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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 532
  • अष्टावक्रगीता * ५३१

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकता।
क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥२॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये धर्म कहाँ ? काम कहाँ ? अर्थ कहाँ? विवेक कहाँ? द्वैत कहाँ और अद्वैत कहाँ?॥२॥

क्व भूतं क्व भविष्यद्वा वर्तमानमपि क्व वा।
क्व देशः क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥३॥

मैं सदा-सर्वदा अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये भूत, भविष्य तथा वर्तमान-रूप काल कहाँ, देश कहाँ?॥३॥

क्व चात्मा क्व च वानात्मा क्व शुभं क्वाशुभं तथा।
क्व चिन्ता क्व च वाचिन्ता स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥४॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये आत्मा-अनात्मा, शुभ-अशुभ चिन्ता एवं अचिन्ताका अस्तित्व ही कहाँ है?॥४॥

क्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणं तथा।
क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥५॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ स्वप्न और कहाँ सुषुप्ति ? कहाँ जागरण और कहाँ तुरीय ? मेरे लिये भय ही कहाँ है?॥५॥

क्व दूरं क्व समीपं वा बाह्यं क्वाभ्यन्तरं क्व वा।
क्व स्थूलं क्व च वा सूक्ष्मं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥६॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ दूर और कहाँ समीप? कहाँ बाह्य और कहाँ आभ्यन्तर? कहाँ स्थूल और कहाँ सूक्ष्म ?॥६॥

क्व मृत्युर्जीवितं वा क्व लोकाः क्वास्य क्व लौकिकम्।
क्व लयः क्व समाधिर्वा स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥७॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ मृत्यु और कहाँ