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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

About this granth

Beyond the Bhagavad Gita, the epics and Puranas contain many other dialogues called 'Gitas'. Gita Sangraha (गीता-संग्रह, Gita Press book no. 1958) gathers twenty-five of them, each with its original text and a Hindi translation.

The contents show the range: the Ganesha Gita from the Ganesha Purana; the Bhikshu, Paramahamsa, Hamsa and Avadhuta Gitas from the Bhagavata; from the Mahabharata the Shadja, Pingala, Shampaka, Manki, Ajagara, Harita, Vritra, Putra, Kama and Narada Gitas, a second Hamsa Gita and the Uttara Gita; two Yama Gitas from the Vishnu and Agni Puranas; two Rama Gitas from the Adhyatma and Adbhuta Ramayanas; the Bhagavati (Parvati) Gita from the Devi Purana; and the Ashtavakra Gita and Dattatreya's Avadhuta Gita.

Many of these are short teachings on detachment, contentment, self-knowledge and devotion, such as the courtesan Pingala's awakening or the sage who lives like a python. The copy here is the sixth reprint, of Samvat 2074, and its 675 pages bring these scattered texts together in one volume.

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  • मङ्गिगीता * १८९

तो उसके लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या हो सकता है? यदि धनकी उपलब्धि हो भी जाय तो उतनेसे ही वह सन्तुष्ट नहीं होता है, अपितु अधिक धनकी तलाश करने लग जाता है॥ २७॥

अनुतर्षुल एवार्थः स्वादु गाङ्गमिवोदकम्।
मद्विलापनमेतत्तु प्रतिबुद्धोऽस्मि सन्त्यज ॥ २८ ॥

काम! स्वादिष्ट गंगाजलके समान यह धन तृष्णाकी ही वृद्धि करनेवाला है, मैं अच्छी तरह जान गया हूँ कि यह तृष्णाकी वृद्धि मेरे विनाशका कारण है; अतः तू मेरा पिण्ड छोड़ दे॥ २८ ॥

य इमं मामकं देहं भूतग्रामः समाश्रितः।
स यात्वितो यथाकामं वसतां वा यथासुखम्॥ २९॥

मेरे इस शरीरका आश्रय लेकर जो पाँचों भूतोंका समुदाय स्थित है, वह इसमेंसे अपनी इच्छाके अनुसार सुखपूर्वक चला जाय या इसमें रहे, इसकी मुझे परवा नहीं है॥ २९॥

न युष्मास्विह मे प्रीतिः कामलोभानुसारिषु।
तस्मादुत्सृज्य कामान् वै सत्त्वमेवाश्रयाम्यहम्॥ ३०॥

पंचभूतगण! अहंकार आदिके साथ तुम सब लोग काम और लोभके पीछे लगे रहनेवाले हो। अतः तुमपर यहाँ मेरा रत्तीभर भी स्नेह नहीं है। इसलिये मैं समस्त कामनाओंको छोड़कर केवल अब सत्त्वगुणका आश्रय ले रहा हूँ॥ ३०॥

सर्वभूतान्यहं देहे पश्यन् मनसि चात्मनः।
योगे बुद्धिं श्रुते सत्त्वं मनो ब्रह्मणि धारयन्॥ ३१ ॥
विहरिष्याम्यनासक्तः सुखी लोकान् निरामयः।
यथा मां त्वं पुनर्नैवं दुःखेषु प्रणिधास्यसि ॥ ३२ ॥

मैं अपने शरीरमें मनके अंदर सम्पूर्ण भूतोंको देखता हुआ बुद्धिको योगमें, एकाग्रचित्तको श्रवण-मनन आदि साधनोंमें और मनको परब्रह्म

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१९० * गीता-संग्रह *


परमात्मामें लगाकर रोग-शोकसे रहित एवं सुखी हो सम्पूर्ण लोकोंमें
अनासक्त भावसे विचरूँगा, जिससे तू फिर मुझे इस प्रकार दुःखोंमें
न डाल सकेगा॥ ३१-३२॥

त्वया हि मे प्रणुन्नस्य गतिरन्या न विद्यते।
तृष्णाशोकश्रमाणां हि त्वं काम प्रभवः सदा॥ ३३॥

काम! तृष्णा, शोक और परिश्रम—इनका उत्पत्तिस्थान सदा तू
ही है। जबतक तू मुझे प्रेरित करके इधर-उधर भटकाता रहेगा, तबतक
मेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है॥ ३३॥

धननाशेऽधिकं दुःखं मन्ये सर्वमहत्तरम्।
ज्ञातयो ह्यवमन्यन्ते मित्राणि च धनाच्च्युतम्॥ ३४॥

मैं तो समझता हूँ कि धनका नाश होनेपर जो अत्यन्त दुःख
होता है, वही सबसे बढ़कर है; क्योंकि जो धनसे वंचित हो जाता
है, उसे अपने भाई-बन्धु और मित्र भी अपमानित करने लगते
हैं॥ ३४॥

अवज्ञानसहस्त्रैस्तु दोषाः कष्टतराऽधने।
धने सुखकला या तु सापि दुःखैर्विधीयते॥ ३५॥

दरिद्रको सहस्त्र-सहस्त्र तिरस्कार सहने पड़ते हैं; अतः निर्धन
अवस्थामें बहुत-से कष्टदायक दोष हैं; और धनमें जो सुखका लेश
प्रतीत होता है, वह भी दुःखोंसे ही सम्पादित होता है॥ ३५॥

