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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages
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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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इस ' अन्योऽन्यानुविधायित्व ( सायको फिजिकल् प्यारेल-लिउम Psycho Physical Parallelism के कारण भिन्न २ योनि विशेष, अवयव रचना अथवा इंद्रिय रचना विशेष तथा वय विशेष के अनुसार सत्व के प्रकारों में भी अनेक विशेष पैदा होते हैं। सिवाय शुद्धबहुल, शुद्धबहुलतर और शुद्धबहुलतम इस तरह तरतम भाव से भी सत्व के असंख्य प्रकार होते हैं। इसी तरह सत्व के अनुविधान से शरीर में भी विशेषताएँ पैदा होती हैं। इसी संबंध को लेकर यह भी कहा गया है कि ' निर्विकारः परस्त्वात्मा सर्वभूतानां निर्वि-शेषः सत्वशरीरयोस्तु विशेषात् विशेषोपलब्धिः '। ( च. शा. अ. ४ ) अर्थात् प्राणियों में जो विभिन्नता प्रतीत होती है वह सत्व और शरीर की विविधताओं तथा अन्योऽन्यानु-विधान के कारण होती है। किंतु आत्मा, अपने पर स्वरूप के कारण निर्विकार और एकसाँ रहता है। षड्धातुवादिओं ने यह भी कहा है कि निर्विकार और पर आत्मा, नित्य होकर चैतन्य में कारण है और वह सत्वगुण, भूतगुण तथा इंद्रियों के द्वारा सब व्यापारों को देखता है अर्थात् द्रष्टा है। ( च. सू. अ. १ ) त्रिभागात्मक सिद्धांत के उक्त संबंध को निम्न लिखित सारिणी पर से भी जाना जा सकता है।

जैसा कि:-

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आयुर्वेद-दर्शन

आत्मा

ज्ञानत्वकर्तृत्व
शुद्धरजस्
तमस्सत्त्व
कर्मपुरुष अथवा आयु

पुनर्वसु आत्रेय ने जिन भावों की सम्पद् विपद् को पुरुषरोगोत्पादक कहा है वे उनकी तात्विक भाषा में त्रिगुण और त्रिधातु ही हैं। इनके अन्योऽन्यानुविधान से पांचभौतिक द्रव्यों की, उनसे सूर्यादि लोको की, उनसे ऋतुओं की, ऋतुओं सरस की, रस से ओषधि व अन्न ( गुणप्रसादाख्य सचेतन प्रसादधातु ) की, अन्न से रेत ( द्रव्यप्रसादाख्यधातु ) की और रेत से पुरुष की क्रमशः उत्पत्ति होती है।

इसके बाद कार्षापति वामक ने यह सवाल किया कि 'भगवन्, सपञ्चिमित्तज पुरुष की और विपञ्चिमित्तज रोगों की 'अभिद्युद्धि' में क्या कारण है?' तब पुनर्वसु आत्रेय ने यह उत्तर दिया कि 'हितकारक आहार का सेवन ही पुरुष की अभिद्युद्धि में और अहितकारक आहार का सेवन ही रोगों की अभिद्युद्धि में कारण है। और आहार की सम्पदा विपदा अथवा हिताहितत्व मुख्यतः आहारगत रसों व गुणों

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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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पर अवलंबित है'। यह प्रश्नोत्तर 'तंत्रभाषा' में हुआ है क्योंकि आयुर्वेद, केवल 'मंत्र' अर्थात् विचार करने के लिये ही प्रस्तुत नहीं हुआ बल्कि 'तंत्र' अर्थात् कुछ करने के लिये प्रवृत्त हुआ है। इसके द्वारा आयु को जाना भी जाता है आर आयु की रक्षा भी की जाती है। रक्षाविधान में अर्थात् तंत्र में सन्निष्ठ कारण ही अधिक महत्व पूर्ण होता है। पुरुषोत्पत्ति में अन्न, सन्निष्ठ भी है। सारांश तंत्र दृष्ट्या आहार को अभिवर्धक कहना उचित है। प्रसंगानुसार माता, पिता, आत्मा, सात्त्व्य, रस, सत्व, इनके समुदाय को भी पुरुषोत्पादक कहा ही गया है किन्तु त्रिभागात्मक सिद्धांत की दृष्टि से इनकी सबकी तह में आत्मा, त्रिगुण और त्रिधातु ही विद्यमान हैं।

मुश्रुत संहिता के गर्भोवक्रांति प्रकरण में प्राणों का उल्लेख किया जाना यह सूचित करता है कि धान्वंतर संप्रदायी

१ द्रव्य प्रधानतावादी, आहार को 'रसगुणाश्रयीभूत द्रव्य' कहते थे और धर्मप्रधानतावादी, आहारद्रव्य को तदगुणमूलक मानते थे। (देखो पृष्ठ ४५ व ४६) पुनर्वसु आत्रेय का कथन था कि यद्यपि मंत्र दृष्ट्या द्रव्यगत गुण, द्रव्य के मूलघटक और उत्पादक हैं तथापि तंत्र में तंत्र की भाषा का व्यवहार करना ही उचित है। धातु पोषण का विषय तंत्र से धानष्ट संबंध रखता है और तंत्र में आहार द्रव्य को अथवा द्रव्यमात्र को प्रधान तथा रसगुणाश्रय माना जाता है।

