २१वें प्रकरणमें ग्रन्थकी श्लोक-संख्या और विषय दिखाये गये हैं।) उपदेशनामक प्रथम प्रकरणमें २० श्लोक हैं। शिष्योक्त आत्मानुभवात्मक द्वितीय प्रकरणमें २५ श्लोक हैं। आक्षेपोपदेशनामक तृतीय प्रकरणमें १४ श्लोक हैं॥ १॥
षडुल्लासे लये चैवोपदेशे च चतुश्चतुः।
पञ्चकं स्यादनुभवे बन्धमोक्षे चतुष्ककम्॥ २॥
शिष्यानुभवात्मक चतुर्थ प्रकरणमें ६ श्लोक हैं। लयनामक पंचम प्रकरणमें ४ श्लोक हैं। गुरूपदेशनामक षष्ठ प्रकरणमें भी ४ श्लोक हैं। शिष्यानुभवात्मक सप्तम प्रकरणमें ५ श्लोक हैं। बन्धमोक्षनामक अष्टम प्रकरणमें ४ श्लोक हैं॥ २॥
निर्वेदोपशमे ज्ञान एवमेवाष्टकं भवेत्।
यथासुखे सप्तकं च शान्तौ स्याद्वेदसम्मितम्॥ ३॥
निर्वेदनामक नवम प्रकरणमें ८ श्लोक हैं। उपशमनामक दशम प्रकरणमें ८ श्लोक हैं। ज्ञानाष्टकनामक एकादश प्रकरणमें ८ श्लोक हैं। एवमेवाष्टकनामक द्वादश प्रकरणमें ८ श्लोक हैं। यथासुखनामक त्रयोदश प्रकरणमें ७ श्लोक हैं। शान्तिचतुष्कनामक चतुर्दश प्रकरणमें ४ श्लोक हैं॥ ३॥
तत्त्वोपदेशे विंशच्च दश ज्ञानोपदेशके।
तत्त्वरूपे च विंशच्च शमे च शतकं भवेत्॥ ४॥
तत्त्वोपदेशनामक पंचमदशप्रकरणमें २० श्लोक हैं। ज्ञानोपदेशनामक
२३- अवधूतगीता (१) (भगवान दत्तात्रेय)
५३६ * गीता-संग्रह *
षोडश प्रकरणमें १० श्लोक हैं। तत्त्वस्वरूपनामक सप्तदश प्रकरणमें २० श्लोक हैं। शमनामक अष्टादश प्रकरणमें १०० श्लोक हैं॥४॥
अष्टकं चात्मविश्रान्तौ जीवन्मुक्तौ चतुर्दश।
षट् सङ्ख्याक्रमविज्ञाने ग्रन्थैकात्म्यं ततः परम्॥५॥
विंशत्येकमितैः खण्डैः श्लोकैरात्माग्निमध्यखैः।
अवधूतानुभूतेशच श्लोकाः सङ्ख्याक्रमा अमी॥६॥
आत्मविश्रान्तिनामक उन्नीसवें प्रकरणमें ८ श्लोक हैं। जीवन्मुक्तिनामक विंशतिक प्रकरणमें १४ श्लोक हैं और संख्याक्रमविज्ञान नामक एकविंशतिक प्रकरणमें ६ श्लोक हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थमें इक्कीस प्रकरण और ३०३ श्लोक हैं। इस प्रकार अवधूतका अनुभवरूप जो ‘अष्टावक्रगीता’ है, उसके श्लोकोंकी संख्याका क्रम बताया है॥५-६॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां संख्याक्रमविज्ञाननाम एकविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम्॥२१॥
॥ अष्टावक्रगीता सम्पूर्ण॥
अवधूतगीता-(१)
[ भगवान् श्रीदत्तात्रेयकृत अवधूतगीता एक प्राचीन स्वतन्त्र ग्रन्थके रूपमें प्राप्त है। आठ अध्यायोंमें विभक्त इस गीतामें अवधूत श्रीदत्तात्रेयजीने मुमुक्षुजनोंके कल्याणार्थ वेदान्तमार्गद्वारा गूढ़ ब्रह्म-ज्ञानप्राप्तिका सुन्दर विवेचन किया है। इसमें आत्माका निरूपण, निर्द्वन्द्व भाव-कथन, जीव-ब्रह्मकी एकता, प्रणवका स्वरूप, वेदान्तके महावाक्योंपर विचार, ब्रह्मकी सर्वव्यापकता, मनकी लोलुपतासे निवृत्तिका उपाय, विषय-भोगकी निन्दा एवं उसके त्यागका उपाय इत्यादि अनेक परमोपयोगी उपदेश गुम्फित हैं। विरक्त मुमुक्षुजनों एवं प्रबुद्ध विचारकोंके मध्य यह अवधूतगीता प्राचीनकालसे लोकप्रिय बनी हुई है, इसीको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है— ]
