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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 207 of 675

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Page 207

२०६ * गीता-संग्रह *

इस विषयमें विज्ञ पुरुष उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते
हैं, उसे सुनो।
स्वगृहादभिनिस्सृत्य लाभेऽलाभे समो मुनिः।
समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत्॥ ३॥
मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि लाभ और हानिमें समान भाव रखकर
मुनिवृत्तिसे रहे और भोगोंके उपस्थित होनेपर भी उनकी आकांक्षासे
रहित हो अपने घरसे निकलकर संन्यास ग्रहण कर ले॥ ३॥
न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषयेदपि।
न प्रत्यक्षं परोक्षं वा दूषणं व्याहरेत् क्वचित्॥ ४॥
न नेत्रसे, न मनसे और न वाणीसे ही वह दूसरेके दोष देखे, सोचे
या कहे। किसीके सामने या परोक्षमें पराये दोषकी चर्चा कहीं न
करे॥ ४॥
न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत्।
नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित्॥ ५॥
समस्त प्राणियोंमेंसे किसीकी भी हिंसा न करे—किसीको भी पीड़ा
न दे। सबके प्रति मित्रभाव रखकर विचरता रहे। इस नश्वर जीवनको
लेकर किसीके साथ शत्रुता न करे॥ ५॥
अतिवादांस्तितिक्षेत नाभिमन्येत कञ्चन।
क्रोध्यमानः प्रियं ब्रूयादाक्रुष्टः कुशलं वदेत्॥ ६॥
यदि कोई अपने प्रति अमर्यादित बात कहे—निन्दा या कटुवचन
सुनाये तो उसके उन वचनोंको चुपचाप सह ले। किसीके प्रति अहंकार
या घमंड न प्रकट करे। कोई क्रोध करे तो भी उससे प्रिय वचन
ही बोले। यदि कोई गाली दे तो भी उसके प्रति हितकर वचन ही
मुँहसे निकाले॥ ६॥