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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages
Page 146Permalink

नवाँ प्रकरण । १३९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
नाना मतम् =नाना प्रकार के मत हैंदृष्ट्वा =देख करके
महर्षीणाम् =महर्षियों केनिर्व्वेदम् =वैराग्य को
तथा =औरआपन्नः =प्राप्त हुआ
योगिनाम् =योगियों केकः मानवः =कौन पुरुष
इति =ऐसान शाम्यति =नहीं शान्ति को प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! ‘तर्क-शास्त्र’ को, और कर्मकाण्ड में निष्ठा को, त्याग करके केवल आत्म-ज्ञान में ही निष्ठा करना चाहिए । क्योंकि तर्क-शास्त्रादिक सब बुद्धि के भ्रम करने-वाले हैं ।

गौतम आदिकों के जो मत हैं, वे वेद और युक्ति-प्रमाण से विरुद्ध हैं, केवल भ्रम-जाल में डालनेवाले हैं । गौतम आदिकों के मत पर चलनेवाले नैयायिक ईश्वर-आत्मा और जीव-आत्मा, दोनों को जड़ मानते हैं । और ज्ञान, इच्छा आदिकों को आत्मा का गुण मानते हैं । फिर ईश्वरात्मा के गुणों को नित्य मानते हैं । जीवात्मा के गुणों को अनित्य मानते हैं । और सारे जीवात्मा को व्यापक मानते हैं। आत्मा के संयोग को ज्ञान के प्रति कारण मानते हैं। परमाणुओं से जगत् की उत्पत्ति मानते हैं । फिर परमाणुओं को निरवयव मानते हैं ।

प्रथम तो जीवात्मा और ईश्वरात्मा जड़ नहीं हो सकते हैं, क्योंकि—

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म

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१४० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

आत्मा सत्य-रूप, ज्ञान-स्वरूप और आनन्द-रूप है। इस श्रुति के साथ विरोध आता है। दूसरा, दोनों ईश्वर आत्मा के जड़ मानने से जगदांध प्रसंग होगा।
यदि यह मान लिया जाय कि कर्म जड़ है, आत्मा जड़ है, ईश्वरात्मा भी जड़ है, तो फिर भोक्ता, कर्ता और फल-प्रदाता कोई भी नहीं होगा। क्योंकि जड़ में भोक्तापना, कर्तापना आदिक शक्ति बनती नहीं, और जड़ के गुण ज्ञान और चेतनता बन नहीं सकते हैं, क्योंकि गुण-गुणी का भेद नहीं होता। जैसे अग्नि और उष्णता; जल और शीतलता का भेद नहीं है। यदि अग्नि से उष्णता और प्रकाश निकाल लिया जाय, तो अग्नि कोई वस्तु बाकी नहीं रहती है, और दोनों जड़ भी है। जैसे अग्नि के स्वरूप उष्ण और प्रकाश हैं वैसे ज्ञान और चेतनता भी दोनों आत्मा के स्वरूप ही हैं, आत्मा के धर्म नहीं हैं। क्योंकि गुण-गुणी भाव आत्मा में कहीं भी नहीं लिखा है। और चेतनता जड़ का धर्म है, इसमें कोई भी दृष्टान्त नहीं मिलता है, इसलिये नैयायिक का कथन असंगत है।
यदि ईश्वर के इच्छादिक गुणों को नित्य माना जाय, तो ईश्वर की इच्छानुसार जगत् की उत्पत्ति अथवा प्रलय सर्वदा हुआ करेगी याने दोनों में से एक ही होगा, दोनों नहीं होवेंगे।
यदि यह माना जाय कि दोनों कभी प्रलय, कभी सृष्टि, तब ईश्वर की इच्छा अनित्य हो जावेगी।
सारे जीवात्मा व्यापक भी नहीं हो सकते हैं, यदि ऐसा

