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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

About this granth

The Bhaishajya Ratnavali (भैषज्य रत्नावली) of Kaviraj Govind Das Sen is an Ayurvedic treatise on therapeutics, widely used by practitioners as a trusted collection of formulations. As the introduction to this edition points out, it gathers tested preparations of both kinds: herbal ones such as decoctions, powders, linctuses, asavas and arishtas, and mineral and metallic preparations from rasashastra, so that physicians of every level can use it.

The work proceeds disease by disease. Under each condition it gives the relevant formulations, for example decoctions of the five roots and the ten roots for fever, linctuses such as kutajavaleha, medicated ghee and oils, and remedies for hiccup and other ailments, with quantities of ingredients and methods of preparation.

This edition gives the verses with a Hindi commentary in prose order, enlarged, revised and translated by the late Vaidya Shankarlal, described as the author and commentator of many books. It was printed by Khemraj Shrikrishnadas at the Shri Venkateshwar Steam Press, Bombay, in Samvat 2009 (1952). At 1416 pages it is a reference work for students and practitioners.

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४६१

रुधिरका स्राव होनेपर नस्य देवे । कानामैसे रक्तस्राव हो तो इस घृतको कानोंमें डाले । नेत्रोंमेंसे रुधिरका स्राव होनेपर नेत्रोंमें भरे, जो लिङ्ग और गुदाके द्वारा रक्तस्राव हो तो इस घृतकी पिचकारी लगावे और रोमकूपोंके द्वारा रक्तस्राव होय तो इस घृतकी शरीरमें मालिश करे ॥ ३-६ ॥

सप्तप्रस्थघृत ।

शतावरीपयोद्राक्षाविदारीक्ष्वामलै रसैः ।
सर्पिषा सह संयुक्तैः सप्तप्रस्थं पचेद् घृतम् ॥ ७ ॥
शर्करापादसंयुक्तं रक्तपित्तहरं पिबेत् ।
उरःक्षते पित्तशूले चोष्णवातेऽप्यसृग्दरे ।
बल्यमोजस्करं वृष्यं क्षयहृद्रोगनाशनम् ॥ ८ ॥

शतावर, सुगन्धवाला, दाख, विदारीकन्द, ईख और आमले इन सबका स्वरस और गोघृत ये प्रत्येक एक एक प्रस्थ लेवे । सबको घृतके साथ मिलाकर यथा-विधि घृतको पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब उसमें १६ तोले शुद्ध खांड मिलादेवे । इस घृतको प्रतिदिन छः छः मासे पान करनेसे रक्तपित्त, क्षय और हृदयरोग दूर होता है । यह घृत उरःक्षत, पित्तशूल उष्णवात और रक्त-प्रदर रोगोंमें हितकारी एवं बल, ओज और वीर्यकी अत्यन्त वृद्धि करता है तथा क्षय और हृदयरोगको नष्ट करता है ॥ ७ ॥ ८ ॥

शतावरीघृत ।

शतावर्यास्तु मूलानां रसं प्रस्थद्वयं मतम् ।
तत्समं च भवेत्क्षीरं घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ९ ॥
जीवकर्षभकौ मेदा महामेदा तथैव च ।
काकोली क्षीरकाकोली मृद्वीकामधुकं तथा ॥ १० ॥
मुद्गपर्णी माषपर्णी विदारी रक्तचन्दनम् ।
शर्करामधुसंयुक्तं सिद्धं विस्रावयेद् घृतम् ॥ ११ ॥

शतावरका रस दो प्रस्थ, गौका दूध दो प्रस्थ, उत्तम घृत १ प्रस्थ तथा जीवक ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली दाख, मुलहठी, मुगवन, मषवन, विदारीकन्द और लालचन्दन इनका कल्क १६ तोले डालकर घृतको सिद्ध करे । जब घृत अच्छे प्रकारसे सिद्ध होजाय तब उसमें सोलह-सोलह तोले मिश्री और शहद मिलाकर उतार लेवे ॥ १०९-१११ ॥

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४६२ | भैषज्यरत्नावली । | [ रक्तपित्त-

रक्तपित्तविकारेषु वातरक्तगदेषु च ।
क्षीणशुक्रेषु दातव्यं वाजीकरणमुत्तमम् ॥ १२ ॥
अङ्गदाहं शिरोदाहं ज्वरं पित्तसमुद्भवम् ।
योनिशूलं च दाहं च मूत्रकृच्छ्रं च पैत्तिकम् ॥ १३ ॥
एतान्रोगान्निहन्त्याशु छिन्नाभ्राणीव मारुतः ।
शतावरीसर्पिरिदं बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ॥
स्नेहपादः स्मृतः कल्कः कल्कवन्मधुशर्करे ॥ १४ ॥

इस घृतको रक्तपित्त, वातरक्त और शुक्रकी क्षीणताम देना चाहिये। यह अत्यन्त बाजीकरण है एवं शरीरकी दाह, शिरोदाह, पित्तज्वर, योनिशूल सर्व प्रकारकी कफ और पित्तज मूत्रकृच्छ इन समस्त विकारोंको इस प्रकार नष्ट करदेताहै जैसे वायुके वेगसे मेघोंका समूह तत्काल छिन्न भिन्न होजाताहै। यह शतावरीघृत बल, वर्ण और जठराग्निकी विशेष वृद्धि करता है ॥ १२-१४ ॥

बृहच्छतावरीघृत ।

शतावरीमूलतुलाश्चतस्रः संप्रपीडयेत् ।
रसेन क्षीरतुल्येन पचेत्तेन घृताढकम् ॥ १५ ॥
जीवनीयैः शतावर्या मृद्वीकाभिः परूषकैः ।
पिष्टैःप्रियालैश्चाक्षांशैर्द्वियष्टिमधुकैर्भिषक् ॥ १६ ॥
सिद्धशीते च मधुनः पिप्पल्याश्च पलाष्टकम् ।
दत्त्वा दशपलं चात्र सितायास्तद्विमिश्रितम् ॥ १७ ॥

शतावरकी जडको कूट पीसकर वस्त्रमें निचोडकर रस निकाल लेवे। ऐसा रस ४०० पल, गौका दूध ४०० पल और घी १ आढक लेवे। सबको एकत्र मिलाकर घृतको पकावे। कुछ देर बाद जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीर-काकोली जीवन्ती, मुलहठी, मुगवन, मषवन, शतावर, दाख, फालसे, चिरौंजी मुलहठी और महुआ प्रत्येक औषधिको दो दो तोले पीसकर डालदेवे। जब घृत उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब नीचे उतारलेवे। शीतल होनेपर घृतको छानकर उसमें शहद ३२ तोले, पीपलका चूर्ण ३२ तोले और मिश्री ४० तोले डालकर सबको अच्छी तरह मिला देवे ॥ १५-१७

ब्राह्मणान्प्राशयेत्पूर्वं लिद्यात्पाणितलं ततः ।
योन्यसृक्शुक्रदोषघ्नं वृष्यं पुंसवनं च तत् ॥ १८ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४६३

क्षतक्षयं रक्तपित्तं कासं श्वासं हलीमकम् ।
कामलां वातरक्तं च विसर्पं हृच्छिरोग्रहम् ॥
उन्मादादीनपस्मारांन्वातपित्तात्मकाञ्जयेत् ॥ १९ ॥

यह घृत पहले ब्राह्मणोंको भोजन कराकर पश्चात् एकएक तोला परिमाण सेवन करना चाहिये। इसका सेवन करनेसे योनिद्वारा रक्तका स्राव, वीर्यदोष, क्षतक्षय, रक्तपित्त, खाँसी, श्वास, हलीमक, कामला, वातरक्त, विसर्प, हृदयरोग, शिरदर्द, उन्माद, अपस्मार और वात-पित्तजन्य विकार ये सब नष्ट होते हैं, एवं वीर्यकी और पुरुषत्वकी प्राप्ति होती है ॥ ११८ ॥ ११९ ॥