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आयुर्वेद-दर्शन

महर्षि सुश्रुत भी त्रिभागात्मक सिद्धांत को स्वीकार करते थे। और वे इन प्राणों को ही वंशांकुर (सु. शा. अ. ३) की प्रकृति मानते थे। तदनुसार 'आत्मप्रकृति विकार संमू-च्छितं गर्भ इत्युच्यते'। (सु. शा. अ. ५) इसका अर्थ इस तरह करना ही उचित है कि 'वंशांकुर में समस्त अंग-प्रत्यंगों को पैदा करनेवाले जितने भी बीज-रूप सचेतन अचेतन सूक्ष्म द्रव्य रहते हैं वे सब उक्त 'प्राण' संज्ञक प्रकृति के ही विकार हैं। (अर्थात् यहाँ प्रकृति शब्द सांख्यों के अथवा आत्मवादिओं के प्रकृति का वाचक नहीं है) वंशांकुर अपनी प्राण संज्ञक प्रकृति के विकारों से मूच्छित होकर क्रमशः वंशांकुरगुच्छ, Morula कल्ल, Blastula संता-निका, Blastus कला, Mambans धातु, Tissues स्रोत आदि अवस्थाओं में परिणत होता हुआ 'गर्भ' संज्ञा को प्राप्त होता है। धान्वंतर आगे यह भी कहते हैं कि गर्भ, जब हस्तपादादि स्थूल अंगोपांगों से सम्पन्न होता है तब उसे 'शरीर' कहते हैं। शरीर के प्रत्येक मर्म में इन प्राणों का विशेष रूप से वास्तव्य रहता है। फलतः मर्मों में आघात या रोग होने पर वेदनातिशय अथवा मरण हो जाता है। सारंश धान्वंतरों क मत से भी त्रिभागात्मक सिद्धान्तानुसार प्राणों का अथवा आत्मा, सत्त्व और शरीर का संयोग ही पुरुष और आयु है।

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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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हमारी सम्मति में भी त्रिभागात्मक सिद्धान्त ही आयुर्वेद का निर्णीत सृष्टि विज्ञान है और इसमें पुनर्वसु आत्रेय ने प्रजापतिवाद् और षड्धातुवाद दोनों का समुचित समन्वय किया है।

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परिशिष्ट

इस परिशिष्ट में वातपित्त-लेष्माओं के तथा सत्व के प्रकारों पर विचार करना है।

आयुर्वेद का तंत्र, ( निदान व चिकित्सा ) आरम्भ से ही वात-पित्त-लेष्माओं के आधार पर प्रतिष्ठित है। किन्तु जैसे २ इनकी व्यापकता का और इनके भिन्न २ कार्यों का ज्ञान बढ़ता गया वैसे २ इनके प्रकारों की भी कल्पना होने लगी। कालानुक्रम के अनुसार देखा जाय तो प्रथम वायु के प्रकारों का आविष्कार हुआ और बाद में पित्त-लेष्माओं के प्रकारों का। चरक संहिता में सिर्फ पित्त-लेष्माओं के भिन्न २ कार्यों का उल्लेख है किन्तु सुश्रुत संहिता में उन कार्यों के आधार पर नामतः भिन्न २ प्रकारों का विवेचन किया गया है। इन प्रकारों की सृष्टि जिस समय में हुई उसके पहले ही हेतुसंक्षेप और औषधि-गुण-धर्म-विवेचन पास २ में निबद्ध हो चुका था। इस का परिणाम यह हुआ कि निदान में और औषधि-गुण-धर्म-विवेचन में इन प्रकारों का सन्तोषजनक उल्लेख न हो सका। यदि भाविष्य में इस वटि को पूर्ण करना है तो उस पर अधिक विचार करना भी आवश्यक है।

आयुर्वेद दृष्टया शरीर, वातपित्त-लेष्माओं का बना हुआ है। शरीर में जितने पदार्थ हैं उनमें कुछ वातसंज्ञक, कुछ पित्तसंज्ञक और कुछ लेष्मसंज्ञक हैं। अर्थात् शरीरगत पदार्थों के संक्षेप में तीन प्रधान वर्ग हैं और उनको वात, पित्त और लेष्मा कहा जाता है। आगे इन प्रधान वर्गों का ही कर्म विशेष के आधार पर पांच २

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परिशिष्ट

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प्रकारों में वर्गीकरण किया गया और उनका नाम भी तत्कर्म-बोधक ही रक्खा गया। जैसा कि:—

वायु के:—प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान.

पित्त के:—पाचक, रंजक, साधक, आलोचक और प्राजक.

क्षेप्मा के:—क्रेदक, अवलंबक, बोधक, तर्पक और क्षेपक.