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नवाँ प्रकरण । १४१

मानें, तो एक के शरीर में जगत् भर के जीवात्मा बैठे हैं,
और सब जीवात्माओं के साथ उसके मन के संयोग बने
रहने से उसको सर्वज्ञता होनी चाहिए, इस कारण सबको
सर्वज्ञता होनी चाहिए, सो तो होती नहीं है, इसी से सिद्ध
होता है कि जीवात्माओं को व्यापक मानना युक्ति-प्रमाण
से विरुद्ध है, और परमाणुओं से जड़ जगत् की उत्पत्ति भी
नहीं बनती है, क्योंकि निरवयव परमाणुओं का परस्पर
संयोग बनता नहीं, सावयव पदार्थों का ही परस्पर संयोग
बनता है, युक्ति-प्रमाणों से विरुद्ध होने के कारण नैयायिक
का मत विवेकी को त्यागने-योग्य है। इसी तरह कर्म-निष्ठा-
वाले कर्मियों के मत में भी विवेकी को श्रद्धा न करनी
चाहिए, क्योंकि उनके मत में भी नाना प्रकार के झगड़े लगे
हैं। कोई कर्मी होम को ही मुख्य मानते हैं, कोई मन्त्रों के
जपादिकों को ही प्रधान मानते हैं, कोई कृच्छ्र चान्द्रायणा-
दिक व्रतों के करने को ही धर्म मानते हैं, कोई यज्ञों में
पशुओं की हिंसा को ही धर्म मानते हैं, कोई मूर्ति-पूजा को,
कोई तीर्थाटन को धर्म मानते हैं। कर्मजाल इतना बड़ा भारी
है कि यदि एक आदमी प्रत्येक दिन एक एक कर्म को करे,
तब भी उसके सब उमर भर में सारे कर्म समाप्त नहीं होंगे
और घटीयन्त्र की तरह अधोध्वं अर्थात् नरक, स्वर्ग का
हेतु कर्म-रूपी जाल है। इसी पर कहा है—

कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते ।
तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यत्तपः पारदर्शिनः ॥ १ ॥

अर्थात् कर्मों करके जीव बन्ध को प्राप्त होता है, और

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१४२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

आत्म-विद्या करके वह मोक्ष को प्राप्त होता है, इसलिये विवेकी आत्म-ज्ञानी कर्मों को नहीं करते हैं, किन्तु आत्मा-निष्ठा में ही मग्न रहते हैं ॥ १ ॥

जैमिनि आचार्य का मत भी श्रुति-युक्ति से विरुद्ध है, क्योंकि जैमिनि आत्मा को जड़, चेतन उभय-रूप मानते हैं, और स्वर्ग की प्राप्ति को ही मोक्ष मानते हैं ।

एक ही पदार्थ जड़, चेतन उभय-रूप नहीं हो सकता है । क्योंकि इसमें कोई भी दृष्टान्त नहीं मिलता है । फिर चेतन निरवयव है, और जड़ सावयव और अनित्य है । शीत, उष्ण जैसे परस्पर विरोधी हैं, वैसे ही उभय-रूप जड़, चेतन भी विरोधी हैं । और वेद में भी कहीं आत्मा को उभय-रूपता नहीं लिखी है, और न स्वर्ग की प्राप्ति का नाम भी मोक्ष है ।

तद्यथेह कर्मचितो लोकःक्षीयत एवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते ।

श्रुति कहती है कि जैसे इस लोक में कर्मों करके प्राप्त की हुई खेती काल पा करके नष्ट हो जाती है, वैसे ही पुण्यकर्मों करके प्राप्त हुआ स्वर्ग भी नष्ट हो जाता है । इन श्रुतिवाक्यों से स्वर्ग की अनित्यता सिद्ध होती है । और जब स्वर्ग ही अनित्य है, तो मुक्ति भी अनित्य अवश्य होगी । इस वास्ते जैमिनि का मत आत्म-ज्ञान निष्ठावाले को त्यागना चाहिए ॥ ५ ॥

मूलम् ।

कृत्वा मूर्त्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः ।
निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः ॥ ६ ॥

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नवाँ प्रकरण । १४३

पदच्छेदः ।

कृत्वा, मूर्तिपरिज्ञानम्, चैतन्यस्य, न, किम्, गुरुः, निर्वेदसमता युक्त्या, यः, तारयति, संसृतेः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
निर्वेदसमता युक्त्या=$वैराग्य, समता और युक्ति द्वारासंसृतेः =संसार से
चैतन्यस्य =चैतन्य के+ स्वम् =अपने को
मूर्तिपरिज्ञानम् =मूर्ति के ज्ञान कोतारयति =तारता है
कृत्वा =जानकरकिम् =क्या
यः =जोसः =वह
गुरुः न =गुरु नहीं है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिसने विषय-वासना को त्याग करके शत्रु और मित्र में समबुद्धि करके, और श्रुति के अनुकूल युक्ति से सच्चिदानन्द-रूप अपने आत्मा का साक्षात्कार किया है, और जिसने अपने को ही सर्वरूप से अनुभव किया है, उसने संसार से अपने को तारा है, दूसरा नहीं । हे जनक ! तुम अपने ही पुरुषार्थ से मुक्त होगे, दूसरे करके नहीं होगे ।

