बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)
Bawan Kasni
सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)
51. साहिब जी को इमली के पेड़ के साथ बाँध कर कीलें गड़वाना
116 साहिब बन्दगी
(51) साहिब जी को इमली के पेड़ के साथ बाँध कर कीलें गड़वाना
चारों ओर पूरे देश में साहिब की सत्य भक्ति की प्रसिद्धी फैल गई थी और भक्तजन बड़ी गिनती में साहिब की शरण में आने लगे थे। दूसरी ओर धर्म गुरु और उनके साथी बार-बार अपनी हार के कारण परेशान हो रहे थे। इतने में किसी ने सलाह दी कि कबीर को इमली के पेड़ के साथ बाँध देते हैं। तकी ने उदास मन से यह युक्ति भी स्वीकार कर ली और साहिब को उस पेड़ के पास लाकर कहा कि आप इस पेड़ के पास खड़े हो जाओ। अर्न्तयामी साहिब तो उनके मन की बात को जानते थे और मुस्ककाते हुये वहाँ खड़े हो गये। तकी ने सिपाहियों को आदेश दिया कि कबीर को इमली के पेड़ के साथ बाँध दिया जाये और उसके माथे और छाती पर कीलें गाड़ दो। धर्म गुरु शेख तकी ने सोचा कि कबीर तड़पकर मर जायेगा। तकी के आदेश का पालन करते हुए सिपाहियों ने ऐसा ही किया। वे हथौड़ों से साहिब के माथे और छाती पर कीलें गाड़ने लगे। पर कोई यह नहीं जान पा रहा था कि साहिब का शरीर तो मात्र देखने के लिए था वो तो शब्द स्वरूपी हैं। सिपाही साहिब की छाती और माथे तक अपनी कीलें ले जा ही नहीं पा रहे थे। कीलें उनके हाथों से छूट-छूटकर नीचे पृथ्वी पर गिर रही थीं। सिपाहियों ने शेख तकी से कहा कि हमारे हाथ काम नहीं कर पा रहे हैं। कीले हाथ से नीचे गिर जाती हैं। यह सुनकर शेख तकी और उनके सलाहकार बड़ा ही लज्जित हुए। ऐसे में वो कर ही क्या सकते थे।
पाखण्डी देख शान साहिब की, हो गए लाल-पीले।
इमली पेड़ से बाँध साहिब को, लगे गाड़ने कीलें॥
कीलें पकड़ हाथ साहिब और, बड़े तो पड़ जाएँ ढीले॥
सिपाही कहें वश नहीं हमरे, गिर रही हाथ से कीलें॥
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