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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages
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३

आयुर्वेद-दर्शन

धातु को स्वतः—सिद्ध नहीं मानते थे। इनके बाद आयुर्वेद क्षेत्र में षड्धातुवाद और प्रजापतिवाद का प्रवेश हुआ। ये आत्मा को स्वतःसिद्ध मानते थे। और इनके बाद आत्मवाद, सत्त्ववाद और कर्मवाद का आयुर्वेद के दार्शनिक क्षेत्र में प्रवेश हुआ।

उनमें कुछ पंचात्मक लोकपक्षीय और कुछ द्विधात्मक लोकपक्षीय थे। जैसा कि “लोको हि द्विविधः स्थावरों-जंगमश्च। द्विविधात्मक एव आग्नेयः सौम्यश्च तदभूयस्त्वात् पंचात्मको वा।” (सु. सू. अ. १) इसमें भी स्वीकार किया गया है।

पंचात्मक लोकपक्षीय, लोक को आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इनमें विभाजित करते थे। किन्तु इनमें भी कुछ गुर्वादि गुणों को प्रधान मानते थे तो कुछ शब्दादि गुणों को। गुर्वादि गुणप्रधान पंचात्मक लोकपक्षीयों में भी एक संप्रदाय आकाशादि को गुर्वादि गुणवत् नित्य द्रव्य मानता था जैसा कि स्वभाववादी-भारद्वाज-संप्रदाय और दूसरा आकाशादिकों को नित्य द्रव्य नहीं अपितु चेतना धातु के अमतीघातकत्वादि गुण मानता था जैसा कि षड्धातुवादी हिरण्यक्ष संप्रदाय। शब्दादिगुण प्रधान पंचात्मक लोकपक्षीय, आकाशादिकों की उत्पत्ति शब्दस्पर्शादितन्मात्राओं से मानते हैं जैसा कि सत्त्ववादी।

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विषय प्रवेश

७

द्विधात्मक लोकपक्षीय, लोक को अग्नीपोम संज्ञक धर्मद्वय में विभाजित करते थे जैसा कि अग्नीपोमवादी। इनका उत्थान षड्स्वाद में से हुआ और पर्यवसान काल-वाद, त्रिधातु-सिद्धांत और प्रजाप्रति पक्षमें अर्थात् त्रिधात्वात्मक लोकपक्ष में हुआ।

उक्त सब संप्रदायों में कुछ सत्त्व को शरीरोत्पन्न तो कुछ शरीर को सत्त्वोत्पन्न कहते थे। जो सत्त्व को शरीरोत्पन्न कहते थे वे चेतना धातु को स्वतःसिद्ध नहीं मानते थे।

यज्ञः पुरुषीय परिषद् का वर्णन चरक संहिता के सूत्र स्थान अध्याय २५ में उपलब्ध होता है। उसके आयोजन के विषय में यह कहा गया है कि:—

पुरा प्रत्यक्ष धर्मीणं भगवंतं पुनर्वसुम्।
समेतानां महर्षिणां प्रादुरासीदियं कथा ॥
आत्मेंद्रिय-मनोऽर्थानां योऽयं पुरुष संज्ञकः।
राशित्तस्यामयानांच प्रागुत्पत्तिविनिश्चये ॥

अर्थात् प्राचीन काल में साक्षात् धर्ममूर्ति भगवान् पुनर्वसु अत्रेय के पास महर्षि सम्मिलित हुए और उनमें आत्मा इंद्रिय मन अर्थ इनके राशिरूप पुरुष के प्राथमिक उत्पत्ति तथा रोग के विषय में इस प्रकार चर्चा हुई।

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आयुर्वेद-दर्शन

यहां पुरुष को जो आत्मा इत्यादि का राशि कहा गया है वह निर्णीतार्थ-प्रतिपादक नहीं है। किसी निर्णय के पूर्व जिस तरह की सामान्य भाषा बरती जाती है उसी तरह का यह विधान है। ‘ प्राक् ’ शब्द से यह सूचित होता है कि इस परिपद की चर्चा मुख्यतः इस बात का निर्णय करने के लिये हुई कि पुरुष की अथवा ‘सचेतन स्मृति’ की उत्पत्ति का आरंभ किन कारणों से हुआ। इसमें संदेह नहीं कि इस चर्चा का प्रधान विषय ‘सचेतन स्मृति’ ही रहा है।

तदनंतरं काशिपतिर्वामकोवाचमर्थवित् ।

व्याजहारर्षिं समितिमभि-स्तुत्याभिवाद्य च ॥

किंतुस्यात्पुरुषो यज्जःस्तज्जास्तस्यामायाःस्मृताः ।

नवा....