प्रश्न— संसार में लोग कहते हैं कि गुरु शिष्य को मुक्त कर देता है । आप उसके विरुद्ध ऐसा कहते हैं कि शिष्य अपने पुरुषार्थ से ही मुक्त होता है, यह क्या बात है ?

उत्तर— हे प्रियदर्शन ! संसार के लोग प्रायः करके अज्ञानी मूर्ख होते हैं, वे शास्त्र के तात्पर्य को और गुरु-शिष्य शब्दों के अर्थ को नहीं जानते हैं । क्योंकि वे कामना करके

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१४४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

होते हैं। जैसे कि मुसलमानों ने मान रक्खा है कि पैगम्बर
हमको पापों से छुड़ा देगा। एवं जैसे ईसाइयों ने मान
रक्खा है कि ईसा हमको पापों से छुड़ा देगा वैसे ही
और भी संसारी लोगों ने मान रक्खा है कि गुरु हमको
पापों से छुड़ा देगा, ऐसा उनका मानना दुःख का जनक है।
क्योंकि वेद और शास्त्र में कान में मंत्र फूंकनेवाले को गुरु
नहीं लिखा है, किन्तु जो अज्ञान और ज्ञान के कार्य जन्म-
मरण-रूपी संसार से आत्म-ज्ञान उपदेश करके छुड़ा देवे,
और चित्त के संशयों को दूर कर देवे, उसका नाम गुरु है,
मन्त्र फूंकनेवाले का नाम गुरु नहीं है। रामचन्द्रजी ने
वशिष्ठजी के प्रति हजारों शंकाएँ की थीं और जब सबका
उत्तर वशिष्ठजी ने देकर रामजी को संशयों से रहित करके
आत्मा का बोध करा दिया, तब रामजी ने वशिष्ठजी को
गुरु माना। अर्जुन ने श्रीकृष्णजी के प्रति हजारों शंकाएँ की
थीं। जब अर्जुन को भगवान् ने विराट्-रूप दिखाया, तब
उनको अर्जुन ने गुरु माना। इसी तरह और भी पूर्व जितने
श्रेष्ठ पुरुष हुए हैं, उन्होंने चित्त के सन्देह दूर करनेवाले को
ही गुरु करके माना है। सो भी व्यवहार-दृष्टि से ही माना
है, आत्म-दृष्टि से नहीं माना है। क्योंकि आत्म-दृष्टि में
आत्मा का भेद नहीं है।

अष्टावक्रजी ने आत्म-दृष्टि को ले करके कहा है कि
संसारी मूर्ख कान में मंत्र फूंकनेवाले गुरु के ही अज्ञानार्थ शिष्य
पूरे पशु बन जाते हैं, क्योंकि उनको बोध नहीं है कि पार-
मार्थिक गुरु आत्म-ज्ञानी का ही नाम है। ऐसे गुरु तो
संसार में बहुत दुर्लभ हैं। दूसरा गुरु गायत्री का मन्त्र

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नवाँ प्रकरण । १४५

देनेवाला है । तीसरा गुरु व्यावहारिक विद्या का पढ़ानेवाला है । चौथा सत्सङ्ग गुरु है ।

विद्या-दाता हजारों अक्षरों को पढ़ाता है, पशु से मनुष्य बनाता है, फिर भी लोग उसके उपकार को नहीं मानते हैं । जो दो चार अक्षरों के मन्त्र को कान में फूँक देता है, उसी के पूरे पशु बन जाते हैं । उसके उपदेश से कोई संशय दूर नहीं होता है, बल्कि उल्टी भेद-बुद्धि उत्पन्न होती है । कोई विष्णु का मन्त्र देकर महादेव से विरोधकरा देता है, कोई विष्णु से विरोध कराता है, कोई देवी का पशु बना देता है । कनफुकवे गुरु तो आप ही भेदवाद-रूपी कीच में फँसे हैं और शिष्यों को भी फँसाते हैं । अपनी जीविका के लिये शिष्यों के घरों में भिखारियों की तरह मारे-मारे फिरते हैं । जैसे वे मूर्ख हैं, वैसे उनके शिष्य भी मूर्ख हैं । क्योंकि जो सत् महात्मा संशयों का नाश करते हैं, उनकी वह सेवा-पूजा नहीं करते हैं । जो मूर्ख कनफुकवे गुरु संशयों में डालते हैं, उन्हीं की पूरी सेवा करते हैं ।