वास्तव में देखा जाय तो ये प्रकार भी वर्ग ही हैं। अस्तु, अब इन पर अलग २ विचार करें।

वायु के प्रकार

पहिले यह कहा गया है कि कुछ सम्प्रदाय 'वायु द्रव्य' को प्रधान मानते थे तो कुछ 'वायु धर्म' को। तदनुसार दोनों ही सम्प्रदाय अपने २ वायु को प्राणादि प्रकारों में विभाजित करते थे। फलतः आयुर्वेद में दोनों प्रकार का विभक्तीकरण उपलब्ध होता है। यह बात वैदिक वाङ्मय में भी दृग्गोचर होती है। वेदों में प्राण, अपान व उदानसंशक्त प्रकार वायु द्रव्य और वायु धर्म दोनों के उपलब्ध होते हैं। अतः इनका पृथक् २ विवेचन करना ही उचित है।

वायु द्रव्य के प्रकार:—सुश्रुत संहिता में वायु द्रव्य का दो जगह विवेचन है। जैसा कि:—

प्रस्पंदनोद्बहनपूर्णणविवेकधारणलक्षणो वायुः पंचधा प्रविभक्तः शरीरं धारयति। (सु. सू. अ० १५)

इसमें वायु के पांच प्रधान लक्षणों का उल्लेख करके यह सूचित किया है कि वायु, इन लक्षणों के अनुसार पांच प्रकारों में विभाजित

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आयुर्वेद-दर्शन

होकर शरीर को धारण करता है। इस कथन के अनुसार प्राण का प्रसंदन, उदान का उदहरन, न्यान का पूर्ण, समान का विवेक और अपान का धारण मुख्य लक्षण हैं।

अत्र प्राणादिको कर् अलग २ विवेचन करते हैं। जैसा कि:—

वायुयों वक्त्र संचारी स प्राणो नाम देहधृक् ।

सोऽत्र प्रवेशयत्तंतः प्राणांश्चाप्यवलंबते ॥

प्रायशः कुरुते दुष्टो दिकाश्चासादिकान् गदान् ।

अर्थात् जो वायु नाक व मुख से शरीर में प्रविष्ट होता है उस को प्राण कहते हैं। यह देह को धारण करता है, अत्र को भीतर प्रविष्ट करता है और प्राणों का अवलंबन करता है। दूषित होने पर यह दिकाश्वास आदि रोगों को पैदा करता है।

बाहर की हवा नाक व मुख के द्वारा मुख्यतः प्राणवहलोटों (श्वास मार्ग, Trachae अपस्तंभ, Bronchi लघ्वपस्तंभ, Bronchioli वातवह लोत, Air Passages वायु कोष, Air Sacs और ऊपमुखीया भमनी Pulmonary Artery) में प्रविष्ट होता है। इस हवा में प्राण द्रव्य रहता है। यह प्राणद्रव्य, रक्त के द्वारा प्रथम हृदय में और वहां से समस्त शरीर में संचार करता है। यह शरीर धातुओं का पोषक ही नहीं बल्कि जीवन की मुख्य वस्तु होने के कारण इसको देहधारक कहना यथार्थ ही है। अत्र को निगलने के समय बाहर की हवा को अन्नमार्ग में लेने की आवश्यकता रहती है। इनका कथन है कि हृदयस्थ प्राणों का अवलंबन यह प्राणद्रव्य ही करता है।

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परिशिष्ट

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इस प्राणद्रव्य का प्रधान स्थान श्वासमार्ग से हृदय तक है। अतः इसका प्रधान कार्य 'प्रस्फंदन' (फुफ्फुस व हृदय दोनों का निमेषोन्मेष) माना गया है और तदनुसार इसकी विकृति में हिकका-श्वास आदि रोगों का सम्भव बतलाया है।

उदानो नाम यस्तूर्ध्वमुपैति पवनोत्तमः ॥

तेन भाषितगीतादि विश्लेषोऽभिप्रवर्तते ।

ऊर्ध्वजन्तुगतान् रोगान् करोति च विशेषतः ॥

अर्थात् जो उत्तम पवन, ऊपर के द्वारों से बाहर निकलता है उसको उदान कहते हैं। इससे भाषा, संगीत आदि पैदा होते हैं। इसकी विकृति से विशेषतः ऊर्ध्वजन्तुगत रोग होते हैं।

इसका प्रधान कार्य 'उद्दहन' है। तदनुसार उत्च्छ्वासन भी इसका एक कार्य होगा। किन्तु यहाँ मुख्यतः भाषा संगीत का उल्लेख किया है। इस विषय में औपनिषदिक ऋषियों का कथन है कि 'प्राण एव उत्पाणेन उत्सिद्धति वाग्नीः' (छां. ब्रा. ३-३) प्राण ही जब उत्पाण के साथ ऊपर उठता है तब वाणी और संगीत की प्रवृत्ति होती है। इस पर से यह ज्ञात होता है कि इनको उद्दहन में प्राण व उत्पाण संज्ञक दो द्रव्यों के अस्तित्व का ज्ञान था। किन्तु वे मुख्यतः उद्गत प्राण को ही वाक्प्रवर्तक मानते थे।

