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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages
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तर्पकः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

शिरःस्थः स्नेहसंतर्पणाधिकृतत्वात्

इंद्रियाणामात्मवैर्येणानुग्रहं करोति । (सु. सू. अ.२१)

अर्थात् तर्पक शिर में रहता है । स्नेहन ( चिकनाहट ) और तर्पण ( तरी ) उसका कार्य है । यह अपनी शक्ति से समस्त इंद्रियों पर अनुग्रह करता है ।

मस्तिष्क और सुषुम्नारज्जु के बीच में ' पश्मापरा ' Ciliated Epithelium की बनी हुई एक थैली है । इस थैली में यह भरा रहता है । यह मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को भीतर से तर रखता ही है सिवाय इसके आवरणों के बीच में और उनकी सतह पर फैल कर बाहर से भी तर रखता है ।

काय्य ने संभवतः इसीके उपलक्ष्य में यह कहा है कि ' अकुपित स्नेष्मा, उत्साह शान, बुद्धि, क्षमा, धृति, अलोभ आदि भावोंको पैदा करता है आर कुपित स्नेष्मा आलस्य, अशान, मोह, आदि ताद्विपरीत भावों को ।

इस तर्पक की विकृति से ही ' मोहज्वर ' ( Meningitis ) होता है ।

इस तर्पक के द्वारा अन्य इंद्रियों का तर्पण होना जिस हेतु से कहा गया है उस पर विचार किया जाय तो यह ज्ञात होगा कि जहां २ पश्मापरा है वहां २ के तरल को ऋषि, तर्पक कहना चाहते हैं । क्योंकि पश्मापरा शरीर में अन्यत्र भी रहती है; उससे

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( तद्गत श्लेष्मपिंडों से ) भिन्न २ प्रकार के श्लेष्मा भी पैदा होते हैं और उनका भी प्रधान कार्य तर्पण ही है। उदाहरणार्थ—श्रासमार्ग के भीतर की श्लेष्मवराकला में पश्मापरा है और तद्गत पिंडों से एक प्रकार का श्लेष्मा पैदा होता है। उसी तरह दोनों अपस्तंभों और उनकी शाखा प्रशाखाओं की दिवाल में भी पश्मापरा है। फुफ्फुस में इस तर्पक के साथ ‘ श्लेषक ’ भी रहता है। नाक के भीतरी भाग में पश्मापरा है और वहां कुछ पिंड हैं। इन पिंडों से पैदा होने वाले तरल से नाक का भीतरी भाग तर रहता है और इस तरल में जो वस्तु घुल जाती है उसके गंध का ज्ञान होता है। इसका फोफुस तर्पक के साथ संबंध है। स्त्रियों के गर्भाशय और फलवाहिनीयों में पश्मापरा है और उससे पैदा होने वाला तरल स्त्री प्रजननैन्द्रिय का तर्पण करता है। उसी तरह पुरुष के वृषणगत ‘ उर्ध्वगाभीस्त्रोत्तों ’ में पश्मापरा है और उससे भी एक प्रकार का खाव होता है। सारंश पश्मापरा से पैदा होने वाले तरल को सामान्यतः तर्पक कहते हैं।

श्लेषकः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

संधिरथस्तु श्लेष्मा सर्वसंधिसंश्लेषात्

सर्वसंध्यनुग्रहं करोति । ( सु. सू. अ. २१ )

अर्थात् श्लेषक संधियों में रहता है और सब प्रकार की संधियों को लिपट कर बांधता है।

उदक में अथवा क्लेदक में रहने वाले पिच्छल गुण पर से इसका ज्ञान हुआ। शरीर में इसके अनेक प्रकार उपलब्ध होते हैं जो कि भिन्न २ स्थानों में अपने उत्पादक अणु अवयवों अर्थात् पिंडों