सब ऋषियों के सम्मिलित होने के पश्चात् काशिराज वामक आगे बढे और उन्होंने अभिवादन पूर्वक यह प्रश्न किया कि “ पुरुष, किन कारणों से पैदा हुआ ? और वह जिन कारणों से पैदा हुआ उन कारणों से उसको रोग पैदा होते हैं या नहीं ?

....इत्युक्ते नरेद्रेण प्रोवाचर्षीन्पुनर्वसुः ।

सर्वं एवाभितं ज्ञानं विज्ञानच्छिन्नसंशयाः ॥

भवंतश्छेतुमर्हति काशिराजस्य संशयम् ।

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विषय प्रवेश

९

नरेंद्र के द्वारा इस तरह सवाल किये जाने पर (अध्यक्ष) पुनर्वसु ने सब ऋषियों के प्रति यह कहा कि 'आप सभी अपने अगाध ज्ञानविज्ञान के कारण संदेह रहित हैं। अतः काशिराज के संशय को आप मिटा सकते हैं।'

इस पर ऋषियों में जो संवाद हुआ वह निम्नलिखित है।

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पारीक्षिमौद्गल्य का आत्मवाद

पारीक्षिमौद्गल्यः—सर्वं प्रथम उत्तर देने के लिये आत्मवादी पारीक्षि मौद्गल्य उठे । उन्होंने कहा किः—

आत्मजःपुरुषो रोगाश्चात्मजाः कारणं हि सः ।
स चिनोत्युप भुक्तेच कर्म कर्मफलानि च ।
न ह्यतं चेतना धातोः प्रवृत्तिः मुख दुःखयोः ॥

अर्थात् पुरुष ( कर्म पुरुष ) आत्मा (अनादि पुरुष,) से पैदा होता है । रोग भी आत्मा से पैदा होते हैं । क्योंकि आत्मा, कारण है । वह ही कर्मों को करता है और कर्म फलों को भोगता है अथवा वह ही कर्मफलों को पैदा करता व भोगता है । बिना चेतना—धातु के मुख ( आरोग्य ) और दुःख ( रोग ) की प्रवृत्ति ही नहीं होती !

इस पर से सर्वे प्रथम जो बात स्पष्ट होती है वह यह कि मौद्गल्य के आत्मवाद में आत्मा को उदासीन नहीं माना जाता अपितु कारण, कर्ता, ज्ञाता, भोक्ता, माना जाता है ।

आत्मवाद का विवेचन चरकसंहिता के शारीर स्थान के पहिले अध्याय में उपलब्ध होता है । वहां इसको

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पारिशिष्टमहत्त्व का आत्मवाद

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त्रयोविंशतिक प्रश्नोत्तरों के रूप में प्रथित किया है और उसमें कहीं २ षड्धातुवाद के मतों को भी शामिल कर दिया है। फलतः यह जानना कठिन है कि उसमें जिन आत्मसमर्थक युक्तियों का संग्रह किया है उनमें षड्धातुवादियों की कितनी और आत्मवादियों की कितनी है।

आत्मवादियों का सृष्टिविज्ञान चतुर्विंशतिक है। वे कर्म-पुरुष को २४ धातुओं का समुदाय कहते हैं। तहां अन्यत्क ( आत्मा या अनादिपुरुष ) बुद्धि, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी ये आठ धातु 'प्रकृति' अथवा 'भूत प्रकृति' संज्ञक होकर मन, दश इंद्रिय और ५ अर्थ मिलकर सोलह विकार संज्ञक हैं।