आमसकाशयचरः समानो वनिहसंगतः ।

सोऽन्नं पचति तज्जांश्च विकारान् विविनाकि हि ॥

गुल्माभिसंगातीसारप्रश्चृतीन् कुरुते गदान् ।

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आयुर्वेद-दर्शन

अर्थात् आमाशय व पकाशय में संचार करने वाले ( प्राण ) वायु को समान कहते हैं। यह अग्नि मंडलों ( पिप्पलादक पिंडों ) में पिप्पों को पैदा करके अन्न का पाचन करता है और अन्नरसगत सार व किट्टों को अलग र करता है। इसकी विकृति से गुल्म, अग्निमांघ, अतिसार आदि रोग पैदा होते हैं। विवेक, इसका प्रधान कार्य है। अन्न के रासायनिक पृथकरण को विवेक कहते हैं।

कृत्स्नदेहचरो व्यानो रससंवहनोद्यतः ॥
स्वेदास्तृक्खावणो वापि पंचधा चेष्यत्यपि ।
कुद्वक्ष कुशते रोगान् प्रायशः सर्वदेहगान् ॥

अर्थात् समस्त शरीर में संचार करने वाले ( प्राण ) वायु को व्यान कहते हैं। वाहिनीयों में यह रस का संवहन करता है। ‘पूर्ण’ इसका प्रधान कार्य है। इस पूर्ण व्यापार (सम्भवतः दवाब) के कारण ही समस्त शरीर में रस संवहन होता है। सरल भाषा में वाहिनीयों को रस से भरा पूरा रखना इसका कार्य है। सामान्यतः स्रोतों के द्वारा स्वेदों ( अन्यान्य तरलों ) को सुत करना और विकृत अवस्था में वाहिनीयों को विशीर्ण करके रक्तसुति करना भी इसका कार्य है। और यह ही मांसखायुओं में तथा धातुप्रसाद में रहकर आकुंचन प्ररसणादि अथवा ग्रहणविसर्जनादि चेषाएँ करता है। किन्तु यह ध्यानमें रखना चाहिये कि केवल ‘पूर्ण’ का उल्लेख करने वाले, ‘चिद्धा’ का उल्लेख नहीं करते। जब यह कृपित होता है तब सार्वदैहिक व्याधियों को पैदा करता है।

इस कथन के अनुसार व्यान के तीन प्रकार होते हैं; वा हिनीगत रस संवहन कर्ता, स्रोतोगत स्वेदसुति कर्ता और धातुप्रसाद व स्नायु गत

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परिशिष्ट

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चैधाकर्ता । इस तरह यहां न्यान शब्द वर्ग बोधक ही है ।

पक्षाधानाल्योऽपानः काले कर्षति चाप्ययम् ॥

समीरणः शकृन्मूत्रगर्भशुक्रार्तव्यान्यधः ।

कुड्रस्तु कुहते रोगान् घोरान् बस्तिगुदाश्रयान् ॥

( सु. नि. अ० १ )

यहां पक्षाधान शब्द से महास्रोत का उंडुक से अघरगुद तक का भाग, मूत्र संस्था, शुक्रार्तवोत्पादक यंत्र और गर्भाशय इनको सबको ग्रहण करना चाहिये । अत्रत्य वायु (प्राण और कटुप्रपाकजन्य) को अपान कहते हैं । यह पुरीष, मूत्र, शुक्र, आर्तव और गर्भ को धारण करता है और यथा समय इनको बाहर भी निकालता है । कुपित अवस्था में यह बस्तिगुदाश्रित रोगों को पैदा करता है ।

अपान शब्द भी यहां वर्ग बोधक है । तदनुसार भिन्न २ स्थानों में भिन्न २ पदार्थों को धारण करने की व उनको बाहर निकालने की उसकी पद्धति भी भिन्न २ है :

वायु धर्म के प्रकारः—इन पर विचार करने के पहिले धातुप्रसाद जन्य स्पर्शनेन्द्रिय की रचना को जानना आवश्यक है । किंतु उपलब्ध आयुर्वेदिक संहिताओं में इसकी रचना का विवेचन नहीं के बराबर है ।

अन्य आर्ष ग्रंथों में इसकी स्थूल रचना का कुछ विवेचन उपलब्ध होता है । उसमें मस्तिष्कगत ‘सहस्रदलकमल’ ( सुश्रुत


१ ऊर्ध्वमूलेऽवाक्शाख एषाऽश्वत्यः सनातनः । तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवास्मृतमस्तुते ॥ ( कठ २।६।१ ) ‘ शतैवैका हृदयस्य नाज्यस्तासां

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आयुर्वेद-दर्शन

इसका ‘अधिपति’ कहते हैं। ‘हृदय कमल’, ‘कुल कुंडलिनी’, (सुषुम्नामध्यस्थ धूसरभाग) ‘हिरण्यआपु’, (तर्पककफ)