कामदेवघृत ।

अश्वगन्धापलशतं तदर्द्धं गोक्षुरस्य च
वातावरी विदारी च शालपर्णी बला तथा ॥ १२० ॥
अश्वत्थस्य च शृङ्गाणि पद्मबीजं पुनर्नवा
काश्मरीफलमेतच्च माषबीजं तथैव च ॥ २१ ॥
पृथग्दशपलान्भागांश्चतुर्द्रोणेऽम्भसः पचेत् ।
चतुर्भागावशेषं तु कषायमवतारयेत् ॥ २२ ॥
मृद्वीका पद्मकं कुष्ठं पिप्पली रक्तचन्दनम् ।
बालकं नागपुष्पं च आत्मगुप्ताफलं तथा ॥ २३ ॥
नीलोत्पलं शारिवे द्वे जीवनीयं विशेषतः ।
पृथक् कर्षसमं चैव शर्करायाः पलद्वयम् ॥ २४ ॥
रसस्य पौण्ड्रकेक्षूणामाढकं तत्र दापयेत् ।
चतुर्गुणेन पयसा घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ २५ ॥

असगन्ध १०० पल, गोखरू ५० पल एवं शतावर, विदारीकन्द, शालपर्णी, खिरैंटी, पीपलके वृक्षके अंकुर, कमलगट्टा, पुनर्नवा, कुम्मेरके फल और उड़द ये प्रत्येक औषधि दश-दश पल लेवे। सबको एकत्र कूटकर ४ द्रोण जलमें पकावे। जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे। फिर इस क्वाथमें दाख, पद्माख, कूठ, पीपल, लालचन्दन, सुगन्धवाला, नागकेशर, कौंचके बीज, नीलकमल, दोनों सारिवा और जीवनीयगणकी समस्त औषधियाँ (जीवक, ऋषभक, ऋद्धि, वृद्धि, मेदा, महामेदा, काकोली, मुगवन और मषवन) ये प्रत्येक

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४६४भैषज्यरत्नावली ।[ रक्तपित्त-

औषधि दो दो तोले, मिश्री ९ तोले, पौण्डे गन्नोंका रस १ आढक, दूध ४ प्रस्थ और घी १ प्रस्थ डालकर मन्द मन्द अग्निके द्वारा धीरे धीरे विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे ॥ १२०-२५ ॥

रक्तपित्तं क्षतक्षीणं कामलां वातशोणितम् ।
हलीमकं तथा शोथं स्वरभेदं बलक्षयम् ॥ २६ ॥
अरोचकं मूत्रकृच्छ्रं पार्श्वशूलं च नाशयेत् ।
एतद्राज्ञां प्रयोक्तव्यं बहन्तःपुरचारिणाम् ॥ २७ ॥
स्त्रीणां चैवानपत्यानां दुर्बलानां च देहिनाम् ।
क्लीबानामल्पशुक्राणां जीर्णानामल्परेतसाम् ॥ २८ ॥
श्रेष्ठं बलकरं हृद्यं वृष्यं पेयं रसायनम् ।
ओजस्तेजस्करं चैव आयुःप्राणविवर्द्धनम् ॥ २९ ॥
संवर्द्धयति शुक्रं च पुरुषं दुर्बलेन्द्रियम् ।
सर्वरोगविनिर्मुक्तस्तोयसिक्तो यथा द्रुमः ॥
कामदेव इति ख्यातः सर्वर्तुषु च शस्यते ॥ ३० ॥

यह कामदेव घृत रक्तपित्त, क्षतक्षीण कामला, वातरक्त, हलीमक, सूजन, स्वरभंग, बलकी क्षीणता, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र और पसलीका शूल इन सम्पूर्ण व्याधियोंको नष्ट करता है। यह घृत अधिकतर अन्तःपुरमें रहनेवाले राजाओंको सेवन करना चाहिये एवं वन्ध्या स्त्रियों, दुर्बल मनुष्यों, नपुंसक, क्षीणवीर्य, वृद्ध मनुष्य और अल्पवीर्यवाले मनुष्योंको अत्यन्त हितकारी है। एवं बलकारक, हृदयको हितकारी, वीर्यवर्द्धक, रसायन तथा ओज, तेज, आयु और प्राणोंकी वृद्धि करनेवाला, दुर्बल इन्द्रियवाले पुरुषके शरीरमें पुरुषत्वकी प्राप्ति और वीर्यकी वृद्धि करता है। इस घृतके सेवनसे सर्वप्रकारके रोग दूर होते हैं ॥ १२६-१३० ॥

उशीरासव।

उशीरं बालकं पद्मं काश्मरीं नीलमुत्पलम् ।
प्रियङ्गु पद्मकं लोध्रं मञ्जिष्ठा धन्वयासकम् ॥ ३१ ॥
पाठा किराततिक्तं च न्यग्रोधोदुम्बरं शठी ।
पर्पटं पुण्डरीकं च पटोलं काञ्चनारकम् ॥ ३२ ॥
जम्बुशाल्मलिनिर्यासं प्रत्येकं पलसम्मितम् ।
भागांस्तु चूर्णितान्कृत्वा द्राक्षायाः पलविंशतिम् ॥ ३३ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४६५

घातकीं षोडशपलां जलद्रोणद्वये क्षिपेत् ।
शर्करायास्तुलां दत्त्वा क्षौद्रस्यैकतुलां तथा ॥ ३४ ॥
मासैकं स्थापयेद्भाण्डे मांसीमरिचधूपिते ।
उशीरासव इत्येष रक्तपित्तविनाशनः ॥
पाण्डुकुष्ठप्रमेहार्शःकृमिशोथहरस्तथा ॥ ३५ ॥
खस, सुगन्धवाला, कमल, कुम्भीरकी छाल, नीलकमल, फूलप्रियंगु, पद्माख, लोध, मंजीठ, धमासा, पाठ, चिरायता, बडकी छाल, गूलरकी छाल, कचूर, पित्त-पापडा, सफेदकमल, पटोलपात, कचनारकी छाल, जामुनकी छाल और मोचरस ये प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेकर सबका एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर दाख २० पल धायके फूल १६ पल, खाँड १०० पल और शहद १०० पल इन सबको एकत्रकर दो द्रोण परिमाण जलमें डालदेवे। फिर उसको बालछड और काली-मिरचोंके चूर्णके द्वारा धूप दियेहुए पात्रमें भरकर और उसका मुँह बाँधकर एक महीनेतक रक्खा रहनेदेवे । एक महीनेके पश्चात् उसको निकालकर छानलेवे । इसको उशीरासव कहते हैं । इसका सेवन करनेसे रक्तपित्त, पाण्डु, कुष्ठ, प्रमेह, अर्श, कृमि और शोथ ये सब विकार नष्ट हो ॥ ३१-३५ ॥

रक्तपित्तम पथ्य ।
अधोगते च्छर्दनमूर्द्धनिर्गमे विरेचनं स्यादुभयत्र लङ्घनम् । पुरातनाः षष्टिकशालिकोद्रवप्रियङ्गुनीवारयवप्रशांतिकाः ॥ ३६ ॥ मुद्गा मसूराश्चणकास्तुवर्यो मुकुष्ठकाश्चिङ्कटवर्मिमत्स्याः । शशः कपोतो हरिणैणलावशाररिपारावतवर्त्तकाश्च ॥ ३७ ॥ बका उरभ्राश्च सकाङ्गपुच्छाः कपिञ्जलाश्चापि कषायवर्गः । गवामजायाश्च पयो घृतं च घृतं महिष्याः पनस फलम् ॥ ३८ ॥
अधोगतरक्तपित्तमें-वमन, ऊर्ध्वगत रक्तपित्तमें विरेचन और अधो व ऊध्व दोनों मार्गोंसे रुधिरस्राव होनेपर लंघन करावे । पुराने साँठीके चावल, शालिधानोंके चावल, कोदों कङ्गनीके चावल, नीवार धान, जौ और लाल नीवार धानोंके चावल, मूँग, मसूर, चने, अरहर, मोठ, और चिल्लुट मछली, वर्म्मि मछली, एवं खरगोश, कबूतर, हिरन, काले हिरन, लवा, शरारिपक्षी, परेवा, बत्तक, बगुला, मेढा, बारह-

