आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
Page 205 of 235
Read in contextपरिशिष्ट
१८५
अर्थात् अनिमंडलों को 'स्वेदवहसोत;' ऋदककफोत्पादक पिंडों को अर्थात् सोममंडलों को 'अनुवहसोत' और अन्य कतिपय पिंडों को 'दोषवहसोत' कहा गया है। दोषवह सोतों में किनका समावेश करना यह विचारणीय है। फिरभी यह कहा जा सकता है कि उक्त स्वेदांयुवह सोतों के तथा उन पिंडों के जो कि अर्पान के क्षेत्र में हैं; अतिरिक्त ही दोषवहसोत हैं। इन दोषवह सोतों में 'अंतःखावी' पिंडों का भी समावेश किया जा सकता है। दोष शब्द आयुर्वेद में अनेक अर्थों में प्रयुक्त होने के कारण अंतःखावों को भी लगाया जा सकता है।
इन सोतों में विशेषतः तद्रत अणु अवयवों और 'अभिपूतों' में जो स्वेदांयुदोषोत्पादक धर्म हैं वह समान संज्ञक है। यह धर्म उनमें स्वतंत्रता से रहता है तथापि इसका वास्तव्य अंतरनि के बाजू में-स्थित धातुप्रसाद म भी रहता है जिससे कि अनिमंडल गत अभिपूतों को पिचोत्पादन करने की क्रमोवशी शक्ति प्राप्त होती है।
इसमें समान के 'दोषशोषण' और 'विवेचन' के विषय में कुछ भी उल्लेख नहीं है। वाग्भट के 'अंत्रणृण्णाति' का अर्थ 'रस शोषण' है।
देहं व्याप्रोति सर्वं तु व्यानः शीघ्रगतिर्नुणाम् ।
गतिप्रसारणाक्षेपनिमेषादि क्रियाः सदा ॥
इसमें व्यान के स्थान व कार्यों का ऐसे शब्दों में वर्णन किया है जो कि रस संवहन और मांस स्नायवीय च्छा दोनों में चरितार्थ हो। रससंवहन का आरंभ हृदय के निमेषोन्मेषण से होता है अतः वाग्भट