मूर्द्धनमभाषाःसुतैका’। (कठ २।६।१६) ‘हृदि ह्येष आत्मा। अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां क्षतंशतमेकैकस्यां द्वासप्तति द्वीसप्ततिः प्रतिशाखा नाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति’। (प्रश्न ३।६) ‘देवानां निहितं निधिं (धातुप्रसादं) यमिन्द्रान्विदत्तं पथामिर्देवयानैः। आपो हिरण्यं जुगुपुंजिबृद्धिं (वातपित्त-रुग्धभाभः) स्तास्तवा रक्षतु त्रिवृता त्रियुद्धैः’ (रुग्धस्ताव्यपराभः)। (अथर्व. १९।२।७।९) ‘मध्यस्थ कुंडलिनीमाश्रित्य सुव्या नाब्ज्यश्चतुर्दश भवति। इडा, पिंगल, सुषुम्ना, सरस्वती, वारुणी, पूषा, हस्तिजिह्वा, यशस्विनी, विश्वोदरी, कुहूः, संखिनी, पर्यास्विनी, अलंबुषा, गांधारीति नाब्ज्यश्चतुर्दश भवन्ति। तत्र सुषुम्ना, विश्वधारिणी मोक्षमागोति चाचक्षते। गुदस्य प्रुष्टभागे वाणादंआश्रिता मूर्द्धपर्यन्तं ब्रह्मगंधे विश्वशब्दका सूक्ष्मा वैष्णवी भवति। सुषुम्नायाः सव्यभागे इडा तिष्ठति, दक्षिणभागे पिंगल। ...सुषुम्नाप्रुष्टपार्श्वयोः सरस्वतीकुहू भवतः। यशस्विनी कुहू मध्ये वारुणी प्रतिष्ठिता भवति। पूषासरस्वती मध्ये पर्यास्विनी भवति। गांधारीसरस्वता मध्ये यशस्विनी भवति। कंद मध्येडलंबुषा भवति। सुषुम्नापूर्वभागे मेदान्तं कुहूर्भवति। कुण्डलिन्या अघश्चोर्ध्वं वारुणी सर्वगामिनी भवति। यशस्विनी सौम्या च पादांगुष्ठान्तं मित्य्प्यति। पिंगल चोर्ध्वभागं याम्यनासान्तं भवति। पिंगलयाः प्रुष्टो याम्यनेत्रान्तं पूषा भवति। याम्यकर्णान्तं यशस्विनी भवति। जिह्वाया ऊर्ध्वान्तं सरस्वती भवति। आसव्यकर्णान्तंपूर्वभागे संखिनी भवति। इडाप्रुष्टभागान्तसव्यनेत्रान्तभागं गांधारी भवति। पायुमूलादचोर्ध्वगाडलंबुषा भवति। एतासु चतुर्दशसु नाडीष्वन्या नाब्जः संभवन्ति। तास्तन्यास्तास्तन्या भवन्तीति विशेयाः। यथ दृश्यतादिपत्रं शिरामिभ्यांसमेवं शरीरं नाडीभिर्वासम्। प्राणपातनसमानोदानव्याना नागकूर्मैककलदेवदत्तघनंजया एते दश वायवः सर्वेषु नाडीषु चरन्ति। आसनासिका कंठनाभिपादांगुष्ठदश

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परिशिष्ट

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कुलकुंडलिनी से लगी हुई इडा, पिंगला, सुषुम्ना, सरस्वती, वारुणी, पूषा, हस्तिजिह्वा, यशस्विनी, विश्वोदरी, कुहू, शंखिनी, पयस्विनी, अलंबुषा व गांधारी नाम की नाडियाँ और इन चौदह नाडियों से संबंधित सहस्रों शाखा प्रशाखा इनका उल्लेख है। ( आयुर्वेदांतर्गत भिन्न २ संप्रदायों ने नाडियों को भिन्न २ शब्दों से संबोधित किया है। )

इसके अतिरिक्त छः चक्रों का उल्लेख किया जाता है। जैसा कि ‘‘ गुद से दो अंगुल ऊपर कुंडलिनी में मूलाधार नामक स्थान है । वहां चार दल का ‘आधारचक्र’ है । इसके ऊपर किंतु नाभि के नीचे छः दल का ‘स्वाधिष्ठानचक्र’ है । नाभि और द्रव्य के बीच में दस दल का ‘मणिपूरकचक्र’ है । इसके पास ही जीवात्मा

कुंडल्यधश्चोर्ध्वभागेषु प्राणः संचरति । श्रोत्राक्षिकटिगुल्फप्राणगलस्फिन्दरोषु व्यानः संचरति । गुदमेदोरेजानुदरद्वेषणकटिजंघानाभ्यन्मयगारेष्वापानः संचरति । सर्वसंस्थिस्थ उद्गानः । पादहस्तयोरपि सर्वगत्रेषु सर्वव्यापी समानो भुक्तान्नरसादिकं गग्रेऽग्निना सह व्यापयन् द्विसप्तति सहस्रेषु नाडीं मार्गेषु चरन् समानवायुरग्निना सह सांगोपांगं कलवरं व्याप्नोति । ( शांडिल्योपनिषद् १।४ )

आधारस्तु चतुर्दलोऽरुणसहि वीसान्तवर्णाश्रयः ।
स्वाधिष्ठानमनेक विष्णुतकरा बालांतपदपत्रकम् ॥
रत्नाभं मणिपूरकं दशदलं ढाचिःफकारान्तकम् ।
पत्रैर्द्रादशाभिस्त्वनाहतपुरं हैमं कठाराणितम् ॥ १॥
मात्राभिदेलं षोडशस्वरयुतं ज्योतिर्विद्युद्द्राडिजम् ।
ई क्षं द्रव्यक्षरसंयुतं द्विदलकं रत्नोपमाज्ञापुरम् ॥
तस्माद्दूध्वभघोषमुखं विकसितं पद्मं सहस्राक्षिदम् ।
नित्यानंदमयं सदाशिवपदं नित्यं नमस्ते सदा ॥२॥ (स्व. सि.)

