अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
About this granth
The Ashtavakra Gita (अष्टावक्र-गीता) is a classic of Advaita Vedanta in the form of a dialogue between the sage Ashtavakra and King Janaka. Janaka asks how knowledge, liberation and detachment are gained, and Ashtavakra replies that the Self is already liberated, the witness and pure awareness; bondage is only the belief 'I am the body, I am the doer'. Rather than a graded path of practice, the text points straight to self-recognition, and in several chapters Janaka describes his own realisation.
Its twenty chapters move through instruction in self-knowledge, Janaka's wonder at the Self, the glory of knowledge, dissolution, peace, the marks of bondage and freedom, dispassion, the bliss of aloneness, the nature of the sage and liberation in life.
According to the scanned pages, this edition gives the verses with a Hindi commentary by Rai Bahadur Babu Jalim Singh, who recalls in his preface how, as an inspector of post offices in Gonda and Bahraich, he turned to Tulsidas's Ramayana and Vedanta. This is the fifth edition, printed in 1971 by the Tejkumar Press, Lucknow, successor to the Naval Kishore Press, and has 405 pages.
१७६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
और शान्तचित्त और स्थिर अन्तःकरणवाला होता है, और
श्रम से रहित होकर भी कर्मों से जन्य अर्थों का भोगनेवाला
नहीं होता है ॥ ५ ॥
मूलम् ।
नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी ।
कैवल्यमिव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
न, अहम्, देहः, न, मे, देहः, बोधः, अहम्, इति,
निश्चयी, कैवल्यम्, इव, संप्राप्तः, न, स्मरति, अकृतम्,
कृतम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहम् = | मैं | कैवल्यम् = | विदेह मुक्ति को |
| देहः = | शरीर | संप्राप्तः = | प्राप्त होता हुआ |
| न = | नहीं हूँ | निश्चयी = | निश्चय करनेवाला पुरुष |
| देहः = | देह | ||
| मे = | मेरा | अकृतं कृतम् = | अकृत और कृत कर्म को |
| न = | नहीं है | ||
| बोधोऽहम् = | ज्ञानस्वरूप हूँ | न स्मरति = | नहीं स्मरण करता है ॥ |
| इति = | इस प्रकार |
भावार्थ ।
पूर्वोक्त साधनों करके युक्त जो ज्ञानी हैं, उनकी दशा
को दिखाते हैं—
ग्यारहवाँ प्रकरण । १७७
ज्ञानवान् का ऐसा निश्चय होता है “नाहं देहः” मैं
देह नहीं हूँ और “न मे देहः” मेरा यह देह नहीं है और मैं
नित्य बोध-स्वरूप हूँ । आत्म-ज्ञान करके देहादिकों में दूर
हो गया है अहं और मम अभिमान जिसका, कर्तव्य और
अकर्तव्य जिसका बाकी नहीं रहा है, और कृत तथा अकृत
का स्मरण भी जिसको नहीं है वही ज्ञानवान् जीवन्मुक्त
कहा जाता है । इसमें एक दृष्टान्त को कहते हैं—
एक मंदिर में एक महात्मा रहते थे । आत्म-विद्या का
अभ्यास करते करते उनकी अवस्था चढ़ गई थी, और शरीर
की सब क्रियाएँ उनकी छूट गई थीं । अतः जब कोई उनके
मुख में भोजन डाल देता, तब खाते, जब कोई पानी पिलाता,
तब पानी पीते थे और एक स्थान में बैठे रहते थे, किसी
से बोलते, चालते न थे और अपने आत्मानंद में ही मग्न
रहते थे । एक दिन दोपहर के समय उसी मंदिर में लड़के
खेलते थे । एक लड़के ने कहा कि इन महात्मा के पट पर
याने स्थल पर चौपट बनाकर खेलें, दूसरा लड़का चाकू ले
आया और जब चाकू से पट पर लकीरें खींचने लगा, तब
उसमें से रुधिर बहने लगा । महात्मा ज्यों के त्यों पड़े रहे
