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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 206 of 675

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Page 206

हारीतगीता

[प्राचीन कालमें हारीतमुनिने मुमुक्षु पुरुषके प्रधान कर्तव्योंसे सम्बद्ध जो उपदेश दिये थे, उन्हींका परिचय शरशय्यापर लेटे पितामह भीष्मद्वारा युधिष्ठिरको दिया गया था। यह वर्णन महाभारतके शान्तिपर्वमें प्राप्त है, इसीको ‘हारीतगीता’ कहते हैं। इस लघुकाय गीतामें मुख्यतः संन्यासीके आचरण एवं कर्तव्योंका वर्णन है। इसकी भाषा अत्यन्त सरल, सुबोध तथा सारगर्भित है। संन्यासियोंके लिये प्रकाशस्तम्भसदृश यह हारीतगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है—]

युधिष्ठिर उवाच

किंशीलः किंसमाचारः किंविद्यः किंपरायणः।
प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं यत् परं प्रकृतेर्ध्रुवम्॥ १॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! प्रकृतिसे परे जो परब्रह्मका अविनाशी परमधाम है, उसे कैसे स्वभाव, किस तरहके आचरण, कैसी विद्या और किन कर्मोंमें तत्पर रहनेवाला पुरुष प्राप्त कर सकता है?॥ १॥

भीष्म उवाच

मोक्षधर्मेषु निरतो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।
प्राप्नोति परमं स्थानं यत् परं प्रकृतेर्ध्रुवम्॥ २॥

**भीष्मजीने कहा—**राजन्! जो पुरुष मोक्षधर्मोंमें तत्पर, मिताहारी और जितेन्द्रिय होता है, वह उस प्रकृतिसे परे परब्रह्म परमात्माका जो अविनाशी परमधाम है, उसे प्राप्त कर लेता है॥ २॥

(अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
हारीतेन पुरा गीतं तं निबोध युधिष्ठिर॥)

युधिष्ठिर! पूर्वकालमें हारीतमुनिने जो ज्ञानका उपदेश किया है,