जब गुरु ही मोक्षमार्ग को नहीं जानते हैं, तब शिष्य कैसे जाने । शिष्यों के चित्तों में तो अनेक प्रकार के विषयों की कामनाएँ भरी हैं । उन कामनाओं की पूर्ति के लिये वे मन्त्र लेकर जपते हैं, और जपते जपते मर जाते हैं, परन्तु कामना किसी की भी पूरी नहीं होती है । इसी पर कबीरजी ने भी कहा है—

दोहा ।

गुरु लोभी, शिष्य लालची, दोनों खेलैं दाँव ।
दोनों डूबे बापड़े, बैठ पथर की नाव ॥ १ ॥

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१४६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

गुरुजन जाका है गृही, चेला गृही जो होय ।
कीच कीच को धोवते, दाग न छूटै कोय ॥ २ ॥
बँधे को बंधा मिलै, छूटै कौन उपाय ।
सेवा कर निर्बंध की, पल में देय छुड़ाय ॥ ३ ॥

एवं ‘गुरु-गीता’ में भी अज्ञानी मूर्ख गुरु का त्याग करना ही लिखा है—

ज्ञानहीनो गुरुस्त्याज्यो मिथ्यावादी विडम्बकः ।
स्वविश्रांति न जानाति परशान्ति करोति किम् ॥ १ ॥

जो गुरु ज्ञान से हीन हो, मिथ्यावादी हो, विडम्बी हो, उसका त्याग कर देना चाहिए । क्योंकि जब वह अपना ही कल्याण नहीं कर सकता है, तो शिष्यों का कल्याण क्या करेगा । ऐसे मूर्ख अज्ञानी गुरु के त्याग में बहुत से शास्त्रोक्त प्रमाण हैं, पर मूर्ख अज्ञानी लोग कुकर्मी मूर्ख गुरुओं को नहीं त्यागते हैं, क्योंकि प्रथम तो लोग आत्मा के ही कल्याण को नहीं जानते हैं । दूसरे उनके चित्त में भय रहता है कि गुरु के निरादर करने से हमारे को कोई विघ्न न हो जावे, इसी से मूर्खों के मूर्ख जन्म भर उनके पशु बने रहते हैं । इन मूर्ख शिष्य-गुरुओं का इस जगह में निरुपण करने का कोई प्रकरण नहीं है, इस वास्ते उनका प्रसंग छोड़ दिया जाता है । हे राजन् ! ज्ञान की प्राप्ति के अनन्तर गुरु-शिष्य-व्यवहार भी मिथ्या हो जाता है, क्योंकि उसकी भेद-बुद्धि नहीं रहती है ॥ ६ ॥

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नवाँ प्रकरण । १४७

मूलम् ।
पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान यथार्थतः ।
तत्क्षणाद्वन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि ॥ ७ ॥

पदच्छेदः ।
पश्य, भूतविकारान्, त्वम्, भूतमात्रान्, यथार्थतः, तत्क्षणात्, बन्धनिर्मुक्तः, स्वरूपस्थः, भविष्यसि ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यदा=जबतत्क्षणात्=उसी समय
भूतविकारान्= { भूतों के कार्य देह, इन्द्रिय आदि कात्वम्=तू
यथार्थतः=वास्तव मेंबन्धविनिर्मुक्तः= { बन्ध से छूटा हुआ
भूतमात्रान्=भूत मात्रस्वरूपस्थः= { अपने स्वरूप में स्थित
पश्य=देखेगाभविष्यसि=होगा ॥