पहला अध्याय
आत्मतत्त्व एवं ब्रह्मतत्त्वका निरूपण, उनका ऐक्य तथा अनुभूति
अवधूत उवाच
ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना ।
महद्भयपरित्राणा विप्राणामुपजायते ॥ १ ॥
अवधूत दत्तात्रेयजी बोले—ईश्वरकी कृपासे ही श्रेष्ठ पुरुषोंको [जन्ममरण-रूपी] महान् भयसे रक्षा करनेवाली अद्वैत वासना उत्पन्न होती है॥ १॥
येनेदं पूरितं सर्वमात्मनैवात्मनात्मनि ।
निराकारं कथं वन्दे ह्यभिन्नं शिवमव्ययम् ॥ २ ॥
जिस आत्माके द्वारा निश्चय ही अपनेमें यह सम्पूर्ण जगत् परिव्याप्त हो रहा है, उस निराकार आत्मतत्त्वकी वन्दना मैं किस प्रकार करूँ, क्योंकि वह [जीवसे] अभिन्न, कल्याणस्वरूप तथा अविनाशी है॥ २॥
पञ्चभूतात्मकं विश्वं मरीचिजलसन्निभम् ।
कस्याप्यहो नमस्कुर्यामहमेको निरञ्जनः ॥ ३ ॥
पाँच भूतों [पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश]–से निर्मित
अवधूतगीता (१) ❂ ॐ
अवधूत भगवान् दत्तात्रेयद्वारा आत्मतत्त्वका निरूपण
- अवधूतगीता ( १ ) * ५३९
यह जगत् मृगतृष्णाके जलके समान [मिथ्या] है। मायामलसे रहित मैं एक हूँ तो फिर किसको नमस्कार करूँ ? ॥ ३ ॥
आत्मैव केवलं सर्वं भेदाभेदो न विद्यते।
अस्ति नास्ति कथं ब्रूयां विस्मयः प्रतिभाति मे ॥ ४ ॥
[सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें] सब कुछ एकमात्र आत्मा ही है। इसमें भेद तथा अभेद दोनों ही नहीं है। यह है अथवा नहीं है—यह मैं कैसे कहूँ; मुझे विस्मय प्रतीत हो रहा है॥ ४ ॥
वेदान्तसारसर्वस्वं ज्ञानविज्ञानमेव च।
अहमात्मा निराकारः सर्वव्यापी स्वभावतः ॥ ५ ॥
वेदान्तका सार तथा ज्ञान-विज्ञान इतना ही है कि मैं स्वभावसे ही सर्वव्यापी निराकार आत्मा (ब्रह्मतत्त्व) हूँ॥ ५॥
यो वै सर्वात्मको देवो निष्कलो गगनोपमः।
स्वभावनिर्मलः शुद्धः स एवाहं न संशयः ॥ ६॥
जो सर्वरूप परमात्मा हैं, वे निश्चय ही अखण्ड, आकाशतुल्य, स्वभावसे निर्मल तथा शुद्ध हैं। मैं वही [चेतन ब्रह्म] हूँ; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६ ॥
अहमेवाव्ययोऽनन्तः शुद्धविज्ञानविग्रहः।
सुखं दुःखं न जानामि कथं कस्यापि वर्तते ॥ ७ ॥
मैं निश्चय ही नाशरहित, अनन्त तथा शुद्ध विज्ञानस्वरूप हूँ। मैं नहीं जानता कि यह सुख-दुःख किसीको भी किस प्रकार हो सकता है ॥ ७ ॥
न मानसं कर्म शुभाशुभं मे
न कायिकं कर्म शुभाशुभं मे।
न वाचिकं कर्म शुभाशुभं मे
ज्ञानामृतं शुद्धमतीन्द्रियोऽहम् ॥ ८ ॥
[कोई भी] मानसिक कर्म मेरे लिये शुभ अथवा अशुभ नहीं
५४० * गीता-संग्रह *
है, कायिक कर्म मेरे लिये शुभ अथवा अशुभ नहीं हैं और वाचिक कर्म मेरे लिये शुभ अथवा अशुभ नहीं है। मैं तो ज्ञानामृत, शुद्ध तथा इन्द्रियातीत हूँ॥८॥
