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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages
Page 320Permalink

अठारहवाँ प्रकरण । ३१३

मूलम् ।

न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति ।
धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्यसर्वदा शान्तमानसः ॥ ३९ ॥

पदच्छेदः ।

न, शान्तिम्, लभते, मूढः, यतः, शमितुम्, इच्छति, धीरः, तत्त्वम्, विनिश्चित्य, सर्वदा, शान्तमानसः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यतः=जिस कारणन लभते=नहीं प्राप्त होता है
शमितुम्=शान्त होने कोधीरः=ज्ञानी
मूढः=अज्ञानीतत्त्वम्=तत्त्व को
इच्छति=इच्छा करता हैविनिश्चित्य=निश्चय करके
ततः=इसी कारणसर्वदा=सर्वदा
सः=वहशान्तमानसः=शान्त मनवाला है ॥
शान्तिम्=शान्ति को

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! मूढ़ अज्ञानी जिस हेतु चित्त के निरोध से शान्ति की इच्छा करता है, इसी वास्ते वह शान्ति को नहीं प्राप्त होता है । धीर जो है सो आत्मतत्त्व को निश्चय करके शान्ति की इच्छा नहीं करता है, इसी लिये शान्ति को प्राप्त होता है ॥ ३९ ॥

मूलम् ।

क्वात्मनो दर्शनं तस्य यद्दृष्टमवलम्बते ।
धीरास्तंतं पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम् ॥ ४० ॥

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३१४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

क्व, आत्मनः, दर्शनम्, तस्य, यत्, दृष्टम्, अवलम्बते, धीराः,
तम्, तम्, न, पश्यन्ति, पश्यन्ति, आत्मानम्, अव्ययम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
तस्य=उसकोधीराः=ज्ञानी
आत्मनः=आत्मा कातम् तम्=उस
दर्शनम्=दर्शनदृष्टम्=दृष्ट को
क्व=कहाँ हैन पश्यन्ति=नहीं देखते हैं
यत्=जोपरन्तु=परन्तु
दृष्टम्=दृष्ट कोअव्ययम्=अविनाशी
अवलम्बते=अवलम्बन करता हैआत्मानम्=आत्मा को
पश्यन्ति=देखते हैं ॥

भावार्थ ।

जो अज्ञानी पुरुष है, वह प्रत्यक्ष प्रमाणों करके ही जाने हुए पदार्थों को सत्य-रूप करके मानता है, इसी कारण उसको आत्म-दर्शन कदापि नहीं प्राप्त होता है। और जो ज्ञानी है, वह देखते हुए पदार्थों को नहीं देखता है। किन्तु उनके अन्तर्गत कारण-शक्ति सर्वत्र चिद्रूप आत्मा को ही देखता है, इसी कारण वह परमात्मा में सदा लीन रहता है, और कार्य-रूपी बाह्य पदार्थ उसको कोई भी दिखाई नहीं देता है ॥ ४० ॥

मूलम् ।

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै ।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदाऽसावकृत्रिमः ॥ ४१ ॥

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अठारहवां प्रकरण । ३१५

पदच्छेदः ।
क्व, निरोधः, विमूढस्य, यः, निर्बन्धम्, करोति, वै,
स्वरामस्य, एव, धीरस्य, सर्वदा, असौ, अकृत्रिमः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः=जोस्वरामस्य=आत्माराम
निर्बन्धम्=चित्त के निरोध कोधीरस्य=ज्ञानी को
वै=हठ करकेसर्वदां=सदैव
करोति=करता हैएव=निश्चय करके
तस्य=उसअसौ=यह
विमूढस्य=अज्ञानी कोचित्तनिरोधः=चित्त का निरोध
क्व=कहाँअकृत्रिमः=स्वाभाविक है ॥
निरोधः=चित्त का निरोध है