और लड़के डर के मारे भाग गये । कोई एक पुरुष मंदिर
में आया और उसने महात्मा के पट में रुधिर बहते देखा,
तब उसने इधर-उधर से पूछा, तो उसको मालूम हुआ कि
यह लड़कों ने किया है । तब दो चार आदमी मिलकर
जर्राहि को बुला लाये । जब जर्राहि आकर जखम को हाथ
लगाकर सीने लगा, तब महात्मा ने न सीने दिया । जब
१७८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
थोड़े दिनों के बाद जखम में कीड़े पड़ गये, तब भी महात्मा का चेहरा मैला न हुआ । उसी नगर में थोड़ी दूर पर मंदिर में एक और महात्मा रहते थे । उन्होंने जब उनका हाल सुना, तब एक आदमी की जबानी उन महात्मा को कहला भेजा कि भाई ! जिस मकान में आदमो रहता है, उस मकान में उसको झाड़ू-बुहारू देना आवश्यक होता है । जब ऐसा संदेश उनको पहुँचा, तब उन्होंने जवाब दिया कि महात्माजी से कहना कि जब आप तीर्थों में गये थे और राह में बीसों धर्मशालाओं में रात्रि-भर रहते गये थे, वे धर्मशाले अब गिर पड़े हैं, अब जाकर उनकी मरम्मत करिए। हमको तो शरीर-रूपी धर्मशाला में आयु-रूपी रात्रि भर रहना है। वह रात्रि भी व्यतीत हो गई है । अब इस शरीर-रूपी धर्मशाला की कौन मरम्मत करे । इतना कहकर फिर चुप हो गये । थोड़े दिनों के बाद उन्होंने शरीर का त्याग कर दिया, ऐसी दशा जीवन्मुक्तों की होती है ॥ ६ ॥
मूलम् ।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमहमेवेति निश्चयी ।
निर्विकल्प शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः ॥ ७ ॥
पदच्छेदः ।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तम्, अहम्, एव, इति, निश्चयी, निर्विकल्पः, शुचिः, शान्तः, प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः ॥
ग्यारहवाँ प्रकरण । १७९
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| $आब्रह्मस्तम्ब-\atopपर्यन्तम्=ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यंत | च = और | ||
| शान्तः = शान्त-रूप | |||
| अहम् एव = मै ही हूँ | च = और | ||
| इति = इस प्रकार | $प्राप्ताप्राप्त-\atopविनिवृत्तः=लाभालाभ-रहित पुरुष | ||
| निश्चयी = निश्चय करनेवाला | |||
| निर्विकल्पः = संकल्प-रहित | +सुखीभवति = सुखी होता है ॥ | ||
| शुचि = शुद्ध |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्तों के और लक्षणों को दिखलाते हैं—
ब्रह्मा से लेकर स्तंभर्यंत संपूर्ण जगत् मेरा ही रूप है, अर्थात् मैं ही सर्व-रूप हूँ, ऐसा निश्चय करनेवाला जो पुरुष है, वही निर्विकल्प समाधिवाला जीवन्मुक्त है, वही विषय-रूपी मल के सम्बन्ध से भी रहित है, वही शान्त चित्तवाला है, और वही प्राप्ताप्राप्त विषयों में इच्छा से रहित है, वही परम संतोषवाला है, वही अपने आत्मानंद करके ही पूर्ण है ॥ ७ ॥
मूलम् ।
नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी ।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
नानाश्चर्यम्, इदम्, विश्वम्, न, किञ्चित्, इति, निश्चयी निर्वासनः, स्फूर्तिमात्रः, न, किञ्चित्, इव, शाम्यति ॥
१८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| इदम्= | यह | निश्चयी= | निश्चय करनेवाला |
| विश्वम्= | संसार | निर्वासनः= | वासना-रहित |
| नानाश्चर्य्यम्= | अनेक आश्चर्य्यवाला | स्फूर्तिमात्रः= | बोध-स्वरूप पुरुष |
| न किञ्चित्= | कुछ नहीं है अर्थात् मिथ्या है | न किञ्चिदिव= | व्यवहार-रहित |
| इति= | इस प्रकार | शाम्यति= | शान्ति को प्राप्त होता है |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**हे प्रभो ! ब्रह्मज्ञानी के मन के संकल्प कैसे स्वतः नष्ट हो जाते हैं ?
