भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पादशेषे समं तैलं दधि दद्यात्सकाञ्जिकम् ॥ ६७ ॥
| ६७२ | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि- |
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कुब्जप्रसारणी तैल ।
प्रसारणीशतं क्षुण्णं पचेत्तोयार्मणे शुभे ।
पादशेषे समं तैलं दधि दद्यात्सकाञ्जिकम् ॥ ६७ ॥
द्विगुणं च पयो दत्त्वा कल्कान्द्विपलिकॉंस्तथा ।
चित्रकं पिप्पलीमूलं मधुकं सैन्धवं बलाम् ॥ ६८ ॥
शतपुष्पां देवदारु रास्नां वारणपिप्पलीम् ।
प्रसारण्याश्च मूलानि मांसी भल्लातकानि च ॥ ६९ ॥
पचेन्मृद्वग्निना तैलम्—
सौ पल प्रसारणीको कूटकर एक द्रोण ( ३२ सेर ) जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग ( ८ सेर ) जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें तिलका तैल, दही और काँजी ये प्रत्येक आठ आठ सेर, दूध सोलह सेर एवं चीता, पीपलामूल, मुलहठी, सेंधानमक, खिरेंटी, सोया, देवदारु, रास्ना, गज-पीपल, प्रसारणीकी जड, बालछड और भिलावे इन सबके कल्कको दो दो पल डालकर मन्दमन्द अग्निसे तैलको सिद्ध करे ॥ ६७-६९ ॥
—वातश्लेष्मामयाञ्जयेत् ।
अशीतिं नरनारीस्थान्वातरोगान्व्यपोहति ॥ ३७० ॥
कुब्जस्तिमितपङ्गुत्वं गृध्रसीखुडकार्दितम् ।
हनुपृष्ठशिरोग्रीवास्तम्भं चाशु नियच्छति ॥ ७१ ॥
यह तैल वात और कफजन्य सब रोगोंको दूर करता है। एवं स्त्री पुरुषोंके अस्सी प्रकारके वातरोगोंको नष्ट करता है । इससे कुब्जता, जडता, पंगुता, गृध्रसी, खुडक अर्दितवात, हनुस्तम्भ, पृष्ठशूल, शिरःपीडा और ग्रीवास्तंभ ये सब रोग शीघ्र नाश होते हैं ॥ ३७० ॥ ३७१ ॥
त्रिशतीप्रसारणीतैल ।
समूलपत्रशाखां च जातसारां प्रसारणीम् ।
कुट्टयित्वा पलशतं दशमूलशतं तथा ॥ ७२ ॥
अश्वगन्धापलशतं कटाहे समधिक्षिपेत् ।
वारिद्रोणे पृथक् कृत्वा पादशेषेऽवतारितम् ॥ ७३ ॥
कषायसममात्रं तु तैलमत्र प्रदापयेत् ।
दध्नस्तथाऽऽढकं दत्त्वा द्विगुणं चाम्लकाञ्जिकात् ॥ ७४ ॥
[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता। ६५३
चतुर्द्रोणेन पयसा जीवनीयैः पलोन्मितैः ।
शृङ्गवेरपलात्पंच त्रिंशद्भल्लातकानि च ॥ ७५ ॥
द्वे पले पिपलीमूलाच्चित्रकाच्च पलद्वयम् ।
यवक्षारपले द्वे च सैन्धवस्य पलद्वयम् ॥ ७६ ॥
सौवर्चलपले द्वे च मञ्जिष्ठायाः पलद्वयम् ।
प्रसारणीपले द्वे च मधुकस्य पलद्वयम् ॥
सर्वाण्येतानि संहृत्य शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ७७ ॥
