आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुर्वेद-दर्शन
‘ धीवनक्षत्रशुद्धारिनिःश्वासान्नप्रवेशकृत् ’ इसमें प्रवर्तकवैगों का उल्लेख किया है। यहाँ यह देखना आवश्यक होजाता है कि उस धीवनादि कार्ये जिन नाडियों के द्वारा प्रस्तुत होते हैं उनका किस चक्र से सम्बन्ध है। किन्तु यह अन्वेषण अभी विचाराधीन रखना ही उचित है।
वदानस्य पुनः स्थानं नाम्भुरः कंठ एव च ।
वाक्प्रवृत्तिं प्रयत्नौञो बल वर्णादि कर्म च ॥
इसमें यद्यपि नाभि और उरस का उदान के स्थानों में उल्लेख है तथापि कंठ को ही मुख्य स्थान कहा गया है। कार्यों में वाणी और बल का उल्लेख है। ध्वनि पैदा होने के लिये यद्यपि अवकाश और इवा की आवश्यकता है तथापि स्वरवर्ण विशेष पैदा होने के लिये स्थान, प्रयत्न और वे प्रवर्तक वेग जिनके द्वारा कंठगता स्वरतंत्रियाँ तनतीं व शिथिल होती हैं; प्रधान कारण हैं। बल, ओज में रहता है; अतः ओज का भी उल्लेख है।
उपनिषदों में उदान के उद्गमन का दो जगह उल्लेख है। एक जीवात्मा के पुनर्भव के समय और दूसरा हृदयाकाश स्थित जीवात्मा को मूर्द्ध में शिव के समीप ले जाने के समय। वाग्भट ने उदान को ‘ स्मृतिक्रिय ’ भी कहा है।
स्वेददोषांशुवाहीनि शोतांसि समाधिष्ठितः ।
अंतरग्नेश्च पार्श्वस्थः समानोऽग्निबलप्रदः ॥
यहाँ शोतसु शब्द ‘ पिंड ’ वाचक है। पिंडों की आकृति साधारणतः शोतों के सदृश ही होती है। इसमें पित्तोत्पादक पिंडों को