**उत्तर—**जब अधिष्ठान चेतन के साक्षात्कार होने से अध्यस्त वस्तु का बाध हो जाता है अर्थात् आत्मा के साक्षात्कार होने से जब नाना प्रकार के आश्चर्य-रूप विश्व का बाध हो जाता है, तब विद्वान् के मन के सर्व संकल्प दूर हो जाते हैं ।
**प्रश्न—**हे प्रभो ! यदि आत्मा के साक्षात्कार होने से जगत् का बाध अर्थात् नाश हो जाता है, तो फिर पञ्चभूतात्मक जगत् भी न रहता, और जगत् के नाश होने पर विद्वान् के देहादिक भी न रहते, पर ऐसा तो नहीं देखते हैं, इसी से जाना जाता है कि आत्मा के साक्षात्कार होने पर भी जगत् ज्यों का त्यों बना रहता है ?
**उत्तर—**नाश दो प्रकार का है । एक तो बाध-रूप नाश है, दूसरा निवृत्तिरूप नाश है ।
ग्यारहवां प्रकरण । १८१
उपादानेन सह कार्यविनाशो बाधः ॥ १ ॥
उपादानकारण के सहित जो कार्य का नाश है, उसका नाम बाध है ॥ १ ॥
विद्यमाने उपादाने कार्यविनाशो निवृत्तिः ॥ २ ॥
उपादान के विद्यमान होते हुए जो कार्य का नाश है, उसका नाम निवृत्ति है ॥ २ ॥
विद्वान् की दृष्टि से अज्ञान-रूपी कारण के सहित कार्य-रूपी जगत् का नाश हो जाता है । जगत् का नाश-रुप बाध हो जाता है; परन्तु बाधिता अनुवृत्ति करके बना रहता है, और स्वप्न-प्रपञ्च की निवृत्ति-रुप बाध जाग्रत् में हो जाता है, क्योंकि उसका उपादानकारण जो अविद्या है, वह बनी रहती है । कारण-रूपी अविद्या के विद्यमान होने पर स्वप्नरूपी कार्य का नाश हो जाता है, इसी से वह निवृत्ति-रूप बाध है ।
अज्ञान के अनेक अंश हैं । जिस विद्वान् के अंतःकरण-रूपी अंश का, जो अज्ञान का कार्य है, नाश हो जाता है, उसी को अपने आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है, और बाकी के जीवों को नहीं होता है उनका जगत् भी बना रहता है । जैसे दश पुरुष सोये हुए अपने-अपने स्वप्नों को देखते हैं । उनमें से जिसकी निद्रा दूर हो गई है, उसी का स्वप्न प्रपंच नष्ट हो जाता है, बाकी के पुरुषों का बना रहता है । जिस पुरुष को ऐसा निश्चय हो गया है कि जगत्
१८२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अपनी सत्ता से शून्य हैं, ब्रह्म की सत्ता करके सत्यवत् भान
होता है, वास्तव में मिथ्या है वही पुरुष शान्ति को प्राप्त
हो जाता है ॥ ८ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां एकादश प्रकरणं समाप्तम् ॥
—:०:—
बारहवाँ प्रकरण (स्वरूप-स्थिति)
बारहवाँ प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः ।
अथ चिन्तासहस्तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
कायकृत्यासहः, पूर्वम्, ततः, वाग्विस्तरासहः, अथ, चिन्तासहः, तस्मात्, एवम्, आस्थितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| पूर्वम् = | पहले | अथ = | उसके पीछे |
| कायकृत्यासहः = | शारीरिक कर्म का न सहारने- वाला हुआ अर्थात् कायिक कर्म का त्यागनेवाला हुआ | चिन्तासहः = | चिन्ता के व्या- पार को न सहारनेवाला हुआ अर्थात् मानसिक कर्म का त्याग करने- वाला हुआ |
| ततः = | उसके पीछे | तस्मात् एवम् = | इसी कारण |
| वाग्विस्तरासहः = | वाणी के जप्य- रूप कर्म का न सहारनेवाला हुआ अर्थात् वाचिक कर्म का त्यागनेवाला हुआ | अहम् एव = | मैं ही |