३०

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४६६भैषज्यरत्नावली ।[ रक्तपित्त -

सिंहा और तीतर इन सब जीवोंका मांस एवं कषायवर्गकी सब औषधियाँ, गौका दूध, घी, बकरीका दूध, घी, भैंसका घी, कटहल, चिरौंजी ॥ ३६-३८ ॥-

रम्भाफलं कञ्चटतण्डुलीयपटोलवेत्राग्रमहाईकाणि ।
पुराणकूष्माण्डफलं च पक्वतालानि तद्बीजजलानि
वासा ॥ ३९ ॥ स्वादूनि बिम्बानि च दाडिमानि
खर्जूरधात्रीमिषिनालिकेलम् । कशेरुशृङ्गाटमरुष्कराणि
कपित्थशालूकपरूषकाणि ॥ ४० ॥ भूनिम्बशाकं पिचु-
मर्दपत्रं तुम्बी कलिङ्गानि च लाजसक्तुः । द्राक्षा सिता
माक्षिकमैक्षवश्च शीतोदकं चौद्भिदवारि चापि ॥ ४१ ॥
सेकोऽवगाहः शतधौतसर्पिरभ्यङ्गयोगः शिशिरप्रदेहः ।
हिमानिलश्चन्दनमिन्दुपादो यथा विचित्राश्च मनो-
ऽनुकूलाः ॥ ४२ ॥

केलेकी फली, नाडीका शाक, चौलाईका शाक, परवल, बेंतका अग्रभाग, वन-अदरख, पुराना पेठा, पके ताड़के फल और उसके बीज, अडूसा मधुररसवाले पदार्थ, कन्दुुरी, अनार, खजूर, आमले, सौंफ, नारियल, कशेरू, सिंघाडे, भिलावा, कैथ, भसींडे, फालसे, चिरायता, नीमके पत्ते, लौंकी, तरबूज, खीलोंके सत्तू, दाख, मिश्री, शहद, ईखका रस, और ईखके रसके बनेहुए अन्य पदार्थ, शीतल जल, औद्भिदजल, शरीरपर शीतल जलका सिंचन, जलमें घुसकर स्नान, सौबार धोयेहुए-घीकी मालिश, शीतलवस्तुओंका प्रलेप, शीतल वायुका सेवन, लालचन्दन, चाँदनी मनको आनन्ददायक मधुर वार्त्तालाप ३९–४२॥

धारागृहं भूमिगृहं सुशीतं वैडूर्यमुक्तामणिधारणं च ।
रम्भोत्पलाम्भोरुहपत्रशय्या क्षौमाम्बरं चोपवनं सुशी-
तम् ॥ ४३ ॥ प्रियङ्कुकश्चन्दनरूषितानामालिङ्गनं चापि
वराङ्गनानाम् । पद्माकराणां सरितां हृदानां चन्द्रोद्यानां
हिमवद्दरीणाम् ॥ ४४ ॥ सुशीतलानां गिरिनिर्झराणां
श्रुतिप्रशस्तानिच कीर्त्तनानि । प्रकृष्टनीरं हिमवालुका
च मित्रं नृणां शोणितपित्तरोगे ॥ ४५ ॥

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[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४६७

फुहारेवाले और शीतल भूमिगृहमें निवास, वैदूर्यमणि और मोतियोंकी मालाको धारण करना, केलेके पत्तों, कुमुदके पत्तों और कमलके पत्तोंपर शयन करना, रेशमी वस्त्रोंका पहरना, शीतल वायुयुक्त बगीचेमें भ्रमण, फूलप्रियंगु और चन्दनसे सुगन्धित अङ्गोंवाली कामिनी स्त्रियोंके साथ आलिङ्गन करना, खिले हुए कमलोंसे युक्त नदियों और तालाब, चाँदनी युक्त बरफके कणोंसे शीतलपर्वतोंकी गुफाओंमें निवास, पर्वतके झरनोंका जलपान, कर्णप्रिय गीत और वाद्योंका सुनना, निर्मल जल और कपूर ये सब पदार्थ रक्तपित्तरोगवाले मनुष्योंके लिये हितकारी हैं ॥ १४२-१४५ ॥

रक्तपित्तमें अपथ्य ।

व्यायामाध्वनिषेवणं रविकरस्तीक्ष्णानि कर्म्माणि च
क्षोभो वेगविधारणं चपलता हस्त्यश्वयानानि च ।
स्वेदास्रस्रुतिधूमपानसुरतक्रोधाः कुलत्थो गुडो
वार्त्ताकुस्तिलमाषसर्षपदधिक्षाराणि कौपं पयः ॥
ताम्बूलं नलदाम्बुमद्यलशुनाः शिम्बी विरुद्धाशनं
कट्वम्लं लवणं विदाहि च गणस्त्याज्योऽस्रपित्ते नृणाम्॥४६

कसरत आदि परिश्रम, अधिक रास्ता चलना, तीक्ष्ण धूपका सेवन, कठिन काम करना, क्षोभ, मल मूत्र आदिके वेगको रोकना, चञ्चलता, हाथी, घोडे आदिकी सवारीपर चढकर चलना, स्वेद निकलवाना, रुधिर निकलवाना, धूम्रपान, स्त्रीप्रसङ्ग, क्रोध, कुलथी, गुड, बैंगन, तिल, उडद, सरसों, दही, क्षारवाले पदार्थ, कुएका जल, ताम्बूल, नीम, मदिरा, लहसुन, सेमकी फली, विरुद्ध भोजन, चरपरे, खट्टे, अधिक लवणरसवाले और दाहकारक पदार्थ ये सब रक्तपित्त रोगवाले मनुष्योंको त्यागदेने चाहिये ॥ १४६ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां रक्तपित्तचिकित्सा ॥


अथ यक्ष्मरोगचिकित्सा ।

ज्वराणां शमनीयो यः पूर्व्वमुक्तः क्रियाविधिः ।
क्षयिणां ज्वरदाहेषु स सर्वोऽपि प्रशस्यते ॥ १ ॥

ज्वरकी चिकित्सा में जो संशमनविधि कही है वह समस्त विधि क्षयरोग ज्वर और दाहमें करनी चाहिये ॥ १ ॥

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४६८ भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग-


उपद्रवा ज्वराद्यास्ते साध्याः स्वैः स्वैश्चिकित्सितैः ।
तेषु शान्तेषु रोगेषु पश्चाच्छोषमुपाचरेत् ॥ २ ॥
यदि यक्ष्मरोगमें ज्वर आदि उपद्रव उत्पन्न हों तो उनकी चिकित्सा उन्हीं २ रोगोंके अधिकारमें कहीहुई विधिके अनुसार करनी चाहिये । उन सम्पूर्ण रोगोंके शमन होनेपर फिर यक्ष्मरोगकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २ ॥