अन्यत्क पुरुष के अस्तित्व के विषय में इनका कथन है कि "कर्ता और बोद्धा पुरुष का यदि अस्तित्व न माना जाय तो ज्ञान, अज्ञान, सत्य, असत्य, वेद, शुभाशुभकर्म, आश्रय, सुख, दुःख, गति, अगति, वाणी, विज्ञान, शास्त्र, जन्म, मरण, बंध, मोक्ष, इनका अस्तित्व ही नहीं रहेगा।" "यदि उसको कारण न माना जाय तो उक्त ज्ञान आदि अहेतुक ही सिद्ध होंगे।" "और यदि उसको बोद्धा न माना जाय तो इनके विषय में न तो ज्ञान होगा और ज्ञानाभाव के कारण उनका प्रयोजन भी न रहेगा।" "अतः कारणज्ञों ने इसको 'कारण' कहा है।" "जो यह कहते हैं कि 'केवल

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आयुर्वेद-दर्शन

‘पंचधातु समुदाय ने आत्मनिरपेक्ष होकर देह का रूप धारण किया ’ वे ( स्वभाववादी ) यह भी कह सकते हैं कि ‘कुंभ-कार के बिना ही केवल मिट्टी, चक, दंड आदि से घट बनगया ! ’ जो इस तरह का युक्तिवाद करते हैं वे आगम से बहिष्कृत हैं । सारांश जिन प्रमाणों द्वारा प्रमेय की सिद्धि होती है उनसे यह सिद्ध है कि चेतनाधातुपुरुष ही कारण है ।

कुछ लोग अर्थात् परंपरावादी यह कहते हैं कि “मातृ-पितृ परंपरा से पैदा होने वाले पुरुषों में यद्यपि सारुप्य रहता है और इस कारण उनको पूर्व सहस्र भी कहा जाता है तथापि वे पूर्व के नहीं हैं; क्योंकि उनकी पैदाइश प्रति समय नवीन २ ( शरीर का प्रत्येक अणु-अवयव नष्ट होता है और उसका स्थान नवीन अणु अवयव ग्रहण करता है ) होती है । सारांश प्रत्येक प्राणी आत्म-तत्त्व रहित पंचधातु विकार समुदाय मात्र होने के कारण और इस समुदाय का परिणाम ही ‘सत्त्व ’ संज्ञक होने के कारण चेतना धातु पुरुष, न कुछ करता, न कुछ भोगता और न अस्तित्व ही रखता है ।” इस तरह जो आत्मा का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते उनके मत से एक के द्वारा किये हुए कर्म का फल दूसरा भोगता है या नहीं ? चूंकि जब कि प्रत्येक प्राणी अपने किये का ही फल भोगना चाहता है तब यह कहो कि अन्यकृत कर्म का फल अन्य नहीं

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पारीक्षिमौद्रव्य का आत्मवाद

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भोगता तो संतान में ( अथवा नवागत अणु अवयव में )
पैतृक विकारों का प्रादुर्भाव क्यों होता है ? अर्थात् यदि
वह प्रति समय नवीन है तब उसमें पूर्वाश की प्रतीति क्यों
होती है ? और यदि यह कहा जाय कि वह अन्य कृत फल
भोगता है तब उसको प्रति समय नवीन कहने के बजाय
पूर्व का परिणाम कहना उचित है किंतु जब कि प्रत्येक प्राणी
अपने किये का ही फल भोगना चाहता है तब इस तरह
विधान करना भी अनुचित है । वास्तविक बात यह है कि
परिणाम पानेवाले करणों ( अणु अवयवों, इंद्रियों, अथवा
शरीरों ) में नवीनता या विभिन्नता होते हुए भी कर्ता, आत्मा
नवीन नहीं अपितु वही रहता है । करणों में परिवर्तन होता
है पर आत्मा में नहीं होता । कर्ता, करणों से युक्त होकर
समस्त कर्मों का कारण है । तत्त्वज्ञों का यह निश्चित मत है कि
समस्त भाव, प्रतिक्षण भ्रम होते हैं; भ्रमभाव पुनः पैदा
नहीं होते और अन्यकृतकर्म, अन्य को भोगना नहीं पड़ता ।
नित्य पुरुष ही समस्त भावाभावों का कारण है । वह ही कर्म
को करता व कर्मफल को भोगता है । वह बिना देह के भी
अहंकार, कर्म, कर्मफल देहांतरगति और स्मृति इनसे युक्त
रहता है ।