मूल, पत्ते और शाखासहित प्रसारणी १०० पल, दशमूल १०० पल और असगन्ध १०० पल इन तीनोंको अलग अलग कूटकर जब उसमें सार भाग उत्पन्न होजाय तब एक एक द्रोण जलमें डालकर कढ़ाईमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर सबको एकत्र मिलाकर उसमें तिलका तेल ८ सेर, दहीका तोड ८ आढक, काँजी २ आढक, पाकके लिये जल ४ द्रोण, कल्कके लिये जीवनीयगणकी प्रत्येक औषधि एक एक पल, अदरख ५ पल, भिलावे ३० पल, पीपलामूल २ पल, चीता २ पल, जवाखार दो पल, सैंधानमक २ पल, कालानमक २ पल, मंजीठ २ पल, गन्धप्रसारिणी दो पल और मुलहठी २ पल इन सब औषधियोंको कूट पीसकर डालदेवे । फिर मन्दमन्द अग्निद्वारा धीरे धीरे तेलको पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर छानलेवे ॥ ७२–७७ ॥
एतदभ्यञ्जने श्रेष्ठं वस्तिकर्मनिरूहणे ।
पाने नस्ये च दातव्यं न क्वचित्प्रतिहन्यते ॥ ७८ ॥
अशीतिं वातजाँरोगांश्चत्वारिंशच्च पैत्तिकान् ।
विंशतिं श्लैष्मिकांश्चैव सर्वानैतान् व्यपोहति ॥ ७९ ॥
गृध्रसीमस्थिभङ्गं च मन्दाग्नित्वमरोचकम् ।
अपस्मारं तथोन्मादं विभ्रमं मन्दगामिताम् ॥ ३८० ॥
त्वग्गताश्चापि ये वाताः शिरःसन्धिगताश्च ये ।
जानुसन्धिगताश्चैव पादपृष्ठगताश्च ये ॥ ८१ ॥
इस तैलको मालिश करना, वस्तिकर्म, निरूहवस्ति, पान करना, नस्य देना आदि कर्मोंमें प्रयोग करना । इसपर किसी प्रकारका परहेज नहीं करना चाहिये । यह
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६७४ | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि-
तैल अस्सी प्रकारके वातरोग, चालीस प्रकारके पित्तरोग, बीस प्रकारके कफके रोग एवं गृध्रसीवात, हड्डीका टूटजाना मन्दाग्नि, अरुचि, अपस्मार, उन्माद, भ्रम, मन्द मन्द चलना, त्वचा, शिर, सन्धि, जानुसन्धि, पाँव और पृष्ठ इन स्थानोंमें स्थित वातकी पीडा इन सबको नष्ट करताहै ॥ ७८-८१ ॥
अश्वो वा वातसंभग्नो गजो वा यपि वा नरः ।
प्रसारयति यस्मात्तं तस्मादेषा प्रसारणी ॥ ८२ ॥
इन्द्रियाणां च जननी वृद्धानां च प्रसूयनी ।
एतेनान्धकवृष्णीनां कृतं पुंसवनं महत् ॥
प्रसारणीतैलमिदं बलवर्णाभिवर्द्धनम् ॥ ८३ ॥
अपनयति जरां पलितं शोषयति रुजां करोति तारुण्यम् ।
पक्षाघातं सर्वाङ्गहतं नाशयति वातगुल्मं च ॥ ८४ ॥
एतदुपयुज्यमानः प्रसन्नवर्णेन्द्रियो भवति ॥ ८५ ॥
वातसे पीडित घोडे या हाथी अथवा मनुष्यको वातबंधनसे छुडा देता है, इस कारण इसको प्रसारणी तैल कहते हैं । यह तैल इन्द्रियशक्तिको उत्पन्न करनेवाला, वृद्ध मनुष्योंको प्रसन्न करनेवाला, अन्धोंको दृष्टिशक्ति, नपुंसकोंको, पुरुषत्व देनेवाला एवं बल, वर्ण और जठराग्निकी वृद्धि करता है । वृद्धताको और पलितरोगको दूर करता है । रोगोंको नष्टकर तरुणताको उत्पन्न करता है । एवं पक्षाघात, सर्वाङ्गत-वात और वात गुल्मरोगका नाश करता है । इस तेलको सेवन करनेसे मनुष्य निर्म-लवर्ण और प्रसन्न इन्द्रियोंवाला होता है ॥
सप्तशंतिकप्रसारणीतैल ।
समूलपत्रमुत्पाट्य शरत्काले प्रसारणीम् ।
शतं ग्राह्यं सहचराच्छतावर्याः शतं तथा ॥ ८६ ॥
बलात्मगुप्ताश्वगन्धाकेतकीनां शतं शतम् ।
पचेच्चतुर्गुणे तोये द्रवैस्तैलाढकं पृथक् ॥ ८७ ॥