शालिषष्टिकगोधूमयवमुद्गादयः शुभाः ।
मद्यानि जाङ्गलाः पक्षिमृगाः शस्ता विशुष्यताम् ॥३॥
शुष्यतां क्षीणमांसानां कल्पितानि विधानवित् ।
दद्यात्क्रव्य,दमांसानि बृंहणानि विशेषतः ॥ ४ ॥
एक वर्षसे अधिक पुराने शालिधान और साठी धानोंके चावल, गेहूँ, जौ, मूँग, मद्य, जांगलदेशके पशु और पक्षियोंका मांस ये सब यक्ष्मरोगीके लिये हितकर हैं । यक्ष्मरोगमें यदि रोगीका बल और मांस क्षीण होगया हो तो व्याघ्र और गिद्ध आदिके मांसको शास्त्रोक्त विधिके अनुसार विविध प्रकारकी कल्पनाओं द्वारा सिद्ध करके देवे और विशेषकर पौष्टिक पदार्थ देवे । ये सब मांसवर्द्धक, बलकारक और पौष्टिक हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥

दोषाधिकानां वमनं शस्यते सांविरेचनम् ।
स्नेहस्वेदोपपन्नानां सस्नेहं यन्न कर्षणम् ॥ ५ ॥
अधिक दोषोंवाले यक्ष्मरोगियोंको प्रथम स्वेद देकर और स्नेह ( घृत-तैलादि पान कराकर सस्नेह मृदु वमन और विरेचन कराने चाहिये । किन्तु ऐसा उपाय करे जिससे रोगी दुर्बल और कृश न हो ॥ ५ ॥

बलिनो बहुदोषस्य पञ्च कर्माणि कारयेत् ।
यक्ष्मिणः क्षीणदेहस्य तत्कृतं स्याद्विषोपमम् ॥ ६ ॥
दोषोंकी अधिकता हो तो बलवान् यक्ष्मरोगीके पञ्चकर्म ( अर्थात् वमन, विरेचन, अनुवासनबस्ति, निरूहणबस्ति और नस्यकर्म ) का प्रयोग करना चाहिये । किन्तु बल हीन और क्षीण रोगीके लिये उक्त सम्पूर्ण क्रियायें विषकी समान हानिकर हैं ॥ ६ ॥

शुद्धकोष्ठस्य युञ्जीत विधिं बृंहणदीपनम् ।
शुक्रायत्तं बलं पुंसां मलायत्तं हि जीवनम् ॥
तस्माद्यत्नेन संरक्षेद्यक्ष्मिणो मलरतेसी ॥ ७ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४६९

वमन विरेचनादिके द्वारा कोष्ठ शुद्धि हो जानेपर रोगीको बलकारक और अग्नि-वर्द्धक औषधियाँ देनी चाहिये, क्योंकि मनुष्योंका बल शुक्रके अधीन है और जीवन मलके अधीन है। इसलिये राजयक्ष्मरोगीके वीर्य और मलकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। कारण, अधिक वीर्यक्षय होनेसे बलका हास और अधिक मल निकलनेसे जीवन नष्ट होता है ॥ ७ ॥

पारावतकपिच्छागकुरङ्गाणां पृथक् पृथक् ।
मांसचूर्णमजाक्षीरैः पीतं क्षयहरं परम् ॥ ८ ॥

परेवा (कबूतर), बन्दर, बकरा और हिरन इनके मांसको पृथक् पृथक् भून कर और उनका चूर्ण करके बकरीके दूधके साथ सेवन करनेसे क्षयरोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥

घृतकुसुमरसलीढं क्षयं नयति गजबलामुलम् ।
दुग्धेन केवलेन च वायसजङ्घा निपीतैव ॥ ९ ॥

गंगेरनकी जडको बारीक पीसकर घी और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे वा केवल मसीघासको पीसकर दूधके साथ पीनेसे क्षयरोग निवृत्त होता है ॥ ९ ॥

शर्करामधुसंयुक्तं नवनीतं लिहन् क्षयी।
क्षीराशी लभते पुष्टिमतुल्ये चाज्यमाक्षिके ॥ १० ॥

क्षयरोगी, मिश्री और शहदको नैनीघीमें मिलाकर सेवन करे और दूधका भोजन करे अथवा घृत और शहदको असमान भाग अर्थात् ४ माशे और २ माशे लेकर सेवन करे तो उसके शरीरकी पुष्टि होती है ॥ १० ॥

अलक्तरसैः क्षौद्रं रक्तवान्तिहरं परम् ॥ ११ ॥

लाखके रस अथवा लाखके काढेमें शहद मिलाकर सेवन करनेसे रक्तकी वमन दूर होती है ॥ ११ ॥

ककुभत्वङ्नागबला वानारिबीजानिचूर्णितं पयसि ।
पक्वं घृतमधुयुक्तं ससितं यक्ष्मादिकासहरम् ॥ १२ ॥

अर्जुनकी छाल, गंगेरन और कौंचके बीज-इनके समान भाग चूर्णको दूधमें डाल-कर पकावे, फिर उसमें शहद, घी और मिश्री मिलाकर पान करनेसे यक्ष्मा, खाँसी आदि रोग दूर होते हैं ॥ १२ ॥

कृष्णा द्राक्षा सितालेहः क्षयहा क्षौद्रतैलवान् ।
मधुसर्पिर्युतो वाऽश्वगन्धाकृष्णासितोद्भवः ॥ १३ ॥

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४७० | भैषज्यरत्नावली | [ यक्ष्मरोग-

पीपल, दाख और मिश्री इन तीनोंको समान भाग लेकर शहद और तिलके साथ अथवा असगन्ध, पीपल और मिश्री इनको शहद और घीमें मिलाकर सेवन करनेसे क्षयरोग नष्ट होता है ॥ १३ ॥

यष्ट्याह्नं चन्दनोपेतं सम्यक् क्षीरप्रपेषितम् ।
क्षीरेणालोड्य पातव्यं रुधिरच्छर्दिनाशनम् ॥ १४ ॥
मुलहठी और चन्दन, दोनोंको समान भाग लेकर और दूधमें बारीक पीसकर और दूधमें घोलकर पान करनेसे रुधिरकी वमन दूर होती है ॥ १४ ॥

छागमांसं पयश्छागं छागं सर्पिः सशर्करम् ।
छागोपसेवा शयनं छागमध्ये तु यक्ष्मनुत् ॥ १५ ॥
बकरीका मांस खाना, बकरीका दूध पीना, बकरीके घृतको मिश्रीमें मिलाकर सेवन करना, बकरियोंकी सेवा करना और बकरियोंके बीचमें सोना इन उपायोंके द्वारा यक्ष्मरोग नष्ट होता है ॥ १५ ॥

दशमूलक्वाथ !
दशमूलबलारास्ना पुष्करसुरदारुनागरैः कथितम् ।
पेयं पार्श्वांसशिरोरुक्क्षयकासादिशान्तये सलिलम् ॥ १६॥
दशमूलकी समस्त औषधियाँ, खिरेंटी, रास्ना, पोहकरमूल, देवदारु और सोंठ इनका यथाविधि क्वाथ बनाकर पीनेसे क्षय, कास, पार्श्वशूल कन्धोंकी पीडा और शिरःशूलादि रोग शमन होते हैं ॥ १६ ॥

अश्वगन्धादिक्वाथ ।
अश्वगन्धामृताभीरुदशमूलीबलावृषाः ।
पुष्करातिविषे घ्नन्ति क्षयं क्षीररसाशिनः ॥ १७ ॥
असगन्ध, गिलोय, शतावर, दशमूल, खिरेंटी, अडूसा, पोहकरमूल और अतीस इनका क्वाथ बनाकर पान करे और दूध तथा मांसरसका भोजन करे तो क्षयरोग नष्ट होता है ॥ १७ ॥