कर्म पुरुष में आत्मा के परिचायक लक्षण भी उपलब्ध
होते हैं । जैसा कि:—

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आधुनिक दर्शन

प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसोगतः ।
इन्द्रियांतर संचारः प्रेरणधारणं च यत् ॥
देशांतरगतिः स्वप्ने पंचत्व ग्रहणं तथा ।
दृष्टस्य दक्षिणे नाश्चिन्ना सन्व्येनापगमस्तथा ॥
इच्छाद्वेषः सुखदुःखं प्रयत्नश्रेतनाश्रुतिः ।
बुद्धिः स्मृतिरहंकारो लिंगानि परमात्मनः ॥
यस्मात्समुपलभ्यते लिंगान्येतानिजीवतः ।
न मृतस्यात्मलिंगानि तस्माद्गुरुर्महर्षयः ॥
शरीरं हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् ।
पंचभूतावशेषत्वात् पंचत्वं गतमुच्यते ॥

आत्मवादी आत्मा को यद्यपि कर्ता और ज्ञाता कहते हैं तथापि उनकी दृष्टि से कर्तृत्व और ज्ञातृत्व भिन्न २ नहीं हैं। वे कर्तृत्व का ज्ञातृत्व में ही समन्वय करते हैं अथवा ज्ञातृत्व के कारण ही कर्तृत्व स्वीकार करते हैं। उनका कथन है कि:—

चेतनावान् यतश्चात्माततः कर्ता निरुच्यते ।

अर्थात् आत्मा चेतनावान् होने के कारण ही कर्ता कहा जाता है। इस पर यदि यह कहा जाय कि ‘जिसमें किया रहती है वह कर्ता है’ तो आत्मवादी इसको स्वीकार नहीं करते। क्योंकि वे स्पष्ट ही कहते हैं कि:—

अचेतनत्वाच्चमनः क्रियावदपि नोच्यते ॥

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पारिशिष्टीय का आत्मवाद

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अर्थात् मन, क्रियावान् होते हुए भी अचेतन है अतः उस-को कर्ता नहीं कहा जा सकता। यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि स्वभाववादी, मन को 'चेतसू' कहते थे और सत्त्ववादी, सत्त्व को कर्ता कहते हैं। आगे चल कर हम देखेंगे कि आयुर्वेद-दर्शन में आत्मा के कर्तृत्व और ज्ञातृत्व को अलग २ ही स्वीकार किया गया है। अस्तु।

आत्मवादी, दो प्रकार के पुरुष मानते हैं; एक अनादि पुरुष और दूसरा समुदायात्मक। इस विषय में उनका कहना है कि अनादि पुरुष उत्पत्ति रहित होकर समुदायात्मक पुरुष की उत्पत्ति होती है। क्योंकि समुदायात्मक पुरुष मोहच्छा-द्वेष-कर्मज है। यह भी नियम है कि 'अकारणवत्' 'सत्' नित्य रहता है और कारणवत् 'सत्' अनित्य। अतः अनादि पुरुष नित्य होकर समुदायात्मक अनित्य है। सिवाय नित्यत्व का ज्ञान भाव पदार्थ से नहीं होता अतः नित्यत्व, अव्यक्त रहता है और जिस का भाव पदार्थ से ज्ञान होता है उसको व्यक्त समझना चाहिये। केवल आत्मा ही अव्यक्त होकर शेष सब व्यक्त है"।

आत्मा, ज्ञाता है पर वह समुदायात्मक अवस्था में करणों (बुद्ध्यादि इंद्रियों) के द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है। करण यदि अविमल हों अथवा उनके साथ आत्मा का अयोग हो तो ज्ञान नहीं होता। जैसा कि गँदले जल में या मलिन

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१६

आयुर्वेद-दर्शन

ऐने में प्रतिबिंब नहीं पड़ता। किंतु जब विमल करणों का कर्ता के साथ संबंध होता है तब कर्म, वेदना और बुद्धि की प्रवृत्ति होती है। क्योंकि भूतात्मा, (यह समुदायात्मक-पुरुषगत आत्मा की विशेष संज्ञा है) न तो अकेला कर्म में प्रवृत्त होता है और न अकेला फल ही भोगता है। यह सब करण संयोग पर निर्भर है बिना करण संयोग के कुछ नहीं होता। क्योंकि कोई भी भाव अकेला नहीं रह सकता, वह अहेतुक भी नहीं रहता और वह अपने परिवर्तनशीलता को भी त्याग नहीं सकता।