| आस्थितः = | स्थित हूँ |
१८४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
अब द्वादशाष्टक प्रकरण का आरम्भ करते हैं—
पूर्व जो गुरु ने शिष्य के प्रति ज्ञानाष्टक कहा है, उसी को अब शिष्य अपने में दिखाता है । शिष्य कहता है कि हे गुरो ! प्रथम जो शरीर के कर्म यज्ञादि हैं, उनका मैं असहन करनेवाला हुआ अर्थात् शारीरिक कर्म मेरे से सहारे नहीं गये हैं, फिर वाणी के कर्म जो निन्दा स्तुति आदिक हैं, उनका मैंने असहन किया । फिर मन के कर्म जो जपादिक हैं, उनका मैंने असहन किया अर्थात् कायिक, वाचिक और मानसिक संपूर्ण कर्मों को त्याग करके मैं स्थित हो गया ॥ १ ॥
मूलम् ।
प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः ।
विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
प्रीत्यभावेन, शब्दादेः, अदृश्यत्वेन, च, आत्मनः, विक्षे-
पैकाग्रहृदयः, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| शब्दादेः= | शब्द आदि की | विक्षेपेकाग्रहृदयः= | विक्षेपों से एकाग्र हुआ है मन जिसका |
| प्रीत्यभावेन= | प्रीति के अभाव से | ||
| च= | और | एवम् एव= | ऐसा |
| आत्मनः= | आत्मा के | अहम्= | मैं |
| अदृश्यत्वेन= | अदृश्यता से | आस्थितः= | सब तरफ से स्थित हूँ ॥ |
बारहवाँ प्रकरण । १८५
भावार्थ ।
अब तीन प्रकार के कर्मों के त्याग के हेतु को कहते
हैं—कायिक, वाचिक और मानसिक ये तीनों कर्म मन की
एकाग्रता विषे विक्षेप के करनेवाले हैं। लोकान्तर की प्राप्ति
करनेवाले जो यज्ञादिक कर्म हैं; उनसे शरीर में विक्षेप
होता है। शरीर में विक्षेप के होने से मन का निरोध नहीं
हो सकता है। वाणी के कर्म जो निन्दा, स्तुति आदिक हैं,
उनसे भी मन का निरोध नहीं हो सकता है, और मन के
जो जपादिक कर्म हैं, वे भी मन के विक्षेप करनेवाले हैं।
तीनों कर्मों में जो प्रीति है, उसका त्याग करना आवश्यक
है। आत्मा अदृश्य है अर्थात् ध्यानादिकों का अविषय है।
आत्मा चेतन है, मन, बुद्धि आदिक सब अचेतन हैं याने जड़
हैं। जड़ चेतन को विषय नहीं कर सकता है, इस वास्ते
आत्मा के ध्यान करने की चिन्तारूपी विक्षेप भी मेरे को
नहीं है और मैं संपूर्ण विक्षेपों से रहित होकर अपने स्वरूप
में ही स्थित हूँ ॥ २ ॥
मूलम् ।
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये ।
एवं विलोक्य नियममेवमेवाहमास्थितः ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
समाध्यासादिविक्षिप्तौ, व्यवहारः, समाधये, एवम्,
विलोक्य, नियमम्, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
१८६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः। | शब्दार्थ । | अन्वयः। | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सामाध्यासा-दिविक्षिप्तौ = | सम्यक् अध्यास आदि करके विक्षेप होने पर | एवम् नियमम् = | ऐसे नियमको |
| विलोक्य = | देख करके | ||
| समाधये = | समाधि के लिये | एवम् एव = | समाधि-रहित |
| व्यवहारः = | व्यवहार है | अहम् = | मैं |
| आस्थितः = | स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ ।
प्रश्न— किसी प्रकार के विक्षप के न होने पर भी समाधि के लिये तो कुछ मन आदिकों को व्यापार करना ही पड़ेगा ?
