गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* अवधूतगीता ( १ ) * ५४५
भावना रहती है॥ २९॥
विशुद्धोऽसि समं तत्त्वं विदेहमजमव्ययम्।
विभ्रमं कथमात्मार्थे विभ्रान्तोऽहं कथं पुनः॥ ३०॥
तुम विशुद्ध हो; देहरहित, जन्मरहित, अव्यय तथा समरस तत्त्व हो। आत्माके विषयमें तुम्हें भ्रान्ति क्यों है? तुम कैसे कह सकते हो कि मैं भ्रान्तियुक्त हूँ?॥ ३०॥
घटे भिन्ने घटाकाशं सुलीनं भेदवर्जितम्।
शिवेन मनसा शुद्धो न भेदः प्रतिभाति मे॥ ३१॥
घटके नष्ट हो जानेपर घटाकाश (घटके भीतरका आकाश) महाकाशमें पूरी तरह विलीन हो जाता है और भेदरहित हो जाता है। परमतत्त्वमें शुद्ध मनके द्वारा किसी भेदकी प्रतीति नहीं होती है॥ ३१॥
न घटो न घटाकाशो न जीवो जीवविग्रहः।
केवलं ब्रह्म संविद्धि वेद्यवेदकवर्जितम्॥ ३२॥
[उस चेतन ब्रह्ममें उपाधिरूप] घट नहीं है, घटाकाश भी नहीं है, [अन्तःकरणरूपी उपाधिके अभावसे] जीव भी नहीं है और जीवका विग्रह भी नहीं है। अतः ज्ञेय-ज्ञाताके भेदसे रहित एकमात्र उस परब्रह्मको भली-भाँति जानो॥ ३२॥
सर्वत्र सर्वदा सर्वमात्मानं सततं ध्रुवम्।
सर्वं शून्यमशून्यं च तन्मां विद्धि न संशयः॥ ३३॥
आत्माको सर्वत्र, सभी कालोंमें विद्यमान, सर्वरूप, सतत तथा शाश्वत जानो। सभी शून्य तथा अशून्य (पदार्थों)-को निस्संदेह आत्मस्वरूप समझो॥ ३३॥
वेदा न लोका न सुरा न यज्ञा
वर्णाश्रमौ नैव कुलं न जातिः।