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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 501 of 1416

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Page 501

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४६९

वमन विरेचनादिके द्वारा कोष्ठ शुद्धि हो जानेपर रोगीको बलकारक और अग्नि-वर्द्धक औषधियाँ देनी चाहिये, क्योंकि मनुष्योंका बल शुक्रके अधीन है और जीवन मलके अधीन है। इसलिये राजयक्ष्मरोगीके वीर्य और मलकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। कारण, अधिक वीर्यक्षय होनेसे बलका हास और अधिक मल निकलनेसे जीवन नष्ट होता है ॥ ७ ॥

पारावतकपिच्छागकुरङ्गाणां पृथक् पृथक् ।
मांसचूर्णमजाक्षीरैः पीतं क्षयहरं परम् ॥ ८ ॥

परेवा (कबूतर), बन्दर, बकरा और हिरन इनके मांसको पृथक् पृथक् भून कर और उनका चूर्ण करके बकरीके दूधके साथ सेवन करनेसे क्षयरोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥

घृतकुसुमरसलीढं क्षयं नयति गजबलामुलम् ।
दुग्धेन केवलेन च वायसजङ्घा निपीतैव ॥ ९ ॥

गंगेरनकी जडको बारीक पीसकर घी और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे वा केवल मसीघासको पीसकर दूधके साथ पीनेसे क्षयरोग निवृत्त होता है ॥ ९ ॥

शर्करामधुसंयुक्तं नवनीतं लिहन् क्षयी।
क्षीराशी लभते पुष्टिमतुल्ये चाज्यमाक्षिके ॥ १० ॥

क्षयरोगी, मिश्री और शहदको नैनीघीमें मिलाकर सेवन करे और दूधका भोजन करे अथवा घृत और शहदको असमान भाग अर्थात् ४ माशे और २ माशे लेकर सेवन करे तो उसके शरीरकी पुष्टि होती है ॥ १० ॥

अलक्तरसैः क्षौद्रं रक्तवान्तिहरं परम् ॥ ११ ॥

लाखके रस अथवा लाखके काढेमें शहद मिलाकर सेवन करनेसे रक्तकी वमन दूर होती है ॥ ११ ॥

ककुभत्वङ्नागबला वानारिबीजानिचूर्णितं पयसि ।
पक्वं घृतमधुयुक्तं ससितं यक्ष्मादिकासहरम् ॥ १२ ॥

अर्जुनकी छाल, गंगेरन और कौंचके बीज-इनके समान भाग चूर्णको दूधमें डाल-कर पकावे, फिर उसमें शहद, घी और मिश्री मिलाकर पान करनेसे यक्ष्मा, खाँसी आदि रोग दूर होते हैं ॥ १२ ॥

कृष्णा द्राक्षा सितालेहः क्षयहा क्षौद्रतैलवान् ।
मधुसर्पिर्युतो वाऽश्वगन्धाकृष्णासितोद्भवः ॥ १३ ॥