मनो वै गगनाकारं मनो वै सर्वतोमुखम्।
मनोऽतीतं मनः सर्वं न मनः परमार्थतः॥९॥
मन आकाशके आकारवाला है, मनकी गति सभी ओर है, मन सबसे परे है और मन ही सब कुछ है, किंतु परमार्थकी दृष्टिसे मन कुछ भी नहीं है॥९॥
अहमेकमिदं सर्वं व्योमातीतं निरन्तरम्।
पश्यामि कथमात्मानं प्रत्यक्षं वा तिरोहितम्॥१०॥
मैं एक हूँ और यह दृश्यमान सर्वरूप भी मैं ही हूँ। मैं आकाशसे भी अतीत हूँ तथा असीम हूँ। मैं इस आत्माको प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष किस प्रकार देखूँ?॥१०॥
त्वमेवमेकं हि कथं न बुध्यसे
समं हि सर्वेषु विमृष्टमव्ययम्।
सदोदितोऽसि त्वमखण्डितः प्रभो
दिवा च नक्तं च कथं हि मन्यसे॥११॥
वस्तुतः तुम एक ही हो ऐसा क्यों नहीं समझते? सम्पूर्ण शरीरोंमें तुम (आत्मारूपसे) एक समान व्याप्त हो। तुम शाश्वत तथा अव्यय हो। हे प्रभो! तुम सर्वदा प्रकाशमान हो और भेदरहित हो। [निरन्तर प्रकाशमान होनेके कारण] तुम [उदयास्तरूप] दिन तथा रातको किस प्रकार मान सकते हो?॥११॥
आत्मानं सततं विद्धि सर्वत्रैकं निरन्तरम्।
अहं ध्याता परं ध्येयमखण्डं खण्ड्यते कथम्॥१२॥
[हे वत्स!] आत्मा (स्वयं)-को सर्वदा सर्वत्र एक तथा अनन्त
- अवधूतगीता (१) * ५४१
जानो। मैं ध्यान करनेवाला हूँ तथा अन्य कोई ध्यानका विषय है—
(यदि तुम ऐसा कहते हो) तो फिर उस भेदरहित आत्माको भेदयुक्त
कैसे किया जा सकता है?॥ १२॥
न जातो न मृतोऽसि त्वं न ते देहः कदाचन।
सर्वं ब्रह्मेति विख्यातं ब्रवीति बहुधा श्रुतिः॥ १३॥
[हे शिष्य!] वास्तवमें तुम न तो उत्पन्न होते हो और न मरते ही
हो; न तो यह देह ही कभी तुम्हारा है। सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म ही है—
ऐसा प्रसिद्ध है और श्रुति भी अनेक प्रकारसे ऐसा ही कहती है॥ १३॥
स बाह्याभ्यन्तरोऽसि त्वं शिवः सर्वत्र सर्वदा।
इतस्ततः कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत्॥ १४॥
[हे शिष्य!] [सम्पूर्ण प्राणियोंके] बाहर तथा भीतर रहनेवाला,
कल्याणस्वरूप, सर्वत्र सभी कालोंमें विद्यमान जो चेतन तत्त्व है, वह
तुम ही हो। [अतः उसकी प्राप्तिके लिये] भ्रमित होकर तुम [व्यर्थ
ही] पिशाचकी भाँति इधर-उधर क्यों दौड़ते हो?॥ १४॥
संयोगश्च वियोगश्च वर्तते न च ते न मे।
न त्वं नाहं जगन्नेदं सर्वमात्मैव केवलम्॥ १५॥
संयोग तथा वियोग न तुम्हारेमें है और न तो मुझमें ही है।
[वस्तुतः] न तुम हो, न मैं हूँ और न तो यह जगत् ही है; केवल
आत्मा ही सब कुछ है॥ १५॥
शब्दादिपञ्चकस्यास्य नैवासि त्वं न ते पुनः।
त्वमेव परमं तत्त्वमतः किं परितप्यसे॥ १६॥
शब्द आदि (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) पाँच विषयोंके साथ
तुम्हारा सम्बन्ध नहीं है और तुम्हारे साथ इनका भी सम्बन्ध नहीं
है। तुम ही परमतत्त्व हो, अतः तुम क्यों सन्तप्त होते हो?॥ १६॥