भावार्थ ।
जो अज्ञानी पुरुष शुष्कचित्त के निरोध में हठ करता है, उसका चित्त कभी निरोध को नहीं प्राप्त होता है । अज्ञानी ही चित्त के निरोध के लिये समाधि लगाता है । जब वह समाधि से उत्थान करता है, तब फिर उसका चित्त संसार के पदार्थों में फैल जाता है । और जो आत्मा में स्मरण करनेवाला योगी है, जिसका चित्त निश्चल है, उसका चित्त सर्वदा आत्मा में ही निरुद्ध रहता है, इसी कारण सर्वदा उसकी समाधि बनी रहती है ॥ ४१ ॥

मूलम् ।
भावस्य भावकः कश्चिन्न किञ्चिद्भावकोऽपरः ।
उभयाऽभावकः कश्चिदेवमेव निराकुलः ॥ ४२ ॥

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३१६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

भावस्य, भावकः, कश्चित्, न, किञ्चित्, भावकः, अपरः,
उभयाऽभावकः, कश्चित्, एवम्, एव, निराकुलः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
कश्चित्=कोईभावकः=माननेवाला है
भावस्य=भाव काएवम् एव=वैसा ही
भावकः=माननेवाला हैकश्चित्=कोई
अपरः=और कोई$\left.\begin{aligned} उभया- \ ऽभावकः \end{aligned} \right} =\begin{aligned} &दोनों अर्थात् भाव \ &और अभाव का नहीं \ &माननेवाला \end{aligned}$
किञ्चित्=कुछ भी
न=नहीं है
एवम्=ऐसानिराकुलः=स्वस्थ चित्त है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! कोई एक नैयायिक ऐसा मानता है कि भाव-रूप प्रपञ्च परमार्थ से सत्य है । और कोई शून्य वादी कहता है कि सब प्रपञ्च शून्य-रूप है, क्योंकि शून्य ही से उसकी उत्पत्ति होती है । और हजारों में से कोई एक आत्मा का अनुभव करनेवाला होता है । वह भाव और अभाव दोनों की भावना का त्याग करके और स्वस्थचित्त होकर अपने आत्मानन्द में ही सदा मग्न रहता है ॥ ४२ ॥

मूलम् ।

शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः ।
न तु जानन्ति संमोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः ॥ ४३ ॥

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अठारहवाँ प्रकरण । ३१७

पदच्छेदः ।
शुद्धम्, अद्वयम्, आत्मानम्, भावयन्ति, कुबुद्धयः, न, तु,
जानन्ति, संमोहात्, यावज्जीवम्, अनिवृत्ताः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
कुबुद्धयःदुर्बुद्धि पुरुषसंमोहात्अज्ञानता के कारण
शुद्धम्शुद्धन जानन्तिनहीं जानते हैं
अद्वयम्अद्वैतअतःइसलिये
आत्मानम्आत्मा कोयावज्जीवम्जब तक उनका जीवन है
भावयन्तिभावना करते हैंअनिवृत्ताःसंतोष-रहित हैं ॥
तुपरन्तु

भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! अज्ञानी मूढ़ शुद्ध निर्मल द्वैत से रहित व्यापक आत्मा का अनुभव नहीं करते हैं, क्योंकि उनका मोह सांसारिक पदार्थों से निवृत्त नहीं हुआ है । इसी कारण उनको आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता है । जब तक वे जीते हैं, सन्तोष को कदापि नहीं प्राप्त होते हैं । आत्मा के साक्षात्कार होने के विना सन्तोष की प्राप्ति नहीं हो सकती है ॥ ४३ ॥

मूलम् ।
मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते ।
निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा ॥ ४४ ॥

पदच्छेदः ।
मुमुक्षोः, बुद्धिः, आलम्बम्, अन्तरेण, न, विद्यते, निरा-
लम्बा, एव, निष्कामा, बुद्धिः, मुक्तस्य, सर्वदा ॥

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३१८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मुमुक्षोः =मुमुक्षु पुरुष कीसर्वदा =सब काल में
बुद्धिः =बुद्धिनिष्कामा =कामना-रहित
आलम्बम् अन्तरेण =आलम्ब के बिनाच =और
न विद्यते =नहीं रहती हैनिरालम्बा =आश्रय-रहित
मुक्तस्य =मुक्त पुरुष कीएव =निश्चय करके
बुद्धिः =बुद्धिविद्यते =रहती है ॥