उत्तर— कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनर्थों का हेतु जो अध्यास है, उसी करके विक्षेप होता है । उस विक्षेप के दूर करने के लिये समाधि के वास्ते मन आदिकों का व्यापार होता है, अन्यथा नहीं होता है । ऐसे नियम को देख करके प्रथम मैंने अध्यास को दूर कर दिया है, इस वास्ते समाधि के लिये भी मन आदिकों के व्यापार की कोई आवश्यकता नहीं है, किंतु समाधि से रहित अपने आत्मानंद में मैं स्थित हूँ ॥ ३ ॥
मूलम् ।
हेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषादयोः ।
अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
हेयोपादेयविरहात्, एवम्, हर्षविषादयोः, अभावात्, अद्य, हे ब्रह्मन्, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
बारहवाँ प्रकरण । १८७
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| हे ब्रह्मन्= | हे प्रभो ! | अभावात्= | अभाव से |
| हेयोपादेयविरहात्= | त्याज्य और ग्राह्य वस्तु के वियोग से | अद्य= | अब |
| अहम्= | मैं | ||
| एवम्= | वैसे ही | एवम् एव= | जैसा हूँ वैसा ही |
| हर्षविषादयोः= | हर्ष और विषाद के | आस्थितः= | स्थित हूँ |
भावार्थ ।
जनकजी फिर अपने अनुभव को कहते हैं कि हे प्रभो ! त्यागने-योग्य और ग्रहण करन योग्य वस्तु का अभाव होने से अर्थात् आत्म-ज्ञान की प्राप्ति होने से न तो मेरे को कुछ त्याग करने-योग्य रहा है, और न कुछ ग्रहण करने के योग्य रहा है, इसी वास्ते हर्ष विषादादिक भी मेरे को नहीं हैं, क्योंकि हर्ष विषादादिक भी ग्रहण और त्याग करने से ही होते हैं, इस वास्ते अब मैं अपने स्वरूप में ही स्थित हुआ हूँ ॥ ४ ॥
मूलम् ।
आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम् ।
विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
आश्रमानाश्रमम्, ध्यानम्, चित्तस्वीकृतवर्जनम्, विकल्पम्, मम, वीक्ष्य, एतैः, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
१८८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| + यत्= | जो | एतैः= | उन सबसे |
| आश्रमाना-श्रमम्= | आश्रम और अनाश्रम है | उत्पन्नः= | उत्पन्न हुए |
| मम= | अपने | ||
| ध्यानम्= | ध्यान है | विकल्पम्= | विकल्प को |
| च= | और | वीक्ष्य= | देख करके |
| अहम्= | मैं | ||
| चित्तस्वीकृत-वर्जनम्= | चित्त से स्वीकार की हुई वस्तु का त्याग है | एवम्= | इन तीनों से रहित |
| आस्थितः= | स्थित हुआ हूँ |
भावार्थ ।
शिष्य कहता है कि हे गुरो ! आश्रमों के धर्मों से और उनके फलों के सम्बन्ध से भी मैं रहित हूँ । अनाश्रमी जो त्यागी संन्यासी है, उनके धर्म जो दण्डादिकों का धारण करना है, उनके सम्बन्ध से भी मैं रहित हूँ और योगियों के धर्म जो धारणा ध्यानादिक हैं, उनसे भी मैं रहित हूँ, क्योंकि ये सब अज्ञानियों के लिये बने हैं, मैं इन सबका साक्षी चिद्रूप हूँ ।
यः शरीरेन्द्रियादिभ्यो विभिन्नं सर्वसाक्षिणम् ।
पारमार्थिकविज्ञानं सुखात्मानं च स्वप्रभम् ॥ १ ॥
परं तत्त्वं विजानाति सोऽतिवर्णाश्रमी भवेत् ॥ २ ॥
जो पुरुष शरीर इन्द्रियादिकों से भिन्न और शरीरादिकों के साक्षी विज्ञान-स्वरूप, सुख-स्वरूप, स्वयंप्रकाश परम तत्त्व अपने आत्मा को जान लेता है, वह अतिवर्णाश्रमी कहलाता है। सो मैं वर्णाश्रमों से अतीत सबका साक्षी चिद्रूप हूँ ॥ ५ ॥
बारहवाँ प्रकरण । १८९
मूलम् ।
