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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 509 of 1416

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Page 509

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४३७

रमें बलका संचार और वायुका अनुलोमन करता है। इस रसायनको सेवन करनेसे वायु और धूपको न सहनेवाला वृद्ध मनुष्य भी वृद्धावस्थाके पूर्वरूपको दूरकर नव-यौवनके रूपको प्राप्त करता है ॥ ५६-५७ ॥

द्राक्षारिष्ट ।

द्राक्षातुलाद्धं द्विद्रोणे जलस्य विपचेत्सुधीः ।
पादशेषे कषाये च पूते शीते विनिक्षिपेत् ॥ ५८ ॥
गुडस्य द्वितुलां तत्र त्वगेलापत्रकेशरम् ।
प्रियङ्गुर्मरिचं कृष्णा विडङ्गञ्चेति चूर्णयेत् ॥ ५९ ॥
पृथक्पलोन्मितैर्भागैर्घृतभाण्डे निधापयेत् ।
मासं ततो घट्टयित्वा पिबेज्जातरसं ततः ॥ ६० ॥
उरःक्षतं क्षयं हन्ति कासश्वासगलामयान् ।
द्राक्षारिष्टाह्वयः प्रोक्तो बलकृन्मलशोधनः ॥ ६१ ॥

उत्तमदाख ५० पल लेकर दो द्रोण जलमें पकावे। जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर शीतल होजानेपर उस क्वाथमें गुड २०० पल एवं दारचीनी, छोटी इलायची, तेजपात, नागकेशर, फूलप्रियंगु, काली-मिरच, पीपल और वायविडंग प्रत्येकके चूर्णको चार चार तोले डालदेवे। फिर सबको अच्छे प्रकारसे मिलाकर घीके चिकने वर्त्तनमें भरकर और उसका मुँह बन्द करके रखदेवे। एक महीनेतक रक्खा रहनेके पश्चात् जब उसमें रस उत्पन्न होजाय तब निकालकर छानलेवे। यह द्राक्षारिष्ट यथोचित मात्रासे पान करते ही उरःक्षत, क्षय, खाँसी, श्वास और सर्व प्रकारके गल रोगोंको दूर करता है। एवं बलको बढाताहै। शुद्ध करता है ॥ ५८-६१ ॥

विन्ध्यवासियोग ।

व्योषं शतावरी त्रीणि फलानि द्वे बले तथा ।
सर्वामयहरो योगः सोऽयं लौहरजोन्वितः ॥ ६२ ॥
एष वक्षःक्षतं हन्ति कण्ठजांश्च गदांस्तथा ।
राजयक्ष्माणमत्युग्रं बाहुस्तम्भमथार्दितम् ॥ ६३ ॥

सोंठ, पीपल, मिरच, शतावर, हरड, बहेडा, आमला, खिरैंटी और कंघी इन सब औषधियोंका चूर्ण एक एक तोला और लोह भस्म ९ तोले लेकर सबको एकत्र जलके साथ खरल करलेवे। यह उत्तम योग सम्पूर्ण रोगोंको हरनेवाला है।