त्रयोदशाङ्गक्वाथ ।
धन्याकपिप्पलीविश्वदशमूलीजलं पिबेत् ।
पार्श्वशूलज्वरश्वासपीनसादिविवृत्तये ॥ १८ ॥
धनियाँ, पीपल, सोंठ और दशमूल इनके क्वाथको पान करनेसे क्षयरोगीकें पार्श्वशूल, ज्वर, श्वास, पीनस आदि विकार दूर होते हैं ॥ १८ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४७१

बलादिचूर्णं ।
बलाऽश्वगन्धाश्रीपर्णीबहुपुत्रीपुनर्नवाः ।
पयसा नित्यमभ्यस्ताः शमयन्ति क्षतक्षयम् ॥ १९ ॥
खिरेंटं, असगन्धक, कुम्भीर, श्तावर और पुनर्नवा इनको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके एक वस्त्रमें छानलेवे । इस चूर्णको प्रतिदिन दूधके साथ सेवन करनेसे क्षत और क्षय दूर होता है ॥ १९ ॥

लवंगाद्य चूर्ण ।
लवङ्गकङ्कोलमुशीरचन्दनं नतं सनीलोत्पलपत्रजीरकम् ।
त्रुटिः सकुष्णाऽगुरुभृङ्गकेशरं मुस्ता सविश्वानलदंसह्रांबुदम् ॥
अहीन्द्रजातीफलवंशलोचनाः सिताष्टभागं समसूक्ष्मचूर्णितम् ।
सुरोचनं तर्पणमग्निदीपनं बलप्रदंवृष्यतमं त्रिदोषनुत ॥ २१ ॥
उरोविबन्धं तमकं गलग्रहं सकासहिक्कारुचियक्ष्मपीनसम् ।
ग्रहण्यतीसारभगन्दरार्बुदं प्रमेहगुल्मांश्च निहन्ति सज्वरान् ॥
लौंग, कंकोल, खस, चन्दन, तगर, नीलकमल ( अभावमें नीलोफर ) तेजपात, जीरा, छोटी इलायची, पीपल, अगर, दारचीनी, नागकेशर, नागरमोथा, सोंठ, बालछड, सुगन्धवाला, अनन्तमूल, जायफल और वंशलोचन इन सबको समान-भाग लेकर बारीक चूर्ण करके अठगुनी मिश्री मिलादेवे । इस चूर्णको प्रतिदिन चार २ मासेकी मात्रासे सेवन करे । यह चूर्ण रुचिकारक, तृप्तिजनक और अग्नि-वर्द्धक एवं बल-वीर्यको उत्पन्न करनेवाला और त्रिदोषनाशक है तथा उरःक्षत, तमक, गलेकी पीडा, खाँसी, हिचकी, अरुचि, यक्ष्मा, पीनस, संग्रहणी, अतिसार, भगन्दर, अर्बुद, प्रमेह, गुल्म और ज्वर इन सब रोगोंको नष्ट करता है ॥ २०–२२॥

शृङ्ग्यर्जुनाद्य चूर्ण ।
शृङ्ग्यर्जुनाश्वगन्धानागबलापुष्कराभयाच्छिन्नरुहाः ।
तालीसादिसमेता लेह्या मधुसर्पिर्भ्यां यक्ष्महराः ॥ २३ ॥
काकडासिंगी, अर्जुनकी छाल, असगन्ध, गंगेरन, पोहकरमूल, हरड, गिलोय, तालीशपत्र, सोंठ, मिरच, पीपल, वंशलोचन, दारचीनी, छोटी इलायची और मिश्री इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके वस्त्रमें छान लेवे । इसको ३ मासे परिमाण शहद और घीमें मिलाकर सेवन करनेसे राजयक्ष्मा रोग दूर होता है ॥२३॥

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४७२ भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग-

सितोपलादिलेह ।

सितोपला तुगाक्षीरी पिप्पली बहुलात्वचः ।
अन्त्यादूर्द्धं द्विगुणितं लेहयेत्क्षौद्रसर्पिषा ॥ २४ ॥
चूर्णं वा प्राशयेदेतं श्वासकासक्षयापहम् ।
सुप्तजिह्वारोचकिनं मन्दाग्निं पार्श्वशूलिनम् ॥
हस्तपादांगदाहेषु ज्वरे रक्ते तथोर्ध्वगे ॥ २५ ॥

मिश्री १६ तोले, वंशलोचन ८ तोले, पीपल ४ तोले, छोटी इलायची दो तोले और दारचीनी १ तोला लेवे। सबको एकत्र चूर्ण करके शहद और घीके साथ मिला-कर सेवन करनेसे श्वास, खाँसी, क्षय, जिह्वाकी जडता, अरुचि, मन्दाग्नि, पसलीकी पीडा आदि रोग दूर होते हैं। इसको हाथ पाँव एवं शिरकी दाह, ज्वर और ऊर्ध्व-गत रक्तपित्तादि रोगाम भी सेवन कराना चाहिये ॥ २४ ॥ २५ ॥

वासावलेह ।

शतं संगृह्य वासायास्तोयद्रोणे विपाचयेत् ।
चतुर्भागावशेषेऽस्मिन् शर्करायाः पलं शतम् ॥ २६ ॥
त्रिकटु त्रिसुगन्धिश्च कट्फलं मुस्तकं गदम् ।
जीरकं पिप्पलीमूलं रोचनी चविका शुभा ॥ २७ ॥
कटुका श्रेयसी चैव तालीशं सधनीयकम् ।
कार्षिकं पृथगेतेषां क्षिपेन्मधु पलाष्टकम् ॥ २८ ॥

अडूसके पंचांगको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते-चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें १०० पल शुद्ध खांड डालकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे । जब वह पककर कुछ गाढा होजाय तब त्रिकुटा, दारचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, कायफल, नागरमोथा, कूठ, जीरा, पीपलामूल, गोरोचन, चव्य, वंशलोचन, कुटकी, गजपीपल, तालीशपत्र और धनियाँ, प्रत्येक औषधिका चूर्ण दो दो तोले डालदेवे और शीतल होजानेपर ३२ तोले शहद मिलादेवे ॥ २६-२८ ॥

तद्यथाग्निबलं लिह्याच्छृतशीताम्बुपानतः ।
निहन्ति राजयक्ष्माणं रक्तपित्तं क्षतक्षयम् ॥ २९ ॥
वातिकं पैत्तिकं चैव श्वासं चैव सुदारुणम् ।
हृच्छूलं पार्श्वशूलं च वमिश्चैवारुचिं ज्वरम् ॥
"अश्विभ्यां निर्मितो ह्येष बृहद्वासावलेहकः" ॥३०॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४७३

इस अवलेहको अपनी अग्निक बलानुसार (शृतशीतल) औटाकर शीतल किये हुए जलके साथ सेवन करनेसे राजयक्ष्मा, रक्तपित्त, क्षतक्षय, वात-पित्त जन्य दारुण श्वास, हृदयशूल, पसलीकी पीडा, वमन, अरुचि और ज्वरादिविकार शीघ्र नष्ट होते हैं। “इस वासावलेहको अश्विनीकुमारोंने निर्माण किया है ॥”

बृहद्वासावलेह १-२।

पञ्चविंशत्पलं ग्राह्यं बृहत्योर्वासकस्य च ।
भाङ्गर्याश्च पञ्चविंशच्च जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ३१ ॥
पादशेषे रसे तस्मिन् खण्डं शतपलं न्यसेत् ।
कुडवार्द्धं च हविषो मधुनः कुडवं तथा ॥ ३२ ॥ .
मृताभ्रकं पलं चैकं कणाचूर्णं चतुःपलम् ।
कुष्ठं तालीशपत्रं च मरिचं तेजपत्रकम् ॥ ३३ ॥
मुरा मांसीमुशीरं च लवङ्गं नागकेशरम् ।
त्वग्भाङ्गीं वालकं मुस्तं प्रत्येकं कर्षसम्मितम् ॥
श्लक्ष्णचूर्णीकृतं सर्वं लेहीभूते विनिःक्षिपेत् ॥ ३४ ॥

