भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context४७२ भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग-
सितोपलादिलेह ।
सितोपला तुगाक्षीरी पिप्पली बहुलात्वचः ।
अन्त्यादूर्द्धं द्विगुणितं लेहयेत्क्षौद्रसर्पिषा ॥ २४ ॥
चूर्णं वा प्राशयेदेतं श्वासकासक्षयापहम् ।
सुप्तजिह्वारोचकिनं मन्दाग्निं पार्श्वशूलिनम् ॥
हस्तपादांगदाहेषु ज्वरे रक्ते तथोर्ध्वगे ॥ २५ ॥
मिश्री १६ तोले, वंशलोचन ८ तोले, पीपल ४ तोले, छोटी इलायची दो तोले और दारचीनी १ तोला लेवे। सबको एकत्र चूर्ण करके शहद और घीके साथ मिला-कर सेवन करनेसे श्वास, खाँसी, क्षय, जिह्वाकी जडता, अरुचि, मन्दाग्नि, पसलीकी पीडा आदि रोग दूर होते हैं। इसको हाथ पाँव एवं शिरकी दाह, ज्वर और ऊर्ध्व-गत रक्तपित्तादि रोगाम भी सेवन कराना चाहिये ॥ २४ ॥ २५ ॥
वासावलेह ।
शतं संगृह्य वासायास्तोयद्रोणे विपाचयेत् ।
चतुर्भागावशेषेऽस्मिन् शर्करायाः पलं शतम् ॥ २६ ॥
त्रिकटु त्रिसुगन्धिश्च कट्फलं मुस्तकं गदम् ।
जीरकं पिप्पलीमूलं रोचनी चविका शुभा ॥ २७ ॥
कटुका श्रेयसी चैव तालीशं सधनीयकम् ।
कार्षिकं पृथगेतेषां क्षिपेन्मधु पलाष्टकम् ॥ २८ ॥
अडूसके पंचांगको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते-चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें १०० पल शुद्ध खांड डालकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे । जब वह पककर कुछ गाढा होजाय तब त्रिकुटा, दारचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, कायफल, नागरमोथा, कूठ, जीरा, पीपलामूल, गोरोचन, चव्य, वंशलोचन, कुटकी, गजपीपल, तालीशपत्र और धनियाँ, प्रत्येक औषधिका चूर्ण दो दो तोले डालदेवे और शीतल होजानेपर ३२ तोले शहद मिलादेवे ॥ २६-२८ ॥
तद्यथाग्निबलं लिह्याच्छृतशीताम्बुपानतः ।
निहन्ति राजयक्ष्माणं रक्तपित्तं क्षतक्षयम् ॥ २९ ॥
वातिकं पैत्तिकं चैव श्वासं चैव सुदारुणम् ।
हृच्छूलं पार्श्वशूलं च वमिश्चैवारुचिं ज्वरम् ॥
"अश्विभ्यां निर्मितो ह्येष बृहद्वासावलेहकः" ॥३०॥