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आयुर्वेद-दर्शन

का निवासस्थान ‘हृदयकमल’ है। हृदय और तालूमूल के बीच में बारह दल का ‘अनाहतचक्र’ है। तालूमूल व ललाट के बीच में सोलह दल का ‘विशुद्धचक्र’ है। ललाट व सीमन्त के बीच में ‘आज्ञाचक्र’ है। इसके ऊपर ब्रह्मरंध्र और ब्रह्मरंध्र के भी ऊपर शिव का निवासस्थान, अधोमुख सहस्रदल कमल है। ये सब बिस-तंतु मार्ग से निबद्ध हैं।” इत्यादि।

उक्त सब रचना धातुप्रसाद की बनी हुई है। प्रत्यक्ष में धातुप्रसाद के दो प्रकार उपलब्ध होते हैं; धूसर व श्वेत। तहां धूसर धातुप्रसाद के बने हुए अवयवों को ‘पद्म’ अथवा ‘कमल’ कहते हैं। ये अनेक प्रकार के और असंख्य हैं। इनका शरीर में सर्वत्र अस्तित्व है। सहस्रदलकमल, हृकमल, कुंडिलिनी आदि भाग मुख्यतः इन पद्मों के संयोग से ही बने हुए हैं। उक्त लघु पद्म, बिसतंतुओं से युक्त हैं। ये बिसतंतु, श्वेत धातुप्रसाद के बने हुए हैं और इनके ही समुदाय से नाडियां बनी हुई हैं। इन तंतुओं अथवा नाडियों के द्वारा समस्त पद्म एक दूसरे के साथ संबद्ध हैं और इस तरह इनका समस्त शरीर में जाल-सा बिछा हुआ है। इस संस्था का पाश्चात्य शारीरवेत्ताओं ने बहुत ही सूक्ष्मता से अन्वेषण किया है। अस्तु.

उक्त रचना में ही कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, अतीन्द्रिय और बुद्धीन्द्रिय होने के कारण यह इंद्रिय व्यापक स्पर्शनेन्द्रिय, इनकी सबकी संगठित संस्था है। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो उक्त संस्था के द्वारा ही ‘करणवृत्ति’ और ‘चित्तवृत्ति’ संज्ञक व्यापार प्रस्तुत होते हैं। जो संप्रदाय इन वृत्तियों को वायु धर्म कहते हैं वे इन वृत्तियों का प्राणार्दि प्रकारों में भी विभाजन करते हैं।

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परिशिष्ट

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वायोंविद ने वायुधर्म का विवेचन करते हुए कहा है कि यह वायु, प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान इन प्रकारों में विभक्त है। किन्तु उन्होंने अपने विवेचन में इन प्रभेदों का अलग २ कार्य-निर्देश नहीं किया है। अतः उनके विषय में जो कुछ भी कहा जाय वह एक अनुमान ही होगा।

वायोंविद की दृष्टि में प्राणधर्म का प्रधान कार्य 'उत्साह' अथवा 'उद्योजन' [ सर्वेन्द्रियाणामुद्योजकः, हर्षोत्साहयोर्गनिः ] है।

उद्योजन, Irritability धातु प्रसाद में और अन्यत्र भी रहता है। धातुप्रसाद के धूसर भाग में अर्थात् पञ्चों में खासकर उद्योजन रहता है। इसके अतिरिक्त भी कुछ अवयव ऐसे हैं जिनमें स्वतंत्र रूप से उद्योजन शीलता रहती है। जैसा कि अणु अवयवगत उद्योजन, जिसके द्वारा वह अपने स्वभाविक कार्य करता है; स्नेष्मगत बलोत्पादक उद्योजन; पीतस्त्रावु [ Yellow fibres ] गत और नेच-तृतीयपटलगत आयम्यता का उत्पादक उद्योजन; पक्ष्मापरा [ Ciliated epithelium ] गत पक्ष्म व्यापार ( तृणजलोका गति ) को पैदा करने वाला उद्योजन; रसशोषणक्षमता का उत्पादक रक्तस्थ श्वेतकण गत उद्योजन; अग्निमंडलगत पिचोत्पादक उद्योजन और प्रस्पंदन प्रवर्तक हृन्मांसगत उद्योजन। वायोंविद की भाषा में उक्त सभी उद्योजनों का अंतःस्थ उद्योजक 'प्राणधर्म' ही है। यद्यपि सत्व के तथा बाह्य विषयों के कारण उद्योजनशील अवयव उत्तेजित होते हैं तथापि ये अन्य उद्योजक, प्राणधर्म के अभाव में उत्तेजना पैदा नहीं कर सकते। अतः प्राणधर्म को ही प्रधान उद्योजक कहना उचित है।