कर्माऽनुष्ठानमज्ञानाद्यथैवोपरमस्तथा ।
बुद्ध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
कर्माऽनुष्ठानम्, अज्ञानात्, यथा, एव उपरमः, तथा,
बुद्ध्वा, सम्यक्, इदम्, तत्त्वम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यथा | =जैसे | सम्यक् | =भली प्रकार |
| कर्मानुष्ठानम् | =कर्म का अनुष्ठान | बुद्ध्वा | =जान करके |
| अज्ञानात् | =अज्ञान से है | अहम् | =मैं |
| तथा | =वैसा ही | एवम् एव | =कर्म करने और कर्म न करने की इच्छा को त्याग करके |
| उपरमः | =कर्म का त्याग | ||
| एव | =भी है | ||
| इदम् | =इस तत्त्व को | आस्थितः | =स्थित हूँ |
भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि कर्मों का अनुष्ठान अज्ञानता से होता है, अर्थात् जिसको आत्मा के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं है, वही कर्मों का अनुष्ठान स्वर्गादि फल की प्राप्ति के लिये करता है, और आत्मा के ज्ञान से ही पुरुष कर्म करने से उपराम को भी प्राप्त हो जाता है । जिसका आत्मा का साक्षात्कार हो गया है, वह न कर्म करता है, और न उनसे उपराम होता है, प्रारब्ध-वश से शरीरादिक कर्मों को
१९० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
करता है वा नहीं करता है, ऐसा जानकर ज्ञानी अपने नित्यानन्द-स्वरूप में स्थित रहता है ॥ ६ ॥
मूलम् ।
अचिन्त्यं चिन्त्यमानोऽपिचिन्तारूपं भजत्यसौ ।
त्यक्त्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ ७ ॥
पदच्छेदः ।
अचिन्त्यम्, चिन्त्यमानः, अपि, चिन्तारूपम्, भजति, असौ, त्यक्त्वा, तद्भावनम्, तस्मात्, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अचिन्त्यम् | =ब्रह्म को | तस्मात् | =इस कारण |
| चिन्त्यमानः | =चितवन करता हुआ | तद्भावनम् | =उस चिन्ता की भावना को |
| अपि | =भी | त्यक्त्वा | =त्याग करके |
| असौ | =यह पुरुष | अहम् | =मैं |
| चिन्तारूपम् | =चिन्ता को | एवम् एव | =भावना-रहित |
| भजति | =भावना करता है | आस्थितः | =स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ ।
ब्रह्म अचिन्त्य है अर्थात् मन और वाणी करके चिन्तन नहीं किया जा सकता है, पर जो आत्मवर्ग अचिन्त्यरूप का चिंतवन करता है, उस चिन्तवन की चिन्ता को भी त्याग करके मैं भावना-रूपी चिन्तवन से रहित अपने आत्मा में ही स्थित हूँ ॥ ७ ॥
बारहवाँ प्रकरण । १९१
मूलम् ।
एवमेव कृतं येन सकृतार्थो भवेदसौ ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
एवम्, एव, कृतम्, येन, सः, कृतार्थः, भवेत्, असौ,
एवम्, एव, स्वभावः, यः, सः, कृतार्थः, भवेत्, असौ ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| येन | = जिस पुरुष करके | यः | = जो |
| एवम् एव | = क्रिया-रहित | एवम् एव | = ऐसा ही अर्थात् स्वतः ही |
| स्वरूपम् | = स्वरूप | स्वभावः | = स्वभाववाला है |
| साधनवशात् | = साधनों के वश से | सः असौ | = सो वह |
| कृतम् | = किया गया है | कृतार्थः | = कृतकृत्य |
| सः असौ | = वह पुरुष भी | भवेत् | = होता है |
| कृतार्थः | = कृतकृत्य | किंवक्तव्यम् | = इसमें कहना ही क्या है |
| भवेत् | = होता है |
भावार्थ ।
जिस पुरुष ने इस प्रकार संपूर्ण क्रियाओं से रहित अपने स्वरूप को जान लिया है, वही कृतार्थ अर्थात् जीवन्मुक्त होता है ।
प्रश्न—जीवन्मुक्त का लक्षण क्या है ?