आत्मा विमु और एक है। (‘असर्वगताः क्षेत्रज्ञाः’ कहनेवालों का यह प्रतिवाद है) उपाधि-भेद के कारण तथा देह कर्मानुपाती मन के साथ नित्य संबंध होने के कारण उसमें यद्यपि अनेकता की प्रतीति होती है तथापि एक योनि-गत आत्मा को भी सर्व योनिगतही समझना चाहिये। साधारण अवस्था में वह भिन्न २ शरीर में भिन्न २ स्पर्शनेन्द्रियों के द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है और इस कारण ही उसे सर्वत्र का ज्ञान नहीं होता, इतनाही नहीं तो प्रति शरीर में भी केश नख आदि के जहां कि स्पर्शनेन्द्रिय नहीं है; स्पर्श का ज्ञान नहीं होता तथापि मन को समाध्यवस्थापन्न किये जाने पर वह छिपी हुई वस्तु को भी देख सकता है।

समुदायात्मक पुरुष की उत्पत्ति के विषय में आत्म-वादियों का कथन है कि:—

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पारीक्षिमोद्भव का आत्मवाद

१७

जायते बुद्धिरन्यक्ताद्वबुद्ध्याहमितिमन्यते ।
परं खादीन्यहंकार उपादत्ते यथा क्रमम् ॥

इसमें सिर्फ प्रकृतिसंज्ञक सत्प्रातुओं के उत्पत्ति का विवेचन है । हमारी राय में यह उत्पत्ति क्रम, सौश्रुतिक ‘तस्मादन्यक्तात्’ से ‘एषा तत्त्वं चतुर्विंशतिव्याख्याता’ तक के विवेचन से और सारुष्यों के विवेचन से भिन्न है । इस भेद को जानना आयुर्वेद-दर्शन के अभ्यासकों के लिए अत्यावश्यक है । इसमें संदेह नहीं कि अन्यत्क आत्मा से पैदा होने वाली बुद्धि आत्मवादियों के मत से भी सत्वरजस्तमात्मिका है । क्योंकि “अन्यक्ताद्व्यक्ततां याति व्यक्ताद्व्यक्ततां पुनः । रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत्परिवर्तते ” इसमें रजस् और तमस् का स्पष्ट उल्लेख है । और जब कि यह बुद्धि ही अहंभाव में परिणत होती है तब अहंकार भी त्रिगुणात्मक है । किंतु इस त्रिगुणात्मक अहंकार के केवल रजस्तमोबहुल अंश से शब्द स्पर्शादितन्मात्राओं का व उनसे आकाशादिकों का पैदा होना आत्मवादियों को सम्मत नहीं है । उनका कहना है कि “सत्त्व-बहुल अहंकार से आकाश, रजोबहुल अहंकार से वायु, सत्वरजोबहुल अहंकार से अग्नि, सत्त्वतमोबहुल अहंकार से आप् और तमोबहुल अहंकार से पृथ्वी पैदा होती है” । आत्मवादियों के उक्त कथन का संग्रह यद्यपि चरक-संहिता में हो न सका तथापि सुभ्रत

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१८

आयुर्वेद-दर्शन

संहिता में उसका संग्रह किया गया है। जैसाकिः- 'तत्र सत्त्व-बहुलमाकाशं, रजोबहुलोवायुः, सत्त्वरजोबहुलोऽग्निः, सत्त्व-तमोबहुला आपः, तमोबहुला पृथ्वी' इ। सारांश आकाशादिकों की उत्पत्ति में अहंकार के जिस कदर के गुणबाहुल्य को आत्मवादी स्वीकार करते हैं वह उन संप्रदायों से भिन्न है जो यह कहते हैं कि 'भूतादेरपितैजस् साहाय्यात् पंचतन्मात्राणि' अथवा 'भूतादेस्तन्मात्रः सतामसर्तैजसादुभयम्' ।