भावार्थ ।

जिसको आत्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ है, उसकी बुद्धि सांसारिक विषय का आलम्बन करती है । और जो निष्काम जीवन्मुक्त है, उसकी बुद्धि आत्मा के आश्रय रहती है । आत्मा के अचल होने से वह बुद्धि भी सदैव स्थिर रहती है ॥ ४४ ॥

मूलम् ।

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः ।
विशन्ति झटिति क्रोडन्निरोधैकाग्रयसिद्धये ॥ ४५ ॥

पदच्छेदः ।

विषयद्वीपिनः, वीक्ष्य, चकिताः, शरणार्थिनः, विशन्ति, झटिति, क्रोडम्, निरोधैकाग्रयसिद्धये ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
विषयद्वीपिनः =विषय-रूपी व्याघ्र कोशरणार्थिनः =अपने शरीर की रक्षा करनेवाले मूढ़ पुरुष
वीक्ष्य =देख करके
चकिताः =डरे हुए
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अठारहवाँ प्रकरण । ३१९

निरोधै- ⎧ चित्त की निरोधता ⎹ झटिति=शीघ्र
काग्र्य= ⎨ और एकाग्रता की ⎹ क्रोडम्=पहाड़ की गुहा में
सिद्धये ⎩ सिद्धि के लिये ⎹ विशन्ति=प्रवेश करते हैं ।।

भावार्थ ।
मूढ़ मुमुक्षु विषय-रूपी व्याघ्रों को देख करके भय को प्राप्त होता और चित्त की वृत्ति को एकाग्र करने के लिये पहाड़ी कन्दरा में प्रवेश कर जाता है, परन्तु उसका कार्य सिद्ध नहीं होता है, उसकी अन्तर्वृत्ति फैलती जाती है और वह हर दिन दुःखी होता जाता है, शान्ति उसको लेश-मात्र भी नहीं होती है और जो ज्ञानी जीवन्मुक्त है, वह विषय-रूपी व्याघ्र को इन्द्रजाल-जन्य पदार्थों की तरह देखकर उनसे भय नहीं खाता है ॥ ४५ ॥

मूलम् ।
निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः ।
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ ४६ ॥

पदच्छेदः ।
निर्वासनम्, हरिम्, दृष्ट्वा, तूष्णीम्, विषयदन्तिनः, पलायन्ते, न, शक्ताः, ते, सेवन्ते, कृतचाटवः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
निर्वासनम्=वासना-रहितन शक्ताः=असमर्थ
पुरुषम्=पुरुष-रूपीविषयदन्तिनः=विषय-रूपी हाथी
हरिम्=सिंह कोतूष्णीम्=चुपचाप हुए
दृष्ट्वा=देखकरपलायन्ते=भागते हैं
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३२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

च = और<br>ते = वे<br>कृतचाटवः = प्रियवादी अर्थात् संसारी पुरुष<br>ईश्वराकृष्टाः = ईश्वर करके प्रेरित हुए$\left. तन्निर्वासनम् पुरुषम् \right}=$ उस वासना-रहित पुरुष को<br>स्वयम् = स्वतः<br>आगत्य = आकर<br>सेवन्ते = सेवन करते हैं ॥

भावार्थ ।

क्योंकि वासना-रहित पुरुष-रूपी सिंह को देखकर, विषय-रूपी हस्ती असमर्थ होकर भाग जाता है । और ऐसे ही नरसिंह की प्रतिष्ठा और सेवा इतर पुरुष ईश्वर करके प्रेरित हुए करते हैं ॥ ४६ ॥

मूलम् ।

न मुक्तिकारिकान्धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः ।
पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ ४७ ॥

पदच्छेदः ।

न, मुक्तिकारिकाम्, धत्ते, निःशङ्कः, युक्तमानसः, पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, आस्ते, यथासुखम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
निःशङ्कः = शङ्का-रहित<br>च = और<br>युक्तमानसः = निश्चल मनवाला<br>ज्ञानी = ज्ञानी<br>$\left. मुक्तिका- रिकाम् \right}=$ यमनियमादि योग- क्रिया कोआग्रहात् = आग्रह से<br>न धत्ते = नहीं धारण करता है<br>किन्तु = परन्तु<br>पश्यन् = देखता हुआ<br>शृण्वन् = सुनता हुआ
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अठारहवाँ प्रकरण । ३२१

