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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 411 of 1063

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Page 411

वषड्हुतेभ्यो वषड्हुतेभ्यः. देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित.. (७)
इष्ट देवों और अग्नि देवों के लिए यह आज्य अग्नि में दिया जाए. हे मार्ग को जानने
वाले देवो! तुम मार्ग पा कर हमारे यज्ञ में जिस मार्ग से आए हो, उसी मार्ग से लौट जाओ.
(७)
मनसस्पत इमं नो दिवि देवेषु यज्ञम्.
स्वाहा दिवि स्वाहा पृथिव्यां स्वाहा ऽ न्तरिक्षे स्वाहा वाते धां स्वाहा.. (८)
हे समस्त प्राणियों के स्वामी देव! हमारे इस यज्ञ को स्वर्ग में वर्तमान देवों तक
पहुंचाओ. तुम हमारे यज्ञ को आकाश में, पृथ्वी पर, अंतरिक्ष में एवं सभी कर्मों के आधार
वायु में स्थापित करो. (८)
सूक्त-१०३ देवता—इंद्र
सं बर्हिरक्तं हविषा घृतेन समिन्द्रेण वसुना सं मरुद्भिः.
सं देवैर्विश्वेदेवैभिरक्तमिन्द्रं गच्छतु हविः स्वाहा.. (१)
स्रुक आदि पात्र पुरोडाश और आज्य से पूर्ण हो कर इंद्र के साथ, वसुओं के साथ
मरुद्गण के साथ तथा विश्वे देवों के साथ संपन्न हुए. इस प्रकार का पात्र इंद्र को प्राप्त हो
तथा यह हवि शोभन आहुति वाला हो. (१)
सूक्त-१०४ देवता—वेदी
परि स्तृणीहि परि धेहि वेदिं मा जामिं मोषीरमुया शयानाम्.
होतृषदनं हरितं हिरण्ययं निष्का एते यजमानस्य लोके.. (१)
हे दर्भ घास के फूल! तुम यज्ञ वेदी के चारों ओर विस्तीर्ण हो कर उसे ढक लो. तुम इस
वेदी पर सोते हुए यजमान के सहयोगियों का एवं संतान का विनाश मत करो. हे होताओं के
बैठने के स्थान हरित वर्ण वाले एवं स्वर्ग के समान रमणीय दर्भ! तुम यज्ञ वेदी पर फैल
जाओ. ये फैले हुए दर्भ यजमान के लोकों में सोने के अलंकार हों. (१)
सूक्त-१०५ देवता—बुरे स्वप्न का विनाश
पर्यावर्ते दुष्षप्न्यात् पापात् स्वप्न्यादभूत्याः.
ब्रह्माहमन्तरं कृण्वे परा स्वप्नमुखाः शुचः.. (१)
मैं बुरे स्वप्न से उत्पन्न पाप से छूट जाऊं तथा स्वप्न के दोष से भी अलग रहूं. मैं बुरे स्वप्न
का निवारण करने वाले मंत्र को बोलता हूं. बुरे स्वप्न से संबंध रखने वाले शोक मुझ से दूर हों.
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