धनमस्येति पुरुषं पुरो निघ्नन्ति दस्यवः।
क्लिश्यन्ति विविधैर्दण्डैर्नित्यमुद्वेजयन्ति च॥ ३६॥

जिस पुरुषके पास धन होनेका संदेह होता है, उसे उसका धन
लूटनेके लिये लुटेरे मार डालते हैं अथवा उसे तरह-तरहकी पीड़ाएँ
देकर सताते और सदा उद्वेगमें डाले रहते हैं॥ ३६॥

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  • मङ्किगीता * १९१

अर्थलोलुपता दुःखमिति बुद्धं चिरान्मया।
यद् यदालम्बसे काम तत्तदेवानुरुध्यसे॥ ३७॥

धनलोलुपता दुःखका कारण है, यह बात बहुत देरके बाद मेरी समझमें आयी हैं। काम! तू जिस-जिसका आश्रय लेता है, उसी-उसीके पीछे पड़ जाता है॥ ३७॥

अतत्त्वज्ञोऽसि बालश्च दुस्तोषोऽपूरणोऽनलः।
नैव त्वं वेत्थ सुलभं नैव त्वं वेत्थ दुर्लभम्॥ ३८॥

तू तत्त्वज्ञानसे रहित और बालकके समान मूढ़ है, तुझे सन्तोष देना कठिन है। आगके समान तेरा पेट भरना असम्भव है। तू यह नहीं जानता कि कौन-सी वस्तु सुलभ है और कौन-सी दुर्लभ॥ ३८॥

पाताल इव दुष्पूरो मां दुःखैर्योक्तुमिच्छसि।
नाहमद्य समावेष्टुं शक्यः काम पुनस्त्वया॥ ३९॥

काम! पातालके समान तुझे भरना कठिन है। तू मुझे दुःखोंमें फँसाना चाहता है; किंतु अब तू फिर मेरे भीतर प्रवेश नहीं कर सकता॥ ३९॥

निर्वेदमहमासाद्य द्रव्यनाशाद् यदृच्छया।
निर्वृत्तिं परमां प्राप्य नाद्य कामान् विचिन्तये॥ ४०॥

अकस्मात् धनका नाश हो जानेसे वैराग्यको प्राप्त होकर मुझे परम सुख मिल गया है। अब मैं भोगोंका चिन्तन नहीं करूँगा॥ ४०॥

अतिक्लेशान् सहामीह नाहं बुद्ध्याम्यबुद्धिमान्।
निकृतो धननाशेन शये सर्वाङ्गविज्वरः॥ ४१॥

पहले मैं बड़े-बड़े क्लेश सहता था, परंतु ऐसा बुद्धिहीन हो गया था कि 'धनकी कामनामें कष्ट है,' इस बातको समझ ही नहीं पाता था। परंतु अब धनका नाश होनेसे उससे वंचित होकर मैं सम्पूर्ण अंगोंमें क्लेश और चिन्ताओंसे मुक्त होकर सुखसे सोता हूँ॥ ४१॥

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१९२ * गीता-संग्रह *


परित्यजामि काम त्वां हित्वा सर्वमनोगतीः।
न त्वं मया पुनः काम वत्स्यसे न च रंस्यसे॥ ४२ ॥
काम! मैं अपनी सम्पूर्ण मनोवृत्तियोंको दूर हटाकर तेरा परित्याग कर रहा हूँ। अब तू फिर मेरे साथ न तो रह सकेगा और न मौज ही कर सकेगा॥ ४२ ॥

क्षमिष्ये क्षिपमाणानां न हिंसिष्ये विहिंसितः।
द्वेष्ययुक्तः प्रियं वक्ष्याम्यनादृत्य तदप्रियम्॥ ४३ ॥
अब जो लोग मुझपर आक्षेप या मेरा तिरस्कार करेंगे, उनके उस बर्तावको मैं चुपचाप सह लूँगा। जो लोग मुझे मारे-पीटेंगे या कष्ट देंगे, उनके साथ भी मैं बदलेमें वैसा बर्ताव नहीं करूँगा। द्वेषके योग्य पुरुषका भी यदि साथ हो जाय और वह मुझे अप्रिय वचन कहने लगे तो मैं उसपर ध्यान न देकर उससे अप्रिय वचन नहीं बोलूँगा॥ ४३ ॥

तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं यथालब्धेन वर्तयन्।
न सकामं करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मनः॥ ४४ ॥
मैं सदा सन्तुष्ट एवं स्वस्थ इन्द्रियोंसे सम्पन्न रहकर भाग्यवश जो कुछ मिल जाय, उसीसे जीवन-निर्वाह करता रहूँगा; परंतु तुझे कभी सफल न होने दूँगा; क्योंकि तू मेरा शत्रु है॥ ४४ ॥

निर्वेदं निर्वृतिं तृप्तिं शान्तिं सत्यं दमं क्षमाम्।
सर्वभूतदयां चैव विद्धि मां समुपागतम्॥ ४५ ॥
तू यह अच्छी तरह समझ ले कि मुझे वैराग्य, सुख, तृप्ति, शान्ति, सत्य, दम, क्षमा और समस्त प्राणियोंके प्रति दयाभाव—ये सभी सद्गुण प्राप्त हो गये हैं॥ ४५ ॥

तस्मात् कामश्च लोभश्च तृष्णा कार्पण्यमेव च।
त्यजन्तु मां प्रतिष्ठन्तं सत्त्वस्थो ह्यस्मि साम्प्रतम्॥ ४६ ॥
अतः काम, लोभ, तृष्णा और कृपणताको चाहिये कि वे मोक्षकी