भावार्थ ।
हे जनक ! भूतों के विकार जो देह इन्द्रियादिक हैं, उनको यथार्थ-रूप से तुम भूत-मात्र देखो, आत्म-रूप करके उनको तुम मत देखो । जब तुम ऐसे देखोगे, तब उसी क्षण में शरीरादिकों से पृथक् होकर आत्म-स्वरूप में स्थित हो जाओगे और उनका साक्षीभूत आत्मा भी तुमको करामल-कवत् प्रत्यक्ष प्रतीत होने लगेगा ॥ ७ ॥

मूलम् ।
वासना एव संसार इति सर्वा विमुञ्च ताः ।
तत्त्यागो वासनात्यागात् स्थितिरद्य यथा तथा ॥ ८ ॥

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१४८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।
वासनाः, एव, संसारः, इति, सर्वाः, विमुञ्च, ताः,
तत्त्यागः, वासनात्यागात्, स्थितिः, अद्य, तथा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थः ।अन्वयः ।शब्दार्थः ।
वासना एव= वासनाएँ हीतत्त्यागः= { उसका अर्थात् संस्कार का त्याग है
संसारः= संसार हैअद्यः= ऐसा होने पर
इति= ऐसायथा= { जैसा कर्म है अर्थात् प्रारब्ध है
ज्ञात्वा= जानकरतथा= उसके अनुसार
ताः सर्वाः= { उन सब वासनाओं कोस्थितिः= { शरीर की स्थिति है ॥
विमुञ्च= (तू) त्याग
वासनात्यागात्= { वासना के त्याग से

भावार्थ ।
**प्रश्न—**पूर्वोक्त युक्ति से जब पुरुष आत्मा को जान भी लेगा, तब फिर उसमें उसकी निष्ठा कैसे होवेगी ?
**उत्तर—**विषयों की जो अनेक वासनाएँ हैं, वही संसार है अर्थात् बंधन है । 'योगवाशिष्ठ' में कहा है—
लोकवासनया जन्तोः शास्त्रवासनयापि च ।
देहवासनया ज्ञानं यथावन्नैव जायते ॥ १ ॥
वासनाएं तीन प्रकार की हैं । १—लोक-वासना अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोक की प्राप्ति मुझको हो ।
२—दूसरी शास्त्र-वासना अर्थात् सब शास्त्रों को पढ़कर मैं ऐसा पण्डित हो जाऊँ कि मेरे तुल्य दूसरा कोई न हो ।

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नवाँ प्रकरण । १४९

३—तीसरी शरीर की वासना अर्थात् मेरा शरीर सबसे सुन्दर और पुष्ट सदैव बना रहे ।

इन तीनों प्रकार की वासनाओं के त्याग करने से पुरुष बन्ध से छूट जाता है और उसका चित्त आत्मा में भी स्थिर हो जाता है ।

प्रश्न—समस्त वासनाओं के त्याग कर देने से शरीर की स्थिति कैसी होगी ?

उत्तर—जैसे दुग्ध पीनेवाले बालक के, और उन्मत्त अर्थात् पागल के शरीर की स्थिति प्रारब्ध-कर्म से होती है, वैसे विद्वान् निर्वासनिक के शरीर की स्थिति भी प्रारब्ध-कर्म के वश से रहती है, परन्तु यह वासना कि शरीर की स्थिति कैसे होगी, इसका त्याग ही करना उचित है ।

प्रश्न—यदि पुरुष समग्र वासनाओं का त्याग कर देगा, तब आत्म-ज्ञान को भी वह नहीं प्राप्त होगी, क्योंकि मुमुक्षु को आत्म-ज्ञान की प्राप्ति की वासना सर्वदा बनी रहती है और ज्ञानवान् को भी चित्त के निरोध करने की वासना बनी रहती है, फिर जीवन्मुक्त होने की उसको वासना बनी रहती है । सर्व वासनाओं का त्याग तो किसी से भी नहीं हो सकता है ।

उत्तर—'वाल्मीकीय रामायण' में ऐसा लिखा है—

वासना द्विविधा प्रोक्ता शुद्धा च मलिना तथा ।
मलिना जन्महेतुः स्याच्छुद्धा जन्मविनाशिनी ॥ १ ॥

दो प्रकार की वासनाएँ कही गई हैं—पहली शुद्ध

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१५० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

