गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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परमात्मामें लगाकर रोग-शोकसे रहित एवं सुखी हो सम्पूर्ण लोकोंमें
अनासक्त भावसे विचरूँगा, जिससे तू फिर मुझे इस प्रकार दुःखोंमें
न डाल सकेगा॥ ३१-३२॥
त्वया हि मे प्रणुन्नस्य गतिरन्या न विद्यते।
तृष्णाशोकश्रमाणां हि त्वं काम प्रभवः सदा॥ ३३॥
काम! तृष्णा, शोक और परिश्रम—इनका उत्पत्तिस्थान सदा तू
ही है। जबतक तू मुझे प्रेरित करके इधर-उधर भटकाता रहेगा, तबतक
मेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है॥ ३३॥
धननाशेऽधिकं दुःखं मन्ये सर्वमहत्तरम्।
ज्ञातयो ह्यवमन्यन्ते मित्राणि च धनाच्च्युतम्॥ ३४॥
मैं तो समझता हूँ कि धनका नाश होनेपर जो अत्यन्त दुःख
होता है, वही सबसे बढ़कर है; क्योंकि जो धनसे वंचित हो जाता
है, उसे अपने भाई-बन्धु और मित्र भी अपमानित करने लगते
हैं॥ ३४॥
अवज्ञानसहस्त्रैस्तु दोषाः कष्टतराऽधने।
धने सुखकला या तु सापि दुःखैर्विधीयते॥ ३५॥
दरिद्रको सहस्त्र-सहस्त्र तिरस्कार सहने पड़ते हैं; अतः निर्धन
अवस्थामें बहुत-से कष्टदायक दोष हैं; और धनमें जो सुखका लेश
प्रतीत होता है, वह भी दुःखोंसे ही सम्पादित होता है॥ ३५॥
धनमस्येति पुरुषं पुरो निघ्नन्ति दस्यवः।
क्लिश्यन्ति विविधैर्दण्डैर्नित्यमुद्वेजयन्ति च॥ ३६॥
जिस पुरुषके पास धन होनेका संदेह होता है, उसे उसका धन
लूटनेके लिये लुटेरे मार डालते हैं अथवा उसे तरह-तरहकी पीड़ाएँ
देकर सताते और सदा उद्वेगमें डाले रहते हैं॥ ३६॥