Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 494 of 1416

Read in context
Page 494

४६२ | भैषज्यरत्नावली । | [ रक्तपित्त-

रक्तपित्तविकारेषु वातरक्तगदेषु च ।
क्षीणशुक्रेषु दातव्यं वाजीकरणमुत्तमम् ॥ १२ ॥
अङ्गदाहं शिरोदाहं ज्वरं पित्तसमुद्भवम् ।
योनिशूलं च दाहं च मूत्रकृच्छ्रं च पैत्तिकम् ॥ १३ ॥
एतान्रोगान्निहन्त्याशु छिन्नाभ्राणीव मारुतः ।
शतावरीसर्पिरिदं बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ॥
स्नेहपादः स्मृतः कल्कः कल्कवन्मधुशर्करे ॥ १४ ॥

इस घृतको रक्तपित्त, वातरक्त और शुक्रकी क्षीणताम देना चाहिये। यह अत्यन्त बाजीकरण है एवं शरीरकी दाह, शिरोदाह, पित्तज्वर, योनिशूल सर्व प्रकारकी कफ और पित्तज मूत्रकृच्छ इन समस्त विकारोंको इस प्रकार नष्ट करदेताहै जैसे वायुके वेगसे मेघोंका समूह तत्काल छिन्न भिन्न होजाताहै। यह शतावरीघृत बल, वर्ण और जठराग्निकी विशेष वृद्धि करता है ॥ १२-१४ ॥

बृहच्छतावरीघृत ।

शतावरीमूलतुलाश्चतस्रः संप्रपीडयेत् ।
रसेन क्षीरतुल्येन पचेत्तेन घृताढकम् ॥ १५ ॥
जीवनीयैः शतावर्या मृद्वीकाभिः परूषकैः ।
पिष्टैःप्रियालैश्चाक्षांशैर्द्वियष्टिमधुकैर्भिषक् ॥ १६ ॥
सिद्धशीते च मधुनः पिप्पल्याश्च पलाष्टकम् ।
दत्त्वा दशपलं चात्र सितायास्तद्विमिश्रितम् ॥ १७ ॥

शतावरकी जडको कूट पीसकर वस्त्रमें निचोडकर रस निकाल लेवे। ऐसा रस ४०० पल, गौका दूध ४०० पल और घी १ आढक लेवे। सबको एकत्र मिलाकर घृतको पकावे। कुछ देर बाद जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीर-काकोली जीवन्ती, मुलहठी, मुगवन, मषवन, शतावर, दाख, फालसे, चिरौंजी मुलहठी और महुआ प्रत्येक औषधिको दो दो तोले पीसकर डालदेवे। जब घृत उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब नीचे उतारलेवे। शीतल होनेपर घृतको छानकर उसमें शहद ३२ तोले, पीपलका चूर्ण ३२ तोले और मिश्री ४० तोले डालकर सबको अच्छी तरह मिला देवे ॥ १५-१७

ब्राह्मणान्प्राशयेत्पूर्वं लिद्यात्पाणितलं ततः ।
योन्यसृक्शुक्रदोषघ्नं वृष्यं पुंसवनं च तत् ॥ १८ ॥