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  • मङ्किगीता * १९३

ओर प्रस्थान करनेवाले मुझ साधकको छोड़कर चले जायें। अब मैं सत्त्वगुणमें स्थित हो गया हूँ॥ ४६ ॥
प्रहाय कामं लोभं च सुखं प्राप्तोऽस्मि साम्प्रतम्।
नाद्य लोभवशं प्राप्तो दुःखं प्राप्स्याम्यनात्मवान् ॥ ४७ ॥
इस समय काम और लोभका त्याग करके मैं प्रत्यक्ष ही सुखी हो गया हूँ; अतः अजितेन्द्रिय पुरुषकी भाँति अब लोभमें फँसकर दुःख नहीं उठाऊँगा ॥ ४७ ॥
यद् यत् त्यजति कामानां तत् सुखस्याभिपूयते।
कामस्य वशगो नित्यं दुःखमेव प्रपद्यते ॥ ४८ ॥
मनुष्य जिस-जिस कामनाको छोड़ देता है, उस-उसकी ओरसे सुखी हो जाता है। कामनाके वशीभूत होकर तो वह सर्वदा दुःख ही पाता है ॥ ४८ ॥
कामानुबन्धं नुदते यत् किञ्चित् पुरुषो रजः।
कामक्रोधोद्भवं दुःखमह्रीररतिरेव च ॥ ४९ ॥
मनुष्य कामसे सम्बन्ध रखनेवाला जो कुछ भी रजोगुण हो, उसे दूर कर दे। दुःख, निर्लज्जता और असन्तोष—ये काम और क्रोधसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं॥ ४९ ॥
एष ब्रह्मप्रतिष्ठोऽहं ग्रीष्मे शीतमिव ह्रदम्।
शाम्यामि परिनिर्वामि सुखं मामेति केवलम् ॥ ५० ॥
जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें लोग शीतल जलवाले सरोवरमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार अब मैं परब्रह्ममें प्रतिष्ठित हो गया हूँ, अतः शान्त हूँ, सब ओरसे निर्वाणको प्राप्त हो गया हूँ। अब मुझे केवल सुख-ही-सुख मिल रहा है ॥ ५० ॥
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ ५१ ॥
इस लोकमें जो विषयोंका सुख है तथा परलोकमें जो दिव्य एवं

८- आजगरगीता (महाभारत)

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१९४ * गीता-संग्रह *


महान् सुख है, ये दोनों प्रकारके सुख तृष्णाके क्षयसे होनेवाले सुखकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं॥५१॥

आत्मना सप्तमं कामं हत्वा शत्रुमिवोत्तमम्।
प्राप्यावध्यं ब्रह्मपुरं राजेव स्यामहं सुखी॥५२॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य और ममता—ये देहधारियोंके सात शत्रु हैं। इनमें सातवाँ कामरूप शत्रु सबसे प्रबल है। उन सबके साथ इस महान् शत्रु कामका नाश करके मैं अविनाशी ब्रह्मपुरमें स्थित हो राजाके समान सुखी होऊँगा॥५२॥

एतां बुद्धिं समास्थाय मङ्किर्निर्वेदमागतः।
सर्वान् कामान् परित्यज्य प्राप्य ब्रह्म महत्सुखम्॥५३॥
[राजन्!] इसी बुद्धिका आश्रय लेकर मंकि धन और भोगोंसे विरक्त हो गये और समस्त कामनाओंका परित्याग करके उन्होंने परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त कर लिया॥५३॥

दम्यनाशकृते मङ्किरमृतत्वं किलागमत्।
अच्छिनत् काममूलं स तेन प्राप महत्सुखम्॥५४॥
बछड़ोंके नाशको निमित्त बनाकर ही मङ्कि अमृतत्वको प्राप्त हो गये। उन्होंने कामकी जड़ काट डाली; इसीलिये महान् सुख प्राप्त कर लिया॥५४॥

॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मङ्गिगीता सम्पूर्णा॥

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आजगरगीता

[आजगरगीतामें एक विरक्त अवधूतद्वारा राजा प्रह्लादको दिये गये उपदेशोंका वर्णन है। यह प्रकरण महाभारतके शान्तिपर्वमें भीष्मद्वारा युधिष्ठिरको दिये गये उपदेशोंके मध्य आया है। यह गीता न केवल विरक्त संन्यासियोंके लिये उपयोगी है, अपितु उन वृद्धजनोंके लिये भी विशेष उपयोगी है, जो प्रायः अपने सभी पारिवारिक दायित्वोंको पूर्ण कर चुके हैं तथा शेष जीवन सुख-शान्तिसे बिताना चाहते हैं। सुविधाओं तथा अभावोंमें सम रहनेकी प्रेरणा देनेवाली यह गीता सानुवाद यहाँ प्रस्तुत की जा रही है—]

युधिष्ठिर उवाच

केन वृत्तेन वृत्तज्ञ वीतशोकश्चरेन्महीम्।
किञ्च कुर्वन्नरो लोके प्राप्नोति गतिमुत्तमाम्॥ १॥

राजा युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! आप सदाचारके स्वरूपको जाननेवाले हैं। कृपया यह बताइये, किस तरहके आचारको अपनाकर मनुष्य शोकरहित हो इस पृथ्वीपर विचरण कर सकता है? और इस जगत्में कौन-सा कर्म करके वह उत्तम गति पा सकता है?॥ १॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
प्रह्लादस्य च संवादं मुनेराजगरस्य च॥ २॥

भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इस विषयमें भी प्रह्लाद तथा अजगरवृत्तिसे रहनेवाले एक मुनिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया जाता है॥ २॥

चरन्तं ब्राह्मणं कञ्चित् कल्पचित्तमनामयम्।
पप्रच्छ राजा प्रह्लादो बुद्धिमान् बुद्धिसम्मतम्॥ ३॥

एक सुदृढ़चित्त, दुःख-शोकसे रहित तथा बुद्धिसम्मत ब्राह्मणको

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१९६ * गीता-संग्रह *


पृथ्वीपर विचरते देख बुद्धिमान् राजा प्रह्लादने उससे इस प्रकार पूछा॥ ३ ॥

प्रह्लाद उवाच

स्वस्थः शक्तो मृदुर्दान्तो निर्विधित्सोऽनसूयकः।
सुवाक् प्रगल्भो मेधावी प्राज्ञश्चरसि बालवत्॥ ४॥

प्रह्लाद बोले— ब्रह्मन्! आप स्वस्थ, शक्तिमान्, मृदु, जितेन्द्रिय, कर्मारम्भसे दूर रहनेवाले, दूसरोंके दोषोंपर दृष्टि न डालनेवाले, सुन्दर और मधुर वचन बोलनेवाले, निर्भीक, प्रतिभाशाली, मेधावी तथा तत्त्वज्ञ होकर भी बालकोंके समान विचर रहे हैं॥ ४॥

नैव प्रार्थयसे लाभं नालाभेष्वनुशोचसि।
नित्यतृप्त इव ब्रह्मन् न किञ्चिदिव मन्यसे॥ ५॥

न आप कोई लाभ चाहते हैं और न हानि होनेपर उसके लिये ही शोक करते हैं। ब्रह्मन्! आप नित्यतृप्त-से रहते हुए न किसी वस्तुको प्रिय मानते हैं और न अप्रिय॥ ५॥

स्रोतसा ह्रियमाणासु प्रजासु विमना इव।
धर्मकामार्थकार्येषु कूटस्थ इव लक्ष्यसे॥ ६॥

सारी प्रजा काम-क्रोध आदिके प्रवाहमें पड़कर बही जा रही है; परंतु आप उधरसे उदासीन-जैसे जान पड़ते हैं तथा धर्म, अर्थ एवं काम-सम्बन्धी कार्योंके प्रति भी निश्चेष्ट-से दिखायी देते हैं॥ ६॥

नानुतिष्ठसि धर्मार्थौ न कामे चापि वर्तसे।
इन्द्रियार्थाननादृत्य मुक्तश्चरसि साक्षिवत्॥ ७॥

धर्म और अर्थ-सम्बन्धी कार्योंका आप अनुष्ठान नहीं करते हैं, काममें भी आपकी प्रवृत्ति नहीं है। आप इन्द्रियोंके सम्पूर्ण विषयोंकी उपेक्षा करके साक्षीके समान मुक्तरूपसे विचरते हैं॥ ७॥

का नु प्रज्ञा श्रुतं वा किं वृत्तिर्वा का नु ते मुने।
क्षिप्रमाचक्ष्व मे ब्रह्मन् श्रेयो यदिह मन्यसे॥ ८॥

मुने! आपके पास कौन-सी ऐसी बुद्धि, कैसा शास्त्रज्ञान अथवा

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  • आजगरगीता * १९७

कौन-सी वृत्ति है, जिससे आपका जीवन ऐसा बन गया है? ब्रह्मन्! आपके मतसे इस जगत्में मेरे लिये जो श्रेयका साधन हो, उसे शीघ्र बतायें ॥ ८॥

भीष्म उवाच
अनुयुक्तः स मेधावी लोकधर्मविधानवित्।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा प्रह्लादमनपार्थया ॥ ९॥

भीष्मजी कहते हैं—राजन्! प्रह्लादके इस प्रकार पूछनेपर लोक-धर्मके विधानको जाननेवाले उन मेधावी मुनिने उनसे मधुर एवं सार्थक वाणीमें इस प्रकार कहा— ॥ ९॥

पश्य प्रह्लाद भूतानामुत्पत्तिमनिमित्ततः।
ह्रासं वृद्धिं विनाशं च न प्रहृष्ये न च व्यथे ॥ १०॥

प्रह्लाद! देखो, इस जगत्के प्राणियोंकी उत्पत्ति, वृद्धि, ह्रास और विनाश कारणरहित सत्स्वरूप परमात्मासे ही हुए हैं; इस कारण मैं उनके लिये न तो हर्ष प्रकट करता हूँ और न व्यथित ही होता हूँ॥ १०॥

स्वभावादेव संदृश्या वर्तमानाः प्रवृत्तयः।
स्वभावनिरताः सर्वाः परितुष्येन्न केनचित् ॥ ११॥

ऐसा समझना चाहिये, पूर्वकृत कर्मानुसार बने हुए स्वभावसे ही प्राणियोंकी वर्तमान प्रवृत्तियाँ प्रकट हुई हैं; अतः समस्त प्रजा स्वभावमें ही तत्पर है, उनका दूसरा कोई आश्रय नहीं है। इस रहस्यको समझकर मनुष्यको किसी भी परिस्थितिमें सन्तुष्ट नहीं होना चाहिये ॥ ११॥

पश्य प्रह्लाद संयोगान् विप्रयोगपरायणान्।
सञ्चयांश्च विनाशान्तान् न क्वचिद् विदधे मनः ॥ १२॥