मस्तु मांसरसं चुक्रं पयश्चाढकमाढकम् ।
दध्याढकमायुक्तं पाचयेन्मृदुनाऽग्निना । ८८ ॥
द्रव्याणां तु प्रदातव्या मात्रा चार्द्धपलांशिका ।
तगरं मदनं कुष्ठं केशरं मुस्तकं त्वचम् ॥ ८९ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६७५
रास्ना सैन्धवपिप्पल्यौ मांसीमञ्जिष्ठयष्टिकाः ।
तथा मेदा महामेदा जीवकर्षभकौ पुनः ॥ ३९० ॥
शतपुष्पा व्याघ्रनखं शुण्ठी देवाह्वमेव च ।
काकोली क्षीरकाकोली वचा भल्लातकं तथा ॥ ९१ ॥
पेषयित्वा समानेतानत्साधनीया प्रसारणी ।
नातिपक्वं न हीनं च सिद्धं पूतं निधापयेत् ॥ ९२ ॥
शरदृतुमें मूल और पत्तोंसहित प्रसारणीको उखाड़कर १०० पल लेवे, पियावाँसा १०० पल, शतावर १०० पल, खिरेंटी १०० पल, कौंचकी जड़ १०० पल, असगन्ध १०० पल और केतकी १०० पल इन सबोंको अलग २ कूटकर चार सौ चार सौ पल जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल शेष रहे तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें दहीका तोड़, बकरेके मांसका रस, चूका, दूध, दही और तिलका तैल ये प्रत्येक २क एक आढक ( २५६ तोले ) एवं तगर, मैनफल, कूठ, केशर, नागरमोथा, दालचीनी, रास्ना, सेंधानमक, पीपल, बालछड, मंजीठ, मुलहठी, मेदा, महामेदा, जीवक, ऋषभक, सोया, नख, सोंठ, देवदारु, काकोली, क्षीरकाकोली, वच और भिलावे इन प्रत्येक द्रव्योंको दो दो तोले परिमाण पीसकर डालदेवे । फिर सबको यथाविधि एकत्र कर मन्दमन्द अग्निद्वारा तेलको पकावे । इस तेलको न तो बहुत पकावे और न कच्चा रक्खे । जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर छान लेवे और शुद्ध पात्रमें भरकर रखदेवे ॥८६॥३९२॥
यत्र यत्र प्रदातव्या तन्मे निगदतः शृणु ।
कुब्जानामथ पंगूनां वामनानां तथैव च ॥ ९३ ॥
यस्य शुष्यति चैकाङ्गं ये च भग्नास्थिसन्धयः ।
वातशोणितदुष्टानां वातोपहतचेतसाम् ॥ ९४ ॥
स्त्रीमद्यक्षीणशुक्राणां वाजीकरणमुत्तमम् ।
वस्तौ पाने तथाऽभ्यङ्गे नस्ये चैव प्रयोजयेत् ॥
प्रयुक्तं शमयत्याशु वातजान्विविधान् गदान् ॥ ९५ ॥
जिस २ रोगमें इस तैलको देना चाहिये, उसको कहते हैं सुनो—कुबड़े लँगड़े और बौने मनुष्य एवं जिसका एक अङ्ग सूख गया हो, जिनकी हड्डियें और सन्धियें टूटगईं हों, वातरक्तसे पीडित, दूषितवातसे नष्ट होगया है चित्त जिनका ऐसे अधिक स्त्रीप्रसङ्ग, अत्यन्तमद्यपान करनेवाले और क्षीणवीर्यवाले मनुष्योंके
| ६७६ | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि- |
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लिये यह तैल अत्युत्तम वाजीकरण औषध है। इसको पान, वस्तिकर्म, मालिश और नस्यकर्ममें प्रयोग करना चाहिये। विधिपूर्वक सेवन करनेसे यह तैल नानाप्रकारके वातजनित-रोगोंको बहुत जल्द नष्ट करता है ॥ ९३-३९५ ॥
एकादशशतिकप्रसारणीतैल ।
शाखामूलदलैः प्रसारशितुलास्तिस्रः कुरुण्टात्तुले