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से पैदा होते हैं। तदनुसार इनके रासायनिक संगठन में और गुणधर्मों में भी भिन्नता रहती है। लार, जाठर रस, पित्त, मूत्र तथा शरीर में पैदा होने वाले अन्य कई प्रकार के रसों में ये रहते हैं। प्रत्येक अणु अवयव में, उनकी संधि में, कलाओं में, ( कलाएँ श्लेष्म, स्नायु, fibres और अपरा ओ Epithelium की बनी हुई हैं ) धातुओं में, पर्वों में, प्रतानों में, खास संस्था में, अंतः फलों में, कलल में, तथा नेत्र में ये प्रकार उपलब्ध होते हैं। इनमें कुछ धर्म समान होते हैं। यद्यपि ये सब श्लेषक हैं तथापि इनका सब का जो मूलभूत द्रव्य है वही मुख्य है अतः उसको ही ‘ श्लेषक ’ ( mucin ) कहना उचित है। यह ‘ स्तंभापरा ’ के श्लेष्मपिंडों से विशुद्ध अवस्था में भी पैदा होता है। यह स्तंभापरा महाश्लोत में मुख से गुदतक है।

इस पर से यह भली भांति ज्ञात होता है कि शरीर गत समस्त पदार्थों का वात-पित्त-श्लेष्माओं में समन्वय करने की बुद्धि से उत्क प्रकारों की कल्पना की गई है। इस कल्पना को वैज्ञानिक-दृष्ट्या पूर्ण करना भविष्य-के आधीन है।

सत्व के प्रकार

यद्यपि ‘ वृत्ति ’ तः सत्व, एक है तथापि विशेषताओं के कारण उसके अनेक प्रकार माने गये हैं। विशेषकर भावों के विषय में यह कहा गया है कि “ सत्त्ववैशेष्यकराणि पुनस्तेषां तेषां प्राणिनां मातापितृसत्त्वान्यन्तर्वर्तन्याः श्रुतयश्चाभिर्गुणं स्वीचिन्ते च कर्म सत्त्वविशेषाभ्यासश्चेति ”। [ चं. शा. अ. ८ ] अर्थात् भिन्न २ प्राणियों का ( क्षेत्रज्ञ के साथ आया हुआ ) सत्व, अपने २ मातापिता ( फल क बीज ) के सत्त्वों का अनुकरण करता है। गर्भावस्था में गर्भिणी के

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श्रुतगतिचितित का भी गर्भसत्व पर संस्कार होता है। पूर्वजन्माजीत विशेषताएँ उसमें रहती ही हैं और इस जन्म में भी वह विशिष्ट प्रकार का बौद्धिक अभ्यास करता है। इन सब कारणों से सत्व में अनेक विशेषताएँ पैदा होती हैं। अन्यत्र यह भी कहा गया है कि ‘ योनिविशेष और अवयत रचना विशेष के कारण ( अन्योन्यानुविधायित्व के कारण ) सत्व में जो विशेषताएँ पैदा होती हैं उनमें सात्विकादि प्रभेदों और उनके तरतमादि योगों से जो प्रकार होते हैं वे अखेख्य हैं’। संक्षेप में इनका दो तरह से विवेचन उपलब्ध होता है; बलभेदानुसार और महाप्रकृति संज्ञक।

बलभेदानुसारः-सत्वमुच्यते मनः। तत् शरीरस्य तंत्रकमात्मसंयोगात्।
त्रिविधं बलभेदेन प्रवरमध्यमवर्गमिति। अतश्च प्रवरमध्यावरसत्वा भवति
पुरुषाः। तत्र प्रवरसत्वाः स्वत्पास्ते सारेपूषदिष्टाः। ( यथा स्मृतिमंतो,
भक्तिमंतः, कृतज्ञाः, प्राज्ञाः, शुचयो, महोत्साहा, दक्षा, धीराः,
समरविर्कांतयेधिनः, त्यक्तविषादाः, स्ववस्थितगततिर्गभीरखुडिचेतसः,
कल्याणाभिनिवेशिनश्च ) स्वल्पशरीराद्यपि ते निजगंगुनिमितासु
महतीष्वपि पीडास्वव्यथा दृश्यंते सत्वगुणविशेष्यात्। मध्यमसत्वास्तु
अपरानात्मस्युपधाय संस्तंभयत्यात्मनात्मानं परैश्रापि संस्तंभ्यंते।
हीनसत्वास्तु नात्मना नापि परैः सत्वबलं प्रति शक्यंते उपस्तंभयितुम्।
महाशरीरा ह्यपि ते स्वल्पानामपि वेदानामसहा दृश्यंते;
सन्नद्धितभयशोकलोभमोहमाना रोद्रभैरवद्विष्टभीमस्तविकृत संकथास्वपि
च पशुपुरुषमांसशोणितानि चाविश्य विषादवैषण्यमूर्च्छांमाद
अमप्रपतनानामन्यतममानुबल्यथा मरणमिति। (च. वि. अ. ८)