बडी कटेरी, कटेरी, अडूसा और भारङ्गी इन औषधियोंको पच्चीस २ पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। जब पकते पकते चतुर्थांश जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे फिर उसमें सौ पल शुद्ध खाँड डालकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे। जब पाक उत्तम प्रकारसे सिद्ध होजाय तब उसमें अभ्रक भस्म ४ तोले, पीपलका चूर्ण १६ तोले, एवं कूट, तालीशपत्र, मिरच, तेजपात, मुरा, मांसी, खस, लौंग, नागकेशर, दारचीनी, भारगी, सुगन्धवाला और नागरमोथा प्रत्येकका बारीक चूर्ण एक एक कर्ष और घी ८ तोल डालदेवे। शीतल होनेपर १६ तोले शहद मिलादेवे। सबको अच्छे प्रकारसे मिलाकर एक उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ ३१-३४ ॥

हन्ति यक्ष्माणमत्युग्रं कासं पञ्चविधं तथा ॥ ३५
रक्तपित्तं क्षयं कासं ज्वरं प्लीहानमेव च ।
बालानामपि वृद्धानां तरुणानां विशेषतः ॥ ३६ ॥
पार्श्वशूलं च हृच्छूलमम्लपित्तं वमिं तथा ।
बृहद्वासावलेहोऽयं महादेवेन निर्मितः ॥ ३७ ॥

पादशेषे रसे तस्मिन् खण्डं शतपलं न्यसेत् ॥ ३८ ॥

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४९४भैषज्यरत्नावली ।[ यक्ष्मरोग-

इसको प्रतिदिन छःछः मासे परिमाण सेवन करे। यह बृहद्वासावलेह दारुण राजयक्ष्मा, पाँच प्रकारकी खाँसी, रक्तपित्त, क्षय, ज्वर, प्लीहा, पसलीकी पीडा, हृदयशूल, अम्लपित्त और वमन इन सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करता है एवं बालक, वृद्ध और तरुण पुरुषोंके लिये विशेष उपयोगी है ॥ ३६-३७ ॥

तुलामादाय वासाया जलद्रोणे विपाचयेत् ।
पादशेषे रसे तस्मिन् खण्डं शतपलं न्यसेत् ॥ ३८ ॥
शनैर्मृद्वग्निना सम्यक् सिद्धे तत्र प्रदापयेत् ।
त्रिकटु त्रिसुगन्धं च कट्फलं मुस्तमेव च ॥ ३९ ॥
कुष्ठं कम्पिल्लकं श्वेतजीरकं कृष्णजीरकम् ।
त्रिवृता पिप्पलीमूलं चव्यं कटुकरोहिणी ॥ ४० ॥
शिवा तालीशधन्याकं प्रत्येकं च द्विकार्षिकम् ।
चूर्णयित्वा क्षिपेत्तत्र शीते मधु पलाष्टकम् ॥ ४१ ॥

२-अड़ूसेकी जड़की छाल या पंचांगको सौ पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। जब पकते २ चौथाई जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे फिर उस क्वाथमें सौ पल शुद्ध खांड डालकर धीरे धीरे मन्दमन्द अग्निसे पकावे। जब पककर लेहकी समान गाढा होजाय तब-सोंठ, मिरच, पीपल, दारंचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, कायफल, नागरमोथा, कूठ, कबीला, सफेद जीरा, काला जीरा, निसोत, पिपलामूल, चव्य, कुटकी, हरड, तालीशपत्र और धनियाँ इन प्रत्येक औषधिको दो दो कर्ष बारीक पीसकर डालदेवे और शीतल होनेपर ३२ तोले शहद मिलादेवे ॥३८-४१॥

अस्य मात्रां ततो लीढ्वा तोयमुष्णं पिबेदनु ।
सर्वकासाधिकारेषु स्वरभङ्गे विशेषतः ॥ ४२ ॥
राजयक्ष्मणि दुस्साध्ये वातश्लेष्माश्रये तथा ।
आनाहे वह्निमान्द्ये च हृद्रोगे च क्षतक्षये ॥
मूत्रकृच्छ्रे च कृच्छ्रे च शस्तोऽयं लेह उत्तमः ॥ ४३ ॥

इनको प्रतिदिन प्रातःकाल छः मासे अथवा १ तोला परिमाण सेवन करके ऊपरसे मन्दोष्ण जल पान करे । यह अवलेह सर्वप्रकारकी खाँसी, स्वरभंग, विशेषकर दुस्साध्य राजयक्ष्मा, वात-कफजन्य रोग, आनाह, मन्दाग्नि, हृदयरोग, क्षतक्षय, मूत्रकृच्छ्र और मूत्राघात आदि रोगमें विशेष उपयोगी है ॥ ४२-४३ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४७५


च्यवनप्राश ।

बिल्वाग्निमन्थश्योनाककाश्मर्यः पाटला बला ।
पर्ण्यश्चतस्रः पिप्पल्यः श्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयम् ॥ ४४ ॥
शृङ्गी तामलकी द्राक्षा जीवन्ती पुष्करागुरू ।
अमृता चाभया ऋद्धिर्जीवकषभकौ शठी ॥ ४५ ॥
मुस्तं पुनर्नवा मेदा सूक्ष्मैलोत्पलचन्दने ।
विदारीवृषमूलानि काकोली काकनासिका ॥ ४६ ॥
एषां पलोन्मितान्भागान्छतान्याममलकस्य च ।
पञ्च दद्यात्तदैकस्थं जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ४७ ॥
ज्ञात्वा गतरसान्येतान्यौषधान्यथ तं रसम् ।
तच्चामलकमुद्धृत्य निष्कुलं तैलसर्पिषोः ॥ ४८ ॥
पलद्वादशके भृष्ट्वा दत्त्वा चार्द्धतुलां भिषक् ।
मत्स्यण्डिकायाः पूताया लेहवत्साधु साधयेत् ॥ ४९ ॥

बेल, अरणी, स्योनापाठा, (आलू) कुम्भीर, पाढल इनकी छाल, खिरेंटी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, पीपल, गोखुरू, कटेरी, बडीकटेरी, काकडासिंगीं, भुईं आमला, दाख, जीवन्ती, पोहकरमूल, अगर, गिलोय, हरड, ऋद्धि, जीवक, ऋषभक, कचूर, नागरमोथा, पुनर्नवा, मेदा, (अभावमें असगन्ध), छोटी इलायची, नीलकमल, लालचन्दन, विदारीकन्द, अडसेकी जड, काकोली और काकनसा (कौआठोडी) ये प्रत्येक ओषधि चार चार तोले एवं सुपक्व और बडें बडे आमले ५०० लेवे । प्रथम आमलोंको वस्त्रकी पोटलीमें बाँधकर समस्त औषधियोंके साथ १ द्रोण जलमें पकावे । जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे और आमलोंको निकालकर उनकी गुठली अलग करके हाथसे मथकर वस्त्रमें छानलेवे । फिर उन आमलोंको ४८ तोले तिलके तैल और ४८ तोले गोघृतमें मन्दमन्द अग्निसे भूनकर पीसलेवे । फिर पूर्वोक्त क्वाथमें ५० पल मिश्री और उक्त आमले डालकर धीरे २ पकावे ॥ ४४-४९ ॥

षट्पलं मधुनश्चात्र सिद्धशीते प्रदापयेत् ।
चतुःपलं तुगाक्षीर्याः पिप्पल्या द्विपलं तथा ॥ ५० ॥

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४७६ | भैषज्यरत्नावली । | [ यक्ष्मरोग-