प्रह्लाद! देखो, जितने संयोग हैं, उनका पर्यवसान वियोगमें ही होता है और जितने संचय हैं, उनकी समाप्ति विनाशमें ही होती है। यह सब देखकर मैं कहीं भी अपने मनको नहीं लगाता हूँ॥ १२॥

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१९८

  • गीता-संग्रह *

अन्तवन्ति च भूतानि गुणयुक्तानि पश्यतः।
उत्पत्तिनिधनज्ञस्य किं कार्यमवशिष्यते॥ १३॥
जो गुणयुक्त सम्पूर्ण भूतोंको नाशवान् देखता है तथा उत्पत्ति और प्रलयके तत्त्वको जानता है, उसके लिये यहाँ कौन-सा कार्य अवशिष्ट रह जाता है?॥ १३॥

जलजानामपि ह्यन्तं पर्यायेणोपलक्षये।
महतामपि कायानां सूक्ष्माणां च महोदधौ॥ १४॥
महासागरके जलमें पैदा होनेवाले विशाल शरीरवाले तिमि आदि मत्स्यों तथा छोटे-छोटे कीड़ोंका भी मैं बारी-बारीसे विनाश होता देखता हूँ॥ १४॥

जङ्गमस्थावराणां च भूतानामसुराधिप।
पार्थिवानामापि व्यक्तं मृत्युं पश्यामि सर्वशः॥ १५॥
असुरराज ! पृथ्वीपर भी जितने स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबकी मृत्यु मुझे स्पष्ट दिखायी दे रही है॥ १५॥

अन्तरिक्षचराणां च दानवोत्तम पक्षिणाम्।
उत्तिष्ठते यथाकालं मृत्युर्बलवतामपि॥ १६॥
दानवश्रेष्ठ! आकाशमें विचरनेवाले बलवान् पक्षियोंके समक्ष भी यथासमय मृत्यु आ पहुँचती है॥ १६॥

दिवि सञ्चरमाणानि ह्रस्वानि च महान्ति च।
ज्योतींष्यपि यथाकालं पतमानानि लक्षये॥ १७॥
आकाशमें जो छोटे-बड़े ज्योतिर्मय नक्षत्र विचर रहे हैं, उन्हें भी मैं यथासमय नीचे गिरते देखता हूँ॥ १७॥

इति भूतानि सम्पश्यन्ननुषक्तानि मृत्युना।
सर्वसामान्यगो विद्वान् कृतकृत्यः सुखं स्वपे॥ १८॥
इस प्रकार सारे प्राणियोंको मैं मृत्युके पाशमें बद्ध देखता हूँ; इसलिये तत्त्वको जानकर कृतकृत्य हो सबके प्रति समान भाव रखता

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  • आजगरगीता * १९९

हुआ सुखसे सोता हूँ॥ १८॥
सुमहान्तमपि ग्रासं ग्रसे लब्धं यदृच्छया।
शये पुनरभुञ्जानो दिवसानि बहून्यपि॥ १९॥
यदि दैवेच्छासे अकस्मात् अधिक भोजन प्राप्त हो जाय तो मैं बहुत खा लेता हूँ, ग्रासमात्र मिले तो उसीमें सन्तुष्ट रहता हूँ और न मिला तो बहुत दिनोंतक बिना खाये-पीये भी सो रहता हूँ॥ १९॥
आशयन्त्यपि मामन्नं पुनर्बहुगुणं बहु।
पुनरल्पं पुनःस्तोकं पुनर्नैवोपपद्यते॥ २०॥
फिर कितने ही लोग आकर मुझे अनेक गुणोंसे सम्पन्न बहुत-सा अन्न खिला देते हैं। पुनः कभी बहुत थोड़ा, कभी थोड़ेसे भी थोड़ा भोजन मिलता है और कभी वह भी नहीं मिलता॥ २०॥
कणं कदाचित् खादामि पिण्याकमपि च ग्रसे।
भक्षये शालिमांसानि भक्षांश्चोच्चावचान् पुनः॥ २१॥
कभी चावलकी कनी खाता हूँ, कभी तिलकी खली ही खाकर रह जाता हूँ और कभी अगहनीके चावलका भात भरपेट खाता हूँ। इस प्रकार मुझे बढ़िया-घटिया सभी तरहके भोजन बारम्बार प्राप्त होते रहते हैं॥ २१॥
शये कदाचित् पर्यङ्के भूमावपि पुनः शये।
प्रासादे चापि मे शय्या कदाचिदुपपद्यते॥ २२॥
कभी पलंगपर सोता हूँ, कभी पृथ्वीपर ही पड़ा रहता हूँ और कभी-कभी मुझे महलके भीतर बिछी हुई बहुमूल्य शय्या भी उपलब्ध हो जाती है॥ २२॥
धारयामि च चीराणि शाणक्षौमाजिनानि च।
महार्हाणि च वासांसि धारयाम्यहमेकदा॥ २३॥
मैं कभी तो चिथड़े अथवा वल्कल पहनकर रहता हूँ, कभी सनके, कभी रेशमके और कभी मृगचर्मके वस्त्र धारण करता हूँ तथा किसी

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२०० * गीता-संग्रह *

एक कालमें बहुत-से बहुमूल्य वस्त्रोंको भी पहन लेता हूँ॥ २३॥
न संनिपतितं धर्म्यमुपभोगं यदृच्छया।
प्रत्याचक्षे न चाप्येनमनुरुध्ये सुदुर्लभम्॥ २४॥

यदि दैववश मुझे कोई धर्मानुकूल भोग्य पदार्थ प्राप्त हो जाय तो मैं उससे द्वेष नहीं करता हूँ और प्राप्त न होनेपर किसी दुर्लभ भोगकी भी कभी इच्छा नहीं करता॥ २४॥

