अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context१८६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः। | शब्दार्थ । | अन्वयः। | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सामाध्यासा-दिविक्षिप्तौ = | सम्यक् अध्यास आदि करके विक्षेप होने पर | एवम् नियमम् = | ऐसे नियमको |
| विलोक्य = | देख करके | ||
| समाधये = | समाधि के लिये | एवम् एव = | समाधि-रहित |
| व्यवहारः = | व्यवहार है | अहम् = | मैं |
| आस्थितः = | स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ ।
प्रश्न— किसी प्रकार के विक्षप के न होने पर भी समाधि के लिये तो कुछ मन आदिकों को व्यापार करना ही पड़ेगा ?
उत्तर— कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनर्थों का हेतु जो अध्यास है, उसी करके विक्षेप होता है । उस विक्षेप के दूर करने के लिये समाधि के वास्ते मन आदिकों का व्यापार होता है, अन्यथा नहीं होता है । ऐसे नियम को देख करके प्रथम मैंने अध्यास को दूर कर दिया है, इस वास्ते समाधि के लिये भी मन आदिकों के व्यापार की कोई आवश्यकता नहीं है, किंतु समाधि से रहित अपने आत्मानंद में मैं स्थित हूँ ॥ ३ ॥
मूलम् ।
हेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषादयोः ।
अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
हेयोपादेयविरहात्, एवम्, हर्षविषादयोः, अभावात्, अद्य, हे ब्रह्मन्, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