स्पृशन्=स्पर्श करता हुआसः=वह
जिघ्रन्=सूँघता हुआयथासुखम्=सुख-पूर्वक
अश्नन्=खाता हुआआस्ते=रहता है ॥

भावार्थ ।

दूर हो गए हैं संशय जिसके, निश्चल है मन जिसका, ऐसा जो जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष है, वह यम-नियमादिक क्रिया को भी हठ से नहीं करता है, क्योंकि उसको कर्तृत्वा-ध्यास नहीं है। वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ अर्थात् लोकदृष्टि करके सर्वक्रिया को करता हुआ, अपने आत्मानन्द में ही स्थिर रहता है ॥ ४७ ॥

मूलम् ।

वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः ।
नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति ॥ ४८ ॥

पदच्छेदः ।

वस्तुश्रवणमात्रेण, शुद्धबुद्धि, निराकुलः, न, एव, आचारम्, अनाचारम्, औदास्यम्, वा, प्रपश्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
वस्तुश्रवण-मात्रेण =यथार्थ वस्तु के श्रवण-मात्र से हीन एव=न
शुद्धबुद्धिः=शुद्ध बुद्धिवालाआचारम्=आचार को
च=औरवा=और
निराकुलः=स्वस्थ चित्तवाला पुरुषऔदास्यम्=उदासीनता को
प्रपश्यति=देखता है ॥
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३२२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि चिदात्मा के श्रवण-मात्र से ही जिसकी शुद्ध अखण्डाकार बुद्धि उत्पन्न हुई है, वही अपने आत्मा के स्वरूप में स्थित है । वह न आचार को, न अनाचार को अर्थात् न शुभ, न अशुभकर्म को, न उनसे रहित होने की इच्छा को करता है । क्योंकि वह सदा अपने मन में मग्न रहता है ॥ ४८ ॥

मूलम् ।

यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजुः ।
शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत् ॥ ४९ ॥

पदच्छेदः ।

यदा, यत्, कर्तुम्, आयाति, तदा, तत्, कुरुते, ऋजुः, शुभम्, वा, अपि, अशुभम्, वा, अपि, तस्य, चेष्टा, हि, बालवत् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा= जबधीरः= ज्ञानी
यत्= जो कुछऋजुः= आग्रह-रहित
शुभम्= शुभकुरुते= करता है
वा अपि= अथवाहि= क्योंकि
अशुभम्= अशुभतस्य= उसको
कर्तुम्= करने कोचेष्टा= व्यवहार
आयाति= प्राप्त होता हैबालवत्= बालवत्
तदा= तबभवति= प्रतीत होता है ॥
तत्= उसको
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अठारहवाँ प्रकरण ।
३२३

भावार्थ ।

जिस काल में वह ज्ञानी शुभ कर्म को अथवा अशुभ कर्म को करता है, वह प्रारब्ध के वश से, दैवगति से अकस्मात् करता है । शोभन, अशोभन बुद्धि करके वा हठ करके नहीं करता है । क्योंकि उसकी चेष्टा बालक की तरह प्रारब्ध के अधीन होती है, राग-द्वेष के अधीन नहीं होती है ॥ ४९ ॥

मूलम् ।

स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम् ।
स्वातन्त्र्यान्निर्वृ॑तिंगच्छेत्स्वातंत्र्यात्परमंपदम् ॥ ५० ॥