पलमेकं विदध्याच्च त्वगेलापत्रकेशरात् ।
इत्ययं च्यवनप्राशः परमुक्तो रसायनः ॥ ५१ ॥

जब पकते २ लेहकी समान होजाय तब नीचे उतारकर उसमें वंशलोचन १६ तोले, पीपल ८ तोले, एवं दारचीनी, छोटी इलायची तेजपात और नागकेशर इनका चूर्ण चार चार तोले डालदेवे और शीतल होनेपर २४ तोले शहद मिलादेवे । फिर करछीसे सबको अच्छे प्रकारसे मिलाकर घीके चिकने बासनमें भरकर रखदेवे । यह च्यवनप्राशावलेह परमश्रेष्ठ रसायन है ॥ ५० ॥ ५१ ॥

कासश्वासहरश्चैव विशेषेणोपदिश्यते ।
क्षीणक्षतानां वृद्धानां बालानाञ्चाङ्गवर्द्धनः ॥ ५२ ॥
स्वरक्षयमुरोरोगं हृद्रोगं वातशोणितम् ।
पिपासां मूत्रशुक्रस्थान् दोषांश्चैवापकर्षति ॥ ५३ ॥
अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत नोपरुन्ध्याच्च भोजनम् ।
अस्य प्रयोगाच्च्यवनः सुवृद्धोऽभूत्पुनर्युवा ॥ ५४ ॥

इसके सेवन करनेसे खाँसी और श्वास दूर होते हैं। यह अवलेह विशेषकर क्षतक्षीणरोगी वृद्ध मनुष्य और बालकोंके अंगोकी वृद्धि और पुष्टि करनेवाला है एवं स्वरभंग, उरोरोग, हृदयरोग, वातरक्त, तृषा, मूत्र और वीर्य सम्बन्धी सम्पूर्ण-दोष इन सब विकारोंको हरता है । इस अवलेहको ३ मासे अथवा ६ मासे परिमाण लेकर बकरीके दूध या शहदके साथ सेवन करना चाहिये । इसपर भोजनादि किसी प्रकारके पथ्य करनेका नियम नहीं है । इस अवलेहको सेवन करनेसे अत्यन्त वृद्ध च्यवन ऋषि फिरसे तरुण हो गये थे ॥ ५२–५४ ॥

मेधां स्मृतिं कांतिमनामयत्वमायुःप्रकर्ष बलमिन्द्रियाणाम् ।
स्त्रीषु प्रहर्षं परमग्निवृद्धिं बलप्रसादं पवनानुलोम्यम् ॥ ५५॥
रसायनस्यास्य नरः प्रयोगाल्लभेत जीर्णोऽपि कुटिप्रवेशात् ।
जराकृतं पूर्वमपास्य रूपं बिभर्त्ति रूपं नवयौवनस्य ॥ ५६ ॥
[ “ सिता मत्स्यण्डिकालाभे धात्र्याश्च मृदुभर्जनम् ।
चतुर्भागजले प्रायो द्रव्यं गतरसं भवेत् ॥ ५७ ” ]

यह अवलेह-मेधा, स्मरणशक्ति, कांति, आरोग्य, आयु इन्द्रियोंके बलकी वृद्धि करता है । एवं स्त्रियोंमें आनन्द, जठराग्निकी अत्यन्त वृद्धि, शरी-

पादशेषे कषाये च पूते शीते विनिक्षिपेत् ॥ ५८ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४३७

रमें बलका संचार और वायुका अनुलोमन करता है। इस रसायनको सेवन करनेसे वायु और धूपको न सहनेवाला वृद्ध मनुष्य भी वृद्धावस्थाके पूर्वरूपको दूरकर नव-यौवनके रूपको प्राप्त करता है ॥ ५६-५७ ॥

द्राक्षारिष्ट ।

द्राक्षातुलाद्धं द्विद्रोणे जलस्य विपचेत्सुधीः ।
पादशेषे कषाये च पूते शीते विनिक्षिपेत् ॥ ५८ ॥
गुडस्य द्वितुलां तत्र त्वगेलापत्रकेशरम् ।
प्रियङ्गुर्मरिचं कृष्णा विडङ्गञ्चेति चूर्णयेत् ॥ ५९ ॥
पृथक्पलोन्मितैर्भागैर्घृतभाण्डे निधापयेत् ।
मासं ततो घट्टयित्वा पिबेज्जातरसं ततः ॥ ६० ॥
उरःक्षतं क्षयं हन्ति कासश्वासगलामयान् ।
द्राक्षारिष्टाह्वयः प्रोक्तो बलकृन्मलशोधनः ॥ ६१ ॥

उत्तमदाख ५० पल लेकर दो द्रोण जलमें पकावे। जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर शीतल होजानेपर उस क्वाथमें गुड २०० पल एवं दारचीनी, छोटी इलायची, तेजपात, नागकेशर, फूलप्रियंगु, काली-मिरच, पीपल और वायविडंग प्रत्येकके चूर्णको चार चार तोले डालदेवे। फिर सबको अच्छे प्रकारसे मिलाकर घीके चिकने वर्त्तनमें भरकर और उसका मुँह बन्द करके रखदेवे। एक महीनेतक रक्खा रहनेके पश्चात् जब उसमें रस उत्पन्न होजाय तब निकालकर छानलेवे। यह द्राक्षारिष्ट यथोचित मात्रासे पान करते ही उरःक्षत, क्षय, खाँसी, श्वास और सर्व प्रकारके गल रोगोंको दूर करता है। एवं बलको बढाताहै। शुद्ध करता है ॥ ५८-६१ ॥

विन्ध्यवासियोग ।

व्योषं शतावरी त्रीणि फलानि द्वे बले तथा ।
सर्वामयहरो योगः सोऽयं लौहरजोन्वितः ॥ ६२ ॥
एष वक्षःक्षतं हन्ति कण्ठजांश्च गदांस्तथा ।
राजयक्ष्माणमत्युग्रं बाहुस्तम्भमथार्दितम् ॥ ६३ ॥

सोंठ, पीपल, मिरच, शतावर, हरड, बहेडा, आमला, खिरैंटी और कंघी इन सब औषधियोंका चूर्ण एक एक तोला और लोह भस्म ९ तोले लेकर सबको एकत्र जलके साथ खरल करलेवे। यह उत्तम योग सम्पूर्ण रोगोंको हरनेवाला है।

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४७८ भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग -

इसको उचित मात्रासे सेवन करनेसे उरःक्षत, कण्ठगतरोग, अत्यन्त भयंकर राज-
यक्ष्मा, बाहुस्तम्भ और अर्दितादिरोग नष्ट होते हैं ॥ ६२ ॥ ६३ ॥

मधुताप्यविडङ्गाश्मजतुलोहघृताभयाः ।
हन्ति यक्ष्माणमत्युग्रं सेव्यमानो हिताशिनः ॥ ६४ ॥

स्वर्णमाक्षिक, वायविडंग, शिलाजीत और हरड इन ओषधियोंको एक एक भाग
और सबकी बराबर लोहभस्म लेकर एकत्र खरल करलेवे । इस यक्ष्मारि लोहको
घी और शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे और पथ्य पदार्थोंको सेवन करनेसे
अत्यन्त उग्र यक्ष्मारोग दूर होता है ॥ ६४ ॥

यक्ष्मान्तकलौह ।

रास्नातालीशकर्पूरभेकपर्णीशिलाह्वयैः ।
त्रिकत्रयसमायुक्तैर्लोहो यक्ष्मान्तको मतः ॥ ६५ ॥
सर्वोपद्रवसंयुक्तमपि वैद्यविवर्जितम् ।
हन्ति कासं स्वराघातं क्षयकासं क्षतक्षयम् ।
बलवर्णाग्निपुष्टीनां साधनं दोषनाशनम् ॥ ६६ ॥