वासना, दूसरी मलिन वासना । किसी प्रकार से मेरी मुक्ति
हो और मैं अपनी आत्मा का साक्षात्कार करूँ, उसके लिये
जो वृत्ति आदिकों का निरोध करना है, वह शुभ वासना
है। विषय भोगों की प्राप्ति की जो वासना है, वह मलिन
वासना है। दोनों में से मलिन वासना जन्म का हेतु है और
शुद्ध वासना जन्म का नाशक है। जो चतुर्थ भूमिकावाला
ज्ञानी है और जो मुमुक्षु है, उनके लिये शुभ वासना का
त्याग नहीं है, किन्तु अशुभ वासना का ही त्याग है। क्योंकि
विदेहमुक्ति में आत्म-ज्ञान की ही प्रधानता है। शुभ वासना
का नाश उपयोगी नहीं है, परन्तु जीवन्मुक्ति के लिये समग्र
वासनाओं का त्याग और मन का भी नाश और आत्म-ज्ञान,
ये तीनों उपयोगी हैं।

यहाँ पर अष्टावक्रजी जीवन्मुक्ति के सुख के लिये
जनकजी से कहते हैं कि तू समग्र वासनाओं का त्याग
कर ॥ ८ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां नवमं प्रकरणं समाप्तम् ।

—:०:—

दसवाँ प्रकरण (शान्ति-वर्णन)

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दशवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलम् ।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

विहाय, वैरिणम्, कामम्, अर्थम्, च, अनर्थसंकुलम्, धर्मम्, अपि, एतयोः, हेतुम्, सर्वत्र, अनादरम्, कुरु ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
वैरिणम्=वैरी-रूपहेतुम्=कारण-रूप
कामम्=कामना कोधर्मम्=धर्म को
च=औरअपि=भी
अनर्थसंकुलम्=अनर्थ से भरे हुएविहाय=छोड़कर
अर्थम्=अर्थ कोसर्वत्र=धर्म, अर्थ और काम के हेतु कर्मों को
विहाय=त्याग करके
च=और
एतयोः=उन दोनों कोअनादरम् कुरु=अनादर कर ॥

भावार्थ ।

पहले प्रकरण में विषयों के विना भी संतोष-रूप वैराग्य

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१५२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

का निरूपण किया है । अब इस प्रकरण में विषयों की तृष्णा के त्याग का निरूपण करते हैं ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! काम शत्रु है । यह काम ही सम्पूर्ण अनर्थों का मूल है और बड़ा दुर्जय है ।

आत्मपुराण में कहा है—

कामेन विजितो ब्रह्मा कामेन विजितो हरः ।
कामेन विजितो विष्णुः शक्रः कामेन निर्जितः ॥ १ ॥

कामदेव ही ने ब्रह्मा को जीता, विष्णु को जीता, इन्द्र को जीता, महादेव को जीता, अतएव सब अनर्थों का मूल कारण कामदेव ही है । धन के संग्रह और रक्षा करने में जो दुःख होता है, और उसके नाश होने में जो शोक होता है, उसका मुख्य कारण काम ही है । हे जनक ! काम का कारण जो धर्म है, उसको और सकाम कर्मों को तुम त्याग करो, क्योंकि ये सब जीवन्मुक्ति में प्रतिबन्धक हैं ॥ १ ॥

मूलम् ।

स्वप्नेन्द्र जालवत्पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा ।
मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

स्वप्न, इन्द्रजालवत्, पश्य, दिनानि, त्रीणि, पञ्च, वा, मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥

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दसवाँ प्रकरण । १५३

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मित्रक्षेत्रधना-$\Bigg{$ मित्र, क्षेत्र, धन,त्रीणि=तीन
गारदारदाया-$\Bigg{$ मकान, स्त्री, भाईवा=या
दिसम्पदः$\Bigg{$ आदि सम्पत्तियों कोपञ्च=पाँच
स्वप्नेन्द्रजाल-$\Bigg{$ स्वप्न और इन्द्र-दिनानि=दिनों तक
वत्$\Bigg{$ जाल के समानपश्य=(तू) देख

भावार्थ ।

**प्रश्न—**अनेक प्रकार के सुखों को देनेवाले जो स्त्री पुत्रादिक विषय हैं, उनका निरादर करके त्याग कैसे हो सकता है ?
**उत्तर—**हे शिष्य ! स्त्री, पुत्र, धन, मित्र क्षेत्रादिक जितने कि भोग के साधन हैं, इन सबको तुम स्वप्न और इन्द्रजाल की तरह देखो, क्योंकि ये सब पाँच या तीन दिन के रहनेवाले हैं, और सब दृष्टनष्ट हैं याने देखते ही नष्ट हो जाते हैं । इस वास्ते इनमें ममता का त्याग करना उत्तम है ॥ २ ॥

