अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 326 of 405
Read in contextअठारहवाँ प्रकरण । ३१९
निरोधै- ⎧ चित्त की निरोधता ⎹ झटिति=शीघ्र
काग्र्य= ⎨ और एकाग्रता की ⎹ क्रोडम्=पहाड़ की गुहा में
सिद्धये ⎩ सिद्धि के लिये ⎹ विशन्ति=प्रवेश करते हैं ।।
भावार्थ ।
मूढ़ मुमुक्षु विषय-रूपी व्याघ्रों को देख करके भय को प्राप्त होता और चित्त की वृत्ति को एकाग्र करने के लिये पहाड़ी कन्दरा में प्रवेश कर जाता है, परन्तु उसका कार्य सिद्ध नहीं होता है, उसकी अन्तर्वृत्ति फैलती जाती है और वह हर दिन दुःखी होता जाता है, शान्ति उसको लेश-मात्र भी नहीं होती है और जो ज्ञानी जीवन्मुक्त है, वह विषय-रूपी व्याघ्र को इन्द्रजाल-जन्य पदार्थों की तरह देखकर उनसे भय नहीं खाता है ॥ ४५ ॥
मूलम् ।
निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः ।
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ ४६ ॥
पदच्छेदः ।
निर्वासनम्, हरिम्, दृष्ट्वा, तूष्णीम्, विषयदन्तिनः, पलायन्ते, न, शक्ताः, ते, सेवन्ते, कृतचाटवः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| निर्वासनम्=वासना-रहित | न शक्ताः=असमर्थ |
| पुरुषम्=पुरुष-रूपी | विषयदन्तिनः=विषय-रूपी हाथी |
| हरिम्=सिंह को | तूष्णीम्=चुपचाप हुए |
| दृष्ट्वा=देखकर | पलायन्ते=भागते हैं |