उत्तर—ब्रह्मैवाहमस्मीत्यपरोक्षज्ञानेन निखिलकर्मबन्धवि-
निर्मुक्तो जीवन्मुक्तः ।
१९२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार के अपरोक्ष-ज्ञान करके जो संपूर्ण कर्मों के बंधनों से छूट गया है, वही जीवन्मुक्त है।
देहपातानन्तरं मुक्तिः विदेहमुक्तिः।
शरीर के पात होने के अनन्तर जो मुक्ति है, उसका नाम विदेह-मुक्ति है। तात्पर्य यह है कि साधनों करके क्रम से जिसने संपूर्ण शरीर और इन्द्रियादिकों की क्रिया का त्याग किया है और आत्मानंद का अनुभव किया है, वही जीवन्मुक्त है ॥ ८ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां द्वादशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १२ ॥
—:०:—
तेरहवाँ प्रकरण (कैवल्य-सुख)
तेरहवाँ प्रकरण
—:०:—
मूलम् ।
अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम् ।
त्यागादानेविहायास्मादहमासेयथासुखम् ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
अकिञ्चनभवम्, स्वास्थ्यम्, कौपीनत्वे, अपि, दुर्लभम्,
त्यागादाने, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अकिञ्चनभवम्= नहीं है कुछ, ऐसे विचार से पैदा हुई | अस्मात्=इस कारण से |
| स्वास्थ्यम्= जो चित्त की स्थिरता, सो | त्यागादाने= त्याग और ग्रहण को |
| कौपीनत्वे= कौपीन के धारण करने पर | विहाय=छोड़ करके |
| अपि=भी | अहम्=मैं |
| दुर्लभम्=दुर्लभ है | यथासुखम्=सुख-पूर्वक |
| आसे=स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ ।
इस त्रयोदश प्रकरण में जीवन्मुक्त के फल का निरूपण करते हैं—
१९४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
संपूर्ण विषयों में जा आसक्ति है, उस आसक्ति के त्याग
करने से जो चित्त की स्थिरता हुई है, वह स्थिरता कौपीन-
मात्र में आसक्ति करने मे नहीं होती है, ऐसी स्थिरता अति
दुर्लभ है । इसी कारण मे शिष्य कहता है कि पदार्थों के
त्याग करने में और ग्रहण करने में जो आसक्ति है, उसको
भी त्याग करके आत्मानंद में स्थित हूँ ॥ १ ॥
मूलम् ।
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते ।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम् ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
कुत्र, अपि, खेदः, कायस्य, जिह्वा, कुत्र, अपि, खिद्यते,
मनः, कुत्र, अपि, तत्, त्यक्त्वा, पुरुषार्थे, स्थितः, सुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कुत्र अपि = | कहीं तो | मनः = | मन |
| कायस्य = | शरीर का | खिद्यते = | खेद करता है |
| खेदः = | दुःख है | अतः = | इससे |
| कुत्र अपि = | कहीं | तत् = | तीनों को |
| जिह्वा = | वाणी | त्यक्त्वा = | त्याग करके |
| खिद्यते = | दुःखी है | सुखम् = | सुख-पूर्वक |
| कुत्र अपि = | कहीं | स्थितः = | स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ ।
शारीरिक कर्मों में शरीर को खेद होता है, अर्थात्
शरीर के जो कर्म चलना-फिरना, सोना-जागना, लेना-देना,
तेरहवाँ प्रकरण । १९५
ग्रहण-त्यागादिक हैं, उनके करने में शरीर को ही खेद होता
है, और वाणी के कर्म जो सत्य मिथ्या भाषणादिक हैं, उनके
करने में जिह्वा को खेद होता है, और मन के कर्म जो
संकल्प-विकल्पनादिक का ध्यान-धारणादिक हैं उनके करने
में मन को खेद होता है, इसलिये शिष्य कहता है कि उन
तीनों के कर्मों का त्याग करके मैं अपने आत्मानन्द में स्थित
हूँ ॥ २ ॥
मूलम् ।
कृतं किमपि नैव स्यादिति संचिन्त्य तत्त्वतः ।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वाऽऽसे यथासुखम् ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
कृतम्, किम्, अपि, न, एव, स्यात्, इति, संचिन्त्य, तत्त्वतः,
यदा, यत्, कर्तुम्, आयाति, तत्, कृत्वा, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कृतम् = | $\Big{$ शरीर आदि करके किया हुआ कर्म | संचिन्त्य = | विचार करके |
| किमपि = | कुछ भी | यदा = | जब |
| एव = | वास्तव में | यत् = | जो कुछ कर्म |
| न आत्मकृतम् = | $\Big{$ आत्मा करके नहीं किया हुआ | कर्तुम् = | करने को |
| स्यात् = | होय है | आयाति = | आ पड़ता है |
| इति = | ऐसा | तत् = | उसको |
| तत्त्वतः = | यथार्थ | कृत्वा = | करके |
| यथासुखम् = | सुख-पूर्वक | ||
| आसे = | मैं स्थित हूँ ॥ |