अचलमनिधनं शिवं विशोकं
शुचिमतुलं विदुषां मते प्रविष्टम्।
अनभिमतमसेवितं विमूढै-
र्व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि॥ २५॥

मैं सदा पवित्रभावसे रहकर इस अजगरवृत्तिका अनुसरण करता हूँ। यह अत्यन्त सुदृढ़, मृत्युसे दूर रखनेवाली, कल्याणमय, शोकहीन, शुद्ध, अनुपम और विद्वानोंके मतके अनुकूल है। मूर्ख मनुष्य न तो इसे मानते हैं और न इसका सेवन ही करते हैं॥ २५॥

अचलितमतिरच्युतः स्वधर्मात्
परिमितसंसरणः परावरज्ञः।
विगतभयकषायलोभमोहो
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि॥ २६॥

मेरी बुद्धि अविचल है, मैं अपने धर्मसे च्युत नहीं हुआ हूँ, मेरा सांसारिक व्यवहार परिमित हो गया है, मुझे उत्तम और अधमका ज्ञान है, मेरे हृदयसे भय, राग-द्वेष, लोभ और मोह दूर हो गये हैं तथा पवित्रभावसे रहकर इस अजगरोचित व्रतका आचरण करता हूँ॥ २६॥

अनियतफलभक्ष्यभोज्यपेयं
विधिपरिणामविभक्तदेशकालम् ।

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  • आजगरगीता * | २०१

हृदयसुखमसेवितं कदर्यै-
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २७ ॥

यह अजगर-सम्बन्धी व्रत मेरे हृदयको सुख देनेवाला है। इसमें भक्ष्य, भोज्य, पेय और फल आदिके मिलनेकी कोई नियत व्यवस्था नहीं रहती—अनियतरूपसे जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करना होता है। इस व्रतमें प्रारब्धके परिणामके अनुसार देश और कालका विभाग नियत है। विषयलोलुप नीच पुरुष इसका सेवन नहीं करते, मैं पवित्रभावसे इसी व्रतका आचरण करता हूँ॥ २७॥

इदमिदमिति तृष्णायाभिभूतं
जनमनवाप्तधनं विषीदमानम्।
निपुणमनुनिशाम्य तत्त्वबुद्ध्या
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २८ ॥

जो यह मिले, वह मिले—इस प्रकार तृष्णासे दबे रहते हैं और धन न मिलनेके कारण निरन्तर विषाद करते हैं; ऐसे लोगोंकी दशा अच्छी तरह देखकर तात्त्विक बुद्धिसे सम्पन्न हुआ मैं पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ २८॥

बहुविधमनुदृश्य चार्थहेतोः
कृपणमिहार्यमनार्यमाश्रयन्तम् ।
उपशमरुचिरात्मवान् प्रशान्तो
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २९ ॥

मैं बारम्बार देखता हूँ कि श्रेष्ठ मनुष्य भी धनके लिये दीनभावसे नीच पुरुषका आश्रय लेते हैं। यह देखकर मेरी रुचि प्रशान्त हो गयी है। अतः मैं अपने स्वरूपको प्राप्त और सर्वथा शान्त हो गया हूँ और पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ २९॥

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२०२ * गीता-संग्रह *


सुखमसुखमलाभमर्थलाभं
रतिमरतिं मरणं च जीवितं च।
विधिनियमतमवेक्ष्य तत्त्वतोऽहं
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्‍चरामि ॥ ३० ॥

सुख-दुःख, लाभ-हानि, अनुकूल और प्रतिकूल तथा जीवन और मरण—ये सब दैवके अधीन हैं। इस प्रकार यथार्थरूपसे जानकर मैं शुद्धभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ ३० ॥

अपगतभयरागमोहदर्पो
धृतिमतिबुद्धिसमन्वितः प्रशान्तः।
उपगतफलभोगिनो निशम्य
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्‍चरामि ॥ ३१ ॥

मेरे भय, राग, मोह और अभिमान नष्ट हो गये हैं। मैं धृति, मति और बुद्धिसे सम्पन्न एवं पूर्णतया शान्त हूँ और प्रारब्धवश स्वतः अपने समीप आयी हुई वस्तुका ही उपभोग करनेवालोंको देखकर मैं पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ ३१ ॥

अनियतशयनासनः प्रकृत्या
दमनियमव्रतसत्यशौचयुक्तः ।
अपगतफलसञ्चयः प्रहृष्टो
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्‍चरामि ॥ ३२ ॥

मेरे सोने-बैठनेका कोई नियत स्थान नहीं है। मैं स्वभावतः दम, नियम, व्रत, सत्य और शौचाचारसे सम्पन्न हूँ। मेरे कर्मफल-संचयका नाश हो चुका है। मैं प्रसन्नतापूर्वक पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ ३२ ॥

अपगतमसुखार्थमीहनार्थै-
रुपगतबुद्धिरवेक्ष्य चात्मसंस्थम्।

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* आजगरगीता * २०३

तृषितमनियतं मनो नियन्तुं
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्‍चरामि ॥ ३३ ॥

जिनका परिणाम दुःख है, उन इच्छाके विषयभूत समस्त पदार्थोंसे जो विरक्त हो चुका है, ऐसे आत्मनिष्ठ महापुरुषको देखकर मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है। अतः मैं तृष्णासे व्याकुल असंयत मनको वशमें करनेके लिये पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ ॥ ३३ ॥

