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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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५३० * गीता-संग्रह *


मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्तव्यनिर्वृतः।
समः सर्वत्र वैतृष्ण्यान्न स्मरत्यकृतं कृतम्॥ ९८॥

तत्त्वज्ञ समस्त स्थितियोंमें स्वरूपस्थित रहता है। कृतकृत्य होनेके कारण परम शान्त होता है। सर्वत्र सम रहता है। तृष्णाका अभाव होनेके कारण वह 'क्या किया, क्या नहीं किया'—इन बातोंका स्मरण नहीं करता॥ ९८॥

न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति।
नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति॥ ९९॥

वन्दना करनेसे वह प्रसन्न नहीं होता, निन्दा करनेसे क्रुद्ध नहीं होता, मृत्युसे उद्वेग नहीं करता और जीवनका अभिनन्दन नहीं करता॥ ९९॥

न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः।
यथा तथा यत्र तत्र सम एवावतिष्ठते॥ १००॥

शान्तचित्त तत्त्वज्ञ न तो जनसमूहकी ओर दौड़ता है और न जंगलकी ओर। जहाँ जिस स्थितिमें वह होता है, वहाँ समचित्त ही रहता है॥ १००॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शान्तिशतकं नामाष्टादशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १८॥


उन्नीसवाँ प्रकरण

तत्त्वज्ञानीकी विवेक-प्रक्रिया

तत्त्वविज्ञानसन्दंशमादाय हृदयोदरात्।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया॥ १॥

जैसे सफल चिकित्सक सँड़सीके द्वारा पेटमें घुसे हुए बाणोंको बड़ी चतुरतासे निकाल लेता है, वैसे ही मैंने तत्त्वज्ञानके द्वारा अपने हृदयसे अनेक प्रकारके संकल्प-विकल्प, विचार-विमर्शको निकाल फेंका है॥ १॥