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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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पारीक्षिमौद्रव्य का आत्मवाद

१३

भोगता तो संतान में ( अथवा नवागत अणु अवयव में )
पैतृक विकारों का प्रादुर्भाव क्यों होता है ? अर्थात् यदि
वह प्रति समय नवीन है तब उसमें पूर्वाश की प्रतीति क्यों
होती है ? और यदि यह कहा जाय कि वह अन्य कृत फल
भोगता है तब उसको प्रति समय नवीन कहने के बजाय
पूर्व का परिणाम कहना उचित है किंतु जब कि प्रत्येक प्राणी
अपने किये का ही फल भोगना चाहता है तब इस तरह
विधान करना भी अनुचित है । वास्तविक बात यह है कि
परिणाम पानेवाले करणों ( अणु अवयवों, इंद्रियों, अथवा
शरीरों ) में नवीनता या विभिन्नता होते हुए भी कर्ता, आत्मा
नवीन नहीं अपितु वही रहता है । करणों में परिवर्तन होता
है पर आत्मा में नहीं होता । कर्ता, करणों से युक्त होकर
समस्त कर्मों का कारण है । तत्त्वज्ञों का यह निश्चित मत है कि
समस्त भाव, प्रतिक्षण भ्रम होते हैं; भ्रमभाव पुनः पैदा
नहीं होते और अन्यकृतकर्म, अन्य को भोगना नहीं पड़ता ।
नित्य पुरुष ही समस्त भावाभावों का कारण है । वह ही कर्म
को करता व कर्मफल को भोगता है । वह बिना देह के भी
अहंकार, कर्म, कर्मफल देहांतरगति और स्मृति इनसे युक्त
रहता है ।

कर्म पुरुष में आत्मा के परिचायक लक्षण भी उपलब्ध
होते हैं । जैसा कि:—