रास्ना, तालीशपत्र, कपूर, मण्डूकपर्णी, शिलाजीत, त्रिफला, त्रिकुटा, वायविडंग,
नागरमोथा और चीतेकी जडकी छाल प्रत्येकका चूर्ण एक एक तोला और लोह
भस्म चौदह तोले लेवे सबको एकत्र जलके द्वारा खरल करके गोलियाँ बनालेवे ।
यह यक्ष्मान्तकलोह है । इसीको रास्नादि लौह भी कहते हैं । यह लोह-खाँसी,
स्वरभंग, क्षयकी खाँसी, क्षतक्षय एवं सम्पूर्ण उपद्रवोंसे युक्त और वैद्योंसे त्यागे हुये
राजयक्ष्मारोग और अन्यान्य समस्त दोषोंको नष्ट करता है बल, वर्ण और अग्निकी
वृद्धि तथा पुष्टि करता है ॥ ६५ ॥ ६६ ॥

शिलाजत्वादि लौह ।

शिलाजतुमधुव्योषताप्यलौहरजांसि च ।
क्षीरेण लेहितस्याशु क्षयं क्षयमवाप्नुयात् ॥ ६७ ॥

शिलाजीत, मुलहठी, सोंठ, मिरच, पीपल और सोनामाखी-ये प्रत्येक एक एक
तोला और लोह भस्म ६ तोले लेकर सबको एकत्र जलके साथ खरल करके
गोलियाँ बनालेवे । इस लोहको दूधके साथ सेवन करनेसे क्षयरोग शीघ्र नष्ट
होता है ॥ ६७ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४७९


रजतादिलौह ।

भस्मीभूतं रजतममलं तत्समं व्योमचूर्णं
सर्वैस्तुल्यं त्रिकटु सवरं साय आज्येन युक्तम् ।
लीढं प्रातःक्षपयतितरां यक्ष्मपाण्डूदरार्शः-
श्वासं कासं नयनजरुजः पित्तरोगानशेषान् ॥ ६८ ॥

चाँदीकी भस्म १ भाग, अभ्रकभस्म १ भाग, त्रिकुटा, त्रिफला और लोहभस्म ये प्रत्येक तीन २ भाग लेवे । इन सबको एकत्र खरल करके गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली घृतके साथ मिलाकर सेवन करनेसे राजयक्ष्मा, पाण्डुरोग, उदरविकार, अर्श, श्वास, खाँसी, नेत्ररोग, और पित्तजनित सम्पूर्ण उपद्रव शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ ६८ ॥

क्षयकेसरी १-२ ।

त्रिकटुत्रिफलैलाभिजतीफललवङ्गकैः ।
नवभागान्वितं लौहं समं सिन्दूरसन्निभम् ॥ ६९ ॥
छागीदुग्धेन सम्पिष्य वल्लभस्त्य प्रयोजयेत् ।
मधुना क्षयरोगांश्च हन्त्ययं क्षयकेसरी ॥ ७० ॥

सोंठ, मिरच, पीपल, त्रिफला, छोटी इलायची, जायफल और लौंग प्रत्येकका चूर्ण एक एक तोला और सिन्दूरकी समान कान्तियुक्त लोह भस्म ९ तोले लेवे । सबको एकत्र बकरीके दूधके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बना लेवे । प्रतिदिन एक एक गोली शहदके साथ सेवन करनेसे यह क्षयकेसरी क्षयरोग और उसके सम्पूर्ण उपद्रवोंको नष्ट करताहै ॥ ६९॥७० ॥

मृतमभ्रं मृतं सूतं मृतं लौहं तथा रविः ।
मृतं नागं च कांस्यं च मण्डूरं विमलं शिला ॥ ७१ ॥
वङ्गं खर्परकं तालं शंखटङ्कणमाक्षिकम् ।
वैक्रान्तं कान्तलौहं च स्वर्णं विद्रुममौक्तिकम् ॥ ७२ ॥
वराटं मणिरागं च राजपट्टं च गन्धकम् ।
सर्वमेकत्र सञ्चूर्ण्य खल्लमध्ये विनिःक्षिपेत् ॥ ७३ ॥
मर्दयेत्त्वग्निभानुभ्यां प्रपुटेत्त्रिदिनं लघु ।
भावयेत्पुटयेदेभिर्वारान्त्रींश्च पृथक्पृथक् ॥ ७४ ॥

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४८०भैषज्यरत्नावली ।[ यक्ष्मरोग-

मातुलुङ्गवरावह्नित्वम्लवेतसमार्कवैः ।
हयमारार्द्रकरसैः पाचितो लघुवह्निना ॥ ७५ ॥

अभ्रकभस्म, रससिन्दूर, लोहभस्म, ताम्रभस्म, शीशेकी भस्म, काँसेकी भस्म, मण्डूरभस्म, रूपामाखीकी भस्म, शुद्ध मैनसिल, वङ्गभस्म, शुद्ध खपरिया, हरतालभस्म, शंखभस्म, सुहागा, सोनामाखीकी भस्म, वैक्रान्तकी भस्म, कान्तलोह, सुवर्णभस्म, मूँगा मोती और कौडीकी भस्म, सिंगरफ, राजपट्ट (रेपटी अभावमें गोदन्ती हरताल) और शुद्ध गन्धक इन सबको समान भाग लेकर सबको एकत्र खरलमें डालकर खूब बारिक चूर्ण करके चीते और आकके क्वाथमें खूब खरल करके ३ दिनतक लघुपुटमें पकावे । इसी प्रकार क्रमसे बिजौरेनींबूका रस, त्रिफला, चीता, अमलवेत, भाँगरा, कनेर और अदरख इन प्रत्येक औषधिके स्वरस व क्वाथमें ३-३ दिनतक भावना देकर लघुपुटमें पकावे । फिर स्वांग शीतल होनेपर औषधको निकालकर बारीक चूर्ण कर लेवे ॥ ७१-७५ ॥

वातपित्तकफोत्क्लेशाञ्ज्वरान्समर्दितानपि ।
सन्निपातं निहन्त्याशु सर्वाङ्गैकाङ्गमारुतान् ॥ ७६ ॥
सेवितश्च सितायुक्तो मागधीररसा युतः ।
मधुकार्द्रकसंयुक्तस्तद्व्याधिहरणौषधैः ॥ ७७ ॥
सेवितो हन्ति रोगिणां व्याधिवारणकेसरी ।
क्षयमेकादशविधं शोथं पाण्डुं कृमिं जयेत् ॥ ७८ ॥
कासं पञ्चविधं श्वास मेहं मेदो महोदरम् ।
अश्मरीं शर्करां शूलं प्लीहगुल्मं हलीमकम् ।
सर्वव्याधिहरो बल्यो वृष्यो मेध्यो रसायनः ॥ ७९ ॥

इसको दो रत्तीप्रमाण लेकर मिश्री, पीपलका चूर्ण, शहद और अदरख इनके साथ मिलाकर अथवा यथादोषानुसार अनुपानाेंके साथ सेवन करे । यह क्षयकेसरीरस वात, पित्त और कफके उत्पन्न हुए ज्वर, सन्निपात ज्वर, सर्वांगवात, एकांगवात, ग्यारह प्रकारका क्षय, सूजन, पाण्डु, कृमि, पाँच प्रकारकी खाँसी, श्वास, प्रमेह, मेद, जलोदर, पथरी, शर्करा, शूल, प्लीहा, गुल्म, हलीमक आदि सम्पूर्ण व्याधियोंको नष्ट करता है । यह सब रोगनाशक तथा बल, वीर्य और मेधा शक्तिकी वृद्धि करनेवाला और अत्युत्तम रसायन है ॥ ७६-७९ ॥