मूलम् ।

यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै ।
प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

यत्र, यत्र, भवेत्, तृष्णा, संसारम्, विद्धि, तत्र, वै, प्रौढवैराग्यम्, आश्रित्य, वीततृष्णः, सुखी, भव ॥

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१५४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यत्र यत्र =जिस जिस वस्तु मेंप्रौढवैराग्यम् =असाधारण वैराग्य को
तृष्णा =इच्छाआश्रित्य =आश्रय करके
भवेत् =होवेवीततृष्णः =तृष्णा-रहित होता हुआ
तत्र =उस उस विषेसुखी भव =सुखी हो ॥
संसारम् =संसार को
विद्धि =( तू ) जान
वै =निश्चयपूर्वक

भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिस-जिस प्रसिद्ध विषय में मन की तृष्णा उत्पन्न होती है, उसी उसी विषय को तुम संसार का हेतु जानो । क्योंकि विषयों की तृष्णा ही कर्म द्वारा संसार का हेतु है । यही वार्ता ‘योगवाशिष्ठ’ में भी लिखी है—

मनोरथरथारूढं युक्तमिन्द्रियवाजिभिः ।
भ्राम्यत्येव जगत्कृत्स्नं तृष्णासारथिचोदितम् ॥ १ ॥

मनोरथ-रूपी रथ है, इन्द्रिय-रूपी घोड़े उसके आगे बँधे हैं, उसी रथ पर सारा जगत् आरूढ़ हो रहा है और तृष्णा-रूपी सारथि उसको भ्रमा रहा है ॥ १ ॥

यथा हि शृंगगोकाले वर्धमानेन वर्धते ।
एवं तृष्णापि चित्तेन वर्धमानेन वर्धते ॥ २ ॥

जैसे गौ के दोनों शृंग गौ के शरीर के साथ ही बराबर बढ़ते हैं, वैसे ही तृष्णा भी चित्त के साथ ही बराबर बढ़ती है ॥ २ ॥

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दसवां प्रकरण । १५५

प्राप्त पदार्थ के अधिक प्राप्त होने की इच्छा से और अप्राप्त पदार्थ के प्राप्त की इच्छा से रहित होकर आत्मा में निष्ठा करने से जीव सुखी होता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते ।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तिपुष्टिर्मुहुर्मुहुः ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

तृष्णामात्रात्मकः, बन्धः, तन्नाशः, मोक्षः, उच्यते, भवासंसक्तिमात्रेण, प्राप्तितुष्टिः, मुहुः, मुहुः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तृष्णामात्रात्मकः ={ तृष्णा-मात्र-स्वरूपभवासंसक्तिमात्रेण ={ संसार में असङ्ग होने से
बन्धः =बन्ध हैमुहुःमुहुः =वारंवार
तन्नाशः =उसका नाशप्राप्तितुष्टिः ={ आत्मा की प्राप्ति और तृप्ति होती है ॥
मोक्षः =मोक्ष
उच्यते =कहा जाता है

भावार्थ ।

तृष्णा-मात्र का नाम ही बन्ध है और उसके नाश का नाम मोक्ष है, 'योगवाशिष्ठ' में कहा है—

च्युता दन्ताः सिताः केशा दृङ् निरधोः पदे पदे ।
यातसज्जमिमं देहं तृष्णा साध्वी न मुञ्चति ॥ १ ॥

अर्थात् पुरुष के दांत टूट भी जाते हैं, केश श्वेत हो जाते हैं, नेत्र की दृष्टि कम भी हो जाती है और कदम-कदम पर पांव

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१५६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

फिसलते भी हैं, पर तब भी यह तृष्णा उस पुरुष से नहीं त्यागी जाती है ॥ १ ॥

तृष्णे देविनमस्तुभ्यं धैर्यविप्लवकारिणी ।
विष्णुस्त्रैलोक्यपूज्योऽपि यत्त्वया वामनीकृतम् ॥ २ ॥

हे तृष्णे ! हे देवि ! तेरे प्रति मेरा नमस्कार है, क्योंकि तू पुरुष की धैर्यता नाश करनेवाली है । जो विष्णु तीनों लोकों में पूज्य था, उसको भी तूने वामन याने छोटा बना दिया ॥ २ ॥