सत्व कहते हैं मन को। वह आत्मा के संबंध से शरीर का संज्ञक है। बल के प्रवर, मध्य और अवर भेदानुसार वह तीन प्रकार

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का है। अतः पुरुषों में भी प्रवरसत्व, मध्यसत्व और अवरसत्व इस तरह तीन प्रकार दिखाई देते हैं। तहां प्रवर सत्व, जो कि कम उपलब्ध होते हैं; उनका वर्णन सार के विवेचन में किया गया है। (ये स्मृतिशास्त्री, भक्तिमान, कृतज्ञ, बुद्धिमान्, पवित्र, बड़े उत्साहयुक्त, अपने कार्य में दक्ष, धैर्यशील, समर में खूब लड़ने वाले, विषाद रहित सुस्थिरगति, गंभीरबुद्धि और कल्याणचित्तक होते हैं) छोटे डील वाले होते हुए भी इनका सत्व बलवान् होता है। फलतः वे निजगंतुक व्याधियों के कष्ट सहन करते हुए दिखाई देते हैं। मध्य-सत्व पुरुषों में यद्यपि कष्टसहिष्णुता कम होती है तथापि दूसरों के ढाटस को देख कर अथवा दूसरों के द्वारा ढाटस दिये जाने पर उनको धैर्य आ जाता है। किंतु हीनसत्व पुरुष किसी अवस्था में भी धैर्य नहीं रख सकते। उनका डील कितना ही बड़ा क्यों न हो पर वे तनिक भी कष्ट सह नहीं सकते। भय, शोक, लोभ, मोह सब्दा उनके पास रहते हैं। उग्र, भीतिप्रद, क्रोधयुक्त, बीभत्स या विकृत बातों को सुनकर अथवा प्राणियों के रक्त-मांस को देखकर उनको बड़ा दुःख होता है, चेहरा फीका पड़ जाता है, मूर्च्छा आंन लगती है, भ्रम हो जाता है, उन्माद होता है, पतन होता है और कदाचित् मृत्यु भी होती है।

महाप्रकृति संज्ञकः —शुद्ध सत्व, दोष रहित और कल्याणांश युक्त रहता है। यह ब्राह्म, आर्य, ऐंद्र, याम्य, वरुण, कौवेर और गांधर्व इस तरह सात प्रकार का है और तदनुसार शुद्धसत्व पुरुष भी सात प्रकार के हैं। तहां:—

(१) ब्राम्ह काय पुरुषः—ये पवित्र, सत्यपरायण, जितेंद्रिय, न्यायप्रिय, ज्ञानविज्ञान सम्पन्न, वक्ता, जिम्मेदार, स्मरण रखने वाले,

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काम क्रोध लोभ मान इष्यां इषं इनकी असत्यवृत्ति से रहित और भूत मात्र में समदृष्टि रखने वाले होते हैं।

(२) आर्ष कायः—ये भजन वेदाध्ययन, व्रत होम, ब्रह्मचर्य, अतिथिसेवा इनमें रत रहते हैं। बुद्धिमान् और ज्ञान विज्ञान सम्पन्न होते हैं। इनके मद, मान राग, द्वेष, रोष आदि शांत रहते हैं।