पदच्छेदः ।

स्वातन्त्र्यात्, सुखम्, आप्नोति, स्वातन्त्र्यात्, लभते, परम्, स्वातन्त्र्यात्, निर्वृतिम्, गच्छेत्, स्वातन्त्र्यात्, परमम्, पदम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
स्वातन्त्र्यात् =स्वतन्त्रता सेस्वातन्त्र्यात् =स्वतन्त्रता से
सुखम् =सुख कोनिर्वृतिम् =नित्य सुख को
ज्ञानी =ज्ञानीगच्छेत् =प्राप्त होता है
आप्नोति =प्राप्त होता हैस्वातन्त्र्यात् =स्वतन्त्रता से
स्वातन्त्र्यात् =स्वतन्त्रता सेपरमं पदम् =परमपद को अर्थात् अपने स्वरूप को
परम् =ज्ञान को
लभते =प्राप्त होता हैआप्नोति =प्राप्त होता है ॥
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३२४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

स्वतन्त्रता से अर्थात् राग-द्वेष की अधीनता से रहित पुरुष सुख को प्राप्त होता है और उसी स्वतन्त्रता करके पुरुष आत्म-ज्ञान को भी प्राप्त होता है, और स्वतन्त्रता से ही पुरुष नित्य सुख को भी प्राप्त होता है, और स्वतन्त्रता करके ही पुरुष परम शान्ति को भी प्राप्त होता है ॥ ५० ॥

मूलम् ।

अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा ।
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः ॥ ५१ ॥

पदच्छेदः ।

अकर्तृत्वम्, अभोक्तृत्वम्, स्वात्मनः, मन्यते, यदा, तदा, क्षीणः, भवन्ति, एव, समस्तः, चित्तवृत्तयः ॥


अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा=जबतदा=तब
+पुरुषः=पुरुष+तस्य=उसकी
स्वात्मनः=अपने आत्मा केसमस्ताः=सम्पूर्ण
अकर्तृत्वम्=अकर्तापने कोचित्तवृत्तयः=चित्त की वृत्तियाँ
अभोक्तृत्वम्=अभोक्तापने कोएव=निश्चय करके
मन्यते=मानता हैक्षीणाः=नाश
भवन्ति=होती हैं ॥
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अठारहवां प्रकरण । ३२५

भावार्थ ।

जिस काल में विद्वान् अपने को अकर्त्ता और अभोक्ता
मानता है, उसी काल में चित्त की सम्पूर्ण वृत्तियाँ नष्ट हो
जाती हैं अर्थात् जब वह ऐसा निश्चय करता है कि इस कर्म
को मैं करूँगा, और उसका फल मुझे प्राप्त होगा, तब उसके
चित्त की अनेक वृत्तियाँ उदित होती हैं, और वह दुःखी
होता है । परन्तु जब अपने को अकर्त्ता, अभोक्ता निश्चय
करता है, तब उसके चित्त की सम्पूर्ण वृत्तियाँ निरुद्ध हो
जाती हैं, और वह शान्ति को प्राप्त होता है ।

प्रश्न—केवल अकर्त्ता, अभोक्ता निश्चय करने से ही
यदि चित्त की वृत्तियों का अभाव हो जावे, और वह
जीवन्मुक्त हो जावे, तो बद्धज्ञानियों के चित्त की वृत्तियों का
अभाव होना चाहिए और उनका भी जीवन्मुक्त कहना
चाहिए, पर ऐसा नहीं देखते हैं । क्योंकि बद्धज्ञानियों के
चित्त की वृत्तियां विषयों में लगी रहती हैं, और उनको
लोग जीवन्मुक्त भी नहीं कहते हैं । इसी से सिद्ध होता है
कि केवल अकर्त्ता, अभोक्ता मान लेने से ही वृत्तियों का
निरोध नहीं होता है ।

उत्तर—उन बद्धज्ञानियों का जो कथन है कि हम अकर्त्ता
हैं, हम अभोक्ता हैं, सो सब मिथ्या है । क्योंकि उनका
अभ्यास बना है, उनकी विषयाकार वृत्तियाँ उदय होती हैं,
और न उनका निश्चय परिपक्व है । यदि निश्चय परिपक्व

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३२६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