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आयुर्वेद-दर्शन

सामान्यतः समस्त उद्योजनशील अवयव, प्राणधर्म के निवास स्थान हैं। फिरभी हृत्कमल जैसे मध्यम कमल, कुंडलिनी, और ज्ञानेन्द्रियगत धूसर धातुप्रसाद, में इसके उच्चतर स्थान तथा प्राणायतन Internal Capsule के आस पास और अधिपति के 'दलस्थली' Cortex में उच्चतम स्थान हैं।

प्राण के द्वारा सर्व प्रथम उद्योजन होता है और यह उद्योजन ही अनेक व्यापारों में परिणत होता है। धूसर धातुप्रसाद गत अर्थात् पश्चात्त उस उद्योजन, तंतुओं में 'वेगों' का अथवा 'वृत्तियों' का रूप धारण करता है। ये वेग दो प्रकार के हैं; प्रवर्तक और अभिवाहक। प्रवर्तक वेगों के कारण कर्मेन्द्रियों के द्वारा आकुंचनप्रसरणादि अथवा ग्रहणविसर्जनादि व्यापार होते हैं। और अभिवाहक वेगों के कारण ज्ञानेन्द्रियों द्वारा शब्दस्पर्शादि विषयों का अभिवहन होता है। इसी हेतु से वायोंविद ने प्राणधर्म को अर्थाभिवाहक ( इन्द्रियार्थानामभि वोढा ) और चेष्टाप्रवर्तक ( प्रवर्तकश्चेष्टामुच्चावचानाम् ) कहा है। उक्त दोनों प्रकार के वेग यद्यपि भिन्न २ नाडियों से प्रस्तुत होते हैं तथापि उनका समवायि कारण नाडियां नहीं हैं अथवा अमुक वेग अमुक नाडी से ही प्रस्तुत हो यह नहीं है।

प्राण के व सत्व के निवास स्थान प्रायः एक ही हैं और नाडियों में से प्राणवृत्तियों के साथ २ चित्तवृत्तियाँ भी संचार करती हैं। प्रायः इसी हेतु से वायोंविद् सत्व को प्राण का परिणाम कहते हैं और तदनुसार प्राण को सत्व का उत्पादक व नियामक ( नियंता प्रणेता च मनसः ) कहते हैं। किन्तु यह ध्यान में रखना चाहिये कि सहस्रदल कमल के दलस्थली में विशेषतः उसके पुरोभाग में ऐसे पद्म हैं जिनमें

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किं सत्त्व की दृष्टियाँ प्रधानता से रहती हैं। फिर भी वायोविद्, प्राण को हर्ष (सत्त्वद्वत्प्रादक उद्योजन) की योनि (हर्षोत्साहयौनिः) मानते ही हैं।

प्राण, का यह विवेचन बहुत व्यापक है। प्राण के इस व्यापक क्षेत्र को संकुचित करके ही उदान आदि प्रभेदों की कल्पना की गई है। तदनुसार उदान के तीन कार्य हैं; (१) समस्त शारीर धातुओं का व्यूह करना, (२) अवयवों का सन्धान करना, और (३) वाणी को प्रवृत्त करना। (१) अग्नि को प्रज्वलित करना, (२) शरप्राण का शोषण करना और (३) बाँहमलों को अर्थात् किट्ठको अलग करना ये तीन कार्य समान के बतलाये हैं। वायोविद् के वक्तव्य में व्यान के कार्यों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। गर्भावस्था में कल्लपाक के समय छोटे बड़े खोटों को बनाना और गर्भ में आकृति पैदा करना अपान का कार्य है।

वायोविद् का यह प्राणादि विवेचन यजःपुराण परिसूद् के समय का है।

इसके अतिरिक्त चरक संहिता के वातव्याधि विकृत्सा में भी प्राणादि प्रकारों का विवेचन उपलब्ध होता है। मालूम नहीं कि यह विवेचन किसने किया और कब किया। वह इस प्रकार है:—

स्थानं प्राणस्य शीघोरः कर्णजिन्नाक्षिनासिकाः ।
श्वीवनक्ष्वथूद्धारः श्वासाहारादि कर्म च ॥

इसमें समस्त अभिवाहक वेगों का और कुछ प्रवर्तक वेगों का प्राण के कार्य क्षेत्र में समावेश किया गया है। चारम्भ ने भी अपने 'बुद्धिद्वयौद्रीयचित्तयूक्' इस विधान में अभिवाहक वेगों का और

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आयुर्वेद-दर्शन

‘ धीवनक्षत्रशुद्धारिनिःश्वासान्नप्रवेशकृत् ’ इसमें प्रवर्तकवैगों का उल्लेख किया है। यहाँ यह देखना आवश्यक होजाता है कि उस धीवनादि कार्ये जिन नाडियों के द्वारा प्रस्तुत होते हैं उनका किस चक्र से सम्बन्ध है। किन्तु यह अन्वेषण अभी विचाराधीन रखना ही उचित है।