न हृदयमनुरुध्य वाङ्मनो वा
प्रियसुखदुर्लभतामनित्यतां च।
तदुभयमुपलक्ष्यन्निवाहं
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्‍चरामि ॥ ३४ ॥

मन, वाणी और बुद्धिकी उपेक्षा करके इनको प्रिय लगनेवाले विषय-सुखोंकी दुर्लभता तथा अनित्यता—इन दोनोंको देखनेवालेकी भाँति मैं पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ ॥ ३४ ॥

बहुकथितमिदं हि बुद्धिमद्भिः
कविभिरपि प्रथयद्भिरात्मकीर्तिम्।
इदमिदमिति तत्र तत्र हन्त
स्वपरमतैर्गहनं प्रतर्कयद्भिः ॥ ३५ ॥

अपनी कीर्तिका विस्तार करनेवाले विद्वानों और बुद्धिमानोंने अपने और दूसरोंके मतसे गहन तर्क और वितर्क करके ‘ऐसे करना चाहिये’ ‘ऐसे करना चाहिये’ इत्यादि कहकर इस व्रतकी अनेक प्रकारसे व्याख्या की है ॥ ३५ ॥

तदिदमनुनिशम्य विप्रपातं
पृथगभिपन्नमिहाबुधैर्मनुष्यैः।
अनवसितमनन्तदोषपारं
नृषु विहरामि विनीतदोषतृष्णः ॥ ३६ ॥

मूर्खलोग इस आजगरवृत्तिको सुनकर इसे पहाड़ की चोटीसे

९- हारीतगीता (महाभारत)

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२०४ * गीता-संग्रह *

गिरनेकी भाँति भयंकर समझते हैं। परंतु उनकी वह मान्यता भिन्न है। मैं इस अजगरवृत्तिको अज्ञानका नाशक और समस्त दोषोंसे रहित मानता हूँ। अतः दोष और तृष्णाका त्याग करके मनुष्योंमें विचरता हूँ॥ ३६॥

भीष्म उवाच

अजगरचरितं व्रतं महात्मा
य इह नरोऽनुचरेद् विनीतरागः।
अपगतभयलोभमोहमन्युः
स खलु सुखी विचरेदिमं विहारम्॥ ३७॥

भीष्मजी कहते हैं— राजन्! जो महापुरुष राग, भय, लोभ, मोह और क्रोधको त्यागकर इस आजगरव्रतका पालन करता है, वह इस लोकमें सानन्द विचरण करता है॥ ३७॥

॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि आजगरगीता सम्पूर्णा॥

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हारीतगीता

[प्राचीन कालमें हारीतमुनिने मुमुक्षु पुरुषके प्रधान कर्तव्योंसे सम्बद्ध जो उपदेश दिये थे, उन्हींका परिचय शरशय्यापर लेटे पितामह भीष्मद्वारा युधिष्ठिरको दिया गया था। यह वर्णन महाभारतके शान्तिपर्वमें प्राप्त है, इसीको ‘हारीतगीता’ कहते हैं। इस लघुकाय गीतामें मुख्यतः संन्यासीके आचरण एवं कर्तव्योंका वर्णन है। इसकी भाषा अत्यन्त सरल, सुबोध तथा सारगर्भित है। संन्यासियोंके लिये प्रकाशस्तम्भसदृश यह हारीतगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है—]

युधिष्ठिर उवाच

किंशीलः किंसमाचारः किंविद्यः किंपरायणः।
प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं यत् परं प्रकृतेर्ध्रुवम्॥ १॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! प्रकृतिसे परे जो परब्रह्मका अविनाशी परमधाम है, उसे कैसे स्वभाव, किस तरहके आचरण, कैसी विद्या और किन कर्मोंमें तत्पर रहनेवाला पुरुष प्राप्त कर सकता है?॥ १॥

भीष्म उवाच

मोक्षधर्मेषु निरतो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।
प्राप्नोति परमं स्थानं यत् परं प्रकृतेर्ध्रुवम्॥ २॥

**भीष्मजीने कहा—**राजन्! जो पुरुष मोक्षधर्मोंमें तत्पर, मिताहारी और जितेन्द्रिय होता है, वह उस प्रकृतिसे परे परब्रह्म परमात्माका जो अविनाशी परमधाम है, उसे प्राप्त कर लेता है॥ २॥

(अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
हारीतेन पुरा गीतं तं निबोध युधिष्ठिर॥)

युधिष्ठिर! पूर्वकालमें हारीतमुनिने जो ज्ञानका उपदेश किया है,

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२०६ * गीता-संग्रह *

इस विषयमें विज्ञ पुरुष उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते
हैं, उसे सुनो।
स्वगृहादभिनिस्सृत्य लाभेऽलाभे समो मुनिः।
समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत्॥ ३॥
मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि लाभ और हानिमें समान भाव रखकर
मुनिवृत्तिसे रहे और भोगोंके उपस्थित होनेपर भी उनकी आकांक्षासे
रहित हो अपने घरसे निकलकर संन्यास ग्रहण कर ले॥ ३॥
न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषयेदपि।
न प्रत्यक्षं परोक्षं वा दूषणं व्याहरेत् क्वचित्॥ ४॥
न नेत्रसे, न मनसे और न वाणीसे ही वह दूसरेके दोष देखे, सोचे
या कहे। किसीके सामने या परोक्षमें पराये दोषकी चर्चा कहीं न
करे॥ ४॥
न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत्।
नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित्॥ ५॥
समस्त प्राणियोंमेंसे किसीकी भी हिंसा न करे—किसीको भी पीड़ा
न दे। सबके प्रति मित्रभाव रखकर विचरता रहे। इस नश्वर जीवनको
लेकर किसीके साथ शत्रुता न करे॥ ५॥
अतिवादांस्तितिक्षेत नाभिमन्येत कञ्चन।
क्रोध्यमानः प्रियं ब्रूयादाक्रुष्टः कुशलं वदेत्॥ ६॥
यदि कोई अपने प्रति अमर्यादित बात कहे—निन्दा या कटुवचन
सुनाये तो उसके उन वचनोंको चुपचाप सह ले। किसीके प्रति अहंकार
या घमंड न प्रकट करे। कोई क्रोध करे तो भी उससे प्रिय वचन
ही बोले। यदि कोई गाली दे तो भी उसके प्रति हितकर वचन ही
मुँहसे निकाले॥ ६॥