हे जनक ! तृष्णा का त्याग ही मुक्ति का हेतु है ॥४॥

मूलम् ।
त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा ।
अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।
त्वम्, एकः, चेतनः, शुद्धः, जडम्, विश्वम्, असत्, तथा, अविद्या, अपि, न, किञ्चित्, सा, का, बुभुत्सा, यथा, अपि, ते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
त्वम् =तूतथा =वैसे ही
एकः =एकसा अविद्या अपि=$वह अविद्या भी
शुद्धः =शुद्ध
चेतनः =चैतन्य-रूप हैन किञ्चित् =असत् है
विश्वम् =संसारतथा अपि =ऐसा होने पर भी
जडम् =जड़ते =तुझको
च =औरका =क्या
असत् =असत् हैबुभुत्सा =जानने की इच्छा है ॥
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दशवाँ प्रकरण । १५७

भावार्थ ।

प्रश्न–यदि तृष्णा-मात्र बन्धन का हेतु माना जावे, तो आत्मज्ञान की प्राप्ति का हेतु भी तृष्णा-बन्धन का हेतु होना चाहिए ?

उत्तर–अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! इस जगत् में तीन ही पदार्थ हैं—एक आत्मा, दूसरा जगत्, तीसरी अविद्या ।

प्रथम आत्मा के लक्षण को दिखाते हैं—

स्थूल सूक्ष्मकारणशरीराद्व्यतिरिक्तोऽवस्थात्रयसाक्षी सच्चिदानन्दस्वरूपो यस्तिष्ठति स आत्मा ॥ १ ॥

अर्थ—जो स्थल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों शरीरों से भिन्न है और जो जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं का साक्षी सच्चिदानन्द है, वही आत्मा है ॥ १ ॥

उसकी प्राप्ति के लिये तृष्णा करना उचित है ।

अनादिभावत्वे सति ज्ञाननिवर्तत्वमज्ञानत्वम् ॥ २ ॥

जो अनादिभाव-रूप है, और आत्म-ज्ञान करके निवृत्त है, वही अज्ञान अर्थात् अविद्या है ॥ २ ॥

गच्छतीति जगत् ॥ ३ ॥

जो सदैव गमन करता रहे अर्थात् नदी के प्रवाह की तरह चलता रहे, वही जगत् है ॥ ३ ॥

हे जनक ! तुम इन तीनों में से एक ही चेतन शुद्ध आत्मा हो, अपने आत्मा को ही पूर्ण-रूप करके निश्चय करो और जगत् को असत्-रूप करके जानो । अविद्या सदसत् से

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१५८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

विलक्षण और अनिर्वचनीय है। उसका कार्य जगत् भी
अनिर्वचनीय है। इस वास्ते इन दोनों में तृष्णा करनी अनु-
चित है, क्योंकि दोनों मिथ्या हैं। मिथ्या वस्तु में मूर्ख
अज्ञानी तृष्णा को करता है, ज्ञानवान् कदापि नहीं करता
है॥५॥

मूलम्।
राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च।
संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि॥६॥

पदच्छेदः।
राज्यम्, सुताः, कलत्राणि, शरीराणि, सुखानि, च,
संसक्तस्य, अपि, नष्टानि, तव, जन्मनि, जन्मनि।

अन्वयः। शब्दार्थ।अन्वयः। शब्दार्थ।
राज्यम्=राज्यनष्टानि=नष्ट हुए हैं
सुताः=लड़के+च=और
कलत्राणि=स्त्रियाँतव=तेरे
शरीराणि=शरीरअपि=भी
च=औरएते=ये सब
सुखानि=सुखजन्मनि जन्मनि=हर एक जन्म में
संसक्तस्य=आसक्त पुरुष केनष्टानि=नष्ट हुए हैं॥

भावार्थ।
अष्टावक्रजी जगत् को असत्य-रूप दिखलाते हैं—
हे जनक ! राजभोग और स्त्री, पुत्रादिक ये सब तो
तुमको अनेक जन्मों में मिलते ही रहे हैं और नष्ट भी होते
रहे हैं। क्योंकि पहले जन्मों में जो तुमको स्त्री-पुत्रादिक