भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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इस ग्रन्थ के बारे में
भैषज्य रत्नावली कविराज गोविन्ददास सेन का आयुर्वेदीय चिकित्सा-ग्रन्थ है, जो वैद्यों के बीच योगों (औषधि-निर्माण की विधियों) के प्रामाणिक संग्रह के रूप में बहुत प्रचलित है। इस संस्करण की भूमिका के अनुसार इसकी विशेषता यह है कि इसमें क्वाथ, चूर्ण, अवलेह, आसव, अरिष्ट जैसे वनस्पति-योग और रस-धातुओं से सिद्ध किए गए रसायन-योग, दोनों प्रकार के अनुभूत प्रयोग सरल रीति से एकत्र किए गए हैं, जिससे हर स्तर के वैद्य इसका लाभ उठा सकते हैं।
ग्रन्थ रोगों के क्रम से चलता है। प्रत्येक रोग के प्रकरण में उसके उपचार के योग दिए गए हैं — जैसे ज्वर के लिए पञ्चमूली और दशमूल के क्वाथ, कुटजावलेह जैसे अवलेह, घृत और तैल बनाने की विधियाँ, और हिक्का आदि रोगों के उपाय। हर योग में द्रव्यों की मात्रा और बनाने की प्रक्रिया बताई गई है।
इस संस्करण में मूल श्लोकों के साथ सान्वय भाषा-टीका है, जिसे 'अनेक ग्रन्थों के टीकाकार व रचयिता स्वर्गीय वैद्य शंकरलालजी' ने परिवर्धित, संशोधित और हिन्दी अनुवाद से विभूषित किया। यह खेमराज श्रीकृष्णदास के श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई से संवत् २००९ (सन् १९५२) में छपा। १४१६ पृष्ठों का यह बड़ा ग्रन्थ आयुर्वेद के विद्यार्थियों और चिकित्सकों के लिए सन्दर्भ-ग्रन्थ है।
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