५४२ * गीता-संग्रह *
जन्म मृत्युर्न ते चित्तं बन्धमोक्षौ शुभाशुभौ।
कथं रोदिषि रे वत्स नामरूपं न ते न मे॥ १७॥
जन्म-मृत्यु, बन्धन-मोक्ष और शुभ-अशुभ—ये तुम्हारे नहीं हैं, ये चित्तके धर्म हैं, हे वत्स! तुम क्यों रोते हो; ये नाम तथा रूप तुम्हारे भी नहीं हैं और मेरे भी नहीं हैं॥ १७॥
अहो चित्त कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत्।
अभिन्नं पश्य चात्मानं रागत्यागात्सुखी भव॥ १८॥
हे चित्त! तुम भ्रमित होकर पिशाचकी भाँति क्यों दौड़ रहे हो? तुम आत्माको भेदरहित देखो और रागका त्याग करके सुखी हो जाओ॥ १८॥
त्वमेव तत्त्वं हि विकारवर्जितं
निष्कम्पमेकं हि विमोक्षविग्रहम्।
न ते च रागो ह्यथवा विरागः
कथं हि सन्तप्यसि कामकामतः॥ १९॥
तुम वास्तवमें विकारहीन, निश्चल तथा मोक्षस्वरूप [परम] तत्त्व हो। तुम्हें राग अथवा विराग भी नहीं है; तब तुम विषय-भोगोंकी कामनासे सन्तप्त क्यों होते हो?॥ १९॥
वदन्ति श्रुतयः सर्वा निर्गुणं शुद्धमव्ययम्।
अशरीरं समं तत्त्वं तन्मां विद्धि न संशयः॥ २०॥
सभी श्रुतियाँ परमतत्त्वको निर्गुण, शुद्ध, नाशरहित, शरीररहित और सबमें समरूप कहती हैं; उसे ही तुम आत्मस्वरूप जानो, इसमें सन्देह नहीं है॥ २०॥
साकारमनृतं विद्धि निराकारं निरन्तरम्।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः॥ २१॥
साकार (पदार्थों)-को मिथ्या जानो और निराकारको शाश्वत समझो। इस तत्त्वोपदेशको धारण करनेसे [इस संसारमें] पुनर्जन्म नहीं होता है॥ २१॥
- अवधूतगीता ( १ ) * ५४३
एकमेव समं तत्त्वं वदन्ति हि विपश्चितः।
रागत्यागात्पुनश्चित्तमेकानेकं न विद्यते॥ २२ ॥
विद्वज्जन एक ही आत्मतत्त्वको समरूप कहते हैं। रागका त्याग कर देनेसे पुनः चित्तमें द्वैत-अद्वैत (-का प्रपंच) नहीं रहता है॥ २२ ॥
अनात्मरूपं च कथं समाधि-
रात्मस्वरूपं च कथं समाधिः।
अस्तीति नास्तीति कथं समाधि-
र्मोक्षस्वरूपं यदि सर्वमेकम्॥ २३ ॥
अनात्मस्वरूपको समाधि कैसे हो सकती है और आत्म-स्वरूपको भी समाधिका क्या प्रयोजन है? आत्मा है अथवा आत्मा नहीं है—इन दोनों ही स्थितियोंमें समाधि सम्भव नहीं है; यदि सभी मोक्षस्वरूप और एक हैं तो समाधिकी क्या आवश्यकता है?॥ २३ ॥
विशुद्धोऽसि समं तत्त्वं विदेहस्त्वमजोऽव्ययः।
जानामीह न जानामीत्यात्मानं मन्यसे कथम्॥ २४ ॥
[हे शिष्य!] तुम विशुद्ध, समरस, देहरहित, जन्मरहित तथा अव्यय आत्मतत्त्व हो। ‘इस लोकमें मैं आत्माको जानता हूँ अथवा नहीं जानता हूँ’—ऐसा तुम क्यों मानते हो?॥ २४ ॥
तत्त्वमस्यादिवाक्यैश्च स्वात्मा हि प्रतिपादितः।
नेति नेति श्रुतिर्ब्रूयादनृतं पाञ्चभौतिकम्॥ २५ ॥
‘तत्त्वमसि’ आदि वचनोंके द्वारा अपनी आत्माका ही प्रतिपादन किया गया है और श्रुति भी जो ‘नेति-नेति’ का उद्घोष करती है, उसका तात्पर्य यही है कि यह पांचभौतिक जगत् मिथ्या है॥ २५ ॥