वदानस्य पुनः स्थानं नाम्भुरः कंठ एव च ।

वाक्प्रवृत्तिं प्रयत्नौञो बल वर्णादि कर्म च ॥

इसमें यद्यपि नाभि और उरस का उदान के स्थानों में उल्लेख है तथापि कंठ को ही मुख्य स्थान कहा गया है। कार्यों में वाणी और बल का उल्लेख है। ध्वनि पैदा होने के लिये यद्यपि अवकाश और इवा की आवश्यकता है तथापि स्वरवर्ण विशेष पैदा होने के लिये स्थान, प्रयत्न और वे प्रवर्तक वेग जिनके द्वारा कंठगता स्वरतंत्रियाँ तनतीं व शिथिल होती हैं; प्रधान कारण हैं। बल, ओज में रहता है; अतः ओज का भी उल्लेख है।

उपनिषदों में उदान के उद्गमन का दो जगह उल्लेख है। एक जीवात्मा के पुनर्भव के समय और दूसरा हृदयाकाश स्थित जीवात्मा को मूर्द्ध में शिव के समीप ले जाने के समय। वाग्भट ने उदान को ‘ स्मृतिक्रिय ’ भी कहा है।

स्वेददोषांशुवाहीनि शोतांसि समाधिष्ठितः ।

अंतरग्नेश्च पार्श्वस्थः समानोऽग्निबलप्रदः ॥

यहाँ शोतसु शब्द ‘ पिंड ’ वाचक है। पिंडों की आकृति साधारणतः शोतों के सदृश ही होती है। इसमें पित्तोत्पादक पिंडों को

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अर्थात् अनिमंडलों को 'स्वेदवहसोत;' ऋदककफोत्पादक पिंडों को अर्थात् सोममंडलों को 'अनुवहसोत' और अन्य कतिपय पिंडों को 'दोषवहसोत' कहा गया है। दोषवह सोतों में किनका समावेश करना यह विचारणीय है। फिरभी यह कहा जा सकता है कि उक्त स्वेदांयुवह सोतों के तथा उन पिंडों के जो कि अर्पान के क्षेत्र में हैं; अतिरिक्त ही दोषवहसोत हैं। इन दोषवह सोतों में 'अंतःखावी' पिंडों का भी समावेश किया जा सकता है। दोष शब्द आयुर्वेद में अनेक अर्थों में प्रयुक्त होने के कारण अंतःखावों को भी लगाया जा सकता है।

इन सोतों में विशेषतः तद्रत अणु अवयवों और 'अभिपूतों' में जो स्वेदांयुदोषोत्पादक धर्म हैं वह समान संज्ञक है। यह धर्म उनमें स्वतंत्रता से रहता है तथापि इसका वास्तव्य अंतरनि के बाजू में-स्थित धातुप्रसाद म भी रहता है जिससे कि अनिमंडल गत अभिपूतों को पिचोत्पादन करने की क्रमोवशी शक्ति प्राप्त होती है।

इसमें समान के 'दोषशोषण' और 'विवेचन' के विषय में कुछ भी उल्लेख नहीं है। वाग्भट के 'अंत्रणृण्णाति' का अर्थ 'रस शोषण' है।

देहं व्याप्रोति सर्वं तु व्यानः शीघ्रगतिर्नुणाम् ।

गतिप्रसारणाक्षेपनिमेषादि क्रियाः सदा ॥

इसमें व्यान के स्थान व कार्यों का ऐसे शब्दों में वर्णन किया है जो कि रस संवहन और मांस स्नायवीय च्छा दोनों में चरितार्थ हो। रससंवहन का आरंभ हृदय के निमेषोन्मेषण से होता है अतः वाग्भट

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आयुर्वेद-दर्शन

ने इसको सर्वदेहचारी कहते हुए भी हृदय स्थित कहा है। हृदय के निमेषोन्मेषण के कारण रसका विक्षेप (व्यानने रसधातुहिं विक्षेपोन्मेषित कर्माण् ४०) होता है और वह समस्त देह में शीघ्र गति से संचार करता है। उक्त निमेषोन्मेषण रूप व्यापार वाहिनियों में भी रहता है और उससे रस व रक्त का अभिसरण जहां जितना और जिस वेग में आवश्यक हो; होता है। निमेषोन्मेषण कारक यह व्यानघर्म हृन्मांसखायुओं में स्वतंत्र और अन्य खायुओं में धातुप्रसादाधीन रहता है।

मांस स्नायवीय आकुंचन, प्रसरण, आयम्यता, तन्यता आदि चेष्टाओं के प्रवर्तक नाडी वेगों को व्यान कहने की प्रवृत्ति इसमें पाई जाती है पर व्यान के इस क्षेत्र का निर्णय प्राणादि अन्य प्रकारों के क्षेत्रों को छोड़ कर ही करना होगा।

वृषणौ बस्ति मेदं च नाभ्यूरु वंक्षणौ गुदम् ।

अपानः स्थानयंत्रस्थः शुक्रमूत्रशक्रुति सः ॥

सृजत्यातैवगभा च.....( च. वि. अ. २८ )

अर्थात् वृषण, बस्ति, शिश्न, नाभि, ऊरु, वंक्षण इन स्थानों में जो शुक्र, मूत्र, पुरीष, आतैव व गर्भ इनके उत्पादक और बाह्य यंत्र हैं उनमें अपान रहता है। अपान, शुक्रादिकों को पैदा भी करता है और बाहर भी निकलता है।

हमारी राय में उक्त प्राणादि प्रभेदों का पुनः संशोधन किया जाना आवश्यक है।