होता, तो कदापि उनकी वृत्तियाँ विषयाकार उत्पन्न न
होतीं।

दृष्टान्त।

जैसे हिन्दू-धर्म के लिए गोमांस अति निषिद्ध है, अतः
किसी हिन्दू का मन गोमांस की तरफ स्वप्न में नहीं जाता
है, वैसे ही जिस विद्वान् ज्ञानी का यह परिपक्व निश्चय है
कि मैं अकर्त्ता हूँ, अभोक्ता हूँ, उसका मन कभी स्वप्न में
भी विषयों की तरफ नहीं जाता है, और उसकी विषयाकार
वृत्ति कदापि नहीं उदय होती है, और जिसका निश्चय
परिपक्व नहीं है अर्थात् जो बद्धज्ञानी है, वह लोगों को
सुनाता है कि मैं अकर्त्ता हूँ, अभोक्ता हूँ, परन्तु भीतर से
उसकी विषयों की तरफ बिलार की तरह दृष्टि रहती है।
जैसे बिलार तब तक आँखों को मूँदे रहती है, जब तक मूसे
को नहीं देखती है। जब मूसे को देखती है, तुरन्त झपटकर
खा जाती है, वैसे ही बद्धज्ञानी भी तब तक ही अकर्त्ता,
अभोक्ता बना रहता है, जब तक विषय-रूपी मूस उनको
नहीं दीखता है। जब विषय-रूपी मूस उसके सामने आता
है, तुरंत ही वह कर्त्ता और भोक्ता होकर उसको खा
जाता है।

एक निर्मल संत पञ्जाब देश के किसी ग्राम में एक युवती
स्त्री को 'विचार-सागर' पढ़ाते थे। पढ़ाते-पढ़ाते उस पर उनका
मन चलायमान हो गया। तब उसकी जाँघों पर हाथ फेरने
लगे। उस स्त्री ने कहा कि महाराज अभी तो आपने मुझे

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अठारहवाँ प्रकरण । ३२७

पढ़ाया है कि भोगों को विष के तुल्य जानकर त्याग करना
चाहिए और आप ही अब मेरी जाँघों पर हाथ फेरते हैं,
यह क्या बात है। तब उन महात्मा ने कहा कि हम तुम्हारी
परीक्षा करते हैं। तुमने समग्र 'विचार-सागर' पढ़ लिया,
परंतु तुम्हारा देहाध्यास नहीं छूटा । अब देखिए, महात्माजी
तो स्वयं अपना देहाध्यास दूर नहीं कर सके और विषय-
लोलुप होकर पर-स्त्री की जाँघों पर हाथ फेरने लगे, परंतु
दूसरे का देहाध्यास छुड़ाने को तैयार थे। ऐसे बद्धज्ञानियों
के चित्त में कदापि शान्ति नहीं होती है, और दृष्टान्त को
भी सुनिए—

पूर्व देश में एक पण्डित किसी मन्दिर में 'योगवाशिष्ठ'
की कथा कहते थे । उनकी कथा में माई लोग भी बहुत
आती थीं और गन्धर्व जाति की एक वेश्या भी उनकी कथा
में आती थी और माई लोगों में बैठती थी ।

एक दिन कथा में स्त्री के संग का बहुत निषेध आया
और पर-स्त्री के संग का बहुत ही दोष निकला । उस दिन
कथा कहते-कहते जब पण्डितजी की दृष्टि उस वेश्या के
ऊपर पड़ी, तब पण्डितजी का मन उस वेश्या में आसक्त हो
गया । जब कथा समाप्त हुई, तब सब कोई अपने-अपने घर
को चले गए, तो वह वेश्या भी अपने मकान को चली गई,
और जाकर उसने विचार किया कि आज से फिर मैं इस
व्यभिचार-कर्म को नहीं करूँगी । ऐसा निश्चय करके उसने
अपना फाटक संध्या से ही बंद करा दिया और भीतर
बैठकर भजन करने लगी । इधर तो यह हाल हुआ और

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३२८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