उक्त मतभेद से भी अधिक महत्त्वपूर्ण मतभेद यह है कि आत्मवादी, तन्मात्राओं का विशेषतः शब्दरूपशीदि बन्मात्राओं का उल्लेख नहीं करते। यहाँ यह ध्यानमें रखना चाहिये कि ऐतिहासिक दृष्ट्या आत्मवाद के पहिले षड्धातु-वादी आद्य-सांख्यों की उपपत्ति प्रचलित थी। उसमें आकाशादिकों को अप्रतीवातकत्वादि मात्र स्वीकार किया जाता था और गोचर गुणों का कार्य गुण के रूप में ही उल्लेख किया जाता था। अतः अधिक संभव यही है कि आत्मवादी भी षड्धातुवादियों के कथन से अधिक दूर न जाते होंगे। फिर भी जब कि आत्मवादी अपना कुछ न कुछ विशिष्ट मत प्रतिपादन करते ही थे तब इस विषय में भी उनका कुछ विशेष कथन होगा ही। इस दृष्टि से देखा जाय तो अधिक से अधिक यह संभव है कि वे आकाशादिकों की 'तन्मात्रता' केवल उनके धात्वर्थों में ही स्वीकार करते

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यारीक्षिमौद्रलय का आत्मवाद

१९

होंगे और अप्रतीघातकत्वादिकों को तथा शब्दादिकों को उनके ( अकाशादिकों के ) क्रमशः लक्षण और गुण कहते होंगे। हमारे इस कथन की पुष्टि आत्मवादियों के एतद्विषयक विवेचन पर से भी होती है। आत्मवादियों ने महाभूतों का विवेचन इस प्रकार किया है:—

महाभूतानिखंवायुरगिरापःक्षितित्स्था ।
शब्दःस्पर्शश्चरूपं च रसोगंधश्च तद्गुणाः ॥
तपामेकोगुणः पूर्वो गुण बृद्धिः परे परे ।
पूर्वः पूर्वगुणश्चैव क्रमशो गुणिषुस्मृतः ॥
स्वरद्वचचलोष्णत्वं भूजलानिलतेजसाम् ।
आकाशस्याप्रतीघातो दृष्टं लिंगं यथा क्रमम् ॥

और:—

गुणाः शरीरे गुणिनां निर्दिष्टाश्चिन्हमेवच ।
अर्थाः शब्दादयोज्ञेयामोचराविषयगुणाः ॥

इन सब विधानों पर से यही सिद्ध होता है कि आत्मवादी लक्षणों या गुणों को 'कारण' या 'कारणगुण' नहीं मानते अपितु 'कार्यगुण' ही कहते हैं। किंतु जो संप्रदाय आकाशादिकों को शब्दादि तन्मात्र और शब्दादिकों को कारणगुण भी मानते हैं वे आत्मवादियों की अपेक्षा अर्वाचीन होकर उनका मत आत्मवादियों को मान्य नहीं है।

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आयुर्वेद-दर्शन

यहां यह भी सवाल उठता है कि आत्मवादी अप्रती-घातकत्वादि गुणों को प्रधान मानते थे या शब्दादि गोचर गुणों को ? इस विषय में यद्यपि निश्चय से कुछ नहीं कहा जासकता तथापि दो बातें ध्यान में रखने योग्य हैं । पहिली यह कि आत्मवादी, कर्तृत्व को चेतना से भिन्न नहीं रखना चाहते और तदनुसार आत्मा से सर्व प्रथम बुद्धि का ही प्रादुर्भाव मानते हैं । दूसरी यह कि आत्मवादी अप्रतीघातक-त्वादि लक्षणों का ज्ञान केवल स्पर्शनेन्द्रियद्वारा जैसा कि ‘लक्षणं सर्वभैवैतत्स्पर्शनेन्द्रिय गोचरम् । स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयः स्पर्शेहि सविपर्ययः’ । इसमें बतलाया है; होना सूचित करते हैं । फलतः यह संभव है कि वे गोचरगुणों को प्रधान मानते हों । पर इनको वे कारणगुणत्वेन कदापि स्वीकार नहीं करते । अन्यथा आकाशादिकों को प्रकृति कहना भी व्यर्थ है ।

इस तरह गर्भ में अन्वय से अन्य प्रकृति-संज्ञक यद्यर्थ बनजाने पर इंद्रिय-रचना पैदा होती है । यह इंद्रिय-रचना भौतिक रहती है । इसके साधारण ग्यारह विभाग हैं; पांच कर्मेन्द्रिय, पांच ज्ञानेन्द्रिय और एक अतीन्द्रिय । इनको सामान्यतः ‘करण’ भी कहते हैं । इनके द्वारा भिन्न २ कर्मा में प्रवृत्ति और इंद्रियार्थों का ग्रहण होता है । आत्मा, जब तत्तद्विद्रियार्थ विषयक राग