छिन्नायाश्च तुले तुले रुवुकतो रास्नाशिरीषात्तुलाम् ।
देवाह्वाच्च सकेतकाद् घटशते निःक्वाथ्य कुम्भांशके
तोये तैलघटं तुषाम्बुकलशौ दत्त्वाऽऽढकं मस्तुतः ॥ ९६ ॥
शुक्ताच्छागरसादथैक्षुरसतः क्षीराच्च दत्त्वाऽऽढकं
पृक्काकर्कटजीवकाद्यविकसाकाकोलिकाकच्छुराः ।
सूक्ष्मैलाघनदारुकुन्दुरुसरलाकाश्मीरमांसीनखैः
कालीयोत्पलपद्मकाह्वयनिशाकङ्कोलकर्मन्थकैः ॥ ९७ ॥
चाम्पेयाभयचोचपूगकटुकाजातीफलाभीरुभिः
श्रीवासाऽमरदारुचन्दनवचाशैलेयसिन्धूद्भवैः ।
तैलाम्भोदकटम्भराङ्घ्रिनलिकातृण्वीरकचोरकैः
कस्तूरीदशमूलकेतकनतश्यामाश्वगन्धाम्बुभिः ॥ ९८ ॥
कौन्तीताक्ष्यजशल्लुकीफललघुश्यामाशताह्वाभयै-
र्भालातत्रिफलाब्जकेशरमहाश्यामालवङ्गान्वितैः ।
सव्योषैश्चिपलैर्महीयसि पचेन्मन्देन पात्रेऽग्निना ॥ ९९ ॥
क्वाथके लिये शाखा, मूल और पत्तोंसहित गन्धप्रसारणी ३०० पल, नीली-कटसरैया २०० पल, गिलोय २०० पल, अण्डकी जड २०० पल, रास्ना और शिरसकी छाल सौ सौ पल, देवदारु १०० पल और केवडेकी जड १०० पल इन सबको कूटकर सौ द्रोण अर्थात् ३२०० सेर जलमें डालकर पकावे। जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें तिलका तैल १ द्रोण, काँजी २ द्रोण, दहीका तोड १ आढक, शुक्त (एक प्रकारकी काँजी), बकरेके मांसका रस, ईखका रस और गौका दूध ये प्रत्येक एक एक आढक (आठ आठ सेर) परिमाण डालदेवे। एवं कल्कके
१ अत्र वक्तव्यद्रव्यसम्पूत्त्यै त्रय एव पादा दृश्यन्ते ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहितः । ६७७
लिये असवरग, काकडासिङ्गी, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीर-
काकोली, ऋद्धि, वृद्धि, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलहठी, मंजीठ, काकोली, कौंचकी
जड, छोटी इलायची, कपूर, कुन्दरू, धूपसरल, केशर, बालछड, नख, कालीअगर,
कुमुद पद्माख, हल्दी, शीतलचीनी, गंठिवन, नागकेशर, खस, दारचीनी, सुपारी
(किसी २ के मतसे सुपारीके वृक्षकी छाल लेनी ), कुटकी, जायफल, शतावर,
गन्धबिरोजा, देवदारु, लालचन्दन, वच, भूरिछरीला, सेंधानमक, शिलारस, नागर-
मोथा, प्रसारणीकी जड, नलिका, पुनर्नवा, चोरक, कस्तूरी, दशमूल, केतकीकी जड,
तगर, सुगन्धित, तृण, असगन्ध, सुगन्धवाला, रेणुका, रसौंत, सेमलकी जड, मैन-
फल, अगर, श्यामालता, सोया, कूठ, भिलावे, त्रिफला, कमलकी केशर, कालिसर,
लौङ्ग और त्रिकुटा इन सबको तीन तीन पल लेकर कल्क करके डालदेवे। फिर
सबको एक बहुत बडे पात्रमें भरकर मन्दमन्द अग्निद्वारा तेलको पकावे ॥ ९६-९९॥
पानाभ्यञ्जनवस्तिनस्यविधिना तन्मारुतं नाशयेत्
सर्वाङ्गाङ्गतं तथाऽवयवगं सन्ध्यस्थिमज्जाश्रितम् ।
श्लेष्मोत्थानकपैत्तिकांश्च शमयेन्नानाविधानामयान्
धातून् बृंहयति स्थिरं च कुरुते पुंसां नवं यौवनम् ॥४००॥
वृद्धस्यापि बलं करोति सुमहद्वन्ध्यासु गर्भप्रदं