५४४ * गीता-संग्रह *
आत्मन्येवात्मना सर्वं त्वया पूर्णं निरन्तरम्।
ध्याता ध्यानं न ते चित्तं निर्लज्जं ध्यायते कथम्॥२६॥
तुम्हारे द्वारा सब कुछ आत्मामें निरन्तर आत्मासे ही पूर्ण हो रहा है। ध्यान करनेवाले तथा ध्यानकी तुम्हें आवश्यकता ही नहीं है; तो फिर यह लज्जारहित चित्त ध्यान कैसे करता है?॥२६॥
शिवं न जानामि कथं वदामि
शिवं न जानामि कथं भजामि।
अहं शिवश्चेत्परमार्थतत्त्वं
समस्वरूपं गगनोपमं च॥२७॥
मैं कल्याणस्वरूप ब्रह्मको नहीं जानता हूँ तो उसका वर्णन कैसे कर सकता हूँ, मैं उसे नहीं जानता हूँ तो उसका भजन कैसे कर सकता हूँ; मैं ही कल्याणस्वरूप, परमार्थस्वरूप, समस्वरूप और आकाशतुल्य ब्रह्म हूँ (तो भजन आदिकी क्या आवश्यकता?)॥२७॥
नाहं तत्त्वं समं तत्त्वं कल्पनाहेतुवर्जितम्।
ग्राह्यग्राहकनिर्मुक्तं स्वसंवेद्यं कथं भवेत्॥२८॥
मैं महत् आदि तत्त्व नहीं हूँ और साम्यावस्थारूप प्रकृति तत्त्व भी नहीं हूँ। मैं कल्पना तथा हेतुसे रहित हूँ और ग्राह्य-ग्राहक भावसे निर्मुक्त हूँ; ऐसी स्थितिमें स्वसंवेद्यता भी कैसे सम्भव है?॥२८॥
अनन्तरूपं न हि वस्तु किञ्चित्
तत्त्वस्वरूपं न हि वस्तु किञ्चित्।
आत्मैकरूपं परमार्थतत्त्वं
न हिंसको वापि न चाप्यहिंसा॥२९॥
कोई भी वस्तु अनन्तरूप नहीं है और कोई भी वस्तु तत्त्वस्वरूप नहीं है; वस्तुतः आत्मा ही एकरूप परमतत्त्वके रूपमें अधिष्ठित है। [अद्वैत भावकी स्थितिमें] न कोई हिंसक है और न अहिंसाकी ही
* अवधूतगीता ( १ ) * ५४५
भावना रहती है॥ २९॥
विशुद्धोऽसि समं तत्त्वं विदेहमजमव्ययम्।
विभ्रमं कथमात्मार्थे विभ्रान्तोऽहं कथं पुनः॥ ३०॥
तुम विशुद्ध हो; देहरहित, जन्मरहित, अव्यय तथा समरस तत्त्व हो। आत्माके विषयमें तुम्हें भ्रान्ति क्यों है? तुम कैसे कह सकते हो कि मैं भ्रान्तियुक्त हूँ?॥ ३०॥
घटे भिन्ने घटाकाशं सुलीनं भेदवर्जितम्।
शिवेन मनसा शुद्धो न भेदः प्रतिभाति मे॥ ३१॥
घटके नष्ट हो जानेपर घटाकाश (घटके भीतरका आकाश) महाकाशमें पूरी तरह विलीन हो जाता है और भेदरहित हो जाता है। परमतत्त्वमें शुद्ध मनके द्वारा किसी भेदकी प्रतीति नहीं होती है॥ ३१॥
न घटो न घटाकाशो न जीवो जीवविग्रहः।
केवलं ब्रह्म संविद्धि वेद्यवेदकवर्जितम्॥ ३२॥
[उस चेतन ब्रह्ममें उपाधिरूप] घट नहीं है, घटाकाश भी नहीं है, [अन्तःकरणरूपी उपाधिके अभावसे] जीव भी नहीं है और जीवका विग्रह भी नहीं है। अतः ज्ञेय-ज्ञाताके भेदसे रहित एकमात्र उस परब्रह्मको भली-भाँति जानो॥ ३२॥
सर्वत्र सर्वदा सर्वमात्मानं सततं ध्रुवम्।
सर्वं शून्यमशून्यं च तन्मां विद्धि न संशयः॥ ३३॥
आत्माको सर्वत्र, सभी कालोंमें विद्यमान, सर्वरूप, सतत तथा शाश्वत जानो। सभी शून्य तथा अशून्य (पदार्थों)-को निस्संदेह आत्मस्वरूप समझो॥ ३३॥
वेदा न लोका न सुरा न यज्ञा
वर्णाश्रमौ नैव कुलं न जातिः।