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पारीक्षिमौद्रस्य का आत्मवाद

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से युक्त होता है तब ( शब्दरागान् श्रोत्रमस्य जायते विदितान्तमनः । रूपरागात्तथा चक्षुरार्धं प्राण जिघृक्षया ॥ ) उक्त इंद्रियों की रचना होती है ।

उक्त इंद्रियों में बुद्धि की 'वृत्तियों' का संचार रहता है । इन वृत्तियों को ही 'सत्त्व' अथवा 'मन' कहते हैं । 'एकैकाधिक युक्तानि खादीना भिद्रियाणितु । पंच कर्मानुमेयानि येभ्यो बुद्धिः प्रवर्तते ।' इसका आशय भी यही है । कुछ संप्रदाय इन वृत्तियों को इंद्रियों का परिणाम कहते थे किंतु आत्मवादी इनको आत्मा का ही गुण समझते हैं । जो संप्रदाय चेतना को इन वृत्तियों का परिणाम कहते थे वे इन वृत्तियों को अर्थात् सत्त्व को ही 'चेतस्' कहते थे । किंतु आत्मवादियों का कथन है कि सत्त्व, अचेतन है; उसको चेतनाधातु से चेतना प्राप्त होती है । चेतना प्राप्त होने पर ही सत्त्व स्वकार्य में प्रवृत्त होता है ।

मन के अस्तित्व और रूप के विषय में यह कहा गया है कि:—

लक्षणं मनसोज्ञानस्याभावोभाव एव वा ।
सतिद्यात्मेंद्रियाथार्थानां सन्निकर्षे न वर्तते ॥
वैवृत्त्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्यात्तच्च वर्तते ।
अणुत्वमथचैकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ ॥

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आयुर्वेद-दर्शन

अर्थात् ज्ञान का न होना अथवा होना ही मन के अस्तित्व का लक्षण है। यह तो नित्य का अनुभव है कि जब अपना चित्त किसी गंभीर विचार में मग्न रहता है तब अपने को पास में रखी हुई घड़ी की टिक २ सुनाई नहीं देती और न इस बात का ही ज्ञान होता है कि सामने से गुजरी हुई व्यक्ति कौन थी। वास्तव में देखा जाय तो घड़ी के आवाज की लहरें उस समय भी अपने श्रवणगत द्रवों तक पहुंचती रहती हैं और सामने गुजरनेवाली व्यक्ति का प्रतिबिंब भी नेत्रगत आदर्श पटल पर पड़ता है सिवाय आत्मा का साश्रिध्य रहता ही है फिर भी उस समय उन इंद्रियों में चित्त की वृत्तियों का अभाव रहने के कारण न तो टिक २ सुनाई देती है और न व्यक्ति ज्ञान होता है। किंतु जब मन की वृत्तियाँ ज्ञानेंद्रियों में संचार करती रहती हैं तब ज्ञान होता है। यहाँ आत्मवादियों का यह कथन भी ध्यान में रखना चाहिये कि:—

आत्माज्ञः करणैर्योगाद्ज्ञानं तस्य प्रवर्तते ।

करणानामवैकल्यादयोगाद्भ्रान्तवर्तते ॥

पश्यतोऽपि यथाऽऽदृशे संक्षिप्ते नास्ति दर्शनम् ।

तत्त्वं जले वा कलुषे चेतस्युपहते तथा ॥

सारंश ज्ञान के न होने और होने पर से मन का अस्तित्व सिद्ध होता है।

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पारीक्षिमौद्रव्य का आत्मवाद

२३

यह मन, आत्मा के सहस्र महान् अर्थात् सर्व-देह-व्यापक नहीं है, अपितु 'अणु' है। अणु होने के कारण वह एक ही समय में समस्त इन्द्रियों में सञ्चार नहीं कर सकता। जैसा कि उक्त उदाहरणों पर से भी सिद्ध होता है। उसी तरह वह एक है। इस पर यदि यह कहा जाय कि 'किसी फल को खाने के समय उसके स्पर्श, रूप, रस, गंध, कुरमुर शब्द आदि का जो ज्ञान होता है वह उसके महान् अथवा अनेक होने का परिचायक है' तो उसका उत्तर यह है कि मन अणु और एक होते हुए भी बड़ा चंचल है। उसकी चपलता के कारण ही उक्त सब प्रकार का ज्ञान एक ही समय में होने का भास होता है।