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  • हारीतगीता * २०७

प्रदक्षिणं च सव्यं च ग्राममध्ये च नाचरेत्।
भैक्षचर्यामनापन्नो न गच्छेत् पूर्वकेतितः॥ ७॥

गाँव या जनसमुदायमें दायें-बायें न करे—किसीका पक्ष-विपक्ष न करे तथा भिक्षावृत्तिको छोड़कर किसीके यहाँ पहलेसे निमन्त्रित होकर भोजनके लिये न जाय॥ ७॥

अवकीर्णः सुगुप्तश्च न वाचा ह्यप्रियं वदेत्।
मृदुः स्यादप्रतिक्रूरो विस्रब्धः स्यादकत्थनः॥ ८॥

कोई अपने ऊपर धूल या कीचड़ फेंके तो मुमुक्षु पुरुष उससे आत्मरक्षामात्र करे। बदलेमें स्वयं भी वैसा ही न करे और न मुँहसे कोई अप्रिय वचन ही निकाले। सर्वदा मृदुताका बर्ताव करे। किसीके प्रति कठोरता न करे। निश्चिन्त रहे और बहुत बढ़-बढ़कर बातें न बनाये॥ ८॥

विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने।
अतीतपात्रसञ्चारे भिक्षां लिप्सेत वै मुनिः॥ ९॥

जब रसोईघरसे धूआँ निकलना बन्द हो जाय, अनाज-मसाला कूटनेके लिये उठाया हुआ मूसल अलग रख दिया जाय, चूल्हेकी आग ठंडी पड़ जाय, घरके लोग भोजन कर चुके हों और बर्तनोंका संचार—रसोई परोसी हुई थालीका इधर-उधर ले जाया जाना बन्द हो जाय, उस समय संन्यासी मुनिको भिक्षा प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी चाहिये॥ ९॥

प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रालाभेष्वनादृतः।
अलाभे न विहन्येत लाभश्चैनं न हर्षयेत्॥ १०॥

उसे केवल अपनी प्राणयात्राके निर्वाहमात्रका यत्न करना चाहिये। भर पेट भोजन मिल जाय, इसकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये। यदि भिक्षा न मिले तो उससे मनमें पीड़ाका अनुभव न करे और मिल जाय तो उसके कारण वह हर्षित न हो॥ १०॥

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२०८ * गीता-संग्रह *

लाभं साधारणं नेच्छेन्न भुञ्जीताभिपूजितः।
अभिपूजितलाभं हि जुगुप्सेतैव तादृशः ॥ ११ ॥
साधारण (लौकिक) लाभकी इच्छा न करे। जहाँ विशेष आदर एवं पूजा होती हो, वहाँ भोजन न करे। मुमुक्षु पुरुषको आदर-सत्कारके लाभकी तो निन्दा करनी चाहिये ॥ ११ ॥
न चान्नदोषान् निन्देत न गुणानभिपूजयेत्।
शय्यासने विविक्ते च नित्यमेवाभिपूजयेत् ॥ १२ ॥
भिक्षामें मिले हुए अन्नके दोष बताकर उनकी निन्दा न करे और न उसके गुण बताकर उन गुणोंकी प्रशंसा ही करे। सोने और बैठनेके लिये सदा एकान्तका ही आदर करे ॥ १२ ॥
शून्यागारं वृक्षमूलमरण्यमथवा गुहाम्।
अज्ञातचर्यां गत्वान्यां ततोऽन्यत्रैव संविशेत् ॥ १३ ॥
सूने घर, वृक्षकी जड़, जंगल अथवा पर्वतकी गुफामें अथवा अन्य किसी गुप्त स्थानमें अज्ञातभावसे रहकर आत्मचिन्तनमें ही लगा रहे ॥ १३ ॥
अनुरोधविरोधाभ्यां समः स्यादचलो ध्रुवः।
सुकृतं दुष्कृतं चोभे नानुरुध्येत कर्मणा ॥ १४ ॥
लोगोंके अनुरोध या विरोध करनेपर भी सदा समभावसे रहे, निश्चल एवं स्थिरचित्त हो जाय तथा अपने कर्मोंद्वारा पुण्य एवं पापका अनुसरण न करे ॥ १४ ॥
नित्यतृप्तः सुसन्तुष्टः प्रसन्नवदनेन्द्रियः।
विभीर्जप्यपरो मौनी वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ १५ ॥
सर्वदा तृप्त और सन्तुष्ट रहे। मुख और इन्द्रियोंको प्रसन्न रखे। भयको पास न आने दे। प्रणव आदिका जप करता रहे तथा वैराग्यका आश्रय ले मौन रहे ॥ १५ ॥