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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

यहां पुरुष को जो आत्मा इत्यादि का राशि कहा गया है वह निर्णीतार्थ-प्रतिपादक नहीं है। किसी निर्णय के पूर्व जिस तरह की सामान्य भाषा बरती जाती है उसी तरह का यह विधान है। ‘ प्राक् ’ शब्द से यह सूचित होता है कि इस परिपद की चर्चा मुख्यतः इस बात का निर्णय करने के लिये हुई कि पुरुष की अथवा ‘सचेतन स्मृति’ की उत्पत्ति का आरंभ किन कारणों से हुआ। इसमें संदेह नहीं कि इस चर्चा का प्रधान विषय ‘सचेतन स्मृति’ ही रहा है।

तदनंतरं काशिपतिर्वामकोवाचमर्थवित् ।

व्याजहारर्षिं समितिमभि-स्तुत्याभिवाद्य च ॥

किंतुस्यात्पुरुषो यज्जःस्तज्जास्तस्यामायाःस्मृताः ।

नवा....

सब ऋषियों के सम्मिलित होने के पश्चात् काशिराज वामक आगे बढे और उन्होंने अभिवादन पूर्वक यह प्रश्न किया कि “ पुरुष, किन कारणों से पैदा हुआ ? और वह जिन कारणों से पैदा हुआ उन कारणों से उसको रोग पैदा होते हैं या नहीं ?

....इत्युक्ते नरेद्रेण प्रोवाचर्षीन्पुनर्वसुः ।

सर्वं एवाभितं ज्ञानं विज्ञानच्छिन्नसंशयाः ॥

भवंतश्छेतुमर्हति काशिराजस्य संशयम् ।