मन के कार्यों के विषय में यह कहा गया है कि:—

चिंत्यं विचार्यमूढांच ध्येयं संकल्प्यमेवच ।

यत्किंचिन्मनसांज्ञेयं तत्सर्वं ह्यर्थसंज्ञकम् ॥

इंद्रियाभिग्रहःकर्म मनसः स्वस्थ निग्रहः ।

ऊहोविचारश्रुततः परं बुद्धिःप्रवर्तते ॥

इंद्रियेणेंद्रियाथो हि समनस्केन गृह्यते ।

कल्प्यते मनसाप्यूर्ध्वं गुणतो दोषतो यथा ॥

जायते विषये तत्र या बुद्धिनिश्चयात्मिका ।

व्यवस्यति तथा वक्तुं कर्तुं वा बुद्धिपूर्वकम् ॥

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आयुर्वेद-दर्शन

सारंश निश्चय रहित ज्ञान को मन का कार्य कहते हैं। किंतु जो ज्ञान निश्चित रहता है वह बुद्धि का कार्य है। बुद्धि के विषय में यह भी कहा गया है कि—

या यदिन्द्रियमास्थाय जंतोर्बुद्धिः प्रवर्तते ।
याति सा तेन निर्देशं मनसा च मनोभवा ।
भेदात्कार्यैन्द्रियार्थानां बन्धो वै बुद्धयःस्मृताः ।
आत्मैन्द्रियमनोऽर्थानामैकैका सन्निकर्षजा ॥
अंगुल्यंगुष्ठतलजस्तंत्री वीणानखोद्भवः ।
दृष्टःशब्दो यथा बुद्धिर्दृष्टा संयोगजा तथा ॥

अंत में आत्मवादी कहते हैं कि—

बुद्धीन्द्रियमनोर्थानां विद्याद्योगधरंपरम् ।
चतुर्विंशक इत्येष राशिः पुरुषसंज्ञकः ॥
रजस्तमोभ्यां युक्तस्य संयोगोऽयमनंतवान् ।
ताभ्यांनिराकृताभ्यांनु सत्त्वबुद्ध्या निवर्तते ।

अर्थात् उक्त बुद्ध्यादि भावों का योगधर वह आत्मा ही है। जो इनके सब के परे रहता है। इस तरह चोवीस धातुओं के इस राशि को समुदायात्मक, हेतुज अथवा मोहेच्छाद्वेष कर्मज पुरुष कहते हैं। संसार में जो अनंत पुरुष (प्राणी) दिखाई देते हैं उसका कारण रजोगुण व तमोगुण इनके न्यूनातिरेक से उक्त समुदाय के होने वाले अनंत प्रभेद हैं।

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पारौक्षिमौद्रूल्य का आत्मवाद

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जब उक्त गुणद्वयों का बाहुल्य कम होता है और सत्य की अभिवृद्धि होती है तब यह संयोग नष्ट होता है । सारांशः—

अव्यक्ताद्व्यक्ततांयाति व्यक्तादव्यक्ततां पुनः
रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत् परिवर्तते ॥

अर्थात् मुष्ट्यारंभ में अव्यक्त आत्मा से ही समस्त जगत् व्यक्त होता है और प्रलय के समय पुनश्च अव्यक्त में ही समाजाता है । और यह परिवर्तन चक्र के सदृश वारंवार होता रहता है ।

मालूम होता है कि आत्मवादी, केवल आत्मा के अस्तित्व और उसके पुरुषरोगोत्पादकत्व को सुप्रतिष्ठित करने के लिये ही आयुर्वेद क्षेत्र में प्रविष्ट हुए । इनका आयुर्वेद के प्रायोगिक क्षेत्र में तनिक भी प्रवेश नहीं है और वह संभव भी नहीं था । क्योंकि इनके आत्मवाद में वातपित्तश्लेष्माओं का कहीं भी उल्लेख नहीं है और इनको उनका अस्तित्व भी मान्य नहीं है । यही कारण है कि पारौक्षिमौद्रूल्य वातकलाकलीयपरिषद् में जिस में कि वातपित्तश्लेष्माओं के तात्विक रूप पर विचार हुआ; अनुपस्थित थे । आत्रेयभद्रकाषीयसपरिषद् में भी ये अनुपस्थित थे ।