उधर जब पण्डितजी कथा बाँचकर अपने घर गए, तब रात्रि आने का विचार करने लगे, इतने में रात्रि हो गई । जब एक पहर रात्रि व्यतीत हुई, तब पण्डितजी शिर पर कपड़ा डाले हुए उस वेश्या के मकान के नीचे पहुँचे और जाकर किवाड़ को हिलाया । तब नौकर ने वेश्या से कहा कि पण्डितजी आए हैं । वेश्या ने तुरंत किवाड़ खोल दिया। पण्डितजी ऊपर गए, तो वेश्या ने उनको पलँग पर बैठाया और आप नीचे बैठी, तब पण्डितजी ने कहा कि हे प्यारी ! तू मेरे पास बैठ, हम तो आज तुम्हारे साथ आनन्द करने आए हैं । वेश्या ने कहा कि महाराज ! आपने ही तो आज कथा में विषय-भोग की बड़ी निन्दा सुनाई और फिर आप ही ने यह भी कहा था कि जो पुरुष पर-स्त्री के साथ भोग करता है, उसको यमदूत अग्नि से तपे हुए खम्भों के साथ बाँधते हैं और स्त्री को भी अग्नि से तपे हुए खम्भों के साथ लगाते हैं । तब फिर मैं कैसे आपके साथ क्रीड़ा करूँ । तब पण्डितजी ने कहा कि जब कृष्णजी ने अवतार लिया था, तब उन्होंने उन सब खम्भों को उखाड़कर समुद्र में डाल दिया था । अब वे खम्भे नहीं रह गये हैं वे तो पूर्व युगों की वार्त्ताएँ थीं, इस युग की नहीं हैं, तू अपने को अकर्त्ता मानकर, आकर आनन्द ले । ऐसे बद्धज्ञानियों के चित्त कभी भी शान्ति को प्राप्त नहीं होते हैं । धर्मशास्त्र में भी कहा है—

पठकाः पाठकाश्चैव ये चाऽन्ये शास्त्रचिन्तकाः ।
सर्वे ते व्यसिनो मूर्खा यः क्रियावान् स पण्डिता ॥ १ ॥

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अठारहवां प्रकरण । ३२९

जितने शास्त्र के पढ़ने वाले हैं, और जितने शास्त्र के पढ़ाने वाले हैं, और जो केवल शास्त्र का विचार ही करते हैं, वे सब व्यसनी और मूर्ख हैं । जो उनमें वैराग्यादि साधन सम्पत्ति करके युक्त हैं, वे ही पण्डित हैं । दूसरे शास्त्र-दृष्टि से पण्डित नहीं हैं । पूर्वोक्त युक्तियों से यह सिद्ध हुआ कि जो अध्यासी पुरुष हैं, वही बद्धज्ञानी हैं । केवल अकर्त्ता, अभोक्ता कहने से वह अकर्त्ता, अभोक्ता कदापि नहीं हो सकता है ॥ ५१ ॥

मूलम् ।

उच्छृङ्खलाप्याकृतिका स्थितिर्धीरस्य राजते ।
न तु संस्पृहचित्तस्य शान्तिमूढस्य कृत्रिमा ॥ ५२ ॥

पदच्छेदः ।

उच्छृङ्खला, अपि, आकृतिका, स्थितिः, धीरस्य, राजते, न, तु, संस्पृहचित्तस्य, शान्तिः, मूढस्य, कृत्रिमा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
धीरस्य=ज्ञानी कीस्थितिः=स्थिति
उच्छृङ्खला=शान्ति-रहितअपि=भी
आकृतिका=स्वाभाविकराजते=शोभती है
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३३० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

तु=परन्तुकृत्रिमा=बनावटवाली
संस्पृहचित्तस्य=$\Big{ इच्छा-सहित चित्तवालेशान्तिः=शान्ति
मूढ़स्य=अज्ञानी कीन राजते=नहीं शोभती है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो पुरुष निःस्पृह है, उसकी भी स्वाभाविक स्थिति शोभा करके युक्त ही होती है । क्योंकि उसमें कोई बनावट नहीं होती है । और जो मूढ़ इच्छा करके व्याकुल है, उसकी बनावट की शान्ति भी शोभायमान नहीं होती है ॥ ५२ ॥

मूलम् ।

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान् ।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः ॥ ५३ ॥