पीत्वा तैलमिदं जरन्त्यपि सुतं सूतेऽधुना भूरुहाः ।
सिक्ताः शोषमुपागताश्च फलिनः स्निग्धा भवन्ति स्थिरा
भग्नाङ्गाः सुदृढा भवंति मनुजा गावो हयाः कुञ्जराः॥१॥
इस तेलको पान और मालिश कराना, वस्तिक्रिया (पिचकारी लगाना), नस्य
देना आदि क्रियाओंद्वारा सेवन करानेसे वातरोग नाश होता है। यह तैल सम्पूर्ण
अङ्ग, अर्द्धाङ्ग व एकाङ्गमें स्थित वातकी पीडा एवं सन्धि, अस्थि और मज्जागत वात-
व्याधि, कफजन्य और पित्तजन्य नानाप्रकारके रोगोंको शमन करता है। एवं धातु-
ओंको पुष्ट, स्थिर और मनुष्योंके नवयौवनको स्थिर करता है। वृद्ध मनुष्यको भी
अत्यन्त बलवान् करनेवाला और वन्ध्यास्त्रियोंको गर्भप्रदान करनेवाला है। इस
तेलके पान करनेसे बुढापेमेंभी स्त्री पुत्रको उत्पन्न करती है। सूखे हुए वृक्षोंको इस
तेलके द्वारा सींचनेसे वे फिर हरे भरे, फल फूल युक्त स्निग्ध और मजबूत होजाते
हैं। टूटगये हैं अंग जिनके ऐसे मनुष्य, गौयें, घोडे और हाथी इस तेलके सेवनसे
अत्यन्त दृढ अंगवाले होते हैं ॥ ४०० ॥ १ ॥
| ६७८ | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि- |
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अष्टादशशतिकप्रसारणीतैल ।
समूलदलशाखायाः प्रसारण्याः शतत्रयम् ।
शतमेकं शतावर्या अश्वगन्धाशतं तथा ॥ २ ॥
केतकीनां शतं चैकं दशमूलाच्छतं शतम् ।
शतं वाट्यालकस्यापि शतं सहचरस्य च ॥ ३ ॥
जलद्रोणशतं दत्त्वा शतभागावशेषितम् ।
ततस्तेन कषायेण कषायद्विगुणेन च ॥ ४ ॥
सुव्यक्तेनारनालेन दधिमस्त्व्वाढकेन च ।
क्षीरशुक्तेक्षुनिर्यासाच्छागमांसरसाढकैः ॥
तैलद्रोणसमायुक्तं दृढे पात्रे निधापयेत् ॥ ५ ॥
मूल, पत्ते और शाखासहित प्रसारणी ३०० पल, शतावर १०० पल असगन्ध १०० पल, केतकी १०० पल, दशमूलकी प्रत्येक ओषधि १००-१०० पल, खिरेंटी १०० पल और पियाबाँसा १०० पल इन सबको एकत्र कूटकर १०० द्रोण ( ३२०० सेर ) जलमें पकावे । जब पकते पकते एक द्रोण ( ३२ सेर ) जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस काढेके साथ काढेसे दुगुनी अर्थात् ६४ सेर काँजी, दहीका तोड ८ सेर, दूध ८ सेर शुक्तनामक काँजी ८ सेर, ईखका रस ८ सेर बकरेके मांसका रस ८ सेर और तिलका तैल ३२ सेर मिलाकर एक सुदृढ पात्रमें भरदेवे ॥ २-५ ॥
द्रव्याणि यानि पेष्याणि तानि वक्ष्याम्यतः परम् ।
भल्लातकं नतं शुण्ठी पिप्पली चित्रकं शठी ॥ ६ ॥
वचा पृक्का प्रसारण्याः पिप्पल्या मूलमेव च ।
देवदारु शताह्वा च सूक्ष्मैलात्वचबालकम् ॥ ७ ॥
कुंकुमं मदमञ्जिष्ठा तुरुष्कं नखिकाऽगुरु ।
कर्पूरकुन्दुरुनिशालवङ्गध्यामचन्दनम् ॥ ८ ॥
कक्कोलं नलिका मुस्तं कालीयोत्पलपत्रकम् ।
शठी हरेणुशैलेयश्रीवासं च सकेतकम् ॥ ९ ॥
त्रिफला कच्छुरा भीरु सरलं पद्मकेशरम् ।
प्रियंगुशीरनलदं जीवकाद्यं पुनर्नवा ॥ १० ॥