(३) ऐंद्र कायः—ये ईश्वर प्रिय, यज्ञ कर्ता, तेजस्वी, ओजस्वी, शूर, दूरदर्शी और धर्मार्थकामों का समान उपयोग करने वाले होते हैं। इनका कहा सब मानते हैं।

(४) वाम्य कायः—ये स्मृतिमान्, ऐश्वर्यशाली और राग द्वेष मोह रहित होते हैं। ये लिखित नियमों के तथा प्रसंग के अनुसार काम करते हैं।

(५) वरुण कायः—ये शूर, धीर, स्वच्छ, अस्वच्छता द्वेषी, यज्ञकर्ता, जलविहारप्रिय, सुख कर्ता और योग्य स्थल में भ्रम व प्रसन्नता व्यक्त करने वाले होते हैं।

(६) कौबेर कायः—ये शुचिर्भूत, धर्मार्थपरायण, सुखविहारकर्ता, बहुपश्चिवार और योग्य स्थल में मानोपभोगाकांक्षी होते हैं। इनके राग व प्रसाद स्पष्ट होते हैं।

(७) गांधर्व कायः—ये नृत्य, गीत, वाद्य, स्तुति, कविता, कथा, इतिहास, पुराण इनमें कुशल होते हैं। इनको स्त्री, वस्त्राभूषण, फूल व सुगन्ध प्रिय रहते हैं। ये किसी से ईषां द्वेष नहीं रखते।

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राजसुसत्व, रोषाशयुक्त रहता है। यह दैत्य, राक्षस, पैशाच, सारंग, प्रेत, व शकुन इस तरह छः प्रकार का है। तदनुसारः—

(१) दैत्य कायः—ये शूर, भयंकर, परोक्षप्रसाहिण्य, ऐश्वर्यशाली, उग्र, निर्दय, बहुभोजी और आपमतलक्षी होते हैं।

(२) राक्षस कायः—ये क्रोधी, क्रूर, सुकृषड, मांसप्रिय, निद्रालु, छिद्रान्वेषी, मेहेनती व ईर्ष्यायुक्त होते हैं। अपमान या नीचापन इनको बिलकुल सहन नहीं होता।

(३) पैशाच कायः—ये महा आलसी, लंपट, स्त्रियों में बड़ी बड़ी बातें बनाने वाले, अपवित्र, पवित्रताद्वेषी, डर बताने वाले, किंतु डरपोक, सर्वभक्षी और अनाचारी होते हैं।

(४) सारंग कायः—ये क्रोधी, शूर, मिडर, क्रूर, तीखे मिजाज, ताडवाज, जासूस, झूठ समझने वाले और मितहाराविहार होते हैं।

(५) प्रेत कायः—ये सुकृषड, क्षुद्रस्वभाव, क्षुद्राचार, क्षुद्रोपचार, निंदक, स्वार्थी, अतिलोभी और हर काम में अयोग्य होते हैं।

(६) शकुन कायः—ये सदा वासनायुक्त, सदा खान-पान-रत, अतिधर चित्त, अपमानासहिण्य, उडाऊ, और धन-संचय न करने वाले होते हैं।

तामस सत्व में मोह का अंश रहता है। यह पशु, मत्स्य और चनस्वति इन तीन प्रकारों का रहता है। तदनुसारः—

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(१) पशु कायः—ये झगडाड़, दरिद्रवेण, निर्दित आहाराविहार, अतिव्यभिचारी, और निद्राछ होते हैं।

(२) मात्स्य कायः—ये डरपोक, मूर्ख, भुक्खड, अस्थिर चित्त, सर्वदा कामक्रोध रत, भटकने वाले और जलप्रिय होते हैं।

(३) वनस्पति कायः—ये आलसी, सुक्खड, व हीन ज्ञानेन्द्रिय होते हैं।

उक्त सब प्रकार एक ही पुरुष में रह सकते हैं किन्तु एक समय में नहीं रह सकते। अभ्यास से इनमें परिवर्तन भी हो सकता है।