पदच्छेदः ।

विलसन्ति, महाभोगैः, विशन्ति, गिरिगह्वरान्, निरस्तकल्पनाः, धीराः, अबद्धाः, मुक्तबुद्धयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
निरस्तकल्पना=कल्पना-रहितविलसन्ति=क्रीड़ा करते हैं
अबद्धाः=बन्धन-रहित+ च=और
मुक्तबुद्धयः=मुक्त बुद्धिवाले+कदाचित्=कभी
धीराः=ज्ञानीगिरिगह्वरान्=$\Big{ पहाड़ की कन्दराओं में
\textbf{+ कदाचित् \textbf{+प्रारब्धवशात्=$\Big{ कभी प्रारब्ध- वश सेविशन्ति=प्रवेश करते हैं ॥
महाभोगैः=$\Big{ बड़े-बड़े भोगों के साथ
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अठारहवाँ प्रकरण । ३३१

भावार्थ ।
जिस ज्ञानी धीर के चित्त की सब कल्पनाएँ नष्ट हो
गई हैं, वह प्रारब्ध के वश कभी भोगों विषे क्रीड़ा करता
है, कभी प्रारब्धवश पर्वत और वनों में फिरा करता है, पर
उसका चित्त सदा शान्त रहता है । क्योंकि वह आसक्ति
कर्त्तृत्वाऽध्यास से रहित बुद्धिवाला है ॥ ५३ ॥

मूलम् ।
श्रोत्रियं देवतां तीर्थमंगनां भूपतिं प्रियम् ।
दृष्ट्वा संपूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना ॥ ५४ ॥

पदच्छेदः ।
श्रोत्रियम्, देवताम्, तीर्थम्, अंगनाम्, भूपतिम्, प्रियम्,
दृष्ट्वा, संपूज्य, धीरस्य, न, का, अपि, हृदि, वासना ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
श्रोत्रियम्=पण्डित कोप्रियम्=पुत्रादि को
देवताम्=देवता कोदृष्ट्वा=देख करके
तीर्थम्=तीर्थ कोधीरस्य=ज्ञानी के
संपूज्य=पूजन करकेहृदि=हृदय में
+ च=औरका अपि=कोई भी
अंगनाम्=स्त्री कोवासना=वासना
भूपतिम्=राजा कोन भवति=नहीं होती है ॥

भावार्थ ।
हे शिष्य ! जो श्रोत्रिय ब्रह्मवेत्ता हैं, उन विषे इन्द्र,

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३३२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अग्नि आदिक देवताओं, गंगा आदिक तीर्थों के पूजा करने
से कामना उत्पन्न नहीं होती है । क्योंकि वे निष्काम हैं और
सुन्दर स्त्री-पुत्रादिकों के प्रति और राजा को देख करके भी
उनके चित्त में कोई वासना खड़ी नहीं होती है । क्योंकि वे
सर्वत्र समबुद्धि और समदर्शी हैं ॥ ५४ ॥

मूलम् ।
भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः ।
विहस्य धिक्कृतो योगी न यातिविकृतिं मनाक् ॥ ५५ ॥

पदच्छेदः ।
भृत्यैः, पुत्रैः, कलत्रैः, च, दौहित्रैः, च, अपि, गोत्रजैः,
विहस्य, धिक्कृतः, योगी, न, याति, विकृतिम्, मनाक् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
भृत्यैः=किंकरों करकेधिक्कृतः=धिक्कार किया हुआ
पुत्रैः=पुत्रों करकेयोगी=ज्ञानी
दौहित्रैः=नातियों करकेमनाक्=किंचित् भी
च=औरविकृतिम्=विकार को अर्थात् चित्त के क्षोभ को
गोत्रजैः=बान्धवों करके
अपि=भी
विहस्य=हँस करकेन याति=नहीं प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।
हे शिष्य ! जो ज्ञानी जीवन्मुक्त हैं, उनका चित्त भृत्यों
करके याने नौकरों करके, पुत्रों करके, स्त्रियों करके, कन्याओं
करके और स्वगोत्रियों करके अर्थात् सम्बन्धियों करके भी
तिरस्कार किया हुआ क्षोभ को नहीं प्राप्त होता है । और