आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextपरिशिष्ट
इस परिशिष्ट में वातपित्त-लेष्माओं के तथा सत्व के प्रकारों पर विचार करना है।
आयुर्वेद का तंत्र, ( निदान व चिकित्सा ) आरम्भ से ही वात-पित्त-लेष्माओं के आधार पर प्रतिष्ठित है। किन्तु जैसे २ इनकी व्यापकता का और इनके भिन्न २ कार्यों का ज्ञान बढ़ता गया वैसे २ इनके प्रकारों की भी कल्पना होने लगी। कालानुक्रम के अनुसार देखा जाय तो प्रथम वायु के प्रकारों का आविष्कार हुआ और बाद में पित्त-लेष्माओं के प्रकारों का। चरक संहिता में सिर्फ पित्त-लेष्माओं के भिन्न २ कार्यों का उल्लेख है किन्तु सुश्रुत संहिता में उन कार्यों के आधार पर नामतः भिन्न २ प्रकारों का विवेचन किया गया है। इन प्रकारों की सृष्टि जिस समय में हुई उसके पहले ही हेतुसंक्षेप और औषधि-गुण-धर्म-विवेचन पास २ में निबद्ध हो चुका था। इस का परिणाम यह हुआ कि निदान में और औषधि-गुण-धर्म-विवेचन में इन प्रकारों का सन्तोषजनक उल्लेख न हो सका। यदि भाविष्य में इस वटि को पूर्ण करना है तो उस पर अधिक विचार करना भी आवश्यक है।
आयुर्वेद दृष्टया शरीर, वातपित्त-लेष्माओं का बना हुआ है। शरीर में जितने पदार्थ हैं उनमें कुछ वातसंज्ञक, कुछ पित्तसंज्ञक और कुछ लेष्मसंज्ञक हैं। अर्थात् शरीरगत पदार्थों के संक्षेप में तीन प्रधान वर्ग हैं और उनको वात, पित्त और लेष्मा कहा जाता है। आगे इन प्रधान वर्गों का ही कर्म विशेष के आधार पर पांच २